महाभारत के कुछ अंश                                                                                                           [Hindi PDF,  466 kB]

हम महाभारत के कुछ अंशों को पढ़कर देखेंगे कि उनमें किस तरह की सामाजिक व आर्थिक दशाओं का वर्णन है। समय सीमा को देखते हुए हम केवल तीन अंशों का सारांश पढ़ेंगे और उनके आधार पर कुछ निष्कर्ष निकालने का प्रयास करेंगे।

I
इन्द्रप्रस्थ का निर्माण

राज्यलाभपर्व (आदिपर्व का हिस्सा)

जब पांडव द्रौपदी को ब्याहकर आते हैं तो धृतराष्ट्र उन्हें हस्तिनापुर बुला लाते हैं और युधिष्ठिर को अपने राज्य के आधे हिस्से का राजा घोषित करके उसका राज्यभिषेक भी कर देते हैं। यह देखते हुए कि कौरव इस बात से नाखुश हैं वह पांडवों को हस्तिनापुर से दूर पुरुओं की पुरानी राजधानी खांडवप्रस्थ में बसाने का तय करते हैं। पांडव कृष्ण के साथ वहां जाते हैं और उस नगरी को स्वर्ग के समान अलंकृत करते हैं।
“व्यास के मार्गदर्शन में पांडवों ने उस पवित्र स्थान पर शांति करके नए नगर निर्माण के लिए मापन करवाया।

सागर समान खाई से घिरा, चांद-तारों को छुपा देने वाली ऊंचाई तक दीवार वाला किला बनाया गया। वह ऐसा दिख रहा था जैसे कि नागों से घिरा नागलोक का नगर। गरुड पक्षी के दो पंखों के समान उसके दो तरफ के गोपुर द्वार, बादलों के झुंड जैसे महल, मंथर पर्वत जैसे स्थिर और शस्त्रों से रक्षित ऊंचे भवन-विमान थे। वह नाग जैसी दो जीभ वाले शक्ति-शस्त्र से भरे, अखाड़ेयुक्त, सैनिकों से रक्षित, तरह-तरह के युद्ध-यंत्र और लोहे के चक्रों से युक्त था। उसमें सुनियोजित बड़ी सड़कें व सफेद व ऊंचे भवन थे। उस नगर में सौंदर्य और शास्त्रों में कहे लक्षणों से युक्त पाण्डवों के भवन थे जिनमें सब प्रकार के धन भरे हुए थे। उस शहर को इन्द्रप्रस्थ कहा गया। वेदों को जानने वाले ब्राह्मण तथा सारी भाषाओं को जानने वाले वहां आकर बसना चाहते थे। धन अर्जित करने के लिए नाना देश से व्यापारी वहां आ पहुंचे। हर प्रकार के कारीगर व शिल्पी वहीं आकर बसे।

सुरम्य उद्यानों का निर्माण हुआ, जहां वहां तरह-तरह के पेड़ लगाए गए (बाइस तरह के फलदार व फूलवाले पेड़ों का उल्लेख है)।
सुंदर, साफ व विविध प्रकार के घर, लतागृह, चित्र शालाएं आदि बने। बावड़ी, कमल वाले सरोवर, तरह-तरह के पुष्कर, बड़े तालाब, आदि जलाशय बने।...”

एक परंपरा के अनुसार इन्द्रप्रस्थ उसी जगह बसा हुआ था जिस जगह आज दिल्ली शहर बसा हुआ है।

— इस अंश को पढ़कर आपके मन में उस काल की मुख्य बसाहटों के बारे में क्या छवि बनती है?
— उनमें ऐसी कौन-कौन सी बातें थीं जो किसी सामान्य गांव से उसे अलग करती थीं?
— अगर हम मानें कि इन्द्रप्रस्थ विश्वकर्मा के जादू से नहीं, मगर लोगों की मेहनत से बसाया गया, तो उस काम में किस-किस तरह के लोगों ने योगदान दिया होगा?
— पाठ में विविध शिल्पों का उल्लेख आता है। क्या आप अंदाज़ लगा सकते हैं कि वहां कौन-कौन से शिल्पकार रहते होंगे?
— उसमें कई देशों से आए व्यापारियों का उल्लेख है, वे वहां क्यों आए होंगे?
— किस तरह की अर्थव्यवस्था में ऐसे शहर संभव रहे होंगे?
— इनमें से जो वाक्य सही लगते हैं उन पर सही का निशान लगाएं:

इन्द्रप्रस्थ...

