लेखक :  एस. श्रीनिवासन
अनुवाद: भरत त्रिपाठी

हमारे आसपास मौजूद भाषा, गणित, भूगोल या कोई भी सामग्री खास किस्म की व्यवस्था या परम्परा लिए होती है। क्या यह व्यवस्था रूढ़ है या इसमें कुछ लचीलेपन की गुंजाइश भी है। ऐसी ही कई परम्पराओं पर सवाल उठाते हुए परम्परा और नवाचारों के अन्तर्सम्बन्धों की पड़ताल की गई है इस लेख में।

प्राथमिक शाला के शिक्षकों के साथ हो रहे एक प्रशिक्षण में हम अंकों के स्थानीय मान पर चर्चा कर रहे थे कि इस व्यवस्था में हम इकाई अंकों को सबसे दाईं तरफ रखते हैं, दहाई अंकों को इकाई अंकों के बाईं तरफ रखते हैं और इसी क्रम में आगे बढ़ते जाते हैं। अचानक एक शिक्षक ने खड़े होकर पूछ लिया, “इकाई अंक को दाईं तरफ ही लिखना क्यों ज़रूरी है?” एक क्षण झिझकने के बाद मैंने कहा, “जहाँ तक गणित का सवाल है इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम संख्याओं को किस तरह लिखें। जैसे कि, चार सौ सैंतीस को आमतौर पर 437 लिखा जाता है लेकिन इसे 734 भी लिख सकते हैं और उसे सात, तीस तथा चार सौ पढ़ना होगा।

इससे कक्षा में ज़रा हो-हल्ला-सा मच गया। शिक्षकों ने कहा कि इकाई के अंकों को सबसे बाईं तरफ लिखना कतई स्वीकार नहीं किया जा सकता। काफी बहस के बाद, एक-दो शिक्षकों ने अनिच्छा से यह माना कि हो सकता है मेरी बात में कुछ तर्क हो। और सच्चाई यही है कि जब भी कोई अपरम्परागत या नई बात पहली बार हमारे सामने आती है तो हम सभी अनिच्छा से ही उसे स्वीकार करते हैं (अपनी बात कहूँ तो कम-से-कम मैं तो ऐसा करता ही हूँ)। समझ और स्वीकृति उस बात से सुपरिचित हो जाने पर, और कुछ चिन्तन-मनन के बाद आती है। अगले दिन कुछ शिक्षकों ने मुझसे कहा कि मेरी बातें उन्हें कुछ तर्कसंगत लगी।

परम्पराओं और अपरम्परागत पर जब सोचना-विचारना शु डिग्री किया तो समझ आया कि ऐसे उदाहरणों का दायरा तो काफी बड़ा है। हमारी ज़िन्दगी में ऐसी कई परम्पराओं और नयेपन का तानाबाना गुँथा हुआ है। कुछेक दफा हम इसे महसूस कर पाते हैं लेकिन ज़्यादातर बार हमारा ध्यान इस ओर नहीं जाता क्योंकि हम इन रूढ़ परम्पराओं के आदी हो चुके हैं। ऐसी ही कुछ परम्पराओं की ओर मैं यहाँ आपका ध्यान खींचना चाहूँगा।

