सुशील जोशी

आवर्त तालिका किसी परिचय की मोहताज़ नहीं है। यह वक्तव्य जितना आवर्त तालिका यानी पीरियॉडिक टेबल पर लागू होता है उतना अन्यत्र कहीं नहीं। सचमुच सारे हाई स्कूल छात्र इस तालिका के बारे में जानते हैं। तो कहने को क्या बच जाता है? बहुत कुछ।

इस वर्ष अन्तर्राष्ट्रीय आवर्त तालिका वर्ष मनाया जा रहा है क्योंकि इस वर्ष मेंडेलीव (1834-1907) की प्रथम आवर्त तालिका के प्रकाशन (1869) के डेढ़ सौ वर्ष पूरे हुए हैं। रसायन शास्त्री आवर्त तालिका को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धि मानते हैं और...। खैर, उस गुणगान में न जाते हुए मुद्दे पर आते हैं।

1869 में दिमित्री मेंडेलीव ने अपनी प्रथम आवर्त तालिका प्रकाशित की थी। सवाल यह है कि क्या तब से लेकर आज तक हम उसी से काम चला रहे हैं। दरअसल, आवर्त तालिका से पहले और बाद में बहुत कुछ घटा है और यहाँ हम उसी की बात करेंगे। तो पहले संक्षेप में देखते हैं कि 1869 से पहले क्या-कुछ हुआ था।

सर्वप्रथम तो यह जान लेना चाहिए कि आवर्त तालिका का सम्बन्ध तत्वों से है। तत्व क्या होते हैं, इसकी ठीक-ठाक कामकाजी परिभाषा विज्ञान को सबसे पहले 1661 में रॉबर्ट बॉयल ने दी थी। उनके अनुसार, तत्व वे मूल व सरल पदार्थ हैं जिनसे मिलकर सारे मिश्रित पदार्थ (यौगिक) बने हैं और जिन्हें अन्तत: तत्वों में विभक्त किया जा सकता है। 1789 में एन्तोन लैवॉज़िए ने एक बार फिर तत्वों को परिभाषित किया: तत्व वे पदार्थ हैं जिन्हें रासायनिक अभिक्रिया के द्वारा और अधिक सरल पदार्थों में नहीं तोड़ा जा सकता। हालाँकि, लैवॉज़िए ने अपनी पाठ्य पुस्तक में तत्वों की जो सूची दी थी, उसमें मात्र 33 तत्व थे और उन्होंने प्रकाश और कैलोरिक (ऊष्मा) को भी तत्व मानकर इस सूची में जगह दी थी। इसके बावजूद तत्वों की उनकी परिभाषा ने लगभग पूरी उन्नीसवीं सदी में रसायन शास्त्र की प्रगति को गति दी थी।

फिर आया डाल्टन का परमाणु सिद्धान्त (1806)। डाल्टन से पहले भी वैज्ञानिक इस बारे में विचार करने लगे थे कि पदार्थ की अन्तिम या सबसे छोटी इकाई क्या होगी। इस सन्दर्भ में कणाद और डेमोक्रिटस के नाम लिए जाते हैं। डाल्टन के परमाणु सिद्धान्त में यह कहा गया कि पदार्थ की सबसे छोटी इकाई परमाणु होती है। अलबत्ता, डाल्टन का प्रमुख योगदान ‘परमाणु भार’ है। डाल्टन ने उस समय ज्ञात समस्त तत्वों को एक परमाणु भार दिया। उन्होंने इसके लिए हाइड्रोजन के एक परमाणु को इकाई माना और उसकी तुलना में सारे तत्वों के परमाणु भारों की गणना की। परमाणु भारों की रोचक कहानी के लिए पढ़ें संदर्भ अंक-80। इसके बाद कई रसायन शास्त्रियों के दिमाग में यह सवाल कौंधने लगा कि क्या तत्वों के गुणधर्मों का उनके परमाणु भार से कुछ सम्बन्ध है। इसी सवाल की परिणति आवर्त तालिका के रूप में हुई।

परमाणु भारों में सबसे पहले कोई पैटर्न खोजने का श्रेय विलियम प्राउट (1785-1850) को जाता है जिन्होंने 1815 में यह ध्यान दिया था कि सब तत्वों के परमाणु भार हाइड्रोजन के परमाणु भार के गुणज (मल्टीपल) लगते हैं।

इसके बाद नाम आता है जोहान वोल्फगांग डॉबराइनर (1780-1849) का। वे तत्वों के वर्गीकरण की कोशिश में जुटे थे। वैसे उससे पहले तत्वों को धातु-अधातु में बाँटा जा चुका था। लेकिन वे इस वर्गीकरण को परमाणु भार के सन्दर्भ में रखना चाहते थे। 1829 में उन्होंने पाया कि वे एक जैसे गुणधर्मों वाले तीन-तीन तत्वों के समूह बना सकते हैं। और यदि प्रत्येक समूह में वे तत्वों को परमाणु भार के बढ़ते क्रम में रखें तो बीच वाले तत्व का परमाणु भार शेष दो तत्वों के परमाणु भार के औसत के लगभग बराबर होता है। इन समूहों को उन्होंने ट्राएड यानी तिकड़ियाँ कहा। जैसे-

क्लोरीन, ब्रोमीन, आयोडीन
कैल्शियम, स्ट्रॉन्शियम, बैरियम
सल्फर, सेलेनियम, टेलुरियम
लीथियम, सोडियम, पोटेशियम

एक मायने में डॉबराइनर की ये तिकड़ियाँ तत्वों के परमाणु भार और उनके गुणधर्मों के बीच तालमेल बनाने का प्रथम प्रयास कहा जा सकता है। इसके बाद तो यह विचार चल निकला।

