मार्टिन गार्डनर                                                                                                                             [Hindi PDFs Part 1, 45 kB]


अनुवांशिकी में प्रगति के इस ज़माने में डॉ. मुरलीधरन कारखानिस ने एक नए जीवाणु की खोज की - सप्तशंकु सप्तांलिस जो अपना पोषण हवा से प्राप्त कर लेता है। हवा की उपस्थिति में यह जीवाणु हर एक घंटे में अपने जैसे ही सात टुकड़ों/हिस्सों में बंट जाता है, और तुरन्त ही हर हिस्सा अपने मूल जीवाणु जितना ही आकार (साइज़) धारण कर लेता है।
इस तरह से एक घंटे बाद एक से सात जीवाणु बन जाते हैं, एक और घंटे बाद 7 के 49, उसके एक घंटे बाद 49 से 343 और इसी तरह आगे भी। डॉ. मुरलीधरन कारखानिस ने अपनी इस खोज के बारे में बताते हुए शोध पत्रिका में लिखा, “इस जीवाणु की संख्या में अत्यन्त तीव्र गति से वृद्धि होती है।”

एक दिन डॉ. मुरलीधरन ने कांच के एक खाली मर्तबान में नया पैदा हुआ एक जीवाणु डाला। पचास घंटों में वह मर्तबान इन जीवाणुओं से पूरी तरह से भर गया था। तत्पचात् डॉ. मुरलीधरन ने विभीषक किरणों के ज़रिए इन सब जीवाणुओं को नष्ट कर दिया क्योंकि अगर गलती से बर्तन खुल जाता तो कुछ दिनों में जीवाणुओं की संख्या इतनी बढ़ जाती कि पूरा संस्थान क्या, पूरा शहर जीवाणुओं से भर जाता।
उन दिनों मैं भी इस संस्थान का दौरा कर रहा था। इस प्रयोग को देखकर अचानक मुझे एक सवाल सूझा कि इस मर्तबान का 1/7 हिस्सा ठीक किस समय इन जीवाणुओं से भर गया होगा?