किशोर पँवार                                                                                                                                       [Hindi PDF, 252 kB]

कहा जाता है कि रेगिस्तान में जीवन की गतिविधियां रात में शु डिग्री होती हैं। यहां के अधिकांश जन्तु निशाचर होते हैं जो सूर्य के विदा होने पर, रात की अनुकूल परिस्थितियों में ही सक्रिय होते हैं और दिन निकलते ही अपनी-अपनी मांद में लौट जाते हैं। सूरज के ताप और रेत की तपन से बचने का यह इनका अपना तरीका है।
ऐसी कुछ रेगिस्तानी जगहें हैं - सहारा और नामीबिया के रेतीले क्षेत्र, एशिया का गोबी रेगिस्तान, ऑस्ट्रेलिया का ग्रेट बेसिन और राजस्थान का थार। इन जगहों पर दूर-दूर तक रेत के टीले और खुली तप्त चट्टानों के अलावा कुछ नज़र नहीं आता। यहां औसत वर्षा भी 5 सेंटीमीटर प्रतिवर्ष से कम और दिन 40-50 डिग्री सेल्सियस की वजह से भट्टी जैसे गर्म होते हैं। दिन जितने ज़्यादा गर्म, रातें उतनी ही ठंडी। इन रेगिस्तानी क्षेत्रों में जीवन इन्हीं हालात के आसपास आगे बढ़ता रहता है।

ऐसी विषम दशा में भी कहीं-कहीं कुछ बहुवर्षी झाड़ियां, तरह-तरह के केक्टस जैसे नागफनी और कुछ मौसमी वाÐषक पौधे उगते हैं। इन्हें इफेमेरल्स (ephemerals) कहा जाता है जो मिट्टी से वर्षा की नमी समाप्त होने के पूर्व ही केवल चार-छ: सप्ताह में अपना जीवन-चक्र पूरा कर यानी फूल-फलकर बीज के रूप में अगले वर्ष तक के लिए रेत में किसी योगी की तरह समाधिस्थ (dormant) हो जाते हैं।
कुछ रणनीतियां
आग उगलते इन रेगिस्तानों में सांप, अजगर और छिपकलियों जैसे कुछ सरीसृप यानी रेपटाइल्स और कीट भी रहते हैं। इनका शरीर वॉटरप्रूफ यानी जलरोधी होता है। कहीं कुछ छोटे स्तनधारी भी मिलते हैं जो निशाचर हैं और पानी की कमी को पूरा करने के लिए अपने पेशाब को गाढ़ा कर लेते हैं। ये लगभग बिना पानी पिए जी लेते हैं। रेगिस्तान के जीवन की बात ‘रेगिस्तान के जहाज़’ ऊंट के बिना पूरी नहीं होती। यह भी लम्बे समय तक बिना पानी के रहने के लिए अनुकूलित है।
रेगिस्तानी जंतु दिन की गर्मी से बचने के लिए अपने-अपने बिलों में और यहां उगने वाली छोटी-मोटी झाड़ियों में छिपे रहते हैं। ये वनस्पतियां ही इनका आश्रय हैंै, इनका सहारा हैं। परन्तु क्या आपने कभी सोचा है कि इन वनस्पतियों का कौन सहारा है जो न तो जन्तुओं की तरह चल-फिर सकती हैं, न ही बिल बनाकर उनमें घुस पाती हैं। इन वनस्पतियों को भी यहां की तेज़ धूप, भीषण गर्मी और पानी की अत्याधिक कमी से निपटना ही होता है। क्या रेगिस्तानी पौधे भी जलरोधी हैं? आइए देखें ये लड़ाई इन्होंने कैसे जीती है।