एलेक्ज़ेंडर-एमील बेगुएर डी’चानकोर्टोइस (1820-1886) रसायन शास्त्री नहीं बल्कि भूगर्भ वैज्ञानिक थे। उन्होंने सबसे पहले यह ध्यान दिया था कि तत्वों के गुणधर्मों में परमाणु भार के अनुसार एक आवर्तता पाई जाती है - अर्थात् परमाणु भार के अनुसार जमाने पर तत्वों के गुण एक नियमित अन्तराल के बाद दोहराए जाते हैं। 1862 में उन्होंने एक बेलन बनाया जिसे नाम दिया विस टेलुरिक। जब इस बेलन पर तत्वों को परमाणु भार के बढ़ते क्रम में एक सर्पिलाकार पैटर्न में लिखा जाता तो एक समान गुणधर्मों वाले तत्व एक खड़ी रेखा में नज़र आते थे। दिक्कत यह थी कि भूगर्भ वैज्ञानिक होने के कारण उन्होंने अपने शोध पत्र में रासायनिक की बजाय भूगर्भ वैज्ञानिक शब्दों का उपयोग किया था और विस टेलुरिक में तत्वों के अलावा आयनों और यौगिकों को भी शामिल किया था। उनकी बातें लोगों को समझ में नहीं आईं और मेंडेलीव की तालिका के प्रकाशन के बाद ही इन पर ध्यान दिया गया।

तत्वों के गुणधर्मों और परमाणु भारों के बीच सम्बन्ध को स्पष्ट रूप से सामने रखने का काम किया जॉन न्यूलैंड्स (1837-1898) ने और जिस तरह से उन्होंने इसे व्यक्त किया, उसकी खूब खिल्ली भी उड़ाई गई। 1864 में न्यूलैंड्स ने देखा कि समान गुणों वाले तत्वों (उस समय 62 तत्व ज्ञात हो चुके थे) की कई जोड़ियाँ हैं जिनके परमाणु भारों के बीच 8 या 8 के गुणज का अन्तर होता है।

न्यूलैंड्स ने इसे सप्तक का नियम कहा। केमिस्ट्री न्यूज़ में प्रकाशित अपने पर्चे में न्यूलैंड्स ने इसे संगीत के सप्तक के समान बताया था जिसका कुछ रसायनविदों ने मखौल बनाया। उन्होंने मार्च 1866 में अपनी इस खोज को लेकर केमिस्ट्री सोसायटी में व्याख्यान भी दिया था लेकिन सोसायटी ने यह कहकर उसे प्रकाशित नहीं किया कि ‘सैद्धान्तिक’ विषय विवादास्पद हो सकते हैं। न्यूलैंड्स के इस ‘सैद्धान्तिक योगदान’ को तभी मान्यता मिली जब मेंडेलीव की आवर्त तालिका प्रकाशित होकर स्वीकार कर ली गई। रॉयल केमिस्ट्री सोसायटी ने तो आवर्त नियम के प्रतिपादन में न्यूलैंड्स के योगदान को अन्तत: 2008 में स्वीकार किया और उन्हें ‘रासायनिक तत्वों के आवर्त नियम का खोजकर्ता’ माना।

लगभग इसी समय (1862) जूलियस लोथर मेयर (1830-1895) का ध्यान भी इस बात पर गया। उन्होंने भी पाया कि यदि तत्वों को परमाणु भार के क्रम में जमाया जाए तो उनमें एक जैसे भौतिक व रासायनिक गुणधर्मों वाले तत्व एक निश्चित अन्तराल पर दोहराए जाते हैं। उन्होंने इस बात को यों रखा: यदि आप परमाणु भार को क्ष-अक्ष पर लें और य-अक्ष पर परमाणु आयतन को रखकर ग्राफ बनाएँ तो उस ग्राफ में कई अधिकतम व न्यूनतम बिन्दु दिखाई पड़ते हैं। उन्होंने पाया कि एक जैसे तत्व इस ग्राफ पर एक जैसे स्थानों पर आते हैं। जैसे लीथियम, सोडियम, पोटेशियम, रुबिडियम और सीज़ियम ग्राफ के शिखर वाले बिन्दुओं पर आते हैं। वैसे यहाँ एक जायज़ सवाल यह है कि लोथर मेयर को परमाणु आयतन के आँकड़े कहाँ से मिले। हम उसमें नहीं जाएँगे।

मेंडेलीव की आवर्त तालिका तक पहुँचने का इतिहास जानी-मानी कहानी है। इसे आप संदर्भ के पुराने अंकों (खास तौर से अंक-6) में विस्तार में पढ़ सकते हैं। यहाँ मैं इससे आगे की बात करना चाहूँगा। दरअसल, आवर्त तालिका की कथा का महत्व सिर्फ इतना नहीं है कि इस साल इसकी 150वीं सालगिरह मनाई जा रही है। आवर्त तालिका के विकास की कहानी वास्तव में स्वयं रसायन शास्त्र के विकास की कहानी है। तत्वों को परिभाषित करने से लेकर नए तत्वों की खोज और तत्वों के गुणधर्मों को उनके परमाणुओं की संरचना से जोड़ना आदि इसके प्रमुख उपादान हैं। और तो और, कई विद्वानों का मत है कि परमाणु के इलेक्ट्रॉन विन्यास की खोजबीन मूलत: तत्वों के गुणों में आवर्तता की व्याख्या के प्रयास से प्रेरित थी।

मेंडेलीव ने तालिका बनाने में उस समय उपलब्ध सारे तत्वों को शामिल करने की कोशिश की थी। इनके परमाणु भारों (ज़्यादा सही शब्दों में आपेक्षिक परमाणु द्रव्यमानों) और उनके गुणों में आवर्तता का एक नियम विकसित किया था। यह नियम आँकड़ों के आधार पर निकला था। लेकिन कुछ तत्वों के आँकड़े नियम में फिट नहीं हो रहे थे। यहीं पर मेंडेलीव की सोच महत्वपूर्ण साबित हुई थी। उन्होंने माना कि नियम तो सही है, लिहाज़ा आँकड़ों में कुछ गड़बड़ होगी। इस आधार पर उन्होंने कहा कि कुछ तत्वों के परमाणु भारों के मापन में त्रुटि हुई है। इन तत्वों के परमाणु भारों को गलत मानकर उन्होंने इन्हें उनके रासायनिक गुणधर्मों के हिसाब से ‘सही’ स्थान पर रखा था। उदाहरण के लिए, आयोडीन और टेलुरियम को देख सकते हैं। परमाणु भार के लिहाज़ से देखें तो टेलुरियम का परमाणु भार (128) आयोडीन (127) से अधिक है। लेकिन यदि उन्हें परमाणु भार के आधार पर जमाया जाता तो आयोडीन रासायनिक दृष्टि से गलत जगह पर आ जाता।

