लेखक : कैरन हैडॉक
अनुवाद: सुशील जोशी

इंन्सान मतलब क्या? हम कौन हैं और हमें कैसे पता चलता है कि हम कौन हैं? इस सवाल का जवाब देने का एक तरीका निगमन तर्क (deductive reasoning) का हो सकता है। जैसे हम कह सकते हैं:
सारे मनुष्य पशु हैं। मैं एक मनुष्य हूँ। अत: मैं एक पशु हूँ।
लगता तो तार्किक है। मगर सवाल यह उठता है कि हम कैसे जानते हैं कि सारे मनुष्य पशु हैं? यह कथन वास्तव में, एक सामान्यीकरण है। मगर हमें यह कैसे पता चले कि यह सामान्य कथन सही है? हमें प्रथम नियमों का पता कैसे चलता है?
एक तरह के विचारों के मुताबिक प्रथम नियमों को जानने का एक तरीका किसी तरह के अन्तर्बोध के ज़रिए है। कुछ लोग मानते हैं कि मानव मस्तिष्क में विज्ञान के प्रारम्भिक बिन्दुओं - अर्थात वे सामान्यीकरण जिनकी ज़रूरत हमें भौतिक विश्व को समझने के लिए होती है - को पहचानने की कुदरती क्षमता है।

हो सकता है आप सोच रहे हों कि यह तो ज़ाहिर है। आप शायद कहेंगे कि हमें इस बात का कुछ अन्तर्बोध है कि सारे मनुष्य पशु हैं। अलबत्ता, अन्य लोग ऐतराज़ करके कहेंगे कि यह सामान्यीकरण वास्तव में, मनुष्यों और पशुओं पर किए गए कई विशिष्ट अवलोकनों पर आधारित है।

निगमन तर्क के एक और उदाहरण पर विचार करते हैं, जिसका सम्बन्ध इस बात से है कि हम कौन हैं:
सारे मनुष्यों में 206 हड्डियाँ होती हैं। मैं मनुष्य हूँ। अत: मेरी 206 हड्डियाँ हैं।
सवाल है कि हमें कैसे पता है कि सारे मनुष्यों में 206 हड्डियाँ होती हैं। ज़ाहिर है, इस सामान्यीकरण तक पहुँचने से पहले किसी ने कई सारे मानव शरीरों का अवलोकन किया होगा। कम-से-कम इस मामले में सामान्यीकरण तक पहुँचने के लिए प्रत्यक्ष अवलोकन ज़रूरी नहीं हैं क्या?

गतिविधि
मनुष्य के शरीर में कितनी हड्डियाँ होती हैं?
आप इस सवाल का जवाब कैसे खोजेंगे? आप जितने तरीके सोच सकें, उनकी सूची बनाइए और कुछ अलग-अलग तरीकों का उपयोग करके जवाब खोजिए (अवलोकन के साथ-साथ मौखिक व लिखित जानकारी का भी उपयोग कीजिए)।
हर तरीके से जवाब पाने में आई कठिनाइयाँ नोट कीजिए, और बताइए कि क्या आपको कोई दुविधा या विरोधाभास मिला।

गेलन के निगमन तर्क का एक उदाहरण
पूरे मध्य युग में युरोपीय, अरबी और अफ्रीकी लोग मानव शरीर रचना के बारे में जानने के लिए प्राचीन रोमवासी गेलन की रचनाओं का सहारा लेते थे।
प्राचीन काल में उस अर्थ में ‘वैज्ञानिक’ नहीं होते थे जिस अर्थ में हम आज समझते हैं। अलबत्ता, कई लोग ऐसे विषयों का अध्ययन करते और उनके बारे में लिखते थे जिनका अध्ययन आजकल वैज्ञानिक करते हैं। कई प्राचीन लोगों की रचनाएँ आज भी अस्तित्व में हैं। ऐसा ही एक व्यक्ति दूसरी सदी में रोम में हुआ था - गेलन।
गेलन एक कामकाजी चिकित्सक था और शासक वर्ग का एक प्रभावशाली व्यक्ति था। वह रोमन सम्राटों का निजी चिकित्सक था। उसने शरीर रचना, चिकित्सा और दर्शन पर कई ग्रन्थ लिखे। रोमन साम्राज्य के पतन के सदियों बाद तक गेलन की रचनाओं को (अनुदित रूप में) अरबी शरीर रचनाविदों ने सहेजा। एक हज़ार साल से भी ज़्यादा समय तक इस्लामी साम्राज्यों में इन रचनाओं का उपयोग चिकित्सा शिक्षा और शरीर रचना के अध्ययन में किया जाता रहा। इसके बाद 1100 ईस्वी के आस-पास युरोपीय लोगों ने गेलन की रचनाओं का अनुवाद अरबी से लैटिन व अन्य युरोपीय भाषाओं में करना शुरु किया।

