बोलचाल में तो छुटपन से ही, पर तीसरी-चौथी तक आते-आते विज्ञान में भी बल और भार की बात आने लगती है। और वैसे भी ‘बल' आम बोलचाल का शब्द है, इसलिए सब मान लेते हैं कि बल की अवधारणा तो सबको स्पष्ट होगी ही। पर आप कॉलेज की पढ़ाई कर रहे किसी छात्र से भी पूछकर देख लीजिए, कि ऊपर की ओर फेंकी गई गेंद पर कब, किस तरफ और कौन-सा बल लग रहा है। एकदम से समझ में आ जाएगा कि कैसे-कैसे भ्रम हैं बल की अवधारणा को लेकर....

ऐसा इसलिए होता है क्योंकि आमतौर पर विज्ञान की ऐसी अवधारणाओं पर जो अध्याय लिखे जाते हैं, उनमें परिभाषाओं और गणितीय सूत्रों के अलावा कुछ दिखता ही नहीं है, उस विषय की समझ बनाने या बढ़ाने की कोई कोशिश नज़र नहीं आती।

विद्यार्थियों को बल की अवधारणा समझाने के लिए अनिता रामपाल का एक वैकल्पिक प्रयास यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है।

गेंद, गोल से बहुत दूर थी। छज्जू ने खूब ज़ोर से लात . मारी और गेंद गोली की तरह उड़ती हुई गोल में घुस गई। सभी हैरान थे। छज्जू लगता तो पतलू-सा है पर इतना बल लगा सकता है, यह मालूम ही नहीं था।

बल, बलवान - ये शब्द तो तुम शायद रोज़ इस्तेमाल करते हो। खेल में, लड़ाई या कुश्ती में, मेहनत-मज़दूरी में, ये शब्द आम सुनने में आते हैं। पर विज्ञान में “बल" शब्द का इस्तेमाल अलग ढंग से होता है। उदाहरण के लिए, अगर एक को उठाना हो तो तुम शायद कहोगे कि “अरे, यह तो हल्की-सी है, इसको उठाने में कोई बल थोड़े ही लगा।” पर वैज्ञानिक कहेंगे , “नहीं साहब - किताब क्या पेंसिल उठाने में भी बल लगता है या फिर अगर तुम आराम से दीवार से टिककर खड़े हो, कोई हरकत नहीं कर रहे तब भी बल लग रहा है। है न अजीब-सी बात। तुम कहोगे, "नहीं जनाब - हम तो बिलकुल आराम से खड़े हैं। बल-वल का सवाल ही नहीं उठता।” पर यही नहीं, वैज्ञानिक तो इससे भी और अटपटी बात कहेंगे कि “दीवार भी तुम पर बल लगा रही है।" बस, यह सुनकर तो शायद तुम भाग निकलने की तैयारी में होगे। यह सोचते हुए कि भई, इन वैज्ञानिकों का शायद भेजा घूम गया है, इनकी बल-वल की बात अपने तो पल्ले नहीं पड़ती। पर रुको, यूं मैदान छोड़कर मत भागो। अभी साफ किए देते हैं यह उलझन यह अध्याय पढ़ तो लो, फिर देखो तुम भी बल के मामले में कैसे महारथी बन जाते हो। सबसे पहले तो यह देख लें कि बल के बारे में कौन-सी बातें हम पहले से जानते हैं।

एक खाली ठेले को धक्का दें, यानी उस पर बल लगाएं, तो वह चलने लगता है।

जिस दिशा में बल लगाएं, ठेला उसी दिशा में चलता है। उस पर कहीं एक तीर बनाकर उस बल की दिशा दिखाते हैं।

अगर दो लोग आमने-सामने से ठेले पर बराबर बल लगाएं तो ठेला चलता नहीं, वहीं खड़ा रहता है।

ढलान पर लुढ़कते हुए ठेले को रोकने के लिए उस पर उल्टी दिशा में बल लगाना पड़ता है।

अब नीचे दिए हुए प्रश्नों का उत्तर
तुम्हें अपनी-अपनी समझ से देना है।

उत्तर सही है या गलत इससे हमें मतलब नहीं देखना तो यह है कि कितनी तरह के उत्तर सामने आते हैं। इन्हीं के आधार पर आगे का सिलसिला चलेगा।
नीचे दिखाई चीजों पर क्या कोई बल लग रहे हैं?