तो उन्होंने इन दो तत्वों को रासायनिक समानता के आधार पर स्थान दिया और उनके संकेतों के सामने प्रश्न चिन्ह लगा दिया, जो दर्शाता था कि मेंडेलीव को उनके परमाणु भार के सही होने पर सन्देह था। इसी तरह के अन्य उदाहरण हैं: कोबाल्ट (58.9) और निकल (58.6) तथा थोरियम (232.12) और प्रोटेक्टिनियम (231)। यदि पूरी तालिका को सदैव परमाणु भारों के आधार पर ही व्यवस्थित किया जाता तो कई अन्य दिक्कतें भी पेश आतीं। जैसे आर्गन (परमाणु भार 40) को पोटेशियम (39) के पहले रखा जाता और थोरियम (232.12) को प्रोटेक्टिनियम (231) के पहले रखा जाता। कारण यह था कि यदि मात्र परमाणु भार के आधार पर जमाते तो ये तत्व गलत रासायनिक दोस्तों के साथ रखे जाते, जो स्वीकार्य न होता। इस समस्या का समाधान होने में 50 साल लग गए।

यह सही है कि कुछ तत्वों को उनके रासायनिक मित्रों के साथ रखते हुए मेंडेलीव ने उनके परमाणु भारों को लेकर जो सन्देह व्यक्त किया था, वह कुछ मामलों में सही साबित हुआ किन्तु कई अन्य मामलों में वे गलत साबित हुए थे। उनकी गलती को सुधारने हेतु एक नई अवधारणा की ज़रूरत थी जिसे आते-आते समय लगा। उसकी बात करने से पहले कुछ और समस्याएँ।

समस्थानिक तत्व: समस्या भी, समाधान भी
कई वैज्ञानिकों के प्रयासों से धीरे-धीरे यह स्पष्ट हुआ कि कई तत्व वास्तव में मिश्रण होते हैं। इनके सारे परमाणु रासायनिक दृष्टि से तो एक समान होते हैं किन्तु इनके परमाणु भार अलग-अलग होते हैं। आवर्त तालिका के लिए यह एक नई समस्या थी। समस्या यह थी कि इन अलग-अलग परमाणु भार वाले तत्वों को तालिका में अलग-अलग स्थान दिया जाना चाहिए या नहीं।

समस्थानिकों की खोज कई रास्तों से हुई। एक बात तो यह सामने आई कि कुछ तत्वों के परमाणु भार इस बात पर निर्भर करते हैं कि उन्हें कहाँ से प्राप्त किया गया है। तो यह सवाल स्वाभाविक था कि एक ही तत्व के परमाणु भार अलग-अलग कैसे हो सकते हैं।

दूसरी बात रेडियोसक्रिय तत्वों की थी। ये वे तत्व थे जो लगातार विकिरण छोड़ते रहते थे और अन्य तत्वों में बदल जाते थे। उन्नीसवीं सदी के अन्तिम वर्षों में हेनरी बेकरल (1852-1908) ने रेडियोसक्रियता की खोज की थी। 1912 तक लगभग 50 रेडियोसक्रिय तत्व खोजे जा चुके थे। 1910 तक यह स्पष्ट हो चला था कि रेडियोसक्रियता की प्रक्रिया किसी तत्व को किसी अन्य तत्व में बदल सकती है। खास तौर से यह देखा गया कि युरेनियम व थोरियम नामक तत्वों के अयस्कों में कई ऐसे रेडियोसक्रिय पदार्थ पाए जाते हैं जो पहले कभी नहीं देखे गए थे। इन सारे पदार्थों को अलग-अलग तत्व माना गया और विशेष नाम भी दिए गए। जैसे युरेनियम के अयस्क में से ‘आयोनियम’ और ‘मेसोथोरियम’ प्राप्त हुए थे।

अब शुरू हुआ प्रयोगों का सिलसिला। पता चला कि यदि आयोनियम को थोरियम में मिला दिया जाए, तो उसे मात्र रासायनिक विधियों से वापिस प्राप्त करना असम्भव होता है। इसी प्रकार से यह भी दर्शा दिया गया कि मेसोथोरियम और रेडियम के बीच रासायनिक दृष्टि से कोई भेद नहीं है।

रसायन शास्त्री यह मानते हैं कि तत्व की एक कसौटी यह है कि यदि दो पदार्थों के बीच कोई रासायनिक भेद न हो तो उन्हें एक ही तत्व माना जाएगा। इस आधार पर रसायनज्ञों को मानना पड़ा कि आयोनियम और मेसोथोरियम नए तत्व नहीं हैं बल्कि पहले से ज्ञात तत्वों (थोरियम और रेडियम) के ही रूप हैं।

कुछ वर्षों बाद एक भौतिक शास्त्री फ्रेडरिक सॉडी (1877-1956) ने अलग-अलग स्रोतों से प्राप्त टिकाऊ तत्व सीसा (लेड) के परमाणु भारों की तुलना करके पर्चा प्रकाशित किया। उन्होंने पाया कि युरेनियम प्रचुर अयस्क से प्राप्त लेड का परमाणु भार 206.08 है जबकि थोरियम प्रचुर अयस्क से मिले लेड का परमाणु भार 207.69 है।

इसके बाद अन्य तत्वों के (जिनका सम्बन्ध युरेनियम-थोरियम से नहीं था) समस्थानिक भी खोज लिए गए। इस काम में प्रमुख भूमिका फ्रांसिस विलियम एस्टन (1877-1945) द्वारा विकसित मास स्पेक्ट्रोग्राफ की रही। यह एक ऐसा उपकरण है जो अणुओं और परमाणुओं को उनके आयनों में तोड़कर उनके द्रव्यमान बता सकता है। इस उपकरण के उपयोग से एस्टन ने 1919 में दर्शाया कि नियॉन नामक तत्व में दो तरह के परमाणु होते हैं, जिनके परमाणु भार 20 और 22 हैं।

