बच्चे वयस्कों की दुनिया से नितान्त भिन्न और अलग-थलग किसी दुनिया में नहीं रहते। उनकी दुनिया बड़ों की दुनिया में मिली-जुली एक दुनिया है और वे बड़ों के साथ लगातार लेनदेन करते हैं। इसलिए लेखकों को बच्चों के लिए लिखते समय जीवन को एक समग्र दृष्टि से देखना, समझना और प्रस्तुत करना चाहिए।
ये विचार हैं बच्चों के लिए लिखने वाली प्रसिद्ध मराठी लेखिका और चित्रकार माधुरी पुरन्दरे के। उनके साथ बातचीत कर रही हैं अंशुमाला गुप्ता।

बच्चों के लिए लिखने की ओर आपको किस बात ने प्रेरित किया?
25-30 बरस पहले वनस्थली में हमने उन गाँवों में बालवाड़ी परियोजना पर काम शुरु किया जहाँ औपचारिक स्कूली शिक्षा कार्यक्रम बच्चों के लिए कई किस्म की समस्याओं को जन्म दे रहा था। हमारे पास इन बालवाड़ियों के लिए प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी कमी थी। इसलिए हमने ग्रामीण महिलाओं के लिए खुद अपने प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरु  किए।
जब हमने गाँव की इन महिलाओं/लड़कियों के साथ काम शुरु  किया तो पाया कि बहुत कम पढ़ी-लिखी और बाहर की दुनिया को बहुत कम जानने वाली इन लड़कियों से गाँव की राजनीति, जातिगत संघर्ष आदि के बीच काम लेने के लिए उनकी संवेदना के स्तर को उठाना होगा। साथ ही उनमें आत्मसम्मान की भावना को भी विकसित करना होगा। तब हमने एक अठपेजी द्वैमासिक खबरनामा शुरु  किया जिसमें विभिन्न विषयों के प्रकाशन के साथ-साथ इन लड़कियों के अनुभवों, दिक्कतों और नए-नए विचारों को भी जगह दी गई। हमें जल्दी ही पता चल गया कि बच्चों के लिए कविता, कहानी जैसी सामग्री तक इन लड़कियों की पहुँच बहुत ही कम है। अत: हमने अपने खबरनामे में ‘छोट्याँची वनस्थली’ के नाम से बच्चों के लिए एक खण्ड शुरु  किया। गाँव के बच्चों के लिए लिखने वाले लोगों की कमी हमें फौरन ही महसूस हुई क्योंकि शहरी लेखकों को इन बच्चों की दुनिया के बारे में कुछ पता ही न था। मजबूरी में मुझे खुद ही लिखना शुरु करना पड़ा।
बच्चों के लिए लिखने के लिए अँग्रेज़ी और फ्रांसीसी के ढेर सारे बाल साहित्य को मैंने पढ़ा। शुरु में जिस भी स्रोत से मिली कोई कहानी मुझे पसन्द आती, उसे ही मैं अपने ढंग से लिख डालती थी।

बच्चों के लिए लिखते वक्त किन बातों का विशेष ख्याल रखना होता है?
बच्चों के लिए लिखते वक्त हम गैरज़िम्मेदार नहीं हो सकते, क्योंकि वे हमसे न तो किसी स्तरीय सामग्री की माँग कर सकते हैं और न ही हमारी आलोचना कर सकते हैं।
बच्चों के लिए लिखने वालों से आप और क्या कहना चाहेंगी?
इस क्षेत्र में काम कर रहे लोगों को बच्चों की दुनिया को उसकी सम्पूर्णता में देखना चाहिए। बच्चे अपनी एक बन्द और कटी हुई दुनिया में नहीं रहते। उनकी दुनिया अपने से बड़ी उम्र के लोगों से घिरी दुनिया है और वे लगातार उनके साथ क्रिया-प्रतिक्रिया करते हैं। यह उन बड़े संयुक्त परिवारों में ज़्यादा दिखाई देता है जहाँ एक बच्चा विभिन्न आयु वर्गों के वयस्कों तथा अन्य बच्चों से घिरा होता है। यह एक गलत दृष्टिकोण है कि हम बच्चों को इस तरह से देखें कि उनकी अपनी ही किसी एकदम स्वतंत्र दुनिया का अस्तित्व होता है।