सोचकर बताओ कि वस्तु पर कोई बल लग रहा है या नहीं? और अगर हाँ तो किस दिशा में बल लग रहा है?

  1. ढलान पर से लुढ़कता ठेला

अब तक काफी सर खुजा लिया होगा तुमने। बहुत सोच विचार कर लिया, प्रश्नों के उत्तर देते-देते। चलो अब एक ऐसा प्रयोग करते हैं, जिससे गैलिलियो नाम के वैज्ञानिक ने बहुत पहले बल के एक रहस्य को समझा था।

प्रयोग-1

एक लकड़ी का पटिया लेकर कक्षा में उसे टाटपट्टी या दरी पर रख दो। उसके नीचे एक तरफ किताबें रखो जिससे पटिया तिरछा हो जाए। अब ऊपर की तरफ उठी हुई सतह पर कहीं एक जगह निशान लगाकर कंचा वहां रखकर छोड़ दो। देखो कंचा कितनी दूर जाता है?

दूसरी बार, लकड़ी के पटिए को फर्श पर उसी तरह रखो और उसी जगह से कंचा छोड़कर देखो। इस बार कंचा लुढ़ककर किंतनी दूर गया?

तीसरी बार, पटिए को एक बड़े से कांच के टुकड़े पर रखकर यही प्रयोग दोहराओ

सतह बदल देने से कंचा अधिक दूरी तक क्यों जाता है?

गैलिलियो का ख्याली प्रयोग
बल की कहानी बहुत ही पुरानी है। भौतिकी में तो शायद सबसे पुराना विषय है, जिस पर हजारों साल पहले से लोगों ने सोच-विचार किया है। तीर हवा में कैसे चलता रहता है, लुढ़कता पत्थर क्यों रुक जाता है, फल नीचे को ही क्यों गिरता है, घुआं ऊपर को ही क्यों जाता है, हम उड़ क्यों नहीं सकते?

ऐसे कई प्रश्नों पर लोग गौर तो करते, पर बहुत सटीक उत्तर न मिलते। इन्हीं कुछ प्रश्नों में उलझा हुआ था एक वैज्ञानिक गैलिलियो। कई प्रयोगों के दौरान उसने देखा कि किसी कंचे को ढलान से लुढ़काओ तो वह कुछ दूर जाकर रुक जाता है। उसने सोचना शुरू किया कि अगर कंचे को खूब दूर तक लुढ़काना हो तो क्या किया जाए।

प्रयोग करते-करते उसे पता चल ही गया कि अगर ज़मीन की सतह खुरदुरी हो तो कंचा बहुत दूर नहीं जाता।

गैलिलियो ने सतह को थोड़ा चिकना करके देखा और पाया कि कंचा कुछ और दूरी तक गया। फिर सतह को और अधिक चिकना किया तो कंचा और भी दूर जाकर रुका। इस बात से गैलिलियो ने यह नतीजा निकाला कि सतह का खुरदुरापन ही कंचे की गति में रुकावट डालता है। उसने सोचा, यदि कोई ऐसी काल्पनिक सतह हो जो बिलकुल ही चिकनी हो, तो वह कंचे पर कोई रुकावट नहीं डालेगी। ऐसी सतह तो वास्तव में काल्पनिक ही थी, क्योंकि असली सतह को आखिर कितना चिकना बना सकता था वह। पर एक आदर्श चिकनी सतह का न मिल पाना उसके लिए कोई रुकावट नहीं था| उसने ख्यालों में ही अपना प्रयोग पूरा कर लिया - और मन ही मन उसने भौतिकी का एक मुश्किल रहस्य खोज लिया। ज़रा सुनें उसने अपने ख्याली प्रयोग से क्या निष्कर्ष निकाला।