— एक घनी आबादी वाली बस्ती थी।
— में लोहे के कारीगर रहे होंगे।
— में सुनार, कांसकार भी रहे होंगे।
— में कुम्हार, बढ़ई, आदि कारीगर भी रहे होंगे।
— में पत्थर और पकी हुई ईंटों से बने विशाल महल रहे होंगे।
— में चौड़ी व पक्की सड़कें रही होंगी।
— में बड़े बाज़ार और दुकानें रही होंगी।

II
राजसूय यज्ञ (सभा पर्व)

इन्द्रप्रस्थ में राज्य करते समय युधिष्ठिर के मित्रों ने उन्हें सलाह दी कि वे राजसूय यज्ञ करें। वे यह जानते थे कि इस यज्ञ को वही राजा कर सकता है जिसे अन्य सभी राजा श्रेष्ठ मानें। इसलिए उन्होंने द्वारका जाकर कृष्ण से मिलकर सलाह-मशविरा किया। कृष्ण ने युधिष्ठिर को बताया कि अभी कई ऐसे राजा हैं जो आसानी से युधिष्ठिर को श्रेष्ठ नहीं मानेंगे। इसलिए उन्हें हराने के लिए एक दिग्विजय अभियान करना होगा। युधिष्ठिर ने अपने भाइयों व भाइयों के बेटों को विभिन्न दिशाओं में राजाओं को जीतने के लिए भेज दिया। विजयश्री के साथ उनके लौटने पर राजसूय यज्ञ की तैयारियां शुरू हुईं।

“युधिष्ठिर द्वारा शत्रुओं पर विजय प्राप्त कर सत्य के आधार पर राज्यपालन करने के कारण उनकी प्रजा अपने कामों में लीन थी।
प्रजा नियमित रूप से राजा को भेंट (बलि) देती रही। इस कारण इतना धन इकट्ठा हो गया कि सौ साल में भी वह कम नहीं हो सकता था।

अपने कोष व अन्नागार को भरा देखकर युधिष्ठिर ने यज्ञ के आयोजन का निश्चय किया।...
कृष्ण से आज्ञा प्राप्त करके पाण्डव राजसूय यज्ञ के लिए ज़रूरी सामग्री जुटाने लगे। युधिष्ठिर ने आदेश दिया कि इस यज्ञ के लिए ज़रूरी सामग्री धौम्य आदि ब्राह्मणों के निर्देशानुसार, लोग अपनी-अपनी क्षमता के अनुसार लाएं। मेरे भाइयों के रथों के सारथी भोजन सामग्री इकट्ठा करके लाएं। सहदेव ब्राह्मणों की रुचि के अनुसार तरह-तरह के रस और स्वाद वाले भोजन तैयार करके उन्हें खुश करे।
द्वैपायन व्यास के नेतृत्व में हज़ारों ब्राह्मण यज्ञ के विभिन्न काम करने पहुंचे।...

उनके द्वारा निर्धारित भूमि पर युधिष्ठिर द्वारा नियुक्त शिल्पियों ने हीरे जवाहरात जड़े विशाल गृहों का निर्माण किया।
फिर युधिष्ठिर की आज्ञा के अनुरूप सहदेव ने दूतों को बुलाया और कहा - विभिन्न देशों के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा सम्मानयोग्य शूद्रों को आमंत्रित करो। इस यज्ञ की खबर पाकर विभिन्न देशों के राजा तरह-तरह की भेंट लेकर, खासकर रत्नों को लेकर, निकले। वे चाहते थे कि उनकी सामग्री से ही यज्ञ हो।