मगर यहाँ दिक्कत शुरू हो जाती है। 1912 तक ऐसे 50 समस्थानिक खोजे जा चुके थे। इन सबके परमाणु भार अलग-अलग थे लेकिन कई सारे समस्थानिक रासायनिक रूप से हूबहू एक जैसे थे। इन्हें आवर्त तालिका में कहाँ रखा जाए। और बात सिर्फ रेडियोसक्रिय समस्थानिकों पर नहीं रुकी। यह भी पता चला कि कई साधारण तत्वों के भी ऐसे रूप होते हैं जिनके परमाणु भार अलग-अलग होते हैं। जैसे कार्बन और हाइड्रोजन में तीन-तीन तरह के परमाणु भार वाले अंश होते हैं। आज हम जानते हैं कि मात्र 25 प्रतिशत तत्व ही ऐसे हैं जिनके सारे परमाणुओं का भार एक बराबर होता है। अर्थात् 75 प्रतिशत तत्वों के समस्थानिक पाए जाते हैं। 1935 तक अधिकांश तत्वों के समस्थानिकों के अनुपात और उनके परमाणु भार ज्ञात हो चुके थे।

समस्थानिकों को लेकर हमारी समझ स्पष्ट करने में सॉडी का योगदान महत्वपूर्ण रहा है। उन्होंने 1910 में यह निष्कर्ष निकाला था कि “विभिन्न परमाणु भार वाले तत्वों के रासायनिक गुणधर्म एक समान हो सकते हैं।” लिहाज़ा, उनका मत था कि इन्हें आवर्त तालिका में एक ही स्थान पर रखा जाना चाहिए, हालाँकि वे इसका आधार स्पष्ट नहीं कर पाए थे। इसका आधार भी आगे चलकर स्पष्ट होगा।

नोबल तत्व
अक्रिय या नोबल गैसें मेंडेलीव की आवर्त तालिका के लिए नई समस्या बनकर आईं। 1894 में विलियम रैम्से (1852-1916) और जॉन विलियम स्ट्रट (लॉर्ड रेले, 1842-1919) ने आर्गन नामक एक नए तत्व की खोज की। उसके बाद रैमसे ने एक के बाद एक चार अन्य तत्वों (हीलियम, नियॉन, क्रिप्टॉन और ज़ीनॉन) की खोज की घोषणा कर डाली। इन्हें नोबल गैसें कहा गया क्योंकि ये गैसें बाकी सारे तत्वों से मुख्तलिफ थीं और उनके साथ क्रिया करके यौगिक भी नहीं बनाती थीं।

कई रसायन शास्त्रियों का मत था कि ये तत्व आवर्त तालिका के हिस्से ही नहीं हैं। वैसे भी मेंडेलीव या किसी अन्य ने ऐसे तत्वों की उपस्थिति की भविष्यवाणी भी नहीं की थी। इन्हें आवर्त तालिका में स्थान दिलवाने में 6 साल का वक्त लग गया था। 1903 में स्वयं मेंडेलीव ने आर्गन और हीलियम की उपस्थिति को स्वीकार करते हुए उन्हें आवर्त तालिका में समूह-0 बनाकर स्थान दे दिया। यह नया स्तम्भ हैलोजन और क्षार धातुओं के बीच जोड़ा गया था।

परमाणु संख्या
यह तो पता चल ही चुका था कि एक ही तत्व के परमाणु भार अलग-अलग हो सकते हैं। अर्थात् समस्थानिकों की उपस्थिति से स्पष्ट हो गया था कि परमाणु भार तत्व को परिभाषित करने वाला बुनियादी गुणधर्म नहीं है। यहीं से किसी अन्य गुणधर्म की खोज शुरू होना स्वाभाविक था।

परमाणु संख्या की अवधारणा का श्रेय भौतिक शास्त्री हेनरी मोसले (1887-1915) को जाता है। आम तौर पर कहा जाता है कि किसी भी परमाणु के नाभिक में प्रोटॉनों की संख्या ही उसकी परमाणु संख्या है। किन्तु परमाणु संख्या की हमारी समझ प्रोटॉनों को गिन-गिनकर नहीं आई है। परमाणु संख्या का सम्बन्ध एक्स-रे तस्वीरों के विश्लेषण से है। 1913 में एक शौकिया सैद्धान्तिक भौतिक शास्त्री एन्तोन ब्रोक (1870-1926) ने सुझाव दिया था कि तत्वों को जमाने में परमाणु भार की बजाय यदि परमाणु के नाभिकीय आवेश को आधार बनाया जाए, तो कहीं बेहतर नतीजे मिलेंगे। इस विचार की जाँच करने के लिए हेनरी मोसले ने एक्स-रे विश्लेषण का सहारा लिया था।

एक्स-रे का आविष्कार विलहेल्म रॉन्टगेन (1845-1923) ने 1895 में किया था। आविष्कार के तुरन्त बाद ही ये अनुसन्धान का एक प्रमुख विषय बन गई थीं। कई वैज्ञानिक देखना चाहते थे कि पदार्थों पर इनका क्या असर होता है। सबसे पहले चार्ल्स बारक्ला (1877-1944) ने बताया कि किसी तत्व का परमाणु भार जितना अधिक होगा, वह उितनी ही ज़्यादा तीव्रता वाली एक्स-रे पैदा करता है। इसके आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि एक्स-रे का पैटर्न किसी भी तत्व के परमाणु में इलेक्ट्रॉन की संख्या पर निर्भर करता है। गौरतलब है कि इलेक्ट्रॉन की खोज हो चुकी थी, मगर प्रोटॉन की नहीं।

