सुभाष [Hindi PDF, 291 kB]

राजस्थान के सहरिया समुदाय के बच्चों को मुख्यधारा की शिक्षा से जोड़ने के लिए पृथक प्रोजेक्ट चलाया जा रहा है। इस प्रोजेक्ट के तहत गाँवों में माँ-बाड़ी विद्यालय संचालित हो रहे हैं। इसमें बच्चों को कक्षा दो तक की पढ़ाई के साथ अन्य सुविधाएँ दी जा रही हैं। कक्षा तीन से बच्चों को किसी भी विद्यालय में प्रवेश मिलना चाहिए, लेकिन सहरिया समुदाय के बच्चे अकसर शिक्षा के साथ अपना जुड़ाव बनाकर नहीं रख पाते। किन वजहों से सहरिया बच्चे शिक्षा की मुख्य धारा से अलग-थलग पड़ जाते हैं, पढ़िए इस लेख में।

शिक्षा का अधिकार कानून 2009 कहता है कि विद्यालय में प्रवेश लेने वाला बच्चा प्रति वर्ष अगली कक्षा में जाएगा और प्रवेश लेने के पाँचवे वर्ष, पाँचवीं कक्षा उत्तीर्ण कर लेगा। यानी कोई भी बच्चा अब फेल नहीं होगा।
मेरा मानना है कि ऐसा किए जाने के पीछे कई कारण हैं जिनमें से एक कारण यह भी है कि फेल हो जाने वाले बच्चों को कम उम्र के साथियों के साथ बैठना पड़ता है जिससे वे कक्षा में सहज नहीं रह पाते हैं। एक ही कक्षा में बच्चे कोे लगातार रखने से बच्चे की सीखने-सिखाने में रुचि भी कम होने लगती है और वे अलग-थलग से नज़र आते हैं। जिन बच्चों को पुरानी कक्षा में रोक लिया जाता है उन बच्चों के बारे में शिक्षकों की टिप्पणियों से बच्चे आहत होते हैं और रोज़-रोज़ की ज़िल्लत से बचने के लिए वे धीरे-धीरे विद्यालय आना ही बन्द कर देते हैं और स्कूली जीवन से उनका नाता टूट जाता है।

मुझे लगता है कि सिर्फ कानून बनने से सब कुछ सही हो जाएगा, ऐसा तो नहीं कह सकते लेकिन यह कानून जिन बच्चों के लिए बना है, उन्हें इसकी मदद तो मिलनी चाहिए। मैं यहाँ राजस्थान के सहरिया आदिवासी समुदाय के बारे में अपने कुछ अनुभव बाँटना चाहता हूँ।

नवप्रवेशी बच्चे और विद्यालय
राजस्थान के एक उच्च प्राथमिक विद्यालय में जहाँ मैंने कुछ समय काम किया है, वहाँ आने वाले 90 प्रतिशत बच्चे सहरिया आदिवासी समुदाय के थे। सत्र 2009-10 की बात है। जुलाई माह में विद्यालय की प्रवेश प्रक्रिया शु डिग्री होते ही बच्चे अपने अभिभावकों के साथ विद्यालय में प्रवेश लेने के लिए आने लगे। नवप्रवेशी बच्चों को कक्षा-1 में दाखिल किया जा रहा था। यहाँ कुछ बच्चे ऐसे भी आए जो इसी गाँव में चलने वाली माँ-बाड़ी। से कक्षा-2 उत्तीर्ण कर इस स्कूल में कक्षा-3 से पढ़ाई जारी रखना चाहते थे। सहरिया बच्चों को शिक्षा उपलब्ध कराने के अतिरिक्त प्रयास के रूप में सहरिया बाहुल्य क्षेत्र में एक परियोजना के अन्तर्गत माँ-बाड़ी विद्यालय कक्षा-1 व 2 की पढ़ाई के लिए चलाए जा रहे हैं। माँ-बाड़ी से कक्षा-2 उत्तीर्ण कर एक लड़की अपने अभिभावकों के साथ जब विद्यालय में कक्षा-3 के लिए प्रवेश लेने पहुँची तो शिक्षकों ने उससे किताब पढ़वाई व कुछ संख्याएँ लिखवाईं जिसे वह नहीं कर पाई। ऐसी स्थिति में शाला प्रबंधन द्वारा बच्ची का नाम कक्षा-1 में लिख दिया गया। उनका कहना था ऐसे बच्चे आगे जाएँगे तो स्कूल की आठवीं कक्षा का रिज़ल्ट खराब करेंगे। आखिरकार, उस लड़की का दाखिला कक्षा-1 में किया गया और इसके बाद वो कभी स्कूल नहीं आई।