भोजन का निर्माण
हम ये जानते ही हैं कि हरे पौधे अपना भोजन स्वयं बनाते हैं। दरअसल पौधों के लिए भोजन बनाने की ज़िम्मेदारी उनकी पत्तियों की है। भोजन निर्माण की इस क्रिया में कच्चा माल है पानी और कार्बन डाइऑक्साइड।
परन्तु यह इन हरी पत्तियों का ही कमाल है कि वे इस कार्बन डाइऑक्साइड और पानी से वे सब कुछ बनाती हैं जिसे हम खाते और जलाते हैं यानी हमारा भोजन (दाल, चावल, सब्ज़ी और अप्रत्यक्ष रूप से दूध, मांस-मछली भी) और कोयला-लकड़ी आदि। यानी धरती पर जीवन का प्रमुख आधार कार्बन ही है।
पौधों में भोजन निर्माण यानी प्रकाश संश्लेषण को रासायनिक भाषा में कुछ इस प्रकार लिखा जा सकता है। प्रकृति का यह सबसे महत्वपूर्ण जैव रासायनिक समीकरण है।
पत्तियों में पानी तो जड़ों व उनमें उपस्थित शिराओं द्वारा पहुंचा दिया जाता है और कार्बन डाइऑक्साइड हवा में से, पत्तियों पर पाए जाने वाले हज़ारों-लाखों अतिसूक्ष्म छिद्रों द्वारा। इन छिद्रों को हम स्टोमेटा कहते हैं जो खुलते-बंद होते रहते हैं। सामान्य पौधों की पत्तियों पर जब धूप पड़ती है तो ये खुल जाती हैं और शाम ढलते ही बंद होने लगती हैं। पानी और कार्बन डाइऑक्साइड को जोड़कर शर्करा बनाने का यह काम क्लोरोफिल की मदद से सूर्य के प्रकाश से प्राप्त ऊर्जा की सहायता से होता है। वस्तुत: यह ऊर्जा का रूपान्तरण है जिसमें सूर्य की विकिरण ऊर्जा को रासायनिक ऊर्जा में बदलकर जमा कर लिया जाता है। पहले शर्करा और फिर अन्य रूपों जैसे प्रोटीन और वसा आदि में।
पौधों द्वारा भोजन बनाने की इस क्रिया में ढेर सारी ऑक्सीजन निकलती है। इसलिए कहा जाता है कि पेड़-पौधे वातावरण को शुद्ध करते हैं क्योंकि वे दिन में कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करते हैं और ऑक्सीजन छोड़ते हैं।

स्टोमेटा से वाष्पोत्सर्जन
पत्तियां ज़्यादा-से-ज़्यादा भोजन बनाएं इसके लिए उनका अधिक पतला, चौड़ा और छिद्रमय होना ज़रूरी है। मगर यही बनावट पौधों से पानी की हानि को बढ़ावा देती है। पत्तियों के जिन छिद्रों से भोजन निर्माण और श्वसन के लिए हवा अंदर जाती है उन्हीं से जलवाष्प बाहर आती है। इसे वाष्पोत्सर्जन कहते हैं। जड़ों द्वारा सोखा गया लगभग 90 प्रतिशत पानी इन्हीं खुले रन्ध्रों से बाहर निकल जाता है। हवा जब सूखी और गर्म हो तो यह प्रक्रिया और तेज़ हो जाती है। और रेगिस्तान में तो सब जगह ऐसे ही हालात हैं। ऐसे में पौधों को पानी बचाने के लिए अपने वायु छिद्र बंद करने पड़ते हैं। परन्तु ऐसा करने से भोजन बनाने की क्रिया में बाधा आती है। अत: पत्तियों की यह रचना ‘इधर कुंआ और उधर खाई’ जैसी है।
पानी बचाने की यह समस्या रेगिस्तानी पौधों के लिए और गम्भीर हो जाती है। एक तो वहां पहले ही पानी की कमी है और दूसरा जो भी थोड़ा बहुत है उसे वाष्पित होने से बचाना भी है। उल्लेखनीय है कि भोजन सूर्य के प्रकाश में दिन में ही बनता है और वायु-छिद्रों से पानी भी दिन में ही उड़ता है। वायु-रंध्र खुले रखते हुए पानी बचाना और भोजन भी बनाना एक बड़ा ही विरोधाभासी एवं चुनौतीपूर्ण कार्य है।