उसने कहा कि कंचे पर अगर सतह का या हवा का यानी कोई बाहरी असर न हो, तो कंचा हमेशा चलता रहेगा, रुकेगा नहीं। उफ! कैसी अजीब-सी बात है यह! शायद तब भी लोगों को अजीब लगी होगी, जैसे आज हमें लग रही है। भला किसने देखा है ऐसे होते हुए कि कोई भी चीज़ चलती ही जा रही है, कभी रुकती ही नहीं।

इसी बात को न्यूटन ने पकड़ लिया। उसने कहा कि लुढ़कता हुआ कंचा इसलिए रुक जाता है क्योंकि न दिखने वाला एक बल उसे रोक लेता है। और सतह के साथ रगड़ने वाला यह बल कंचे पर उल्टी दिशा में लगता है। जैसे-जैसे कंचा सतह पर आगे बढ़ता है, यह 'रगड़न' बल एक छुपे हुए हाथ की तरह उसे रोकता है। आखिर में कंचा बेचारा रुक ही जाता है। पर यदि रोकने वाला कोई बल ही न हो, तो हर चलती हुई वस्तु चलती ही जाएगी, रुकेगी नहीं। वाकई, यह बात पचानी कुछ मुश्किल लगती है। इसलिए क्योंकि हमने ऐसा होते हुए कहीं भी देखा नहीं है। खास प्रयोग करें तो ज़रूर देख सकते हैं। पर आम ज़िन्दगी में देखने को नहीं मिलता, क्योंकि कई ऐसे बदमाश बल हैं जो छुप-छुपे काम करते हैं और चलती हुई वस्तुओं को रोकते रहते हैं। पर हम समझ बैठते हैं कि वस्तु अपने आप ही रुक गई। चलो, आगे इन्हीं छुपे रुस्तमों को पहचानना सीखें।

अपनी समझ फिर परखें--

छुपेहुए बल को ढूंढ निकालेंः
हम ठेले पर बल लगाते रहें तो ठेला चलने लगता है, और धीरे-धीरे उसकी गति तेज़ होने लगती है।

धक्का या बल लगाना छोड़ दें तो क्या होता है? ठेले की गति कम होती जाती है और फिर कुछ दूर जाने के बाद वरुक जाता है।

हमने तो बल लगाना छोड़ दिया। पर ठेले पर एक विपरीत बल अब भी है। हां, वही, सतह का 'रगड़न' बल, जो उसकी गति रोक रहा है।

यह बल हमें दिखता तो नहीं, पर इसके असर को हम देख पाते हैं। ये 'रगड़न' मियां तो पहले से ही काम कर रहे थे, लेकिन हमारे बल के सामने ये कमज़ोर पड़ रहे थे।

कुछ छुपे रुस्तम, हैं तो ये भी रगड़न?
एक चलता हुआ ठेला दीवार से टकराकर रुक जाता है। ठेले की गति रोकने के लिए बल किसने लगाया? जी हां, ठीक समझे, दीवार ने ही ठेले पर बल लगाया। बात शायद अटपटी लगे, पर है तो सच। दीवार अगर बल न लगाती तो ठेला चलता ही जाता। सोचो, अगर ठेले के रास्ते में एक कागज़ की दीवार आती तो वह तो ज़रा भी बल नहीं लगा पाती। उसकी क्या हिम्मत कि वह ठेले को रोक पाए। तो बस, ठेला उसे यूं हटाकर निकल जाता।

जब भी कोचलती हुई वस्तु रुक जाती है, या उसकी गति धीमी हो जाती है, तो उस पर लग रहे बल को हमें ढूंढ निकालना होगा

प्रयोग 2 : बल ढूंढो
एक गेंद को कुछ ऊंचाई पर पकड़ो। फिर आराम से, बिना बल लगाए, गेंद को हाथ से छोड़ दो। गेंद नीचे गिरती है। सोचो, भला कौन-सा बल गेंद को नीचे की ओर दौड़ा रहा है? उस बड़े-से छुपे रुस्तम को क्या तुम पहचान पाए? तुमने तो नीचे की तरफ बल नहीं लगाया, फिर किसने लगाया? क्या गिरती हुई गेंद की गति में कुछ अंतर आता हुआ दिखता है? यदि ठीक से न देख पाओ, चूंकि पलक झपकने पर गेंद ज़मीन पर पहुंच जाती है, तो और ऊंचाई से छोड़ो उसे। क्या होता है, गिरती हुई गेंद की गति कम होती है या बढ़ती जाती है?