उचित समय पर युधिष्ठिर ने यज्ञ-दीक्षा लेकर हज़ारों ब्राह्मणों, भाइयों, रिश्तेदारों, मित्रों, सहायकों तथा विभिन्न देशों से आए क्षत्रियों के साथ यज्ञशाला में प्रवेश किया।
यज्ञ की जानकारी पाकर हर दिशा से ज्ञानी ब्राह्मण जुटने लगे। उन सभी ब्राह्मणों के लिए शिल्पियों ने भव्य भवन बनाकर दिए जहां ब्राह्मणों ने नृत्य व नाटकों को देखते हुए तथा कहानियों को सुनते-सुनाते हुए समय बिताया। उन घरों से हमेशा यही आवाज़ें सुनाई पड़ती - इन्हें भी दें, दें, दें... आप भी खाइए, आप भी खाइए... हरेक को धर्मराज ने लाखों गायें, पलंग, सोना व दासियां भेंट कीं।

इस बीच धृतराष्ट्र, भीष्म, विदुर, द्रोण, दुयोधन, दुश्शासन आदि को आमंत्रित करने के लिए नकुल को हस्तिनापुर भेजा गया। उचित समय पर वे सब तथा विभिन्न देशों के राजा इन्द्रप्रस्थ पहुंचने लगे। उन सबका उचित स्वागत किया गया।
पितामहों तथा गुरुओं का अभिवादन करके युधिष्ठर ने कहा कि आप सब इस यज्ञ में शामिल होकर मुझे अनुग्रहीत करें। यह कहकर उसने उन सबको यज्ञ के लिए दीक्षित किया। फिर उसने उन सबको उनकी क्षमता के अनुसार काम दिया। भोजन के मामले दुश्शासन को सौंपे गए, क्या करना है क्या नहीं यह बताने के लिए भीष्म तथा द्रोण को नियुक्त किया गया। ब्राह्मणों को दक्षिणा देने का काम कृप को सौंपा गया।

भीष्म, द्रोण, दुर्योधन, दुश्शासन, आदि सभी रिश्तेदारों को यज्ञ में तरह-तरह के काम दिए गए। उन कामों को उन्होंने दासों जैसी तल्लीनता से पूरा किया।

फिर युधिष्ठिर ने वरुण, अग्नि आदि देवताओं की वंदना की व होमादि क्रियाएं कीं।
फिर उनके सहित युधिष्ठिर ने यज्ञशाला की अंतर्वेदी में महर्षियों के सत्कार के लिए प्रवेश किया।...
उस जगह लाखों ब्राह्मण व क्षत्रिय थे। वहां ऐसा कोई नहीं था जिसका आचरण गलत था, न ही वहां कोई शूद्र था।...
यज्ञ के अंत में आए हुए अतिथियों का आदर करना था। भीष्म के कहने पर युधिष्ठिर ने सबसे पहले कृष्ण का आदर किया। इस पर शिशुपाल नामक राजा ने आपत्ति जताई... लंबे वाद-विवाद के बाद शिशुपाल को कृष्ण ने मार गिराया। उसके बाद यज्ञ संपन्न हुआ।”

— इस अंश को एक बार फिर ध्यान से पढ़ें और उन बिंदुओं को रेखांकित करें जो आपको महत्वपूर्ण लगते हों।
— यज्ञ का खर्चा कहां-कहां से और किस तरह पूरा हुआ?
— इस वर्णन में शिल्पकार और शूद्रों का उल्लेख जगह-जगह आया है। यज्ञ में उनकी भूमिका क्या थी?
— यज्ञ में दूसरे राजाओं की क्या भूमिका दिख रही है?
— यज्ञ में युधिष्ठिर के कुरूवंश के रिश्तेदारों की क्या भूमिका दिख रही है?
— इस वर्णन में यज्ञ का सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम क्या था?
— ब्राह्मणों को दक्षिणा में क्या-क्या दिया गया?
— इस तरह के यज्ञ आयोजित करने के लिए समाज में किन-किन बातों का होना अनिवार्य था?