केम का कमाल
पत्तियों की इन तथाकथित खामियों का चमत्कारिक तरीके से उपयोग कर दिन में पानी बचाते हुए भोजन भी बना लेने की व्यूह रचना के कमाल का नाम है ‘केम पौधे’। केम पौधे दिन में नहीं रात में भोजन बनाते हैं। कितनी विचित्र बात है, जब सूरज का तंदूर विदा हो चुका हो तब रोटी सेंकना। भोजन बनाने का यह तरीका सबसे पहले क्रेसुलेसी कुल के पौधों केलांचू, सीडम और ब्रायोफिल्लम (पत्थर चट्टा) में खोजा गया था। इसमें वस्तुत: भोजन बनाने में कुछ खास अम्लों का निर्माण और विघटन होता है अत: इसे क्रेसुलेसीयन ऐसिड मेटाबोलिज़्म अर्थात संक्षिप्त में केम (CAM) कहा जाता है।वर्तमान में भोजन बनाने का यह तरीका लगभग 35 कुलों में खोजा जा चुका है। इनमें क्रेसुलेसी के अलावा पौचुलेक्रेसी (खट्टी भाजी, ऑफिसटाइम), केक्टेसी (नागफनी), ऑर्किडेसी (अमरकंद), यूफोर्बिएसी (तरह-तरह की दूधियां), ऐजोऐसी (स्टोन प्लांट), ब्रोमीलिऐसी (अनानास) प्रमुख हैं। इनमें आर्किडेसी और ब्रोमीलिऐसी के अधिकांश पौधे उपरिरोही (epiphytes) होते हैं जिनकी जड़ों का ज़मीन से कोई सम्पर्क नहीं होता; अत: पानी प्राप्त करना इनके लिए दुष्कर कार्य है।

केम छो?
सभी केम पौधों में कुछ विशेषताएं पाई जाती हैं। ये सभी आकारिकी, कार्यिकी और जैव-रासायनिक रूप से विशिष्ट हैं।
- इन सभी पौधों की पत्तियां, तना, फूल आदि मांसल (succulent) होते हैं।
- इनकी कोशिकाओं में बड़ी-बड़ी रिक्तिकाएं मिलती हैं जिनमें अम्ल पाया जाता है।
- कई पौधों की पत्तियों और तनों पर मोम की पर्त चढ़ी होती है जो इन्हें वॉटर-प्रूफ बनाती है।
- ये रात में खट्टे (अधिक अम्लीय) और दिन में फीके (कम अम्लीय) लगते हैं।
- इनके वायु छिद्र (stomata) दिन में बन्द रहते हैं और रात में खुलते हैं।
- इनकी वृद्धि दर कम होती है अर्थात ये धीरे-धीरे बढ़ते हैं।
- फूल कम बनते हैं, वर्धी प्रजनन (vegetative reproduction) ज़्यादा होता है क्योंकि फूल बनाने में ज़्यादा ऊर्जा खर्च होती है। अत: इनमें कम ऊर्जा खर्च कर वंश बढ़ता हैं जैसे खटूमरा, पत्थर चट्टा, ऐलोवेरा आदि।

केम पौधों में भोजन निर्माण
सन् 1804 में प्रसिद्ध फ्रांसीसी वैज्ञानिक डी सासरे ने देखा कि नागफनी की शाखाओं को प्रकाश में रखने पर वे कार्बन डाइऑक्साइड की अनुपस्थिति में भी ऑक्सीजन छोड़ती हैं। जबकि हम जानते हैं कि सामान्य पौधे दिन में प्रकाश की उपस्थिति में अपनी भोजन निर्माण की प्रक्रिया के दौरान कार्बन डाइऑक्साइड ग्रहण करके ही ऑक्सीजन छोड़ते हैं -