शायद गेलन को ‘दार्शनिक’ कहना सबसे सही होगा क्योंकि उसका काम मूलत: तार्किक दलीलों पर टिका था। उसने मानव शरीर रचना के विस्तृत विवरण (यूनानी में) लिखे थे। लोग मानते थे कि गेलन के विचार मानव शरीर के प्रत्यक्ष अवलोकन पर आधारित हैं। अलबत्ता, आज हम जानते हैं कि उसने मानव शरीर रचना को समझने के लिए वास्तव में, मानव शरीर का विच्छेदन नहीं किया था। उसने अपने विवरण दार्शनिक तर्कों और वनमानुषों व अन्य पशुओं के अवलोकन के आधार पर तैयार किए थे।
गेलन ने शुरुआत इस सामान्यीकरण से की थी कि मनुष्य बन्दरों और अन्य पशुओं के समान हैं। उसने बन्दरों और अन्य पशुओं की चीरफाड़ की। फिर उसने निष्कर्ष निकाला कि मनुष्य की शरीर रचना इनके समान ही है। यह निगमन तर्क का एक उदाहरण है। वैसे यह गौरतलब है कि इस तर्क का उपयोग करने से पहले गेलन ने भी कुछ अवलोकन तो अवश्य किए थे।

जानने या ज्ञान प्राप्ति के कई तरीके हैं। किसी बात को जानने का एक तरीका यह है कि हम अपने संवेदी अंगों से इसका प्रत्यक्ष अवलोकन करें। विज्ञान में जानकारी प्राप्त करने के लिए इसी तरीके का उपयोग किया जाता है। जानने का एक अन्य तरीका किसी अधिकारी (authority) की बात के आधार पर है। हम किसी ऐसे व्यक्ति को सुनकर ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं जिसका उस विषय पर थोड़ा अधिकार है। या हो सकता है कि हम किसी ऐसी पुस्तक को पढ़कर ज्ञान प्राप्त करें जो अधिकार का स्रोत है।
युरोप, दक्षिण-पश्चिमी एशिया और उत्तरी अफ्रीका में सैकड़ों सालों तक गेलन को मानव शरीर रचना पर प्रमुख विशेषज्ञ माना जाता था। गेलन का विरोध करने के लिए ज़बरदस्त साहस की ज़रूरत होती थी।

बहरहाल, कुछ इस्लामिक शरीर रचनाविद थे जिन्होंने मानव शरीर के प्रत्यक्ष अवलोकनों के आधार पर गेलन द्वारा प्रतिपादित शरीर रचना में कुछ सुधार किए थे। उदाहरण के लिए, अल बगदादी ने 1200-1201 के भयानक अकाल के दौरान मिस्र की यात्रा की थी और हज़ारों मानव शव देखे थे:

“इन शवों को देखते हुए हमने हड्डियों और उनके जोड़ों की आकृतियाँ देखीं, उन्हें उनकी जगह पर और सही अनुपात में जोड़कर देखा, जिससे हमें वह जानकारी मिली जो किताबों से प्राप्य नहीं है, क्योंकि किताबों में इनका ज़िक्र नहीं किया गया था, या इसलिए कि किताबों के शब्द इतने सटीक नहीं थे कि इनके बारे में सही अन्दाज़ लग सकें। इसके अलावा, किताब (गेलन की किताब) में प्रस्तुत विचार हमारे प्रत्यक्ष अवलोकन के विपरीत हैं, क्योंकि सर्वोत्तम प्रमाण सुनने से नहीं बल्कि महसूस करने (यानी देखने व छूने) से मिलता है। हालाँकि, गेलन विज्ञान में पहला व्यक्ति था जिसने छानबीन की, और जो कुछ कहा व विवरण दिया उसमें अत्यधिक सतर्क व सही था, मगर हमारे संवेदी अंगों का साक्ष्य गेलन को पढ़ने से बेहतर है...। मसलन, निचले जबड़े की हड्डी; सारे शरीर रचनाविद इस बात पर एकमत हैं कि जबड़े की यह हड्डी दो हड्डियों से मिलकर बनी है जो ठोड़ी के पास मज़बूती से जुड़ी हुई हैं। जब मैं कहता हूँ कि सारे शरीर रचनाविद, तो एक तरह से गेलन की ही बात कर रहा हूँ क्योंकि एकमात्र वही है जिसने खुद शरीर रचना सम्बन्धी शल्य क्रियाएँ की हैं, और उसने इसे अपने अध्ययनों और अनुसंधानों का विशिष्ट विषय बनाया है, और हमारे पास जो रचनाएँ हैं उनमें से अधिकांश उसी की हैं; शेष रचनाओं का अनुवाद अरबी में नहीं हुआ है।

शवों के इस हिस्से में मैंने जो कुछ देखा, उसने मुझे कायल कर दिया है कि निचले जबड़े की हड्डी एक ही है, इसमें कोई जोड़ या सीवन नहीं है। मैंने यह अवलोकन कई बार, लगभग दो हज़ार खोपड़ियों पर दोहराया है। मैंने इसकी सच्चाई को जाँचने के कई तरीके अपनाए, मगर मुझे एक ही हड्डी मिली। मेरी मदद कई व्यक्तियों ने की जिन्होंने मेरे सामने और मेरी गैर-मौजूदगी में इस जाँच को दोहराया, मगर जैसा कि मैंने कहा है, उन्हें इकलौती हड्डी से ज़्यादा कुछ नहीं मिला।”

अल बगदादी वैज्ञानिक विधि के सबसे महत्वपूर्ण तत्व - प्रत्यक्ष अवलोकन - का उपयोग कर रहा था। अलबत्ता, अल बगदादी की खोज का ज़्यादा असर नहीं हुआ। सम्भवत: चिकित्सा प्रतिष्ठान अथोरिटी के शब्दों से ज़्यादा विश्वास प्रत्यक्ष अवलोकनों और प्रयोगों पर करने को तैयार नहीं था। यह अनिच्छा इस तथ्य के बावजूद है कि इससे 10-20 साल पहले सलादीन के हकीम इब्न जुमे अल इस्राइली ने सुझाव दिया था कि मानव शरीर के हर हिस्से में (हड्डियों की संख्या की) गिनती चीरफाड़ करके की जानी चाहिए। उसने लिखा था कि

“हर हिस्से के बारे में उसके रंग, सामान्य अवस्था,... उसकी बनावट, उसके चिकनेपन या खुरदरेपन, क्या उसमें कोई गुहा या नलिका है और इस गुहा या नलिका में क्या है, उसकी साइज़ की सीमा और यदि उसमें विभिन्न उपभाग हैं तो उसके उपभागों और हर उपभाग की प्रकृति, उसकी स्थिति यानी शरीर में उसकी स्थिति और उसके व अन्य हिस्सों के बीच क्या सम्बन्ध हैं, उसके कार्य और किस उपयोगी उद्देश्य या उद्देश्यों के लिए उसकी ज़रूरत है (का ज्ञान) अनुभव और अवलोकन से प्राप्त करना ज़रूरी है।”

15वीं और 16वीं सदी में युरोप सांस्कृतिक पुनर्जागरण से गुज़र रहा था। सामन्ती व्यवस्था का स्थान पूंजीवादी व्यवस्था ले रही थी। समाज की नई आर्थिक संरचना के लिए नई टेक्नॉलॉजी की ज़रूरत थी। ये टेक्नॉलॉजी प्राकृतिक विश्व के ज्ञान पर आधारित थी। विज्ञान का विकास हो रहा था। युरोप के शोधकर्ताओं ने अपने सवालों के जवाब के लिए यूनान और रोम के प्राचीन विचारकों की मूल रचनाओं को देखना शुरु किया। उनको यकीन था कि प्राचीन यूनानी व रोमन विचारकों के विचारों को बहाल करके ज्ञान का पुनर्जन्म होगा।