अगर फिर भी पता न चले तो गेंद को किसी ढलान से लुढ़काकर ध्यान से देखो कि गति बढ़ती है या कम होती है। अब गेंद को ऊपर को उछालो। उछालने के लिए उस पर तुमने बल लगाया| बस उतनी ही देर गेंद पर बल लगाया जब तक उसे हाथ में पकड़कर घुमाया। हाथ से निकलते ही वह तुम्हारे बल से मुक्त हो गई। यानी तुम्हारे हाथ का बल अब उस पर नहीं लग रहा जब वह हवा में चल रही है। गेंद की गति को ध्यान से देखो।

क्या गेंद ऊपर को चलती ही जाती है?

हाथ से छूटने के बाद उसकी गति कम होती जाती है या बढ़ती है? कौन-सा बल है, जो गेंद की गति में अंतर लाता है?

ऊपर पहुंचकर गेंद क्षणभर के लिए रुकती है और फिर नीचे गिरने लगती है। ऊपर जाते समय भी वही बल लग रहा था जो अब उसे नीचे लाता है। क्या अब पहचान लिया उसे?

जी हां, यह पृथ्वी वास्तव में एक बहुत बड़ी छुपी रुस्तम है। हर चीज़ पर बल लगाती है। हर चीज़ को अपनी ओर खींचती है। दूर-दूर तक इसके बल का असर है। चांद तक को नहीं छोड़ा है - उस पर भी बल लगाती है। इसीलिए बेचारा चंदा पृथ्वी रानी के चक्कर काटता रहता है। इस बल का नाम शायद तुमने सुना हो, मुश्किल-सा लंबा-सा नाम है, गुरूत्वाकर्षण बल!

पढ़ पाए क्या इस भयंकर से नाम को। खेर, इस नाम से अभी हमें कुछ लेना देना नहीं । पहले इस बल का असर तो पहचान लें। ठीक है ना?

नीचे गिर रही गेंद पर लग रहे बल की दिशा दिखाओ। अब ऊपर उछाली गई गेंद पर लग रहे बल की दिशा दिखाओ

क्यों, कहीं चक्कर में तो नहीं पड़ गए। यह तो नहीं सोच रहे कि गेंद ऊपर जा रही है पर बल कहीं और लग रहा है। ऊपर को क्यों नहीं लग रहा।

लो, फिर से ध्यान से सुनो। गेंद को तुमने उछाला, है न। जब तक गेंद तुम्हारे हाथ में थी तुम उस पर बल लगा रहे थे। बस तभी तक तुम ऊपर को बल लगा रहे थे। हाथ से निकलते ही अब उस पर तुम्हारा बल नहीं लग रहा। जा तो रही है ऊपर, पर उस दिशा में कोई बल नहीं लग रहा है। , उस पर तो बस एक ही बल लग रहा-पृथ्वी रानी का खिंचाव। और उस बल की दिशा पृथ्वी की ओर है।

यह बात बिल्कुल वैसी ही है जैसे ठेला छोड़ देने पर हो रहा था| धकेलते हुए ठेले को छोड़ दिया तो भी ठेला आगे . को चल रहा था- पर एक छिपा हुआ बल, सतह का 'रगड़न' बल, उल्टी दिशा में लग रहा था। दरअसल यह सभी छुपे हुए बल हमारे दिमाग में परेशानी पैदा करते हैं। पर हमें सतर्क रहना है, और इनके चक्कर में नहीं पड़ना। हमें तो बस यह देखना है किः