अत: डी सासरे ने निष्कर्ष निकाला कि नागफनी जैसे मांसल पौधे कार्बन डाइऑक्साइड उत्पन्न करने के लिए स्वयं के पदार्थों का उपयोग करते हैं जो पुन: भोजन बनाने के काम आ जाते हैंै क्योंकि दिन में तो इनके स्टोमेटा बंद रहते हैं। ऑक्सीजन भी इन्हें अन्दर से ही मिल रही है अत: दिन में स्टोमेटा बंद होने पर भी इनमें श्वसन क्रिया में बाधा नहीं आती। रात में तो स्टोमेटा खुल ही जाते हैं।
एक अंग्रेज़ बेन्जामिनहेन ने भारत प्रवास के दौरान अपने बगीचे में लगे एक पौधे ब्रायोफिल्लम केलिसिनम (खटूमरा) में पाया कि दोपहर में तो उसका स्वाद फीका होता है परन्तु सुबह-सुबह बहुत खट्टा लगता है। यह बात उसे इतनी महत्वपूर्ण लगी कि उसने सन् 1813 में अपनी वापसी पर लिनियन सोसायटी को इस अवलोकन के बारे मेंें पत्र लिखा। वैसे दिलचस्प बात यह भी है कि मेरी दादी भी इस बात से परिचित थी। वे कहा करती थी कि यदि खटूमरे की चटनी बनानी हो तो इसकी पत्तियां सुबह जल्दी तोड़ लो नहीं तो खटास नहीं रहेगी। आखिर यह खटास आती कैसे है और दिन चढ़ने पर चली कहां जाती है। केम पौधे पर यह लेख लिखते हुए मुझे मशहूर फिल्म ‘मुगल-ए-आज़म’ का यह गीत बड़ा याद आ रहा है - जब रात है ऐसी मतवाली, फिर सुबह का आलम क्या होगा?

रात का आलम
दरअसल केम पौधों में रात और दिन की रासायनिक क्रियाओं में बहुत फर्क होता है। इन पौधों में रात में अम्ल बनता और जमा होता है। केम किस्म का चयापचय यानी मेटाबोलिज़्म वस्तुत: सूखे एवं तेज़ धूप में जीने के लिए पौधों में विकसित हुआ एक अनुकूलन है जिनमें पानी के वाष्पन को रोकने के लिए दिन में वायु-छिद्र बंद रहते हैं। परन्तु रात में जब मौसम ठंडा होता है तब ये जागते हैं अर्थात अपने स्टोमेटा खोलते हैं। रात में हवा की कार्बन डाइऑक्साइड को पत्तियों के अंदर जाने का मौका मिलता है। यह वहां उपस्थित एंज़ाइम पीइपी यानी फास्फो-इनोल पायरूवेट की मदद से ऑक्ज़ेलो ऐसिटिक अम्ल बनाती है।

स्टोन प्लांट्स

ये भी हैं केम पौधे, परन्तु हैं बड़े विचित्र। इन्हें मिमिक्री प्लांट्स कहा जाता है। जंतुओं की मिमिक्री (छद्मावरण) के बारे में तो आप जानते ही हैं, जैसे कुछ कीट-पतंगे बिल्कुल हरी पत्ती जैसे तो कुछ सूखी टहनी जैसे दिखते हैं। परन्तु ये पौधे जीव-जन्तुओं की नहीं बल्कि मोटे-मोटे कंकड़ों (pebbles) की नकल करते हैं। रेगिस्तान में ये पीले भूरे, कंकड़ों जैसे दिखते हैं। पत्थरों से इनकी समानता के चलते ही इन्हें यह नाम मिला ‘स्टोन प्लांट्स’ या लिथोप्स जिसका अर्थ है चट्टान।

इन पर जब तक फूल नहीं आते तब तक इन्हें असली पत्थरों से अलग पहचानना मुश्किल होता है। इन पर सुंदर रंग-बिरंगे फूल खिलते हैं। कुछ पौधों में तो पत्तियों के नाम पर सिर्फ बीच में से निकली फटी दो-तीन पत्तियां भर होती हैं बस।
रेगिस्तान में शाकाहारियों से बचने में इनका यह अनुकूलन बड़ा काम आता है। पौधों के शिकारी इन्हें पत्थर समझ आगे बढ़ जाते हैं। है न हैरत अंगेज़ तरीका। सचमुच कमाल करते हैं केम प्लान्ट्स!