शिक्षकों ने कभी भी यह जानने की कोशिश नहीं की कि वो स्कूल क्यों नहीं आ रही है। मैंने उस लड़की से कई बार सम्पर्क किया लेकिन वो कुछ संवाद ही नहीं करती, और उसके माता-पिता यही कहते कि हम तो भेजते हैं पर यह खुद ही नहीं जाती। अन्य बच्चों से बातचीत करने पर पता चला कि उसका नाम कक्षा-1 में लिख देने के कारण वो स्कूल नहीं आती। क्योंकि कक्षा-1 के सभी बच्चों से वह बड़ी है, उसे वहाँ बैठने में शर्म आती है। साथ ही वहाँ उसकी कोई सहेली भी नहीं हैं क्योंकि उसकी उम्र की सहेलियाँ तो अब कक्षा-3 में पढ़ती हैं।
एक तरफ तो प्रत्येक बच्चे को अनिवार्य रूप से शिक्षा उपलब्ध कराने के लिए लगातार प्रयास हो रहे हैं। शिक्षा तक सभी की पहुँच हो, इसके लिए सरकारी व गैर सरकारी संस्थाएँ जुटी हुई हैं। दूसरी तरफ, शाला प्रबंधन का निर्णय एक सहरिया आदिवासी बच्ची को विद्यालय से बाहर ढकेलने का कारण बनता है। मुझे अभी भी ऐसा लगता है कि शायद उस सहरिया बच्ची को उसकी उम्र के हिसाब से कक्षा तीन में प्रवेश दे दिया जाता तो वह बच्ची विद्यालय से जुड़ी रहती। यह बच्ची जितना पढ़ना-लिखना जानती थी उसे कक्षा तीन में ही ‘स्तरानुसार शिक्षण’ से आगे बढ़ाया जा सकता था, जिसकी बात ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून भी करता है। यहाँ पर हमारी स्कूली व्यवस्था बच्ची को स्कूल से जोड़े रखने में असफल रही। मेरे मन में यह सवाल भी उठता है कि वह वर्ग जो समाज में शिक्षा के माध्यम से बदलाव की बात करता है उसमें अधिकतर शिक्षक ही हैं। क्या शिक्षा की स्थिति में बदलाव बोर्ड के उच्चतर परिणामों से दिखेगा या उन सहरिया बच्चों के लगातार विद्यालय से जुड़े रहने से?

