पिछले दो दशकों में वैश्विक स्तर पर मात्र दो नए कोरोनावायरस उभरे हैं: सार्स-कोव (2003 में सार्स) और दूसरा सार्स-कोव-2 (कोविड-19)। लेकिन हाल ही में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार शायद ये चमगादड़ों से छलकने वाले ऐसे ही वायरसों की एक तुच्छ बानगी भर हैं। शोधकर्ताओं का अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 4 लाख लोग सार्स सम्बंधी कोरोनावायरस से प्रभावित होते हैं जो किसी बड़ी बीमारी का रूप नहीं लेते हैं। इस परिणाम को लेकर काफी अगर-मगर हैं लेकिन इसे एक चेतावनी के रूप में लेना चाहिए क्योंकि इससे पता चलता है कि जंतु-जनित संक्रमण काफी आम हो सकते हैं।         

अध्ययन में इकोहेल्थ अलायन्स के पीटर डज़ाक और एनयूएस मेडिकल कॉलेज, सिंगापुर के शोधकर्ता लिन्फा वांग और अन्य ने सार्स सम्बंधी कोरोनावायरस की वाहक 23 चमगादड़ प्रजातियों के आवासों का एक विस्तृत नक्शा तैयार किया। फिर उन्होंने इस मानचित्र पर उन स्थानों को चिंहित किया जहां मनुष्य भी बसे हैं। शोधकर्ता बताते हैं कि लगभग 50 करोड़ लोग ऐसे क्षेत्रों में रहते हैं जहां भविष्य में कोरोनावायरस चमगादड़ों से छलककर मनुष्यों में आ सकते हैं।  

इस नक्शे की मदद से सार्स या कोविड वायरस के उभरने की संभावना देखकर भावी प्रकोप को रोकने के उपाय किए जा सकते हैं। और तो और, इसकी मदद से वायरस की उत्पत्ति के स्रोत का भी पता लगाने में मदद मिल सकती है।

शोधकर्ता एक कदम और आगे गए। कोविड-19 उभरने से पहले किए गए कुछ सर्वेक्षणों में यह बात सामने आई थी कि दक्षिण एशिया के कुछ लोगों में सार्स-सम्बंधित कोरोनावायरस की एंटीबॉडीज़ मौजूद थीं। लोगों के चमगादड़ों के संपर्क में आने की संभावना और रक्त में एंटीबॉडी कितने समय तक बनी रहती हैं, इनके मिले-जुले विश्लेषण के आधार पर शोधकर्ताओं का अनुमान है कि हर वर्ष लगभग 4 लाख लोग सार्सनुमा वायरस से संक्रमित होते हैं।
    
डज़ाक के अनुसार चमगादड़ों से हमारा संपर्क कल्पना से कहीं अधिक है। गुफाओं के आसपास रहने का मतलब है कि आप वायरस के निरंतर संपर्क में हैं। लोग गुआनो खाद निकालते हैं, चमगादड़ों का शिकार करते हैं और उनको खाते हैं। वैसे इस अध्ययन में  वन्यजीव व्यापार और अन्य जीवों के ज़रिए चमगादड़ से मनुष्यों में वायरस के प्रवेश करने की संभावना पर तो चर्चा ही नहीं की गई है।

वैसे इन नतीजों पर शंकाएं भी व्यक्त की गई हैं। एक आपत्ति तो यह है कि इस अध्ययन के परिणामों की विश्वसनीयता की रेंज बहुत अधिक है: 1 से लेकर 3.5 करोड़ अदृश्य संक्रमण प्रति वर्ष। इसके अलावा, एंटीबॉडी से प्राप्त डैटा चंद हज़ार लोगों का था और इसमें फाल्स पॉज़िटिव भी हो सकते हैं।  
कई संक्रमण इसलिए पता नहीं चलते क्योंकि वे अल्प-कालिक होते हैं और आगे नहीं फैलते। शायद ये वायरस व्यक्ति से व्यक्ति में संचरण के लिए पर्याप्त कोशिकाओं को संक्रमित नहीं कर पाते हों या ये मनुष्यों की प्रतिरक्षा को मात देने में सक्षम न हों। ये थोड़े-से लोगों को ही संक्रमित कर पाते हैं।   

एक कारण यह भी हो सकता है कि इन वायरसों से होने वाली बीमारियां पहचानी न गई हों। वैसे भी हल्के-मध्यम लक्षणों के चलते लोग शायद ही  अस्पताल जाएं।

फिर भी यह अध्ययन भविष्य में वायरस के फैलने के जोखिमों को चिंहित करने की दिशा में छोटा मगर अच्छा प्रयास है। इस अध्ययन से एक बात तो साफ है कि जीवों से मनुष्यों में वायरस के छलकने-फैलने की घटनाएं जितनी मानी जाती थीं उससे कहीं अधिक होती हैं। (स्रोत फीचर्स)