बारक्ला के काम को मोसले ने आगे बढ़ाया। उन्होंने 12 तत्वों के एक्स-रे पैटर्न में K-लाइन पर गौर किया। इनमें से 10 तत्व आवर्त तालिका में एक के बाद एक स्थानों पर थे। मोसले ने पाया कि प्रत्येक तत्व के एक्स-रे वर्णक्रम में K-लाइन की आवृत्ति (फ्रिक्वेंसी) आवर्त तालिका में उस तत्व की स्थिति पर निर्भर करती है। मोसले का निष्कर्ष था कि परमाणु के अन्दर कोई ऐसी मूलभूत राशि है जो एक तत्व से अगले तत्व पर जाने पर नियमित मान में बदलती है। इसे उन्होंने परमाणु संख्या कहा। आगे चलकर रदरफोर्ड (1871-1937) ने प्रोटॉन की खोज की और बताया कि परमाणु संख्या और कुछ नहीं, किसी भी परमाणु के नाभिक में उपस्थित प्रोटॉनों की संख्या है। किन्तु आवर्त तालिका को परमाणु संख्या के अनुसार जमाने का काम इससे कई साल पहले शुरू हो चुका था।

मोसले ने एक्स-रे की लाइन और तत्व की परमाणु संख्या के बीच एक गणितीय समीकरण भी प्रतिपादित किया। इस तरह प्रायोगिक रूप से परमाणु संख्या का निर्धारण सम्भव हो गया। तो 1914 में मोसले ने मेंडेलीव की आवर्त तालिका को परमाणु संख्याओं के आधार पर व्यवस्थित किया और ऐसा करते ही मेंडेलीव की तालिका की कई समस्याएँ दूर हो गईं।

परमाणु संख्या और समस्थानिक
ऊपर हम समस्थानिक समस्या को देख ही चुके हैं। एक ही तत्व के परमाणुओं का भार अलग-अलग हो सकता है। समस्या यह है कि यदि परमाणु भार अलग-अलग हैं तो आवर्त तालिका में इन्हें अलग-अलग स्थान देना होगा। किन्तु ऐसे सारे समस्थानिक रासायनिक रूप से तो एक समान ही होते हैं। इस हिसाब से एक ही तत्व के विभिन्न समस्थानिक आवर्त तालिका में एक ही चौखाने में आने चाहिए।

मोसले ने दर्शाया कि दरअसल किसी भी तत्व के समस्थानिकों के परमाणु भार चाहे अलग-अलग हों किन्तु वे सभी एक ही परमाणु संख्या से पहचाने जा सकते हैं। इस पहचान के आधार पर हर तत्व के सारे समस्थानिकों को आवर्त तालिका में एक ही स्थान पर रखना सम्भव हुआ।

भटके हुए तत्व  
ऊपर हमने देखा था कि टेलुरियम और आयोडीन ने मेंडेलीव को काफी परेशान किया था। टेलुरियम (परमाणु भार 128) और आयोडीन (परमाणु भार 127) को परमाणु भार के आधार पर आवर्त तालिका में रखने पर दोनों ही रासायनिक दृष्टि से गलत स्थान पर रखे जा रहे थे। मेंडेलीव ने इसका समाधान यह निकाला था कि, हो न हो, आयोडीन का परमाणु भार गलत निकाला गया है। किन्तु परमाणु संख्या ने मामले को बहुत सफाई से सुलझा दिया। यदि परमाणु संख्या को आधार बनाया जाए तो आयोडीन (परमाणु संख्या 53) स्वत: ही टेलुरियम (परमाणु संख्या 52) के बाद आएगी और आपको प्रयोगों से निकाले गए उनके परमाणु भारों पर सन्देह करने की भी ज़रूरत नहीं पड़ेगी। और सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि आयोडीन अपने रासायनिक सम्बन्धियों (हैलोजन) के साथ बस गई।

यही स्थिति कोबाल्ट (परमाणु संख्या 27) और निकल (परमाणु संख्या 28), थोरियम (परमाणु संख्या 90) और प्रोटेक्टिनियम (परमाणु संख्या 91) के साथ भी हुई।
कुल मिलाकर परिणाम यह निकला कि नई आवर्त तालिका में सारे तत्व परमाणु संख्या के क्रम में भी जम गए और रासायनिक रूप से सही समूह में भी आ गए।

नए खाली स्थान  
मेंडेलीव ने परमाणु भार के आधार पर तालिका बनाते वक्त ध्यान दिया था कि कई जगहों पर कोई तत्व नहीं आ रहा है। उन्होंने इन रिक्तिकाओं के आधार पर नए तत्वों के खोजे जाने की भविष्यवाणी भी की थी और कई मामलों में मेंडेलीव की भविष्यवाणियाँ सही साबित हुईं। उन्होंने न सिर्फ तत्वों की खोज की बात कही थी बल्कि उन तत्वों के भौतिक व रासायनिक गुणों के बारे में अनुमान भी लगाए थे। मोसले द्वारा परमाणु संख्या को आधार बनाए जाने के बाद आवर्त तालिका में नए खाली स्थान सामने आए। और ये नए खाली स्थान इस आधार पर उभरे थे कि परमाणु संख्या एक पूर्णांक संख्या है। अत: यदि दो तत्वों के बीच एक से अधिक का अन्तर है तो उनके बीच कोई अन्य तत्व होना चाहिए। जैसे मोसले एक तो यह बता पाए कि हाइड्रोजन से युरेनियम तक कुल 92 तत्व होना चाहिए - हाइड्रोजन की परमाणु संख्या 1 है और युरेनियम की 92। तो अब एक सैद्धान्तिक आधार पर तत्वों को परिभाषित किया गया और देखा गया कि परमाणु संख्या के अनुसार जमाने पर क्या कोई ऐसी परमाणु संख्या बचती है जहाँ कोई तत्व नहीं है। मोसले के कार्य से पता चला कि आवर्त तालिका में 43 और 61 परमाणु संख्या वाले स्थान खाली हैं। बाद में इन स्थानों पर टेक्निशियम और प्रोमीथियम को जगह मिली।

