अलक्स एम. जॉर्ज
अनुवाद: सुशील जोशी [Hindi PDF, 515 kB]

पाठ्य पुस्तकों, और खास तौर से समाज विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों की छवि ठूँस-ठूँसकर छपी सामग्री की रही है। इन ग्रन्थों में चित्रों को पाठ्य सामग्री के बराबर महत्व नहीं दिया जाता है। चित्रों से यह अपेक्षा नहीं होती है कि पाठक उनकी मदद से कुछ सीखेंगे, बल्कि चित्रों का समावेश पाठ्य सामग्री के मूर्त प्रस्तुतीकरण या थोड़ी राहत के रूप में किया जाता है। लिहाज़ा, पारम्परिक रूप से समाज विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों में तस्वीरों, रेखाचित्र वगैरह का बोलबाला रहा है। प्रतिमाओं, स्मारकों, नायक-नायिकाओं और खलनायकों के चित्र हमारी इतिहास की पाठ्य पुस्तकों की शोभा बढ़ाते आए हैं।

चित्र सजावटी सामान नहीं
इतिहास की मानक पाठ्य पुस्तकें सामान्यत: किसी हड़प्पाकालीन स्थल की जल निकासी प्रणाली के चित्र से शुरू हुआ करती थीं। हड़प्पा के किसी स्थल की नालियों का चित्र शायद ही किसी 11 वर्षीय बच्चे के लिए कोई मायने रखता हो, जब तक कि यह न बताया जाए कि हड़प्पा के ‘नगरों’ में घरों की तादाद उतनी नहीं होती थी जितनी हमारे आजकल के शहरों में होती है। तथ्य तो यह है कि उन शहरों में आजकल के किसी बड़े गाँव से भी कम घर हुआ करते थे।
मगर इस व्याख्या के बगैर तो लगता है कि वह चित्र किसी बड़े इलाके का प्रतिनिधित्व करता है। इसी प्रकार से जब पाठ्य पुस्तक में लोथल को एक बन्दरगाह या गोदी के रूप में दर्शाया जाता है, तो साथ ही यह भी बताया जाना चाहिए कि उन बन्दरगाहों पर जो ‘जहाज़’ होते थे, उनकी लम्बाई महज़ चन्द गज़ होती थी।
ऐतिहासिक दौर में किसी सन्दर्भ-बिन्दु के अभाव में और आज के बन्दरगाहों और नाली व्यवस्था की तुलना में उस काल में साइज़ वगैरह का महत्व बताए बगैर इन चित्रों से कोई अर्थपूर्ण ज्ञान व्यक्त नहीं होता। अर्थात् जब पारम्परिक पुस्तकों में चित्रों का समावेश किया जाता था तो वह मात्र सघन पाठ्य सामग्री में थोड़ी दृश्य राहत प्रदान करने के लिए होता था। ये मात्र सजावटी सामान थे, ये कोई ऐसे तत्व नहीं थे जिनके बारे में विद्यार्थी सोचें, तुलना करें, आकलन करें या तर्क करें।

समाज विज्ञान की पाठ्य पुस्तकों में नायकों, नेताओं और खलनायकों के चित्र भी हुआ करते थे। राजनीति शास्त्र की किताब में प्लेटो, अरस्तू, सुकरात वगैरह के चित्र होंगे। इन चित्रों के नीचे लिखे नामों की अदला-बदली भी कर दी जाती तो शायद अधिकांश बच्चों को कोई फर्क न पड़ता। पाठ्य पुस्तकों में पोर्ट्रेट चित्रों के उपयोग का आशय इससे ज़्यादा कुछ नहीं होता था कि फलाँ विचारक या सामाजिक कार्यकर्ता कुछ-कुछ ऐसा दिखता था। और तो और, यह चित्र भी अकसर उस व्यक्ति का नहीं बल्कि उसके स्टेचू का फोटो होता था। इसी तरह, लॉर्ड कॉर्नवालिस जैसे किसी औपनिवेशिक शासक और न्यूटन जैसे किसी वैज्ञानिक के चित्र देखें तो भी यही स्थिति होगी क्योंकि उनकी हेयर स्टाइल एक-सी होती थी। मुझे तो यह समझने में बहुत वक्त लगा था कि युवा आन्द्रे अगासी के लम्बे बाल अतीत के किसी नायक की नकल नहीं थे। और यदि पाठ्य पुस्तकों में प्रस्तुत चित्रों के आधार पर विद्यार्थी उन्हें उस ज़माने का फैशन मान बैठें तो यह निष्कर्ष गलत न होता कि अठारहवीं-उन्नीसवीं सदी में ब्रिटेन के सारे किशोरों की लम्बी-लम्बी चोटियाँ होती होंगी। पाठ्य पुस्तकों के अधिकांश चित्र पारम्परिक पाठ्य सामग्री के ही समान मिथ्या और अर्धसत्यों का घाल-मेल हैं।