III
गोग्रहणपर्व
(विराट पर्व का हिस्सा)

द्यूत क्रीडा में हारने के बाद पाण्डव वनवास पर चले जाते हैं। इसमें एक शर्त यह भी थी कि उन्हें एक साल अज्ञातवास पर रहना होगा। अज्ञातवास यानी कहीं छुपकर रहना ताकि उन्हें कौरव खोज निकाल न पाएं। पांडव मत्स्य जनपद में विराट राजा के यहां वेष बदलकर रहने लगे। पूरे साल कौरव उनका पता लगाने की कोशिश करते रहे मगर असफल रहे। साल के अंत में उन्हें भनक लगी कि शायद पाण्डव विराटनगर में हैं। वे तय करते हैं कि अगर कौरव विराटनगर पर हमला करके उनकी गायें भगा लाएं तो ज़रूर पाण्डव युद्ध करने निकलेंगे और पहचाने जाएंगे। यह सोचकर वे युद्ध की योजना बनाते हैं। त्रिगर्त जनपद का राजा सुशर्मा भी उनके साथ हो जाता है।

“दुर्योधन ने आदेश दिया- “मित्र व वृद्धों सहित हम सभी कौरव युद्ध के लिए तैयार होकर निकलेंगे। सुशर्मा के नेतृत्व में त्रिगर्त लोग पहले से ही एक तरफ से विराटनगर पर धावा बोलें और शत सहस्र गायों को भगाकर ले जाएं। विराटराज उनसे लड़ने चला जाएगा। हम अगले दिन दूसरी तरफ से धावा बोलेंगे और उनकी हज़ारों गायों पर कब्ज़ा करेंगे। तब पाण्डव हम कौरवों से लड़ने पर विवश हो जाएंगे और इस तरह पहचाने जाएंगे।

योजना के अनुसार त्रिगर्त लोग विराटनगर पर धावा बोलकर गायों को भगाकर ले जाने लगे। गोपाल भागकर विराटराज को खबर देने पहुंचे। उन्होंने कहा, “हे राजन, त्रिगर्त राज अपने रिश्तेदारों के साथ मिलकर हमें जीतकर आपकी सौ हज़ार गायों को लेकर भाग गए। हे राजा, उन्हें जीतकर अपनी गायों को बचाओ।” यह सुनकर विराटराज तेज़ी से अपनी सेना को तैयार करके उनसे युद्ध करने निकला। ... आठ हज़ार रथ, हज़ार हाथी, साठ हज़ार अश्वारोही मत्स्यवीर अपनी गायों को वापस लाने चल दिए। युधिष्ठिर, भीम, नकुल व सहदेव उनके साथ (वेष बदलकर) चल दिए।

महाभारत - कुछ सवाल
घटनाएं, समय और तत्कालीन समाज

महाभारत के इन तीन हिस्सों को पढ़ने पर यह प्रश्न उठता है कि क्या यह तीनों एक ही समय की बातें हो सकती हैं? क्या ऐसा संभव है कि कु डिग्री जन जटिल शहरी जीवन जीते हुए एक और जन की गाएं भगाकर लाने के लिए निकल सकते हैं? मान लीजिए हम एक आधुनिक युग के युद्ध का वृत्तांत पढ़ रहे हैं। अगर उसमें यह उल्लेख आता है कि सैनिक बंजारों के कारवां की राह देख रहे थे ताकि उनसे अनाज खरीदकर अपना चूल्हा जलाएं तो हमें अजीब लगेगा। हम जानते हैं कि आधुनिक सेनाओं की रसद पूर्ति सेना का ही एक विभाग करता है और सैनिकों को अपना खाना बनाना नहीं होता। लेकिन मुगल-काल में रसद पूर्ति बंजारे करते थे जो कारवां में सेना के पीछे-पीछे चलते थे। सैनिक उनसे अनाज खरीदकर अपना खाना पकाकर खाते थे। तो अगर एक वर्णन में बोफोर्स तोप और एन्टी एयरक्राफ्ट गन की बात हो और साथ में बंजारों की भी बात हो तो हमें खटकेगा कि मामले पर विशेष ध्यान देना होगा। महाभारत के इन हिस्सों के साथ भी ऐसी ही बात है।