फ्लेमिश शरीर रचना शास्त्री एंड्रियास वेसेलियस (1514-1564) गेलन के शरीर रचना शास्त्र को पुन: स्थापित करना चाहता था। उसने गेलन की रचनाओं का अध्ययन किया। मगर वेसेलियस एक कदम आगे गया - उसने स्वयं भी अवलोकन किए। इसके आधार पर वह गेलन के शरीर रचना शास्त्र पर कुछ सवाल उठाने को मजबूर हो गया। उसने मानव शवों का विच्छेदन करके देखा कि गेलन ने कई गलतियाँ की थीं। उदाहरण के लिए, गेलन ने दावा किया था कि मानव उरोस्थि (ब्रेस्टबोन) में 7 खण्ड होते हैं। वेसेलियस को मात्र 3 खण्ड दिखे। वेसेलियस ने एक बार फिर गेलन की रचनाएँ पढ़ीं जिनका हाल ही में मूल यूनानी से अनुवाद हुआ था। वेसेलियस ने निष्कर्ष निकाला कि गेलन ने इतनी गलतियाँ इसलिए की हैं क्योंकि उसने कभी मानव शरीर की चीरफाड़ नहीं की थी। उसने मानव शरीर रचना के बारे में निष्कर्ष बार्बेरी मेकाक और अन्य पशुओं की शरीर रचना के आधार पर निकाले थे।

गतिविधि
इस लेख में जिन बातों का ज़िक्र है उनके अलावा मानव शरीर की बनावट के बारे में प्राचीन काल से ही भारतीय उपमहाद्वीप में भी उल्लेखनीय शोध हुए हैं। इनमें से कुछ शोधकार्य सरसरे अवलोकन, मानव शरीर के विच्छेदन व प्रयोगों के ज़रिए किए गए थे। इस तरह से प्राप्त ज्ञान भी दक्षिण-पश्चिमी एशिया, युरोप और उत्तरी अफ्रीका के लोगों के साथ साझा किया गया था।
आप भी अपने इलाके में जानकारों से मुलाकात करके, किताबों को पढ़कर, इंटरनेट पर खोजबीन करके मानव शरीर के बारे में और मालुमात कीजिए।

रोमन काल से ही मानव शरीर की चीरफाड़ को लेकर वर्जनाएँ रही हैं। चिकित्सा विज्ञान के छात्र शरीर रचना को मानव शरीर की चीरफाड़ स्वयं करके या चीरफाड़ का अवलोकन करके नहीं बल्कि किताबों से सीखते थे। पुनर्जागरण के साथ इसमें बदलाव आने लगे। पाबन्दियाँ सम्भवत: इसलिए लगी होंगी कि मृत्यु को समझना बहुत मुश्किल है। सामाजिक व निजी नैतिकता हमें अन्य जीवित इन्सानों को चोट पहुँचाने से रोकती है। मगर मृत्यु के बाद क्या होता है? क्या मानव शव की चीरफाड़ करने में कोई बुराई है? कई संस्कृतियों में मानव शरीर को, मृत्यु के बाद भी, कुछ अर्थों में विशेष माना जाता है। शायद ये पाबन्दियाँ ‘वाजिब’ कारणों से लगाई गई होंगी। एक कारण यह हो सकता है कि हम सड़ते मानव शव के सम्पर्क से हो सकने वाली बीमारियों से बचे रहें।