कार्टून्स - एक नया पैराडाइम

अन्तर्राष्ट्रीय खेल: ऐंजल बोलिगान का यह कार्टून 2005 में मैक्सिको में प्रकाशित हुआ था और इसका शीर्षक था - अन्तर्राष्ट्रीय खेल। कार्टूनिस्ट यहाँ किस खेल की बात कर रहा है? चित्र में गेंद किस चीज़ का प्रतीक है? खिलाड़ी कौन-कौन से हैं?

मुझे लगता है कि वर्ष 2006 में राजनीति शास्त्र की नई पाठ्य पुस्तकों के साथ भारत में पाठ्य पुस्तकों में एक नया पैराडाइम उभरा है। उस समय एक रूढ़िवादी पाठ्य पुस्तक लेखक की टिप्पणी थी, “ये किताबें तो पत्रिकाओं जैसी दिखती हैं” (इसमें यह आरोप निहित है कि पाठ्य पुस्तकों के सामने पत्रिकाएँ तो फालतू होती हैं, और पाठ्य पुस्तकें तो पूजनीय, पहुँच से परे, असुसंगत होनी चाहिए।) हालाँकि, समिति के सदस्यों को तो यह एक प्रशंसा लगी, मगर वास्तव में यह टिप्पणी दुर्भावनावश की गई थी। समाज विज्ञान पाठ्य पुस्तकों का यह ‘पत्रिकानुमा’ कलेवर कुछ हद तक उनमें इस्तेमाल किए गए चित्रों का परिणाम था।इन पाठ्य पुस्तकों में सबसे ज़्यादा उपयोग कार्टून्स का हुआ है। पन्द्रह भारतीय और सत्रह अन्तर्राष्ट्रीय कार्टूनिस्टों को इन पाठ्य पुस्तकों में जगह मिली है। अधिकांश कार्टून्स अखबारों और पत्रिकाओं से लिए गए हैं। इससे इन पाठ्य पुस्तकों में शैलियों की एक विविधता भी आई है - एंजेल बोलिगान के कार्टून (पृष्ठ 14, कक्षा 9) पर हैं जो स्पेनिश अखबार युनिवर्सल (मेक्सिको) के लिए कार्टून बनाते हैं, और उनके समकालीन कार्टूनिस्ट इरफान खान और मंजुल डीएनए के लिए (पृष्ठ 85, कक्षा 10) जो हमारे लिए ज़्यादा परिचित हैं। एयर्स और बोलिगान द्वारा बनाए गए चित्र शामिल करने का उद्देश्य न सिर्फ हास्य पैदा करना था बल्कि सवाल उकसाना या हमदर्दी पैदा करना भी था। कार्टून्स प्राय: अतिशयोक्ति और केरिकेचर पर टिके होते हैं। ये बिम्ब अकसर राष्ट्रों की सरहदों के पार पैठ बनाते हैं और उस फ्रेमवर्क को भी लाँघते हैं जिसके अन्तर्गत वे पत्रिकाएं या अखबार काम कर रहे होते हैं। यह सही है कि हमें ऐसे कार्टूनिस्ट कम मिले जो भारत में अँग्रेज़ी के अलावा किसी अन्य भाषा में काम करते हों। ऐसा नहीं है कि हमने ऐसे कार्टूनिस्ट ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की। मगर विभिन्न भाषाओं में कार्टूनिस्ट की तलाश ने मुझे एक सबक सिखाया - जहाँ अँग्रेज़ी अखबारों की वेबसाइट्स पर कार्टूनिस्ट को उभारकर पेश किया जाता है वहीं भारतीय भाषाओं के अखबार अपने कार्टूनिस्ट को उस तरह का स्थान उपलब्ध नहीं कराते। इसी प्रकार से, ऐसे कार्टूनिस्ट बहुत ही कम हैं जिनकी रचनाओं को पुस्तक रूप में प्रकाशित किया गया है। politicalcartoons.com या cagle.com जैसी वेबसाइट्स के माध्यम से दुनिया भर के अन्तर्राष्ट्रीय कार्टूनिस्टों तक पहुँचना सम्भव था। इन वेबसाइट्स पर 2005 तक प्रकाशित हर कार्टून देखा जा सकता था। दिलचस्प संयोग यह था कि लगभग उसी समय वेबसाइट्स ने अपने कार्टून संग्रहों के लिए कुछ कीवर्ड्स आधारित टैग्स का उपयोग शुरू किया था। यह एक महत्वपूर्ण सबक था - राजनीति विज्ञान की कई अवधारणाओं - जैसे प्रजातंत्र, समानता, न्याय, नस्लवाद, जेंडर भेदभाव और अन्य - के कीवर्ड्स टाइप करने पर अद्भुत चित्रात्मक परिणाम हासिल हुए। पारम्परिक पाठ्य पुस्तकों में चित्रों के बारे में तभी सोचा जाता है जब मजमून लिख लिया जाता है। इसके विपरीत हमने विषय वस्तु के तौर पर ही चित्रों की तलाश करनी शुरू कर दी, जो पाठ्य पुस्तक की अवधारणाओं को सम्प्रेषित कर सकें। ज़ाहिर है, अन्तर्राष्ट्रीय वेबसाइट्स पर कई कार्टून्स का सम्बन्ध यू.एस. के स्थानीय राजनैतिक परिदृश्य से था और इन्हें छाँट देना पड़ा था।