बच्चों के साथ आपके कैसे रिश्ते हैं और इन रिश्तों ने आपके लेखन को कितना प्रभावित किया है?
मेरी अपनी कोई सन्तान नहीं है और जीवन के एक बड़े दौर में मेरे आस-पास बच्चे नहीं रहे। मैं बच्चों के साथ बहुत धैर्यपूर्वक व्यवहार भी नहीं कर पाती। बच्चों के लिए लिखते वक्त (और जीवन को जानने की कोशिश में) मैंने बहुत कुछ देखा-पढ़ा है। मेरी संवेदनाएँ हर तरह के साहित्य को पढ़ते रहने से ही विकसित हुईं। और इसमें लोकप्रिय व बुरा साहित्य भी शामिल था। मैंने नाटकों और फिल्मों का भी गहरा अध्ययन किया है और अपने आपको हर तरह के प्रभावों के प्रति खुला रखा है ताकि मैं सब कुछ ग्रहण कर सकूँ।

अपने बाल पाठकों के प्रति आप आदर भाव से पेश आती हुई नज़र आती हैं और इस तरह उनके दिमाग में अपने लिए जगह बनाती हैं। बच्चों के साथ वास्तविक क्रिया-प्रतिक्रिया के बिना आप उन्हें इतना बेहतर कैसे जान लेती हैं?
मैं पीछे मुड़कर देखती हूँ और जानने की कोशिश करती हूँ कि जो कुछ मैंने पढ़ा था उसने मेरी चेतना पर कैसा असर डाला था -- वह असर आनन्ददायक था या तकलीफ की वजह बन गया था।
दरअसल, उस ज़माने में बच्चों के साथ वयस्कों के संवाद की संस्कृति बहुत विकसित नहीं थी। बच्चों को अपनी ही तरह का जीवन गढ़ने-करने के लिए छोड़ दिया जाता था। इस तरह जीवन के प्रश्नों को हल करने में किसी ने मेरी मदद नहीं की। ऐसे समय साहित्य मेरे काम आया।
आज बच्चों को सीखने के लिए कई-कई रास्ते तलाशना ज़रूरी हैं। और यही वजह है कि हम बच्चों की सामग्री को किन्हीं तंग परिभाषाओं में नहीं बाँध सकते। मैं नहीं सोचती कि एक खास आयुवर्ग के लिए चीज़ों को इतनी सख्ती से चुनना चाहिए। उन्हें सभी तरह की चीज़ें मिलनी चाहिए। अगर वे उन्हें पसन्द करेंगे तो पढ़ेंगे ज़रूर। और अगर वे अभी तत्काल उन्हें न भी समझ पाएँ तो कोई बात नहीं, वे उन्हें बाद में कभी समझ लेंगे।

बाल साहित्य को समाज में सम्मानजनक हैसियत दिलाने के लिए क्या किया जा सकता है?
मैंने पैसों की परवाह कभी नहीं की और सिर्फ अपने अनुराग की वजह से ही काम किया। वैसे मुझ पर आर्थिक ज़िम्मेदारियाँ भी नहीं थीं। लेकिन दूसरे लोगों को इस काम को गम्भीरता से करते रहने के लिए पैसा और मान्यता दोनों ही चाहिए। यह इस काम को समाज में सम्मानजनक हैसियत दिलाने के लिए भी ज़रूरी है।
लोगों द्वारा यह समझना ज़रूरी है कि यह काम उतना ही गम्भीर है जितना वयस्कों के लिए लेखन। पर यह समझ बनाने के लिए बच्चों के लिए लेखन एक विशेष स्तर से शु डिग्री होना चाहिए। मैं 16-17 वर्षों से बच्चों के लिए लिख रही हूँ और मैंने गुणवत्ता पर कभी समझौता नहीं किया है।