गतिविधि

* अपनी याददाश्त से फीमर हड्डी का चित्र बनाइए।
* अब एक वास्तविक फीमर हड्डी को देखते हुए उसका चित्र बनाइए (यदि आपके पास किसी बड़े जानवर की फीमर न हो, तो मुर्गे की फीमर का उपयोग किया जा सकता है)।
*  फीमर हड्डी के बारे में थोड़ी खोजबीन कीजिए। पता लगाइए कि मांसपेशियाँ फीमर से कैसे जुड़ती हैं, और यह टिबिया, फिबुला, पटेला और पेल्विस से कैसे जुड़ी होती हैं। यह भी पता लगाइए कि जोड़ कैसे काम करते हैं। वास्तविक फीमर हड्डी को फिर से देखें और अपनी खोजबीन के आधार पर एक बार फिर से चित्र बनाइए।
*  अपने द्वारा बनाए गए तीनों चित्रों की तुलना कीजिए। इनमें समानताएँ व अन्तर क्या हैं? आपके ज्ञान व अनुभव का इस बात पर क्या असर होता है कि आप क्या देखते हैं और चित्रित करते हैं? चित्र बनाने की क्रिया ने आपके ज्ञान को कैसे प्रभावित किया?
* इस गतिविधि ने इस सवाल के आपके जवाब को कैसे बदला: ‘मैं कौन हूँ?’ और इस प्रश्न का जवाब पाने की विधियों की आपकी समझ को किस तरह बदला? शरीर रचना का अध्ययन क्यों महत्वपूर्ण (या गैर-महत्वपूर्ण) है? ‘मैं कौन हूँ?’ यह सवाल क्यों महत्वपूर्ण अथवा गैर-महत्वपूर्ण है?


शुरुआत में तो वेसेलियस को भी अध्ययन के लिए मानव शरीर प्राप्त करने में कठिनाई होती थी। जब वह पेरिस में छात्र था तब वह एक चार्नेल हाउस (जहाँ हड्डियाँ वगैरह रखी जाती हैं) से इन्सानी हड्डियाँ लाता था। वहाँ ये हड्डियाँ ‘सीमेट्री ऑफ दी इनोसेन्ट्स’ (जहाँ प्लेग पीड़ितों को दफनाया गया था) से तब लाई गई थीं जब इस कब्रिस्तान को शहर की नई दीवार बनाने के लिए खोदा गया था। या वह रात के अँधेरे में शहर के द्वार से निकल जाता और वे शव चुरा लाता जो मृत्यु दण्ड के बाद सार्वजनिक प्रदर्शन के लिए रखे जाते थे। एक बार उसने सुना कि एक भिक्षु की गृहिणी मर गई है, तो उसने उसका शव हासिल कर लिया और तुरन्त उसकी चमड़ी को छील दिया ताकि भिक्षु उसे पहचान न सके। मगर धीरे-धीरे चीरफाड़ का महत्व स्वीकार किया जाने लगा और कुछ अधिकारियों ने युरोप के विश्वविद्यालयों में अध्ययन के लिए शव प्राप्त करने की अनुमति दे दी।

वेसेलियस ने शिक्षा की उस शैली को खारिज कर दिया जिसमें मात्र ग्रन्थों को याद किया जाए और किसी अथोरिटी की रचना को स्वीकार करके ही ज्ञान हासिल किया जाए। उसने ‘करके सीखने’ की मांग की - अर्थात उसने मांग की कि वह मानव शरीर के बारे में मानव शरीर का प्रत्यक्ष अवलोकन करके सीखेगा, ठीक उसी तरह जैसे इब्न जुमे अल इस्राइली ने सदियों पहले सुझाव दिया था, हालाँकि, वह शायद उस व्यक्ति और उसके सुझाव से अनभिज्ञ था।
सम्भवत: वेसेलियस का सबसे महत्वपूर्ण नवाचार यह था कि उसने मानव शरीर रचना को समझने और समझाने के लिए चित्र बनाए व अन्य लोगों से बनवाए। मानव शरीर का विच्छेदन करने के बाद वह हड्डियों को लोहे की छड़ों या ज़ंजीरों की मदद से फिर से जोड़ता था ताकि पूरा मानव कंकाल प्राप्त कर सके, यथार्थवादी ढंग से सीधा खड़ा। इसके बाद वह देख-देखकर कंकाल का चित्र बनाता था। उसने कंकाल के चित्र बनाने के लिए (सम्भवत: टाइटन के स्टूडियो से) कलाकारों को भी आमंत्रित किया था। उसने इन चित्रों को उकेरने और किताबों के रूप में छपवाने में काफी मेहनत की थी। इन किताबों में उसने अपने निष्कर्ष युरोप के शोधकर्ताओं और चिकित्सकों को प्रस्तुत किए थे। उसके चित्रों और किताबों की नकल बना-बनाकर उन्हें पूरे युरोप में फैलाया गया था।