वस्तु की गति अगर कम हो रही है तो ज़रूर उल्टी दिशा में कोई बल उसे रोक रहा है।

वस्तु की गति तेज़ हो रही है तो ज़रूर कोई बल उसी दिशा में उसे खींच रहा हैं या धकेल रहा है।

यह दो बातें याद रहें तो उस छुपे चोर को तुम आसानी से ढूंढकर पहचान लोगे।

बूझो तो मानेंः

एक माझी नाव चला रहा है। यदि वह चप्पू चलाना बंद कर दे तो चलती नाव की गति में क्या अंतर आएगा?

नाव की गति में इस अंतर का कारण बताओ। यहां कौन-सा छिपा बल काम रहा है, और किस दिशा में?

पृथ्वी रानी हमें अपनी ओर न खींचती तो....

हमने देखा कि पृथ्वी हर वस्तु को अपनी ओर खींचती है। गेंद हो या पत्थर, पेड़ या पुस्तक, गाय, भैंस, चूहा, मेंढक सभी पर पृथ्वी अपना बल लगा रही है। हां और हम पर, तुम पर सभी इंसानों पर भी पृथ्वी का बल लग रहा है। इसलिए तो हम सब पृथ्वी पर पड़े हैं। नहीं तो दूर कहीं अंतरिक्ष में मंडरा रहे होते, क्यों है ना मज़ेदार ख्याल!

अच्छा, अब तुम कल्पना करो कि यदि पृथ्वी हर वस्तु को अपनी ओर न खींचती तो क्या-क्या होता। यह केवल कल्पना की बात नहीं है। ऐसा कई लोगों ने अनुभव भी किया है - उन सबने जो लोग अंतरिक्ष यान में बैठकर पृथ्वी से दूर चले जाते हैं। वहां ऊपर पृथ्वी का खिंचाव कम हो जाता है। और फिर उनके जीवन में बड़ी रोचक घटनाएं होने लगती हैं। जैसे, कोई भी वस्तु अपनी जगह पर टिक कर नहीं रहती| सामान नीचे बैठा नहीं रहता। बर्तन पटिए पर नहीं जमे रहते। पुस्तक, पेन, टेबिल पर नहीं पड़े रहते। और तो और, वे लोग खुद कुर्सी पर बैठ नहीं सकते - कुर्सी कहीं और, वे कहीं और मंडराने लगते हैं। पांव भी नीचे नहीं रहते - बल्कि व्यक्ति का सिर कहीं, और पैर किसी दूसरी दिशा में होते हैं।

और सुनो, गिलास में पानी उड़ेलना तक मुश्किल हो जाता है, क्योंकि पानी नीचे को न गिरकर कहीं भी जा सकता है। जितना सोचो, उतना ही अद्भुत दृश्य उभरता है। जीवन मानो पूरी तरह से उल्टा-पुल्टा हो गया है। जब भारत के राकेश शर्मा अंतरिक्ष यात्रा पर गए थे तो टी.वी. पर उनकी फिल्म दिखाई गई थी। फिल्म में भी उनके यान के अंदर का कुछ ऐसा ही मनोरंजक दृश्य था, किसी ने देखा था क्या?

अंतरिक्ष में तो हवा भी नहीं होती। वैसे, अंतरिक्ष यान में हवा का खास इंतज़ाम होता है।

पर हमारी पृथ्वी अगर एक दिन हवा को अपनी ओर खींचना बंद कर दे, तो हवा भी अंतरिक्ष में उड़ जाएगी, पृथ्वी के आसपास नहीं खिंची रहेगी। फिर तो सारी कहानी ही खत्म हो जाएगी।

पर रुको, मान लो यह हवा का चक्कर नहीं है। फिर क्या तुम इस कल्पना को आगे बढ़ा सकते हो? कोशिश करो, और कुछ नई बातें सोचकर लिखो, जो तब घटेंगी जब पृथ्वी सब चीज़ों को अपनी ओर खींचना बंद कर दे।

प्रयोग-3: भार क्या है

अपनी बांह बाहर की ओर फैला लो और हथेली ऊपर को करो। अपने साथी से कहो कि तीन किताबें तुम्हारी हथेली पर रख दे। क्या हथेली पर कोई बल महसूस हुआ? इस बल कि दिशा क्या है?