पाठ्य पुस्तकों में आम रिवाज़ यह है कि कोई एक कलाकार अकेले पूरी किताब के चित्र बनाता/ती है। मगर कई कार्टूनिस्ट होने से इन किताबों के चित्रों में एक विविधता आई। कार्टून्स के पूरे परास में शैलियों की विविधता से पाठ्य पुस्तकों में एक अलग निखार आया है। यह राजनीति विज्ञान की नवीन शिक्षण पद्धति और राष्ट्रीय पाठ्यक्रम रूपरेखा 2005 द्वारा प्रस्तुत परिप्रेक्ष्य के अनुकूल था - जिसमें अभिमतों की विविधता और विचारों की अनेकता के आधार पर विचार-विमर्श के ज़रिए विद्यार्थियों को खुद अपने मत बनाने में मदद मिलती है। वास्तव में, ये चीज़ें राजनीति विज्ञान शिक्षा के पुराने पेराडाइम के विपरीत थीं, जिसमें विद्यार्थियों को नियम-कायदे बताए जाते थे और समीक्षा की कोई गुंजाइश नहीं छोड़ी जाती थी। विचारकों के आदर्श और विचार निर्विवाद माने जाते थे और यह माना जाता था कि विद्यार्थी एक अच्छे नागरिक का अनुकरणीय प्रतिरूप होगा, जो व्यवस्था पर सवाल नहीं उठाएगा, सिर्फ कानूनों का पालन करेगा।

कार्टून हैं ज़्यादा बोधगम्य

यह कार्टून 2005 में छपा जब आंग सान सू ची 60 वर्ष की हुईं। इस कार्टून के ज़रिए कार्टूनिस्ट क्या कहना चाहता है? क्या सैनिक शासक इस कार्टून को देखकर खुश होंगे?