यह एक ऐसा मुद्दा है जिस पर निश्चित राय बनाना या अभेद्य तर्क देना संभव नहीं है। हमें काफी संभलकर राय बनानी होगी, दूसरों के कड़े विरोध का सामना करने व समझने के लिए तैयार होना होगा और अपने निष्कर्षों को बदलने का साहस रखना होगा।
पिछले दो लेखों में हमने देखा कि कैसे महाभारत आज से लगभग 3000 साल पहले (1000 से 800 ईपू.) की बातों पर केन्द्रित है। मगर यह गाथा एक लम्बे समय तक मौखिक परम्पराओं के माध्यम से संप्रेषित और पोषित हुई। शायद आज से 2000 या 2200 वर्ष पहले इसे एक गाथा के रूप में लिपिबद्ध किया गया होगा। गुप्तकाल में यानी आज से 1500 वर्ष पहले इसका संपादित रूप तैयार किया गया जिसमें एक लाख श्लोक थे। यानी 3000 साल पहले की बातों पर आधारित एक गाथा ने विकसित होते-होते आज से 1500 साल पहले अपना पूर्ण रूप धारण किया। इस बीच समाज में, अर्थव्यवस्था में, राजतंत्र में और यहां तक कि धार्मिक विश्वासों में भी बहुत बदलाव आ चुका था। अत: इसकी संभावना बन जाती है कि इसमें अलग-अलग समय की बातें जुड़ गई हों। हमें इन तीन हिस्सों में यह देखना है कि क्या ये तीनों एक ही समय की बातें दर्शाते हैं या अलग-अलग समय की बातें दर्शाते हैं।

राज्यलाभ पर्व में हम एक विकसित शहरी समाज का वर्णन देख पाते हैं। सैनिकों से रक्षित किला, नियोजित सड़क, तरह-तरह के व्यवसाय वाले - ब्राह्मण, शिल्पी, व्यापारी आदि इस व्यवस्था के हिस्से हैं। वर्णन में इस बात पर भी ज़ोर है कि इस शहर का दूसरे देशों से गहरा सम्पर्क था। उस शहर में धनी व फुर्सती वर्ग ऊंचे महलों में रहता था - जिसने उन बगीचों व बावड़ियों का उपयोग किया होगा।

गोहरण पर्व में समाज की जो छवि बनती है वह कुछ फर्क है। निश्चय ही यह एक ऐसा समाज था जिसमें पशुधन - खासकर गायों का केन्द्रीय महत्व था। अपने पशुधन को बढ़ाने के लिए दूसरे समूहों की गायों को भगाकर लाना एक सामान्य बात थी। इन अभियानों में कोई व्यावसायिक सेना नहीं निकलती थी, बल्कि उस समाज के सभी पुरुष लड़ने निकलते थे। घोड़ों से जुते रथों पर सवार होकर तीर-कमान, भाला आदि अस्त्रों से युद्ध लड़ा जाता था। लेकिन किले, युद्ध, यंत्र आदि का उल्लेख नहीं है। समाज में रथ पर चढ़कर लड़ने वाले योद्धा थे - शायद वे ही गायों के मालिक थे - और उनकी गायों को पालने वाले गोपाल थे। गोपालों के पास लड़ने के लिए मूसल, फरसा आदि घरेलू औज़ार ही थे। ऐसे अभियान कु डिग्री जैसे किसी एक समूह के लोगों के बस की बात नहीं थी - उन्हें त्रिगर्त जैसे अन्य समूहों से मिलकर एक साझा अभियान चलाना पड़ता था। ये सारी बातें एक पशुपालक कबीलाई व्यवस्था की ओर इशारा करती हैं। यह वर्णन काफी हद तक ऋग्वेद में वर्णित ‘गविष्ठी’ या ‘गोष्ठि’ से मेल खाता है। इसमें वैदिक कबीले या जन दूसरे जनों पर उनकी गायों को पाने के लिए धावा बोलते थे।