आवर्त तालिका: कुछ पुरानी, कुछ आधुनिक समस्याएँ   
आवर्त तालिका के प्रथम प्रारूप से लेकर आज तक हाइड्रोजन नामक तत्व एक समस्या रहा है। इसे आवारा तत्व भी कहा गया है क्योंकि आवर्त तालिका में इसके स्थान को लेकर भ्रम है। यह एक सुपरिचित मुद्दा है और इसके बारे में विभिन्न पाठ्य पुस्तकों में लिखा गया है।

क्यों है आवर्तता?  
उन्नीसवीं सदी के अन्त तक यह तो स्पष्ट हो चुका था कि तत्वों के कई स्थूल गुणों (जैसे घनत्व, गलनांक, क्वथनांक) व सूक्ष्म गुणों (जैसे परमाणु के आकार, आयनीकरण ऊर्जा) में एक आवर्तता पाई जाती है। इसका मतलब यह है कि परमाणु संख्या बढ़ने के साथ किसी गुण का मान बढ़ता है लेकिन एक सीमा के बाद यह फिर कम होने लगता है। जैसे तत्वों के घनत्व और परमाणु संख्या का ग्राफ देखिए।

इस तरह की आवर्तता के मद्देनज़र यह लाज़मी था कि इसकी व्याख्या की कोशिश की जाती। इस सन्दर्भ में पहला प्रयास जे.जे. थॉमसन ने किया था। थॉमसन ने 1904 में इलेक्ट्रॉन की खोज की थी। उन्होंने न सिर्फ यह स्पष्ट किया था कि इलेक्ट्रॉन परमाणु का एक अभिन्न अंग है बल्कि परमाणु का एक मॉडल भी प्रस्तावित किया था।

थॉमसन के मुताबिक प्रत्येक तत्व के परमाणु में इलेक्ट्रॉनों की एक निश्चित संख्या पाई जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि परमाणु में ये इलेक्ट्रॉन वृत्तों में सजे होते हैं। आगे उन्होंने कहा कि प्रत्येक तत्व के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन की जमावट विशिष्ट होती है और इसी जमावट से उसके गुणधर्म तय होते हैं। वैसे थॉमसन के मॉडल में इलेक्ट्रॉन नाभिक के आसपास परिक्रमा नहीं करते थे बल्कि पूरे परमाणु में यहाँ-वहाँ धँसे होते थे। फिर भी इलेक्ट्रॉनों की जमावट को गुणधर्मों से जोड़कर देखने का यह पहला प्रयास था।

अलबत्ता, आवर्तता को समझना तभी सम्भव हुआ जब परमाणु का वह मॉडल प्रस्तुत हुआ जिसमें एक धनावेशित नाभिक के इर्द-गिर्द इलेक्ट्रॉन चक्कर काटते हैं। इसे सबसे पहले अर्नेस्ट रदरफोर्ड ने प्रस्तुत किया था और नील्स बोर ने इसका परिष्कृत रूप सामने रखा था।

धीरे-धीरे जो मॉडल उभरा उसने आवर्तता को समझने में काफी मदद की। परमाणु में एक नाभिक होता है, जिसमें उसका सारा धनावेश समाया होता है। धनावेश प्रोटॉन के रूप में होता है और प्रत्येक तत्व में प्रोटॉनों की संख्या निश्चित होती है, जिसे परमाणु संख्या कहते हैं। प्रत्येक परमाणु में उतने ही इलेक्ट्रॉन होते हैं जितने प्रोटॉन हैं। ये इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर काटते रहते हैं। प्रत्येक परमाणु के सारे इलेक्ट्रॉन एक ही पथ पर नहीं विचरते बल्कि उनके परिक्रमा पथ अलग-अलग होते हैं। इन समकेन्द्री परिक्रमा पथों को कक्षा कहते हैं। प्रत्येक कक्षा में कितने इलेक्ट्रॉन हो सकते हैं, यह निश्चित होता है। नाभिक के सबसे पास वाली कक्षा में अधिक-से-अधिक 2 इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं, उसके बाद वाली कक्षा में 8, तीसरी कक्षा में 18 वगैरह।

यहाँ यह बताना उपयोगी होगा कि उपरोक्त कक्षाओं की उप-कक्षाएँ भी होती हैं। पहली कक्षा में एक ही उप-कक्षा होती है। दूसरी कक्षा में 2, तीसरी में 3, चौथी में चार उप-कक्षाएँ होती हैं। उप-कक्षाओं को s, p, d, f वगैरह नामों से जाना जाता है। तो, उदाहरण के लिए तीसरी कक्षा में 3s, 3p और 3d उप-कक्षाएँ होंगी। फिलहाल इस बात की चिन्ता करने की ज़रूरत नहीं है कि ये नाम कहाँ से आए। बस, इतना याद रखना पर्याप्त होगा कि कक्षा क्रमांक से हमें उस कक्षा, उप-कक्षा के ऊर्जा के स्तर का बोध होता है। किसी भी परमाणु में इलेक्ट्रॉन उन्हीं कक्षाओं में विद्यमान रहते हैं।

साथ ही एक नियम और सामने आया - अष्टक का नियम। परमाणु में जो सबसे बाहर वाली कक्षा होगी उसमें अधिक-से-अधिक 8 इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं (ज़ाहिर है, यह नियम पहली कक्षा पर लागू नहीं होता क्योंकि उसमें तो मात्र 2 इलेक्ट्रॉन ही रह सकते हैं)।

एक महत्वपूर्ण सिद्धान्त प्रस्तुत हुआ जिसने आवर्तता की हमारी समझ को पुख्ता करने में योगदान दिया था। यह तो हम देख ही चुके हैं कि किसी भी परमाणु की सबसे बाहरी कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं। पहली कक्षा में तो मात्र 2 इलेक्ट्रॉन के लिए जगह है। लेकिन इसके आधार पर जो एक और सिद्धान्त निकला वह यह था कि प्रत्येक परमाणु की यह लालसा होती है कि उसकी बाह्यतम कक्षा पूर्ण हो। यानी यदि बाह्यतम कक्षा पहली है तो उसमें 2 इलेक्ट्रॉन पाने की चाह रहती है और यदि वह बाह्यतम कक्षा दूसरी, तीसरी वगैरह है तो परमाणु चाहता है कि उसमें 8 इलेक्ट्रॉन मौजूद हों। पूर्ण बाह्यतम कक्षा परमाणु को स्थिरता प्रदान करती है।