अपने स्कूलों में मानव प्रकृति सम्बन्धी जड़ धारणाओं को चुनौती देने या उन्हें बदलने में पहले ही देर हो चुकी है, और ऐसे में पारम्परिक स्केच, तस्वीरों, रेखाचित्रों से बने दृश्यवस्तु फॉर्मूले से दूर हटना आसान नहीं था। फिर भी, दृश्य बिम्बों की विभिन्न शैलियों - जैसे पेंटिंग्स, कार्टून्स, पोस्टर्स वगैरह - को शामिल करना और उनकी व्याख्या/समीक्षा को सम्भव बनाना और उसका आग्रह करना पाठ्य पुस्तकों में सुधार का एक उल्लेखनीय कदम है।

कार्टून्स को सार्थक रूप से छापना आसान है। ये राजनैतिक पोस्टर्स या पार्टी पेम्फलेट्स के मुकाबले शायद ज़्यादा बोधगम्य होते हैं। नई पाठ्य पुस्तकों में राजनीति विज्ञान को महज़ कानूनों, नियमों, कायदों और तारीखों की फेहरिस्त के रूप में प्रस्तुत नहीं किया गया है। इसे एक ऐसे विषय के रूप में पेश किया गया है जो इन चीज़ों को पिछले 60 सालों की महत्वपूर्ण राजनैतिक घटनाओं के सन्दर्भ में रखकर देखता है। इसके अलावा, यह सम्भव भी था और ज़रूरी भी था कि विभिन्न कालों के कार्टूनिस्टों पर नज़र डालें और हम शंकर व अबी जैसे महान कार्टूनिस्टों से आगे जाकर सुरेंदर एवं मंजुल जैसे समकालीन कार्टूनिस्ट को भी देख पाए। हर राजनैतिक कार्टूनिस्ट ने हमारे राजनैतिक इतिहास के किसी क्षण को कैद किया है।

यह कार्टून लातिनी अमरीका के सन्दर्भ में बना था। क्या आपको लगता है कि यह पाकिस्तान पर भी फिट बैठता है? कुछ अन्य देशों के बारे में सोचिए जिन पर यह कार्टून लागू हो सकता है, क्या कई बार हमारे देश में भी ऐसा होता है?

कार्टून मूलत: राजनैतिक वक्तव्य होते हैं। ऐसा एक अकेला कार्टून पूरे सम्पादकीय पृष्ठ का स्थान ले सकता है या उसका निचोड़ प्रस्तुत कर सकता है। विद्यार्थियों को कार्टून्स का विश्लेषण करने के अवसर देने की गुंजाइश समाज विज्ञान की किसी अन्य शाखा से ज़्यादा राजनीति विज्ञान में है। कार्टून्स के ज़रिए अखबार रोज़ाना हमें देश की राजनैतिक घटनाओं पर करारी टिप्पणी उपलब्ध कराते हैं। मतदाता बनने की दहलीज़ पर खड़े हमारे युवाओं को यदि किसी देश की राजनैतिक घटनाएँ तो बताई जाएँ, मगर अतीत का कोई हवाला न दिया जाए, तो बात अधूरी रहेगी। कार्टूनिस्ट भी एक नागरिक है जो अपने समय के राजनैतिक घटनाक्रम पर टिप्पणी करता है। किसी राजनैतिक विचारक या राजनीतिज्ञ के ही समान कार्टूनिस्ट भी अपने दौर की घटनाओं की समीक्षा दर्ज़ कराता है। लिहाज़ा, सामाजिक अध्ययन की पाठ्य पुस्तकों की कल्पना करते हुए यह मान लेना गलत होगा कि कार्टूनिस्ट ने सिर्फ हास्य के लिए सामग्री उपलब्ध करवायी थी। एक शैक्षिक औज़ार के नाते, चित्रों और पाठ्य सामग्री में विविधता कक्षा में एक अहम भूमिका निभाती है। यह सोचना गलत होगा कि सारे कार्टून राजनैतिक वर्ग का मखौल बनाने की कोशिश करते हैं। वे तो विविधतापूर्ण परिप्रेक्ष्य के लिए गुंजाइश बनाते हैं। यदि पाठ्य पुस्तकों का मकसद अपनी राजनैतिक दुनिया को समझना है, तो बिम्बों की एक अहम भूमिका है। ज़्यादा बुनियादी बात यह है कि मात्र विवाद के चलते किसी शैक्षणिक उपकरण को ही खारिज़ न कर दिया जाए।

यह कार्टून मतदान केन्द्र के आगे अपने गुण्डों समेत खड़े आपराधिक चरित्र के उम्मीदवार की एक मतदाता से बातचीत को दिखाता है।