अगले चरण में ऑक्ज़ेलो ऐसिटिक अम्ल एक अन्य अम्ल, मेलिक अम्ल में बदल जाता है। यह क्रिया रात में चलती रहती है और इस दौरान बना मेलिक अम्ल पत्तियों की कोशिकाओं की बड़ी-बड़ी रिक्तिकाओं में जमा होता रहता है। यह क्रिया ऐसिडीफिकेशन (अम्लीयकरण) कहलाती है। यही कारण है कि खटूमरा एवं अन्य पौधों की पत्तियां अल-सुबह खट्टी लगती हैं।

दिन का का आलम
रात का रसायन हम देख ही चुके हैं। सुबह सूर्य के उगते ही जब धूप इन पत्तियों और तनों (नागफनी) पर पड़ती है तो इनके वायु-छिद्र बंद होने लगते हैं। इससे वाष्पोत्सर्जन नहीं होता। अब सूर्य का प्रकाश है, पत्तियों में पानी है, क्लोरोफिल है; नहीं दिखाई दे रही तो वह है वायुमंडलीय कार्बन डाइऑक्साइड। क्योंकि पौधे के स्टोमेटा बंद हैं तो बिना कार्बन डाइऑक्साइड के आखिर भोजन बने तोे कैसे? अब रात में पत्तियों की कोशिकीय रिक्तिकाओं में जमा किया गया मेलिक अम्ल कुछ इस प्रकार काम आता है।

मेलिक अम्ल के विघटन से कार्बन डाइऑक्साइड बनती है। चूंकि बाहर जाने का रास्ता बन्द है और पत्तियों में सूर्य के निकलते ही बाकी सारी तैयारी पूरी कर रखी है अत: यह कार्बन डाइऑक्साइड सामान्य पौधों (तीन कार्बन) की तरह क्रेब चक्र के माध्यम से भोजन बनाने के काम आ जाती है। कुछ इस तरहदरअसल इन पौधों में केल्विन चक्र के सभी विकर उपस्थित होते हैं जिनके माध्यम से दिन में सामान्यत: तीन कार्बन पौधों की तरह भोजन निर्माण होता रहता है। मेलिक अम्ल का विघटन डीऐसीडि-फिकेशन कहलाता है जो दिन में होता है। यही कारण है कि इन पौधों (खटूमरा, खट्टी भाजी) की पत्तियां दोपहर में कम खट्टी हो जाती हैं क्योंकि रिक्तिकाओं में रात में जमा मेलिक अम्ल से अब शर्करा, मंड एवं अन्य पोषक पदार्थ बना लिए गए हैं।

केम पौधों की पत्तियों में रात में चार कार्बन चक्र और दिन में तीन कार्बन चक्र चलता है। एक तरह से जो काम चार कार्बन पौधों की अलग-अलग कोशिकाओं (मीज़ोफिल और बंडलशीथ) में एक ही समय होता रहता है वही कार्य केम पौधों में एक ही कोशिका में अलग-अलग समय पर संपादित होता है। यह ठीक ऐसा ही है जैसे इन्दौर में सराफा में दिन में तो दुकानों पर सोना-चांदी का व्यापार होता है। परन्तु रात में उन दुकानों के बन्द होते ही उनके ओटलों पर खाने-पीने, मिठाई और चाट की दुकानें सज जाती हैं। एक ही जगह एवं बाज़ार का अलग-अलग समय जुदा-जुदा उपयोग। केम पौधे भी ऐसा ही करते हैं - जगह का सुन्दर उपयोग।

केम की इकॉलाजी
केम पौधों का यह अनुकूलन कम पानी और तेज़ धूप में, अपना बचाव करते हुए पानी बचाकर भोजन बनाने का कितना सुन्दर तालमेल है।
ये पौधे पर्यावरण की दृष्टि से भी महत्वपूर्ण हैं। ये पानी बचाते हुए सूखी और गर्म रेगिस्तानी जगहों को आबाद रखते हैं। कृषि की दृष्टि से ये उतने महत्वपूर्ण नहीं दिखते हैं परन्तु फिर भी आकारिकी, कार्यिकी तथा जैव-रासायनिक अनुकूलन का श्रेष्ठ उदाहरण हैं। विषम परिस्थतियों में कमाल करने का नाम है केम प्लांटस। अब जब कभी आप पाइनएपल (अनानास) खाएं तो केम पौधों को ज़रूर धन्यवाद कहिएगा क्योंकि अनानास जैसे खट्टे-मीठे और सुगंधित फल व रस आपको इन्हीं विशिष्ट गुण वाले पौधों की बदौलत मिल पाते हैं।


किशोर पंवार: इंदौर के होल्कर साइंस कॉलेज में वनस्पति विज्ञान पढ़ाते हैं। लेखन के ज़रिए विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में महत्वपूर्ण योगदान।