यदि बाहरी कक्षा में पूर्णता से कम या ज़्यादा इलेक्ट्रॉन हैं तो परमाणु अन्य परमाणुओं से इस तरह क्रिया करता है कि उसकी बाह्यतम कक्षा पूर्णता प्राप्त कर ले। जैसे सोडियम के परमाणु में 11 इलेक्ट्रॉन होते हैं। उसकी पहली कक्षा में 2 इलेक्ट्रॉन रहेंगे, दूसरी कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन रह सकते हैं और तीसरी कक्षा के लिए बचा 1 इलेक्ट्रॉन। अब यदि सोडियम के परमाणु की बाहरी कक्षा को पूर्ण होना है तो दो तरीके हैं। या तो वह बाहरी कक्षा में कहीं से 7 और इलेक्ट्रॉन ले आए या फिर बाहरी कक्षा के 1 इलेक्ट्रॉन को किसी और को दे दे ताकि उसकी जो सबसे बाहर वाली कक्षा रहे उसमें 8 इलेक्ट्रॉन हों। सरलता और ऊर्जा के जमा-खर्च की दृष्टि से सोडियम का परमाणु दूसरा वाला विकल्प अपनाता है।

यदि तत्वों के गुण बाह्यतम इलेक्ट्रॉन कक्षा से निर्धारित होते हैं तो ज़ाहिर है कि बाह्यतम कक्षा में इलेक्ट्रॉन की वही संख्या (उदाहरण के लिए 2) आठ तत्वों के बाद दोहराई जाएगी। क्योंकि बाह्यतम कक्षा में फिर से 2 इलेक्ट्रॉन तभी आएँगे जब 3 से लेकर 7 तक इलेक्ट्रॉन भर चुके होंगे। इस शर्त की वजह से परमाणु संख्या में 8-8 के अन्तर से तत्वों के गुणधर्म दोहराए जाते हैं।

2s1, 2s2, 2p1, 2p2, 2p3, 2p4, 2p5, 2p6, 3s1

इसी नियम से इस बात की भी व्याख्या हो जाती है कि क्यों नोबल गैसें (अक्रिय गैसें) अक्रिय होती हैं। कारण सीधा-सा है - उन सबकी बाह्यतम कक्षा में 8 इलेक्ट्रॉन (हीलियम में 2) मौजूद होते हैं और यह सबसे टिकाऊ विन्यास है।

इस नियम को लागू करके आवर्त तालिका के अधिकांश हिस्से की व्याख्या हो जाती है और यह भी समझ में आ जाता है कि क्यों गुणों में आवर्तता 8 के अन्तराल पर होती है। मगर एक अन्य समस्या अभी शेष है और वह आधुनिक आवर्त तालिका की प्रमुख समस्या है।

अनियमित आवर्तता  
यदि आवर्त तालिका पर नज़र डालेंगे तो पाएँगे कि एक जैसे गुणधर्म वाले तत्वों को खड़ी कतारों में रखा गया है। इन्हें समूह कहते हैं। आधुनिक आवर्त तालिका में 18 समूह हैं। तालिका में तत्वों की जो आड़ी कतारें बनती हैं, उन्हें पीरियड्स कहते हैं। पीरियड्स की संख्या 7 है।

सबसे बाहरी कक्षा में अधिकतम 8 इलेक्ट्रॉन के नियम ने 8-8 के अन्तराल पर आवर्तता की गुत्थी तो सुलझा दी। लेकिन आवर्त तालिका में सारी आवर्तता 8-8 के अन्तराल पर नहीं है। कई तत्व ऐसे भी हैं जिनमें अगला समान गुणधर्म वाला तत्व 18 स्थानों के बाद यानी परमाणु संख्या में 18 के अन्तर के बाद आता है।

दूसरी सम्बन्धित समस्या पर भी गौर करें। वैसे तो एक ही समूह के सदस्यों के बीच ज़्यादा रासायनिक समानता पाई जाती है लेकिन यह भी देखा गया है कि कभी-कभी एक ही पीरियड के तत्वों के बीच समानताएँ समूह के मुकाबले कहीं ज़्यादा होती हैं।

इन सब बातों को समझने के लिए परमाणु में इलेक्ट्रॉन की जमावट को थोड़ा और गहराई में उतरकर देखना होगा। गहराई में उतरने का मतलब यह समझना होगा कि इलेक्ट्रॉन की संख्या बढ़ने पर वे किस कक्षा व उप-कक्षा में जाएँगे। सीधा-सा नियम यह है कि इलेक्ट्रॉन क्रमश: कम ऊर्जा से अधिक ऊर्जा वाली कक्षाओं, उप-कक्षाओं में जाते हैं। यदि ऊर्जा स्तर के आधार पर क्रमबद्ध करें तो निम्नलिखित तस्वीर उभरती है:

ज़ाहिर है, 1s1 से 2s1 तक पहुँचने में मात्र 2 परमाणु संख्या का अन्तर लगेगा जबकि 2s1 से 3s1 तक और 3s1 से 4s1 तक पहुँचने में 18 का अन्तर लगेगा किन्तु 4s1 से 5s1 तक पहुँचने में 18 का अन्तर आएगा। कारण यह है कि इलेक्ट्रॉन विभिन्न कक्षाओं में निम्नानुसार भरे जाएँगे।

1s1, 1s2, 2s1, 2p1-2p6, 3s1, 3s2, 3p1-3p6, 4s1, 4s2, 3d1-3d10, 4p1-4p6, 5s1

अब यदि हम मानें कि रासायनिक गुणधर्म मोटे तौर पर बाह्यतम कक्षा में इलेक्ट्रॉन की संख्या से निर्धारित होते हैं तो एक समान रासायनिक गुणों वाले तत्वों के बीच परमाणु संख्या के अन्तर 2, 8, 8, 18, 32 होंगे। इसका मतलब हुआ कि परमाणु संख्या के हिसाब से जमाने पर आवर्तता हमेशा 8 के अन्तर पर नहीं आएगी।