कार्टून के आर्काइव में काम करना निजी तौर पर भी एक सबक था। भारत के राजनैतिक सन्दर्भ में इन कार्टूनिस्टों के बारे में थोड़ा और जानने से कुछ रोचक पहलू सामने आए।मैं सोचने पर मजबूर हुआ कि बरसों आर.के. लक्ष्मण के बाजू में बैठकर और उसी अखबार (मुम्बई के टाइम्स ऑफ इंडिया) के लिए कार्टून बनाते-बनाते बाल ठाकरे ने अचानक कैसे दक्षिण भारतीयों के खिलाफ राजैतिक आंदोलन शुरू कर दिया। के.एस. कुट्टी की जीवनी के अंश पढ़ते हुए, यह जानकर आश्चर्य हुआ कि वे शायद पहले कार्टूनिस्ट थे जिनके कार्टून्स का बांग्ला में ‘अनुवाद’ हुआ था। वे स्वयं केरल के थे और बांग्ला नहीं समझते थे जबकि उनके कार्टून बांग्ला में नियमित रूप से प्रकाशित होते थे। आजकल ऐसे कार्टूनिस्ट नहीं मिलते जिनके कार्टून्स का अनुवाद अन्य भारतीय भाषाओं में होता हो। यह भी हैरत और थोड़ी निराशाजनक बात थी कि राजधानी के अधिकांश पुस्तकालयों में केरल से प्रकाशित अँग्रेज़ी अखबार ‘द वीक’ के पुराने अंक नहीं रखे जाते हैं। इस वजह से यसुदासन के एक भी कार्टून का उपयोग पाठ्य पुस्तकों में नहीं किया जा सका। ये वे कार्टून हैं जिन्हें बढ़ते समय मलयाली मनोरमा में देखा करते थे। शोध के दौरान मुझे यह भी समझ में आया कि अधिकांश कार्टूनिस्ट बहुत ज़्यादा यात्राएँ नहीं करते थे - अकसर वे समूचे राष्ट्र को नहीं बल्कि किसी एक क्षेत्र को ही भलीभाँति चित्रित करते थे।

केन्द्र-राज्य सम्बन्धों पर कार्टूनिस्ट कुट्टी की एक टिप्पणी - राज्य कुछ और शक्तियों की भीख माँग रहे हैं।

कहने का मतलब यह नहीं है कि पुराने किस्म के चित्रों या पाठ्य सामग्री को पुस्तक-निकाला दे दिया जाए। दरअसल, अधिकांश बच्चे जो पाठ्य पुस्तकें और सामग्री आज भी पढ़ रहे हैं वे निर्जीव बिम्बों से भरी हैं जिनमें एकाधिक व्याख्याओं या एकाधिक परिप्रेक्ष्य या नज़रिए उकसाने की सम्भावना शून्य है। सम्भवत: राजनीति विज्ञान की एन.सी.ई.आर.टी. की ये किताबें ऐसे चित्र व पाठ्य सामग्री जुटाने का पहला प्रयास है जो विभिन्न सम्भावनाएँ प्रदान करती हैं - इनके ज़रिए राजनीति विज्ञान संविधान और नियम-कायदों का संक्षिप्त संस्करण भर रह जाने से मुक्त हुआ है और एक ऐसे विषय में तबदील हुआ है जो विद्यार्थियों को सत्ता के अलग-अलग परिदृश्यों व सन्दर्भों के बारे में सोचने को प्रेरित करता है और जो कुछ वे पढ़ते हैं और जो कुछ वे अपने आसपास देखते हैं, उनके बीच सम्बन्ध टटोलने का मौका देता है।


अलक्स एम. जॉर्ज: स्कूली पढ़ाई केरल में हुई। शिक्षा एवं कानून का समाज शास्त्र विषयों में विशेष रुचि। एन.सी.ई.आर.टी. की राजनीति विज्ञान की पुस्तकों के पाठ्यक्रम निर्माण से सम्बद्ध रहे हैं। वर्तमान में स्वतंत्र शोधकार्य में संलग्न हैं।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
सभी चित्र: एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा निर्मित एवं प्रकाशित लोकतांत्रिक राजनीति कक्षा-9 और कक्षा-10 से साभार।