चित्र - कनक शशि

 

बहुत सारे कवियों ने पानी को अलग-अलग नजरियों से देखा। कभी पानी के पास जाकर। कभी दूर से। भीतर और बाहर से। कभी ख़ुद पानी बनकर तो कभी दूसरों को पानी की तरह बता कर। पानी और पानी से जुड़ी तमाम बातों पर लिखा गया। केवल पानी बचा लिया जाए इससे इतर, पानी को विभिन्न कोणों से देखकर भी अपनी कविताओं में शामिल किया। 

विश्व पानी दिवस पर पानी पर लिखी कुछ कविताएँ...

 

1.
पानी है तो धरती पर संगीत है :
झील-झरनों-नदियों-समुद्र का,
घूँट का !

पानी है तो बानी है
पदार्थ हैं इसलिए कि पानी है
और गूँगे नहीं हैं रंग

पानी भी जब पानी माँग ले
तो समझो कीच-कालिख की
गिरफ्‍़त में है वक्‍़त

ज़िन्‍दगानी को जो नोच-खाय
तो जानो उसके आँख का पानी
मर गया !

भर गया जो गला
सुन कर चीख़-पुकार
वह पानी है !

पानी जो दौड़-दौड़ कर
पृथ्‍वी का चेहरा
सँवारता रहता है !

                           -प्रेम शंकर शुक्ल

2.
बहते हुए पानी ने
पत्थरों पर निशान छोड़े हैं
अजीब बात है
पत्थरों ने पानी पर
कोई निशान नहीं छोड़ा।

                            -नरेश सक्सेना

3.

पानी ने हमसे कुछ नहीं कहा

पानी ने शेर से कहा

शेर ने समझा और उस दिन से नहाना ही छोड़ दिया

उसने मछली से कहा

सारी मछलियाँ पहरेदारी करने उतर गई पानियों में

ऊँट ने अपने दिल के पास रखा पानी

कि पानी बाहर की जगह अंदर बचाया जाए

पेड़ों ने मिट्टी में मिल कर पाया पानी

पानी को छोड़कर कहाँ जाएंगे

कि पेड़ मरने के बाद भी एक ही जगह खड़े रहते हैं

जब पानी के पास बचा होगा

आखिरी बार का कहना

तब भी उसने इंसानों से कुछ नहीं कहा होगा

शायद इस उम्मीद में,

कि इंसान ने जीवन की सबसे खूबसूरत चीजों को

बिना कहे ही समझा है।

                       - सुशील शुक्ल



4.
नदी पानी कथा
नदी में नदी का अपना कुछ भी नहीं
जो कुछ है
सब पानी का है।

जैसे पोथियों में उनका अपना
कुछ नहीं होता
कुछ अक्षरों का होता है
कुछ ध्वनियों और शब्दों का
कुछ पेड़ों का
कुछ धागों का
कुछ कवियों का

जैसे चूल्हे में चूल्हे का अपना
कुछ भी नहीं होता
न जलावन, न आँच, न राख

जैसे दीये में दीये का अपना
कुछ नहीं होता
न रुई उसकी न बाती
न तेल न आग न दियली।

वैसे ही नदी में नदी का
अपना कुछ नहीं  होता!

नदी न कहीं आती है न जाती है
वह तो पिरथमी के साथ
सतत पानी-पानी गाती है।

नदी और कुछ नहीं
पानी की कहानी है
जो बूंदों से सुन कर बादलों को सुनानी है।

                     -बोधिसत्व

5.
गिलास के पानी में जो परछाईं है
वह मेरी नहीं प्यास की परछाईं है
वह प्यास जो साँस की तरह फेफड़ों में भरी है

रक्त की तरह जो नस-नस में बह रही है वही प्यास
ये हज़ारों साल पुरानी है
उतनी ही पुरानी है इसकी बेचैनी

उतनी ही पुरानी है इच्छा
जो दबती रही उन जूतों के नीचे
जिनमें कील ठुकवाई जाती थी

जितनी प्यास है उससे बहुत कम आया हिस्से में पानी
और कहा गया कि अब सब पानी ख़त्म हो गया
इस तरह आज तक तड़प रही है मेरी प्यास
सिर्फ़ कंठ भर पानी के लिए।

                             - शंकरानंद
6.
पानी के पास स्मृति थी
पानी जितना गहरा स्मृति उतनी ही साफ
हवा के पंख जितना पानी को सहलाते
पानी पर ठहरी लहर
उतना ही साफ करती थी स्मृतियों के जाले
पानी
अपने झरने का सबसे आदिम गीत
अकेले में ही गाता

                          - वीरू सोनकर

7.
एक ख़बर की तरह था वहाँ
पानी का आना और जाना

कोई दावे के साथ
नहीं कह सकता था
कि इतने बजे आता है
और इतने बजे चला जाता है पानी

कुछ औरतें पानी को
साधना चाहती थीं
वे हर समय नल की ओर
टकटकी लगाए रहतीं
हर आवाज़ पर चौंकतीं

एक गौरैया जब खिड़की से कूदती
उन्हें लगता पानी आ गया है
एक काग़ज़ खड़खड़ाता
तो लगता यह पानी की पदचाप है
उनकी नींद रह-रहकर उचट जाती थी

कितना अच्छा होता
पानी बता के जाता
—कल मैं पौने सात बजे आऊँगा
या नहीं आऊँगा
कल मैं छुट्टी पर हूँ
एक आदमी सुबह-सुबह
टहलता हुआ
पूछता था दूसरे से
—पानी आया था आपके यहाँ
दूसरा जवाब देता-आया था
मैंने भर लिया
तीसरा कहता था चौथे से
—मैं भर नहीं पाया
पर कल जल्दी उठूँगा
भर के रहूँगा
सबसे चुप्पा आदमी भी
अपना मौन तोड़ बैठता था
पानी के कारण

पहली मंज़िल पर रहने वाले एक आदमी ने
दूसरी मंज़िल के पड़ोसी से
सिर्फ़ पानी के कारण बात शुरू की
और बातों में रहस्य खुला कि
दोनों एक ही राज्य के एक ही ज़िले के हैं
लोग मिलते तो लगता
वे नमस्कार की जगह

कहेंगे—पानी
और उसका उत्तर
भी मिलेगा—पानी...
                   
                         - संजय कुंदन

8.
पत्थरों के देवता हों न हों
देवताओं के होते हैं अनगिनत पत्थर
अनगिनत पत्थर से अनगिनत मौत

पानी की देवियाँ हो न हों
देवियों का होता है अथाह पानी
मौत हो चाहे जितनी अनगिनत या अथाह
कहीं तो पत्थरों का पानी हो
पानी का पत्थर हो
पत्थर और पानी साथ-साथ रहें

कहो कैसे?
सदियों से जैसे
पानी लुढ़के तो पत्थर देवता बने
पत्थर बहे तो पानी-पानी देवियाँ।

                          -जयप्रकाश मानस

9.
झील में झील के रचनात्मक ठहराव को
तोड़ता हुआ सहसा
गिरता है एक पत्ता

पानी पर काँपता है पत्ता
पत्ते के नीचे काँप रही झील
झील के ऊपर हवा काँपती हुई
हवा के साथ-साथ पानी

पानी में काँपता आसमान
दिखाई देता है
आसमान में सूर्य काँपता हुआ
काँपती हुई तितलियाँ
आगे बढ़ रहे चिड़ियों के झुंड काँपते हैं

हर चीज एक-दूसरे के साथ
हर चीज एक-दूसरे के लिए काँपती हुई...

                             - यतीन्द्र मिश्र