भाषा और लिपि
शुरुआत भाषा से करते हैं जिससे हम सबका रोज़ वास्ता पड़ता है। किसी भाषा की लिपि के बारे में आप क्या सोचते हैं? कुछ भाषाओं को परम्परागत रूप से दाहिने से बाएँ लिखा जाता है तो कुछ को बाएँ से दाहिने। मैं मानता हूं कि जब तक सभी लोग एक ही परम्परा का पालन कर रहे हों तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम बाईं तरफ से लिख रहे हैं या दाईं तरफ से। उदाहरण के लिए, हिन्दी और अँग्रेज़ी को दाईं से बाईं तरफ यानी from right to left (tfel ot thgir morf) भी लिखा जा सकता है। यह परम्परा की स्वीकृति का ही परिणाम है कि हम कुछ भाषाओं को बाईं से दाईं तरफ पढ़ते हैं और कुछ अन्य जैसे उर्दू और अरबी को दाईं से बाईं तरफ।
भाषा लेखन में भी कई परम्पराएँ मौजूद हैं (तालिका देखिए)। मसलन, एलटीआर यानी लेफ्ट टू राइट - बाएँ से दाएँ। आरटीएल यानी राइट टू लेफ्ट - दाएँ से बाएँ। टीबी यानी टॉप टू बॉटम - ऊपर से नीचे। ये सब लिखने के प्रमुख ढंग हैं। पर दूसरे ढंग भी हैं जो इन सबसे अलग हैं। कुछ लोग, जैसे कि जापानी लोग, सन्दर्भ के मुताबिक क्षैतिज और लम्बवत, दोनों तरीकों से लिखते हैं। स्वाभाविक है कि संख्याओं के निरूपण का उनका ढंग भी इसके अनुसार बदल जाता है। अपने संवादों को लिखने या निरूपित करने के ढंग का यथार्थ के प्रति हमारी समझ और स्वीकृति पर प्रभाव पड़ता है।

परम्परागत नक्शे
यदि नक्शों की बात करें तो इनमें कई रूढ़ परम्पराओं का निर्वाह किया जाता है। आम तौर पर सभी नक्शों को उत्तर ऊपर की ओर है, ऐसी मुद्रा (पोज़िशन) में पेश किया जाता है। इसकी वजह से होता यह है कि हम सब भी किसी-न-किसी तरह यह धारणा बना लेते हैं कि हिमालय ऊपर की ओर है तथा ऑॅस्ट्रेलिया नीचे (डाउन या अंडर) है। एक उल्टा नक्शा बनाकर देखना चाहिए कि बच्चों की, शिक्षकों की, और हाँ, स्कूल प्रशासन की क्या प्रतिक्रिया होती है।
यह तो हुई नक्शे की उत्तर दिशा की बात; यदि ज़मीन पर खड़े होकर उत्तर दिशा को मालूम करना है तो एक छड़ चुम्बक हमारी मदद कर सकता है। छड़ चुम्बक में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव नाम देने के पीछे भी एक परम्परा है। विज्ञान की अधिकांश किताबें हमें बताती हैं कि जब हम किसी छड़ चुम्बक को मुक्त छोड़ देते हैं तो उसका जो सिरा पृथ्वी के उत्तरी ध्रुव को इंगित करता है, चुम्बक के उस सिरे पर ‘ग़्’ या नॉर्थ (उत्तर) चिन्हित किया जाता है। सवाल पूछने पर कि ये दोनों उत्तर ध्रुव एक-दूसरे को विकर्षित क्यों नहीं करते, अक्सर लोग दिग्भ्रमित हो जाते हैं। चुम्बकीय और भौगोलिक दोनों के ध्रुवों के एक-सरीखे नाम होने से यह भ्रम व्यापक रूप से पाया जाता है।

अंकगणित की रूढ़ियाँ
यदि गणित की बात करें तो प्रारम्भिक अंकगणित में भी संख्या, दशमलव, घातांक इत्यादि से जुड़ी अनेक परम्पराएँ हैं। हम ऋणात्मक संख्याओं को संख्या रेखा की बाईं तरफ लिखते हैं; हम चाहें तो उन्हें दाईं तरफ भी लिख सकते हैं। दशमलव वाली संख्याओं को लिखते समय पूर्णांक वाले भाग को बाईं तरफ लिखा जाता है और आंशिक भाग को दाईं तरफ। क्या 1.5 (अर्थात डेढ़) को 5.1 भी लिख सकते हैं? क्या 23 (2 की घात 3) को 23 की तरह लिखा जा सकता है जिसमें घातांक 3 को ऊर्ध्वांक की बजाय पादांक की तरह दिखाया जाए?
आम तरीके से गुणा करने की बजाय क्यों न इस तरह से करके देखा जाए:

भिन्न संख्याओं और पूर्णांकों को लिखते समय हर को नीचे लिखना और अंश को ऊपर लिखना भी परम्परा ही है? मुझे तो ऐसा ही लगता है। क्योंकि मैं नहीं समझता कि यदि हम तीन-चौथाई को 4/3 या 4 को 1/4 लिखें तो इससे गणित पर कुछ फर्क पड़ेगा, खासतौर पर यदि हमारे बीच इस तरह लिखने की आम सहमति हो।
सामान्य अंकगणित में इस तरह की परम्पराओं के कई और उदाहरण आप भी ढ़ूँढ़ सकते हैं जिन पर हम कोई सवाल नहीं उठाते। क्या किसी ने कभी यह सोचा कि क्यों हमें संख्याओं को 1, 2, 3, 4... के क्रम में याद कराया जाता है, और 0, 1, 2, 3, 4... क्यों नहीं? आखिरकार, शून्य की खोज तो भारत में ही हुई थी, फिर भला हम 1 से गिनती क्यों शुरु  हैं?

टेलीफोन नम्बर
जब भी टेलीफोन नम्बर पूछा जाता है तो हम हमेशा बाईं तरफ से शुरू करते हैं। उदाहरण के लिए, सैल नम्बर इस तरह से धड़धड़ा कर बोल दिया जाता है, 9998531521, यानी कि नौ, नौ,... दो, एक। इसे हम एक, दो, पाँच... नौ, नौ, नौ क्यों नहीं बोलते? इससे कुछ फर्क नहीं पड़ना चाहिए खासतौर पर इसलिए कि सैल नम्बर सामान्य अर्थ में कोई असली संख्या नहीं होती। अरबी बोलने वाले कुछ देशों में और मिस्र में, टेलीफोन नम्बरों (और अंकगणित की संख्याओं) को सामान्य/प्रचलित ढंग (बाईं से दाईं तरफ) से ही पढ़ा जाता है पर पारम्परिक रूप से अरबी संख्याओं को दाईं से बाईं तरफ पढ़ा जाता है (यानी कि, बढ़ते क्रम में, उदाहरण के लिए, 1234 को ‘चार और तीस और दो सौ तथा एक हज़ार’ पढ़ा जाएगा), हालाँकि इस तरह से पढ़ना अब कम हो गया है।

ऊपर जिस सैल नम्बर की बात हुई है उसे 1251358999 करके भी लिखा जा सकता है। तो यदि हम दाएँ से बाएँ लिखें और पढ़ें तो हमें संख्या उसी तरह से मिलेगी जैसी कि वह पारम्परिक तौर पर हमें सुनाई देती है। लेकिन मूल समस्या है 1251.... इस क्रम में नम्बर डायल करने पर सैल कम्पनी का सर्वर कम्प्यूटर इस नम्बर को स्वीकार नहीं करेगा। मामला शायद तकनीक का है। चूँकि, आजकल सभी फोन नेटवर्क न सिर्फ दूसरे देशों से जुड़े होते हैं बल्कि कई कम्प्यूटरों से भी जुड़े होते हैं अत: टेलीफोन नम्बरों को पढ़ने के ढंग के प्रति कुछ आम सहमति मालूम होती है। और निकट भविष्य में इस तरह की विविधता को सुलझाने का कोई हल निकल सकेगा ऐसा दिखाई नहीं देता।