पिछले वर्ष की भाँति इस वर्ष भी माँ-बाड़ी से कक्षा-2 उत्तीर्ण कर कुछ सहरिया लड़के व लड़कियाँ इस उच्च प्राथमिक विद्यालय में आए। क्या करें माँ-बाड़ी विद्यालय हैं ही कक्षा-2 तक, ऐसे में बच्चों को अन्तत: आना इसी उच्च प्राथमिक विद्यालय में ही पड़ता है। इस सत्र में भी यही हुआ। बच्चे कक्षा-3 में प्रवेश के लिए आए। साथ में उनके अभिभावक भी आए। नवप्रवेशी फॉर्म भरे गए। बच्चों से किताबें पढ़वाईं, कुछ सँख्याएँ लिखवाईं। 8-10 बच्चों ने किताब ठीक से पढ़ी और संख्याएँ भी ठीक बताईं। इनका नाम कक्षा-3 में लिखा गया। जबकि 8-10 बच्चे जो कि पढ़ना-लिखना धारा प्रवाह नहीं कर पाए उन्हें फिर से कक्षा-1 में ही प्रवेश दिया गया। ऐसा नही है कि ये 8-10 बच्चे कुछ भी नहीं जानते। इनमें कुछ बच्चे 50 तक संख्याएँ अटकते हुए या मदद करने पर बता पाते हैं। सभी वर्णों को पहचानते हैं, कुछ शब्दों को भी पढ़ लेते हैं। शायद उन्हें वर्ण ही सिखाए गए हों। ऐसे बच्चों को कक्षा-1 में प्रवेश दिया गया। कक्षा-1 में प्रवेश देने पर एक अभिभावक ने आपत्ति उठाई कि मेरी बेटी को कक्षा-3 में ही बिठाओ, कक्षा-1 में नहीं। शिक्षकों ने बच्चे के अभिभावक को, शैक्षणिक स्तर की बात करते हुए उनकी बेटी को कक्षा-2 में प्रवेश देने के लिए राज़ी कर लिया लेकिन अन्य बच्चे कक्षा-1 में ही रह गए।

मैंने शिक्षकों से बात की कि उन्हें कक्षा-3 में ही प्रवेश मिले और हम उनके स्तर के अनुसार ही शिक्षण कार्य कर लेंगे। इस पर शिक्षकों ने असहमति जताई।
इस बार कक्षा-1 में प्रवेश मिलने पर भी वे 8-10 बच्चे लगातार स्कूल आ रहे हैं। मुझे लगता है कि इस बार आठ-दस बच्चों का समूह बन जाने के कारण ये बच्चे अपने आपको अकेला महसूस नहीं करते और लगातार स्कूल आ रहे हैं। पिछले सत्र में वह लड़की अकेली थी शायद इसी कारण उसने स्कूल आना छोड़ दिया था।

एक सहरिया लड़का इस स्कूल में पिछले 3 वर्षों से कक्षा-2 में ही पढ़ रहा है। शिक्षक उसे आगे नहीं बढ़ा रहे हैं। यह बच्चा 1000 तक संख्या पहचानता है और पढ़ना-लिखना भी जानता है। इसके बावजूद उसे एक ही कक्षा में लगातार रोका जा रहा है। इस बच्चे के कुछ साथी तो कक्षा-4 में चले गए हैं और कुछ अब कक्षा-5 में हैं। बच्चा पिछले 3 साल से एक ही कक्षा में होने के बावजूद लगातार स्कूल आ रहा है। मैं सोचने लगता था कि ऐसी स्थिति में उस बच्चे के माता-पिता को कैसा महसूस होता होगा।

एक दिन बच्चे के पिता ने फोन पर अपना परिचय देते हुए कहा, “मेरे बेटे को स्कूल जाते पाँच साल हो गए हैं फिर भी वो अभी तक कक्षा दो में ही क्यों है? मैं बहुत गरीब हूँ माटसाहब, मेरा एक ही बेटा है। मेरे पास रहने को घर नहीं है। घास-फूस की टपरिया में रहता हँू। रोज़ सुबह मज़दूरी पर चला जाता हूँ और शाम को वापिस आता हूँ।” फिर वे तीन-चार बार इस बात को कहते जाते कि “मेरा एक ही बेटा है। मैं उसे पढ़ाना चाहता हूँ।” मैंने उनसे कहा कि “मैं स्कूल में मास्टर साहब से बात करूँगा। और आप भी स्कूल आओ फिर बैठकर बातचीत कर लेंगे। आप खुद आकर अपनी बात स्कूल में कहोगे तो ज़्यादा अच्छा रहेगा।”