अब साथी से एक और पुस्तक हथेली पर रखवाओ

अब हथेली पर अधिक बल क्यों महसूस हुआ?

अनुमान से बताओ कि बांह को बिना झुकाए तुम अपनी हथेली पर ऐसी कितनी किताबें उठा सकते हो?

पुस्तकों के कारण जो बल तुम्हारी हथेली पर लग रहा है उसका एक आसान-सा नाम है। बता सकते हो? जी हां, वह बल पुस्तकों का भार भी कहलाता है। हां, वही भार या वज़न, जिसे तुम पहले से पहचानते हो। पृथ्वी जिस बल से पुस्तकों को खींचती है, वही बल पुस्तकों का भार है। और वही तुम्हारे हाथ पर महसूस हो रहा है। यानी हर वस्तु का भार दरअसल वह बल है जो पृथ्वी उस पर लगा रही है।

जब तुम कहते हो कि 'गेहूं' के बोरे का भार 20 किलो है, तो उसका मतलब है उस पर लग रहे खिंचाव बल की मात्रा 20 किलो भार है। दरअसल भार की इकाई को 'किलो भार' ही कहना चाहिए पर हम लोग अक्सर छोटे में उसे ‘किलो' ही कहते हैं। अन्य किसी बल की इकाई को 'न्यूटन' कहते हैं, जो प्रसिद्ध वैज्ञानिक के नाम पर रखी गई है।

चांद पर तुम्हारा भारः

चौंक गए क्या? नहीं, नहीं हुजूर, तुम्हें चांद पर नहीं भेज रहे। केवल कल्पना कर रहे हैं कि यदि तुम चांद पर पहुंच जाओ तो वहाँ तुम्हारा भार कितना होगा।

हमने देखा है कि पृथ्वी हर वस्तु को अपनी ओर खींचती है। पर यह गुण केवल पृथ्वी का ही नहीं है। कोई भी विशाल वस्तु अन्य चीजों पर अपना खिंचाव बल लगाती है। जितनी ज्यादा विशाल काया होगी उतना ही उसके खिंचाव का असर ज्यादा होगा चांद भी एक विशाल वस्तु है। इसलिए चांद भी अपने आसपास की चीजों पर खिंचाव बल लगाता है। पर चांद पृथ्वी से तो छोटा है। इसलिए जितने बल से पृथ्वी किसी चीज़ को खींचती है, चांद उसी चीज़ को कम बल से खींचेगा। चांद का खिंचाव बल पृथ्वी से 6 गुना कम है।

अब मान लो पृथ्वी पर तुम्हारा भार 36 ‘किलो भार' है। तो चांद पर पहुंच जाने पर क्या होगा? चांद पर तुम्हारा भार 6 गुना कम हो जाएगा। यानी देखने में तो तुम वैसे ही दिखोगे, उतने ही लंबे चौड़े, पर तुम्हारा भार चांद पर केवल 36 +6= 6 'किलोभार' आएगा| यानी वहां तुम बिलकुल हल्के हो जाओगे। वाह, क्या मज़ा आएगा। एक कदम रखोगे तो दूर तक फुदक जाओगे। और चूंकि हर चीज़ वहां हल्की हो जाएगी, तुम बड़ी दिखने वाली वस्तु को आराम से उठा लोगे।

इसी तरह मान लो हम तुम्हें बृहस्पति जैसे ग्रह पर पहुंचा देते हैं। बृहस्पति की काया तो पृथ्वी से भी अधिक विशाल है। इस लिए वहां पर खिंचाव बल पृथ्वी से 5 गुना अधिक है। उस ग्रह पर तुम्हारा भार यहां से 5 गुना अधिक होगा। वहां तुम हो जाओगे 36 x 5 यानी 180 किलो भार के। बाप रे, इतने भारी हो जाओगे कि लगेगा तुम लोहे के बने हो।