अब दूसरी समस्या। इस समस्या का सम्बन्ध भी इलेक्ट्रॉन्स की जमावट से है। यह तो सही है कि किसी भी समूह में सबसे बाहरी कक्षा में इलेक्ट्रॉन की संख्या बराबर होती है। इसलिए यह अपेक्षा करना स्वाभाविक है कि समूह के सदस्यों के बीच समानताएँ होंगी। लेकिन कई मामलों में देखा गया है कि किसी-किसी समूह के सदस्यों के बीच समानताएँ उतनी अधिक नहीं होतीं जितनी पीरियड में पास-पास पाए जाने वाले तत्वों के बीच होती हैं। इसका एक उदाहरण है लौह, कोबाल्ट और निकल। ये तीनों अलग-अलग समूहों में हैं और एक ही पीरियड में हैं। लेकिन इनके बीच बहुत अधिक समानता मिलती है।

दरअसल, यहाँ आवर्त तालिका की बारीकियों को छोड़कर एक रूपरेखा को देखना उपयोगी होगा। यहाँ दिए गए चित्र-6 में आवर्त तालिका को चार खण्डों में बाँटा गया है - s (समूह 1, 2), p (समूह 13-18), d (समूह 3-12) और f। ये खण्ड इस आधार पर बने हैं कि जब आप एक परमाणु संख्या से दूसरी पर जाते हैं, तो नया इलेक्ट्रॉन किस कक्षक में प्रवेश करता है। जब अगला इलेक्ट्रॉन कक्षक s में समाविष्ट होता है तो वह तत्व s खण्ड में आता है। आप देख ही सकते हैं कि प्रथम तीन पीरियड्स में मामला आसान है क्योंकि इनमें मात्र s और p कक्षक ही हैं। चूँकि ये बाह्यतम कक्षा में होते हैं इसलिए इनमें इलेक्ट्रॉन जुड़ने से रासायनिक गुणों (खासकर संयोजकता) में परिवर्तन होता है। जब हम पीरियड 4 पर पहुँचते हैं तो समस्या शु डिग्री हो जाती है। तीसरे पीरियड में तीसरी कक्षा भरी जाती है जिसमें d कक्षक भी होता है। मात्र क्रम संख्या के आधार पर चलें तो 1s, 2s, 2p, 3s, 3p के बाद 3d भरा जाना चाहिए मगर 3d कक्षक में इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा 4s से ज़्यादा होती है। इसलिए 3p के बाद इलेक्ट्रॉन 3d में भरने की बजाय 4s में भरे जाते हैं। इसी तर्क के आधार पर पीरियड 5 में भी 4d से पहले 5s भरा जाएगा। समूह 3 से लेकर 12 तक यही स्थिति होती है। इसके परिणाम थोड़े विचित्र होते हैं।

पहला कि इनकी वजह से 4s/5s और उसके बाद भरे जाने वाले 4p/5p इलेक्ट्रॉनों पर नाभिक के धनात्मक आवेश का आकर्षण थोड़ा कम हो जाता है जिसकी वजह से वे ज़्यादा आसानी-से मुक्त हो सकते हैं।

दूसरा परिणाम यह होता है कि 3d, 4d वगैरह कक्षकों में 10 इलेक्ट्रॉन समा सकते हैं। लेकिन प्रत्येक अतिरिक्त इलेक्ट्रॉन के समाने पर तत्व के रासायनिक गुणधर्मों में बहुत अधिक परिवर्तन नहीं होता। इस वजह से 3d1/4d1 से लेकर 3d10/4d10 तक एक-एक इलेक्ट्रॉन जुड़ने पर रासायनिक गुणों में बहुत नाटकीय परिवर्तन नहीं होते, जैसे कि s तथा p इलेक्ट्रॉन के जुड़ने पर होते हैं। d खण्ड में परमाणु संख्या के साथ गुणों में धीरे-धीरे परिवर्तन या संक्रमण होता है। इसलिए इन्हें संक्रमण तत्व या संक्रमण धातुएँ भी कहते हैं। इसलिए d खण्ड के तत्वों में समूह और पीरियड, दोनों तरह से तत्वों के बीच काफी समानता होती है।

d कक्षक में इलेक्ट्रॉन होने का एक असर और भी होता है। वैसे तो सामान्यत: किसी तत्व की संयोजकता s और p इलेक्ट्रॉनों से तय होती है लेकिन कभी-कभी d इलेक्ट्रॉन भी अन्य तत्वों से क्रिया में हिस्सा लेते हैं। इसके कारण ये संक्रमण तत्व एक से अधिक संयोजकताएँ दर्शाते हैं।

इसके बाद हम आते हैं छठे/सातवें पीरियड के d खण्ड पर। यहाँ कक्षकों के भरने का क्रम ऐसा होता है कि अब 5/6f कक्षक में इलेक्ट्रॉन समाने लगते हैं। एक बार फिर वही स्थिति सामने आती है कि इन तत्वों के गुणों में भी बहुत तेज़ी-से बदलाव नहीं आता। और तो और, लैन्थेनम से ल्यूटेशियम (परमाणु संख्या 57-71) और एक्टिनियम से लॉरेंशियम (परमाणु संख्या 89-103) बहुत अधिक एक जैसे गुणधर्म दर्शाते हैं। इन्हें क्रमश: लैन्थेनाइड और एक्टिनाइड तत्व कहते हैं। इन्हें आवर्त तालिका के एक-एक ही चौखाने में रखकर नीचे एक अलग कतार बनाकर बताया जाता है कि उस एक चौखाने में कितने तत्व हैं। उन दो कतारों से मिलकर f खण्ड बनता है।

हाल ही में आवर्त तालिका में लैन्थेनाइड्स और एक्टिनाइड्स की स्थिति को लेकर काफी गर्मागरम बहस चली है लेकिन फिलहाल हम उसमें नहीं जाएँगे। शायद फिर कभी उस पिटारे को खोलने का मौका आएगा।


सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।