मैंने विद्यालय में अध्यापकों से यह बात की कि अपने विद्यालय में एक बच्चा है जिसे स्कूल आते पाँच वर्ष हो गए हैं लेकिन स्कूल के रजिस्टर में उसका नाम अभी तक कक्षा-2 में लिखा हुआ है और ऐसी क्या वजह है कि वह बच्चा कक्षा-2 से आगे नहीं बढ़ रहा है। मैंने यह भी बताया कि इस बात को लेकर बच्चे के पिता को चिन्ता हो रही है। मेरे व उस बच्चे के पिता के बीच इस मुद्दे पर हुई बातचीत से भी मैंने शिक्षकों को अवगत कराया।

मुझे पता चला कि यह बच्चा प्रत्येक वर्ष परीक्षा के दिनों में अपने परिवार के साथ खेत काटने चला जाता है, इस वजह से परीक्षा में अनुपस्थित रहता है। मैंने शाला प्रबंधन से उम्र के आधार पर ऐसे सभी बच्चों को आगे की कक्षा में प्रवेश देने की बात कही। उनका कहना था कि सत्र के बीच में उस बच्चे का नाम अगली कक्षा में नहीं लिख सकते। इस सत्र में तो वह उसी कक्षा में रहेगा।
दोबारा अभिभावक का फोन आया। पुन: उन्होंने सारी बातें कहीं, “माटसाब मेरे बच्चे को आगे की कक्षा में बिठाने लग गए क्या?” मैंने उन्हें बताया कि शिक्षकों से मेरी चर्चा हुई है। वे उसे इस सत्र में आगे की कक्षा में बिठाने से मना कर रहे हैं। फिर भी मैं दोबारा बात करके कोशिश करता हूँ कि आपका बच्चा आगे की कक्षा में आ जाए।

इस मुददे पर बातचीत करने से पहले मैं इतना इसलिए सोच रहा था क्योंकि शिक्षकों को कई बार ये लगता है कि हम उन्हें शिक्षा के बारे में नई-नई बातें बताकर उन पर अपना ज्ञान झाड़ते हैं। जबकि वो सरकारी अध्यापक हैं और हम गैर सरकारी। मैं चाहता हूँ कि ये मुद्दा मेरा व मेरे साथियों का न होकर सभी का सामूहिक मुद्दा बने, जिस पर हम सभी मिलकर विचार करें और एक ऐसा निर्णय ले पाएँ जिससे वह बच्चा अगली कक्षा में प्रवेश कर सके। और बच्चे के अभिभावक को अपने बच्चे कीशिक्षा के प्रति हो रही चिन्ता दूर हो सके। ऐसे उदाहरणों से हम यह तो कह ही सकते हैं कि वंचित तबके के अभिभावक भी अपने बच्चों की शिक्षा के प्रति चिन्तित हैं।

स्कूल की मीटिंग में मैंने स्कूल के सभी शिक्षकों के समक्ष यह बात रखी। मैंने शिक्षकों को बच्चे के पिता की आर्थिक स्थिति, मजबूरी, स्कूल न आ पाने की वजह और उनकी लगातार बढ़ती चिन्ता के बारे में भी बताया।
मैंने कहा, “हम इस बच्चे को उम्र के आधार पर कक्षा-5 में प्रवेश दे सकते हैं। इस पर एक शिक्षक ने असहज भाव से कहा, “देखो समुदाय का कोई व्यक्ति नहीं कह रहा है बल्कि आप उसको कह रहे हैं कि तुम अपने बच्चे का प्रवेश कक्षा-5 में करवाओ। आप समुदाय को हमारे खिलाफ भड़का रहे हैं।” मैंने कहा, “मैं भड़का नहीं रहा हूँ। मैं सिर्फ वो कह रहा हूँ जो उस बच्चे के पिता ने मुझसे कहा है।” शिक्षक ने कहा, “वो हमको फोन क्यों नहीं करता, हमसे बात क्यों नहीं करता, आपको ही क्यों कहता है?” मैंने कहा, “हम सब मिलकर बातचीत कर लेते हैं।” शिक्षक ने कहा, “हमें कोई बातचीत नहीं करनी, अगर उसको बातचीत करनी होगी तो वह स्कूल में आ जाएगा।” इसके आगे मीटिंग नहीं चल पाई।