खैर, खिंचाव बल की यह भारी बातें छोड़ें। और अन्य ग्रहों की इस काल्पनिक सैर से लौटकर फिर पृथ्वी के दामन में लौट चलें।

बलों की कुश्तीः वस्तु पर कुल कितना बल?
'तुमने पंजा तो लड़ाया होगा। नहीं तो ज़रूर लड़ाकर देखना। जब तक दोनों लोग बराबरं बल लगाते रहते हैं, दोनो के पंजे बीच में रहते हैं। यानी दोनों बल आपस में कट जाते हैं और पंजे वहीं टिके रहते हैं। पर जैसे ही किसी एक का बल अधिक हो जाता है, पंजे उस बल की दिशा में झुकने लगते हैं।

इसी तरह ठेले पर दो विपरीत और बराबर बलों की बात हमने पहले की थी। दो-दो बल लगने पर भी ठेला चलता नहीं, उसमें गति नहीं होती। चूंकि दोनों बल बिल्कुल बराबर हैं और ठीक उल्टी दिशा में हैं, इसलिए वैज्ञानिक कहते हैं कि ठेले पर कुल बल शून्य है।

अब एक उदाहरण लेते हैं। एक बच्चा चौकी पर बैठा है। इस बच्चे पर क्या कोई बल लग रहा है?

एक बल तो तुम जानते हो, पृथ्वी का खिंचाव बल। पर क्या केवल वही एक बल है? यदि एक वही बल होता तो बच्चा तेज़ी से पृथ्वी की ओर खिंचता चला जाना चाहिए। पर ऐसा नहीं हो रहा। क्यों? क्योंकि चौकी उसे सहारा दिए है। यानी चौकी बच्चे पर ऊपर की ओर बल लगा रही है - चौकी जो बल लगा रही है वह बच्चे के भार के बराबर है, और उससे उल्टी दिशा में है। तभी तो दोनों बल आपस में कट सकते हैं। चौकी उतना ही बल लगाकर ऊपर को सहारा देती है। जितना भार उस पर लग रहा हो। पर यदि बहुत ही अधिक बल उसको नीचे दबाए, तो फिर उतना उल्टा बल लगाने की क्षमता उसमें नहीं रहती। फिर जो अन्जाम होता है वह कुछ ऐसा है।

अब एक और उदाहरण देखते हैं, जिसमें दो बलों की कुश्ती में दोनों बराबर हैंयानी कुल बल शून्य है

एक नाव पानी पर तैर रही है। चल नहीं रही, खड़ी है। नाव पर क्या नीचे को बल लग रहा है? नाव स्थिर है, नीचे नहीं डूब रही। तो अवश्य कोई दूसरा उल्टा बल ऊपर को लग रहा है, जो उसे सहारा दे रहा है। नाव पर ऊपर की ओर कौन-सा बल लग रहा है?

इन दोनों उदाहरणों से हमने देखा कि जिन स्थितियों में लगता तो है कि, कोई बल-वल नहीं है वहां भी बलों का पंजा लड़ाना चल रहा होता है। लगता है कि वस्तुएं आराम से बैठी हैं, या लेटी हैं, पर उन पर दो-दो (या और भी) छिपे बल काम कर रहे होते हैं। दरअसल इस पृथ्वी पर तो बिना बल की कोई परिस्थिति नहीं होगी। हम ज़मीन पर खड़े हैं तब भी हम पर दो बराबर बल लग रहे हैं - एक पृथ्वी का खिंचाई बल, और दूसरा ज़मीन का सहारा देने वाला बल। पर आपस में ये दोनों कट जाते हैं इसलिए हमें कुछ महसूस ही नहीं होता। यानी हम पर कुल बल शून्य होता है। इसलिए हमें भ्रम होता है कि कोई बल ही नहीं लग रहा हम पर एक आखिरी उदाहरण, जहां हम तो खूब बल लगाते हैं पर उसका असर नहीं दिखता।