वेसेलियस व अन्य ने मानव शरीर रचना का जो अध्ययन किया उसका असर न सिर्फ चिकित्सा विज्ञान पर पड़ा बल्कि इसने कलाकृतियों में मानव शरीर के चित्रण को भी प्रभावित किया। इटली में पुनर्जागरण के आरम्भ से ही कई कलाकार, खास तौर से लियोनार्डो दा विंची और माइकेलएंजेलो, मानव शरीर का चित्रण प्राचीन यूनानी व रोमन कलाकृतियों के पुनर्मूल्यांकन के आधार पर और खुद मानव शरीर की चीरफाड़ व अवलोकन के आधार पर करते थे। विज्ञान का क्षेत्र कला के क्षेत्र के साथ अपने कुदरती अन्तर्सम्बन्ध के अनुरूप स्थापित हो रहा था।

लियोनार्डो दा विंची ने लिखा था, “आगे बढ़ने से पहले मैं कुछ प्रयोग करूँगा, क्योंकि मेरा इरादा पहले अनुभव का सहारा लेना है और फिर तर्क के माध्यम से दर्शाना है कि क्यों यह प्रयोग इसी तरह चलना तय है। और जो लोग प्राकृतिक प्रभावों का विश्लेषण करते हैं उन्हें इसी नियम के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए।”

तो हम देखते हैं कि वेसेलियस के समान ही लियानार्डो दा विंची और अन्य लोग प्राचीन यूनानियों के प्रशंसक तो हैं मगर उनका काम प्राचीन यूनानी निगमन तर्क प्रणाली से अलगाव भी प्रकट करता है। उन्होंने दर्शाया था कि कम-से-कम कुछ मामलों में हम पहले विशिष्ट को जाने बगैर सामान्य को नहीं जान सकते। सामान्यीकरण करने से पहले अलग-अलग मानव शरीरों का अवलोकन ज़रूरी था।

तो कितनी हड्डियाँ हैं?
प्रारम्भिक शरीर रचनाविदों के बीच मानव शरीर में हड्डियों की संख्या को लेकर परस्पर विरोधी मत थे। वे अपने मतों पर अड़े रहते थे। मगर वेसेलियस ने इस विवाद से त्रस्त होकर कहा, “यदि आप बच्चों में दिखने वाली सारी हड्डियों को गिनें, तो हे भगवान, हड्डियों की कितनी बड़ी ढेरी बन जाएगी।” वे यह कहने की कोशिश कर रहे थे कि मानव शरीर में हड्डियों की कोई सही संख्या नहीं है। हड्डियों की संख्या उम्र के साथ बदलती है क्योंकि शिशु का, अधिकांशत: उपास्थियों से बना कंकाल कठोर होकर हड्डियों में बदलता जाता है। यहाँ तक कि एक हद के बाद यह सवाल भी मात्र शब्दों का फेर रह जाता है कि हड्डी किसे कहते हैं। व्यक्ति-व्यक्ति के बीच भी अन्तर होते हैं। हड्डियाँ गिनने से पहले हमें यह तय करना होगा कि किसकी हड्डियाँ गिनी जाएँगी।

आज भी, यदि आप विभिन्न किताबें या ज्ञान के विभिन्न स्रोतों को देखें, तो पाएँगे कि मानव शरीर में हड्डियों की संख्या को लेकर सामान्यीकरण करना आसान नहीं है। आपको ऐसे स्रोत मिलेंगे जो दावा करेंगे कि मानव शरीर में 206 (या 212 या कोई अन्य संख्या) हड्डियाँ होती हैं। गौरतलब है कि वेसेलियस के ज़माने में ज़्यादातर लोग कहीं अधिक संख्या के दावे करते थे। शिशु में हड्डियों की संख्या में तो और अधिक विविधता होती है - कुछ स्रोत तो इनकी संख्या 300 तक बताते हैं।

शुरु में जो सवाल आसान-सा लगा था, वह काफी मुश्किल साबित हुआ है। वैज्ञानिक अन्वेषण में यह कोई अनोखी बात नहीं है। हम देखते हैं कि विज्ञान की प्रगति के साथ हमारे सवालों के जवाब बदल भी सकते हैं।


कैरन हैडॉक: स्वतंत्र चित्रकार, महिन्द्रा इंटरनेशनल स्कूल, पुणे में अध्यापक, बायोफिज़िक्स में अध्ययन।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।