शाम को मैं उस बच्चे के पिता से मिला। मैंने उनसे कहा, “एक बार आप समय निकाल कर स्कूल में आ जाओ। आप और मैं शिक्षकों से आपके बच्चे को कक्षा-5 में प्रवेश देने की बात करेंगे।” अभिभावक ने कहा, “मैं नहीं आ पाऊँगा, आप ही देख लेना। मैं तो मज़दूरी पर निकल जाता हूँ।”
यहाँ पर समुदाय के बीच शिक्षकों का दबदबा है। आर्थिक व सामाजिक दबाव के चलते शिक्षकों की बात को प्रत्युत्तर करने का साहस समुदाय के लोग नहीं कर पाते। यह अभिभावक कभी स्कूल नहीं आया और इसका बच्चा कक्षा-2 में पढ़ता रहा। यह सत्र भी गुज़र गया।

सत्र के बीच में ही जनवरी, 2012 में मैंने इस स्कूल में काम करना बन्द कर दिया। सत्र 2012-13 शु डिग्री हो चुका था और मैं राजस्थान के एक दूसरे स्कूल में काम करने लगा। एक दिन मैंने उस स्कूल के एक अन्य शिक्षक से अनौपचारिक बातचीत के लिए फोन किया। बातचीत के दौरान ही मैंने उस बच्चे के बारे में पूछ लिया। उन्होंने बताया कि उसने तो पढ़ाई छोड़ दी है, अब वो अपने घर से दूर चला गया है और किसी की भेड़ें चराता है।
जहाँ ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून शिक्षा से वंचित बच्चों को स्कूल से जोड़ने की पैरवी करता है, वहीं एक स्कूल से जुड़ा हुआ बच्चा शिक्षकों की आँखों के सामने से ओझल हो जाता है और शिक्षक समुदाय को इसका आभास तक नहीं होता।

अपने अनुभव बाँटते हुए मुझे यह काफी शिद्दत से महसूस होता है कि हालाँकि, ‘शिक्षा का अधिकार’ कानून पूरे देश में लागू हो चुका है, फिर भी, शिक्षा से जुड़े हुए सभी लोग इस कानून के विविध पहलुओं को समझ नहीं पा रहे। इस कानून की समझ बनने और इसका बच्चों के हित में क्रियान्वयन हो सके, इसके लिए लगातार प्रशिक्षण की ज़रूरत है।
हालाँकि, कुछ ऐसे प्रशिक्षण शु डिग्री हो चुके हैं। कानून लागू होने के बाद कुछ समय तो अनिश्चितता और भ्रम की स्थिति बनी रही लेकिन अब शिक्षक और शाला प्रबंधन इस कानून की भावना को समझ लें तो सहरिया समुदाय या ऐसे अन्य बच्चों को शाला में प्रवेश देते समय शायद बच्चों के अधिकारों की रक्षा हो सकेगी।


सुभाष: पाँच साल तक ‘अलारिप्पू’ (शिक्षा में थिएटर) पर और दिगन्तर में शोध शिक्षक के तौर पर चार साल तक काम किया है। वर्तमान में अजमेर ज़िले में ‘रूम टू रीड’ में पठन-लेखन निर्देशन कार्यक्रम में सलाहकार के रूप में कार्य कर रहे हैं।
सभी चित्र: प्रशान्त सोनी: पेंटर और इलस्ट्रेटर। विद्या भवन एजुकेशन रिसोर्स सेंटर, उदयपुर में कार्यरत।