खूब भरा हुआ ठेला है। बहुत धक्का लगाने पर भी ठेला टस से मस नहीं हो रहाभला, कौन-सा बल हमारे घने को काट रहा है? बूझ पाए क्या? या हमें ही बताना पड़ेगा। हां, वही 'रगड़न' मियां। ठेला भारी होने से उस पर लग रहा सतह का 'रगड़न' बल भी अधिक है। अब यदि हमें इस 'रगड़न बल से कुश्ती जीतनी है तो और अधिक बल लगाना होगा| यदि हम उतना बल अकेले न लगा पाएं तो एक साथी की मदद लेनी होगी।

हां, अब देखो ठेला चल ही पड़ा - यानी हम दोनों का बल उस 'रगड़न' बल से अधिक हो ही गया।

इसको तीर से दिखाना हो तो ऐसे दिखा सकते हैं या फिर दूसरी तरह ऐसे

यहाँ आगे को लगते दोनो बलों को जोड़कर एक लंबा तीर बना दिया है। जबकि पीछे को लग रहा सतह का रगड़न बल कम है, इसलिए तीर छोटा ही है।

अब कुछ करने के लिए

हमें विश्वास है अब तुम भी पूरी तरह से 'बलवान' हो गए हो, यानी बल का इतना ज्ञान हो गया है कि अब तुम किसी वैज्ञानिक से कम नहीं। क्यों, ठीक कहा हमने? अभ्यास के लिए नीचे दिए कुछ प्रश्नों के उत्तर दोः

नीचे दिखाई वस्तुओं पर क्या कोई बल लग रहे हैं?

यदि हां, तो किस-किस दिशा में? तीर से दिखाओ।

नीचे कुछ अधूरे वाक्य लिखे हैं, जिन्हें पूरा करना तुम्हारा काम है।

1. ऊपर उछाली गई गेंद पर बल ......... की दिशा में लग रहा होता है।
2. हर वस्तु पर पृथ्वी जो खिंचाव बल लगाती है उसे वस्तु का.....कहते हैं।
3. लुढ़कती हुई गेंद पर सतह का 'रगड़न' बल लगने से गेंद की गति .........होती जाती है।
4. पैडल चलाना बंद कर दें तो चलती साइकिल इसलिए रुक जाती है क्योंकि उस पर.............बल लग रहा होता है।

नीचे दिए वाक्यों में से सही/गलत चुनोः

1. हम खटिया पर सो रहे हों तो हम पर कोई भी बल नहीं लग रहा होता।
2. ढलान पर से लुढ़कते ठेले की गति नीचे आते-आते कम होती जाती है।
3. चलती हुई वस्तु पर कोई भी बल न लगे तो वह हमेशा चलती ही जाएगी, कभी रुकेगी हीं।
4. हम चांद पर चले जाएं तो वहां हम पर कोई खिंचाव बल नहीं लगेगा।
5. पृथ्वी का खिंचाव बल आकाश में उड़ते पक्षियों पर भी लगता है।
6. हवा में चलते तीर पर केवल एक ही बल होता है जो नीचे पृथ्वी की ओर लगता है

कुछ प्रश्न यहाँ दिए हैं। इनके उत्तर अपने शब्दों में समझाकर लिखो।

  1. तुम पृथ्वी पर खड़े हो। पृथ्वी तुम्हें अपनी ओर खींच रही है, ठीक है। पर तुम्हें पृथ्वी का कोई खिंचाव बल महसूस नहीं होता। भला, सा क्यों?
  2. तुमने कंचे को दरी पर लुढ़काने वाला प्रयोग किया था। देखा था कि हर बार दरी पर कुछ दूर जाकर कंचा रुक जाता था। अमान लो यही प्रयोग हम चिकनी बर्फ पर कर रहे हैं - तो बर्फ पर लुढ़कता कंचा पहले से कम दूरी पर रुकेगा या अधिक? दूरी में यह अंतर क्यों आएगा।

(अनीता रामपाल - होषांगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम से संबद्ध)