इस क्षेत्र में आपको क्या समस्याएँ नज़र आती हैं?
विशेषकर, मराठी बाल साहित्य में लोग समय के साथ नहीं बदले हैं। दरअसल, बहुत सारे लोग तो समय के इस बदलाव को पहचान ही नहीं पा रहे या इस बात को नहीं समझ पा रहे हैं कि अच्छा और बेहतर काम करने के लिए क्या किया जा सकता है। इसके लिए वक्त और लगन दोनों की ही ज़रूरत है और अधिकांश लोगों के पास इतना वक्त नहीं है।
इसके अलावा 7-8 साल के बच्चों के लिए सामग्री बहुत आसानी से उपलब्ध है, लेकिन 9-14 साल के किशोरों के लिए बहुत ही कम लिखा गया है। इस संक्रमण काल में किशोरों को बहुत ज़्यादा सामग्री चाहिए क्योंकि बचपन में वे एक ठीक-ठाक पाठक बन चुके होते हैं। वे अपने लिए सामग्री तय कर सकते हैं और चुन सकते हैं। इस महत्वपूर्ण मोड़ पर अगर उन्हें अच्छा साहित्य उपलब्ध नहीं हुआ तो वे पढ़ने की आदत छोड़ देंगे -- वह आदत जो वयस्क जीवन में उनकी मददगार साबित होती है।
किशोरों के लिए लिखते समय बहुत ज़्यादा सावधानी बरतने की ज़रूरत है। हमें उनकी चिन्ताओं को समझना होगा। उनके सरोकारों को, वयस्कों के साथ उनके रिश्तों को, उनकी दुनिया को समझना होगा। हम सिर्फ अपनी किशोरावस्था की समझ के आधार पर उनके लिए नहीं लिख सकते हैं। हमें विषयों के चुनाव के प्रति, भाषा के प्रति, अपने शब्दों से बनाए जाने वाले बिम्बों के प्रति संवेदनशील और सतर्क होना होगा।


माधुरी पुरन्दरे: पेंटिंग और ग्राफिक आर्ट का अध्ययन पेरिस, फ्रांस व जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट, मुम्बई से किया। बच्चों के लिए कविताओं और कहानियों की अनेकों पुस्तकें लिखीं व चित्रित की हैं। अन्य किताबों में किशोरों के लिए एक उपन्यास भी लिखा है। बच्चों के लिए शिल्प व खेलों पर एक पुस्तक जल्द ही छपने वाली है। फ्रांसीसी से मराठी और मराठी से फ्रांसीसी में कई किताबों के अनुवाद किए हैं। सिनेमा, रंगमंच व संगीत में भी गहरी रुचि रखती हैं। पुणे में रहती हैं।

अंशुमाला गुप्ता: पेशे से इंजीनियर, वर्षों से शिक्षा व बच्चों के साहित्य के क्षेत्र में सक्रिय। इसी प्रक्रिया में उन्होंने 9 से 16 साल के बच्चों के लिए इन्द्रधनुष नामक पत्रिका शु डिग्री की, जो बहुत लोकप्रिय हुई। एक लम्बे अर्से तक हिमाचल प्रदेश ज्ञान विज्ञान समिति की सदस्य रहीं। आजकल जयपुर की दिगन्तर नामक संस्था में काम करती हैं।

अँग्रेज़ी से अनुवाद: राजेन्द्र शर्मा: भारतीय डाक विभाग से सेवानिवृत्त। वसुधा पत्रिका का सम्पादन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में लेखन। भोपाल में रहते हैं।

सभी चित्र: माधुरी पुरन्दरे।