आधुनिक अध्ययन यह बताते हैं कि जो समाज गोपालन पर आधारित होते हैं, उनमें बड़े महलों में रहने वाले राजा नहीं होते। महाभारत के गौहरण पर्व में दोनों तरह की बातें दृष्टिगत होती हैं। आज के युग में यदि कोई सैनिक दुश्मन देश से बहुत-सी गायें हांक कर ले आए तो उसे परमवीर चक्र जैसे वीरता के पुरस्कार नहीं दिए जाएंगे। न ही गायें हांककर लाने से दुश्मन राष्ट्र का आर्थिक मेरुदंड टूट जाएगा। कौरवों ने विराट की गायें इसलिए छीनी कि वह विराट की अर्थव्यवस्था को पंगु कर देना चाहते थे। इसलिए यदि पाण्डव वहां छुपे होंगे तो वे निश्चित रूप से गायों को बचाने की कोशिश करेंगे।

विराट राज्य आज के जयपुर-भरतपुर इलाके में था। वहां गोपालक जीवन पद्धति की पुरानी परम्परा है। वहां राजा और राज्य भी उभरे। जब वहां राज्य उभरे तो राजाओं ने कृषि को बढ़ाया और दूरदराज़ के इलाकों को जीतकर उनसे सोना, चांदी, बेशकीमती पत्थर और तरह-तरह की धातु वसूल की। यदि इन राज्यों पर कोई बाहरी राजा हमला करता था तो वह राजा की गायें हांककर नहीं ले जाता था। वह सोने, जवाहरात आदि ही ले जाता था। और आसपास के गोपालकों और कृषकों से कर इकट्ठा करता था।
अगर ‘गोहरण पर्व’ में बाद के युगों की राज्य व्यवस्था जैसी स्थिति होती तो त्रिगर्त और कौरव, विराट की राजधानी और महल पर आक्रमण करतेे तथा उसका कीमती सामान लूटते, न कि वे राजधानी के आसपास से गायों को हांक कर ले जाते।
कथा के ढांचे से ऐसा लगता है कि ‘गोहरण पर्व’ पूर्व वैदिक युग की कथा थी। महल और राजत्व वाले तत्व बाद में जोड़े गए।

राजसूय पर्व में जिस समाज का आभास होता है वह कुछ और है। इस समाज में पशुपालन के अलावा खेती और व्यापार महत्वपूर्ण थे। इसमें प्रजा राजा को नियमित बलि या लगान देती थी। राजा से अपेक्षा थी कि वह लगान से मिले धन को विशाल यज्ञों के माध्यम से खर्च करे व दूसरों में बांटे। यह चार वर्णों में बंटा समाज था और शूद्रों को यज्ञ शाला से बाहर रखा जाता था, हालांकि उनके एक वर्ग को भी यज्ञ में आमन्त्रित किया गया था। यज्ञ में हज़ारों-लाखों प्रतिष्ठित लोगों (ब्राह्मण-राजकुल के लोगों) को भव्य घरों में ठहराना, उनके आमोद-प्रमोद के साधन उपलब्ध कराना, उन्हें डटकर भोजन खिलाना, उन्हें खूब सोना, गाय आदि दान में देना निहित था। यह भी उल्लेखनीय है कि रिश्तेदारों से अपेक्षा थी कि वे आए सारे अतिथियों के सत्कार में योगदान दें। राजसूय में जिस तरह से दुर्योधन, दु:शासन आदि मिलकर भाग लेते हैं वह इस समाज में रिश्तेदारी के महत्व को दिखाता है। युधिष्ठिर मात्र एक व्यक्ति नहीं, वे एक कुल के प्रतिनिधि हैं। उन्हें राजा बनाने से राजा का पद उनके परिवार का हो जाता है।

प्राय: यह समाज व्यवस्था उत्तर वैदिक काल की समाज व्यवस्था से मेल खाती है। ‘राजसूय पर्व’में जिन राजाओं को पाण्डवों ने अपने अधीन किया था उनमें यूनानी और रोम के राज्यों के भी नाम हैं। ये सभ्यताएं ईसा पूर्व सातवीं सदी के बाद ही उभरीं। भारतीयों को उनके विषय में ईसा पूर्व चौथी सदी में पता चला। इसलिए इन राज्यों की चर्चा का हिस्सा काफी बाद में जोड़ा गया होगा।

