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"ऊँट का फूल" के चित्र बनाते हुए...

हम अक्सर पेंटिंग और इलस्ट्रेशन के बीच एक दीवार खड़ी कर देते है।  एक तरफ हमें लगता है  कि पेंटिंग किसी कलाकार की एक मौलिक अभिव्यक्ति होती है जिसका रचना संसार किसी एक पहलू में बंधा नहीं होता बल्कि बहुत ही विस्तृत होता है।  वहीं दूसरी तरफ हम इलस्ट्रेशन को एक संकुचित दायरे में घेर देते है जिसका काम केवल किसी कहानी, कविता या प्रोडक्ट को चित्र भाषा में बयान करना होता हे। तो फिर हम हमारे ग्रन्थों के मुग़ल लघु-चित्रों, पर्शियन, पहाड़ी अथवा राजस्थानी लघु-चित्रों को क्या संज्ञा देंगे?  वे पेंटिंग है या इलस्ट्रेशन ? अगर वो पेंटिंग है तो फिर किसी इलस्ट्रेशन से किस प्रकार भिन्न है? और अगर वे इलस्ट्रेशन है तो क्या उनका रचना-आकाश किसी प्रकार से संकुचित है?

दरअसल एक चित्रकार के नज़रिये से मै इन प्रश्नो को बहुत महत्वपूर्ण मानता हूँ।  'ऊँट का फूल' नाम की ये जो खूबसूरत कहानी प्रभात ने लिखी है उसके लिए चित्र बनाते वक्त मै लगातार ये कोशिश कर रहा था कि ये चित्र किसी भी पाठक के लिए, जो कि यहाँ मूलतः बच्चे और अभिभावक है, कहानी को सरलीकृत ढंग से कहने का माध्यम मात्र ना बन जाये। बल्कि कोशिश यह थी कि कहानी के मूल तत्वों को रखने के साथ-साथ ये चित्र अपने आप में कई और कहानियाँ, कई और जिज्ञासाएँ पाठक के मन में उत्पन्न कर पाए। इस प्रकार लेखन की भाषा और चित्रों की भाषा, इन दोनों का सामंजस्य कुछ इस तरह बने कि पढने या देखने वाले के लिए कई दिशाओं का निर्माण कर पाये।

लोकेश

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