संख्या नामकरण की परम्पराएँ
अब कुछ चर्चा संख्याओं के नामकरण की करते हैं। ज़रा देखें कि कुछ भारतीय भाषाओं में 11-20 तथा 21-99 की संख्याओं को किस तरह से पढ़ा जाता है। हम जानते हैं कि हिन्दी में 11 से 19 तक की संख्याओं के लिए खास नाम हैं। भाषा का कोई नौसिखिया संख्या 12 के नाम का अनुमान नहीं लगा पाता, भले ही उसे 11 का नाम पता हो। पर तमिल और तेलुगू में पता लगाया जा सकता है। ग्यारह और बारह को तमिल में ‘पाडिनोन्नू’ (दस और एक) और ‘पाडिरेण्डू’ (दस और दो) कहा जाता है, पर हिन्दी के ‘ग्यारह’ और ‘बारह’ से बात साफ ज़ाहिर नहीं होती। अँग्रेज़ी और जर्मन की संख्याओं से तुलना करते समय ही यह भेद ज़ाहिर होता है। 21-29 से लेकर 99 तक की संख्याएँ तमिल, तेलुगू, अँग्रेज़ी और जर्मन में सुवाच्य हैं पर हिन्दी या गुजराती1 या कई अन्य भाषाओं में ऐसा पूर्णतया नहीं है। उदाहरण के लिए, हिन्दी में 21 को ‘इक्कीस’ (एक और बीस) पढ़ा जाता है और 44 को ‘चवालीस’ (चार और चालीस)। इसी प्रकार, गुजराती में भी यह पहचानने के लिए थोड़ा अभ्यास लगता है कि सामने वाला ‘चुम्मोतर’ और ‘छोतर’ कहते वक्त 74 कह रहा है या 76। हिन्दी में एक और अनोखा चलन है 19, 29, 39 आदि कहते वक्त उनके नामों में अगली दहाई के शु डिग्री होने की घोषणा कर देना। यदि हम 20-28, 30-38, 40-48 इत्यादि का उच्चारण सीख भी गए हों तो भी 29, 39, 49 का उच्चारण हमें चकित कर देगा। 29 को ‘उनतीस’ (यहाँ 30 प्रत्यय के रूप में लगा है) कहा जाता है बजाय कि अनुमानित ‘नौवीस’ के; 39 को ‘उनचालीस’ कहा जाता है (यहाँ 40 प्रत्यय है), बजाय कि ‘नौतीस’ के2।

हिन्दी में हैरान कर देने वाली नामों की इस तरह की व्यवस्था के कारण ही हमें नियमित रूप से हिन्दी बोलने वाले ऐसे कई लोग मिल जाते हैं जो संख्याओं को हिन्दी की बजाय अँग्रेज़ी में कहना पसन्द करते हैं।

कैलेंडर की तारीखें
रोज़मर्रा की ज़िंदगी में तारीख, महीना, साल लिखने से हमारा वास्ता पड़ता है। इसमें भी कुछ परम्पराएँ दिखाई देती हैं। उदाहरण के लिए।
*  लिटिल-ऐंडियन - dd-mm-yyyy (दिनांक-माह-वर्ष)। भारत सहित दुनिया के अधिकांश देशों में यह ढंग इस्तेमाल किया जाता है।
* मिडिल-ऐंडियन - mm-dd-yyyy (माह-दिनांक-वर्ष)। अमरीका और कुछ अन्य देशों में यह ढंग इस्तेमाल होता है।
*  बिग-ऐंडियन - yyyy-mm-dd(वर्ष-माह-दिनांक)।

जो बात मैं यहाँ उठाना चाह रहा हूँ वह यह कि इस बात की पड़ताल करना उपयुक्त होगा कि परम्पराएं किस तरह स्थापित होती हैं। विविध तरीकों में से कुछ को ही स्वीकार्य किया जाता है। स्वीकारने या ठुकराने के आधार क्या हैं? ऐसे कारणों और आधारों की गहराई में जाना, पड़ताल करना भी हमारी शिक्षा का हिस्सा होना चाहिए। प्रश्न पूछने, सवाल करने का चलन मज़बूती से जमे हुए विचार या ढाँचों को तोड़ने में तथा विचारों की नई खिड़कियाँ खोलने में मदद करता है।
मैं उस शिक्षक को धन्यवाद देता हूँ जिसने मुझसे इकाई अंक को लिखने के स्थान के बारे में सवाल किया था। इस सवाल से मेरे भीतर विचार मन्थन शुरु हुआ जिसकी वजह से कुछ विचार आप सबके साथ बांट सका हूं।


एस. श्रीनिवासन: वडोदरा में सहज और लोकॉस्ट संस्थाओं की शुरुआत व संचालन में प्रमुख भूमिका। विज्ञान एवं गणित शिक्षण में विशेष रुचि।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: भरत त्रिपाठी: पत्रकारिता की पढ़ाई। स्वतंत्र लेखन और द्विभाषिक अनुवाद करते हैं। होशंगाबाद में निवास।