क्या एक ही समय एक ही समाज में ये तीनों बातें हो सकती हैं? यह एक रोचक सवाल है। भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास की खासियत यह है कि इसमें एक ही समय विभिन्न प्रकार की सामाजिक व्यवस्थाएं पाई जाती हैं। पंजाब की हरित-क्रांति वाली मशीनी खेती से लेकर झूम-खेती व भोजन जंगलों से इकट्ठा करने वाले समाज आज भी इस देश के अभिन्न अंग हैं। इसलिए हमें यह अजीब नहीं लगता है कि शहरी सभ्यता के कु डिग्री जन गविष्ठी पर निकलते हैं या उनके राजा राजसूय जैसे विशाल यज्ञ करवाते हैं। लेकिन हमें यह याद रखना होगा कि महाभारत कोई आधुनिक कहानी नहीं है। न ही वह मौर्य-काल की विकसित शहरी संस्कृति की देन है। वास्तव में उसकी कथा-वस्तु का संबंध आज से 2800 या 3000 साल पुराने समाज से है जिसमें यजुर्वेद व शतपथ ब्राह्मण रचे जा रहे थे। क्या उस काल के लिए तीनों वर्णन उपयुक्त हैं?

इस समस्या का समाधान हम एक और तरीके से कर सकते हैं। हम महाभारत के कथानक से जुड़ी जगहों की खुदाई करके देख सकते हैं कि वे जगहें किन किन अवस्थाओं से कब-कब गुज़रीं। शायद इससे हमें कोई प्रकाश मिले।

मत्स्य और त्रिगर्तों की लड़ाई में विराटराज को त्रिगर्तों ने बंदी बना लिया। फिर उन्हें छुड़ाने के लिए पांडव युद्ध में उतरे। सुशर्मा को हराकर उसे बंदी बनाया। युधिष्ठिर के कहने पर सुशर्मा ने विराटराज की दासता स्वीकार की और उसे मुक्त किया गया।
इस बीच सारी कौरव सेना भीष्म और द्रोण के नेतृत्व में दूसरी ओर से गायों को भगाने पहुंची। वे अपने रथों पर सवार होकर मत्स्यों के देश पहुंचकर साठ हज़ार गायों को घेरकर उन्हें भगाने लगे। जो गोपाल थे उन्हें मारने लगे। गोपालों का मुखिया तुरंत रोते-पीटते रथ पर सवार होकर राजमहल पहुंचा और विराटराज के बेटे उत्तर को खबर दी, “अपने राष्ट्र का सारा गोधन कौरव भगा ले गए। आप आगे आकर अपने राष्ट्र की खुशहाली के आधार, पशुओं को बचा लाइए।”

इसके बाद अर्जुन विराट के बेटे को साथ लेकर युद्ध करने निकलता है और कौरव सेना का सामना करता है। अंत में विजय अर्जुन की ही होती है। फिर भी कौरव खुश हो जाते हैं क्योंकि पांडव पहचाने गए। लेकिन भीष्म समझाते हैं कि जब अर्जुन ने अपने धनुष से टंकार की तब एक साल पूरा हो चुका था।
— इस अंश को पढ़ने के बाद महाभारत काल के कुरू, त्रिगर्त और मत्स्य जनपदों की अर्थव्यवस्था के बारे में क्या बातें पता चलती हैं?
— जो सैनिक युद्ध कर रहे थे वे क्या पेशेवर सैनिक लगे कि कबीलाई सैनिक - कबीले के सारे लोग?
— गोपालों और मत्स्यों के बीच क्या रिश्ता रहा होगा?
— इस अंश में जो सामाजिक व्यवस्था दिख रही है और पहले दो अंशों में जो सामाजिक व्यवस्था दिख रही है, क्या आपको इनमें कुछ अंतर लगा?


सी. एन. सुब्रह्मण्यम: एकलव्य के सामाजिक अध्ययन कार्यक्रम से जुड़े हैं।
पी. के. बसंत: दिल्ली में स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय में इतिहास पढ़ाते हैं।