डी.एन. मिश्रराज

सन् 1704 में एक फ्रांसीसी लेखक एनटोनी गेलार्ड ने मध्यकालीन अरबी, फारसी और भारतीय कथाओं का एक मिला-जुला संग्रह, ‘अरेबियन नाइट्स’ नाम से प्रकाशित किया। इसकी एक कथा का मुख्य पात्र है सिन्दबाद। सिन्दबाद सुदूर, अनजाने समुद्रों की यात्रा करता है और हर बार अपनी यात्राओं के रोमांचक किस्से सुनाता है।

रूख की कल्पना
उसमें से एक किस्सा सुनाते हैं - “हमारा जहाज़ तट से कुछ ही दूर गया होगा कि बादल जैसे छा गए और अँधेरा-सा होने लगा। ऊपर देखा तो एक अति विशाल दानवाकार पक्षी हमारे जहाज़ पर मण्डरा रहा था और उसके विशाल डैनों की ओट में सूरज छिप गया था। उसने पंजों में इतनी बड़ी चट्टान पकड़ी हुई थी कि उसके गिरने से हमारे जहाज़ के टुकड़े-टुकड़े हो जाना निश्चित था। अब हमारी समझ में आया कि इसी को हमने कुछ दिन पहले एक अण्डे पर बैठे, उसे सेते देखा था। अनजाने में हमने उसका अण्डा फोड़ दिया था। इसी से नाराज़ होकर यह पक्षी, जिसे वहाँ के लोग रूख कहते थे, हमारे जहाज़ को समुद्र में ही नष्ट करने आया था...।”

अनजाने सागरों को लाँघकर संसार का भ्रमण करने वाले यात्री मार्को पोलो ने तेरहवीं शताब्दी के अन्त में भारत और चीन सहित अनेक देशों की यात्रा की और उनके वृत्तान्त प्रकाशित किए। उन्होंने मेडागास्कर की यात्रा का वर्णन करते समय वहाँ पाए जाने वाले एक विशाल पक्षी के बारे में, जिसका नाम उन्होंने भी रूख ही बताया, लिखा था कि “उसके डैने कोई बत्तीस कदम तक फैल सकते थे और उसका एक पंख कोई बारह कदम लम्बा था। वह इतना शक्तिशाली था कि हाथी को अपने पंजे में दबाकर उठा ले जाता था और उसे बहुत ऊँचाई से गिरा देता था जिससे उसके कई टुकड़े हो जाते थे। फिर वह हाथी के टुकड़ों को मज़े से खाता था।” वर्णन के अनुसार मार्को पोलो को कुछ यात्रियों ने रूख के कई विशाल पंख भेंट किए थे जिनको उन्होंने अपने आका कुबलाई खाँ और स्पेन के सम्राट के पास भेजा था। रूख के ये तथाकथित पंख कुबलाई खाँ और स्पेन के सम्राट के पास पहुँचते-पहुँचते सूखकर झड़ गए। ये वास्तव में, खजूर के पेड़ की जाति के रैफिना नामक पाम वृक्ष की विशाल पत्तियाँ थीं जो कुछ-कुछ पक्षियों के पंख जैसी दिखती थीं।

तो क्या रूख पक्षी और उसकी विशालता कोई कल्पना थी? सन् 1658 में एक फ्रांसीसी महाशय फ्रूकोर्ट, फ्रांसीसी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के संचालक और मेडागास्कर के गवर्नर नियुक्त हुए। उन्होंने पहली बार मेडागास्कर की प्राकृतिक सम्पदा का, विशेषकर प्राणियों का, वर्णन प्रकाशित किया। इसमें उन्होंने दक्षिणी मेडागास्कर में पाए जाने वाले, शुतुर्मुर्ग जैसे एक विशाल पक्षी का वर्णन किया है। यह पक्षी केवल घने जंगलों में पाया जाता था जहाँ अम्पात्रेस नाम की एक जनजाति रहती थी।

अम्पात्रेस लोग इस पक्षी को वोरनपत्रा कहते थे। श्री फ्रूकोर्ट ने स्वयं इस पक्षी को कभी देखा हो, ऐसा उल्लेख नहीं मिलता। फिर 1832 में एक फ्रांसीसी विक्टर सोंज़िन मेडागास्कर की यात्रा पर गए। वहाँ उन्होंने तटीय क्षेत्र के निवासियों के पास विचित्र प्रकार के कुछ मटके देखे जो सफेद, चिकने, मज़बूत और अण्डाकार थे और चीनी मिट्टी से बने लगते थे। उन्हें बताया गया कि वास्तव में वे एक विशाल पक्षी के अण्डे थे जो तट से दूर, घने जंगलों में छिपकर रहता था। ये अण्डे जो शुतुर्मुर्ग के अण्डों से छह-सात गुना बड़े थे, लोगों को यदाकदा इन जंगलों में पड़े मिल जाते थे।
सोंज़िन ने कुछ अण्डे खरीदकर पेरिस भेजे। परन्तु उन अण्डों को ले जाने वाला समुद्री जहाज़ बीच सागर में ही डूब गया।

जैवशास्त्रीय खोज
सोंज़िन के वर्णन से लगता है कि उनको भी शायद ऐसा कोई व्यक्ति नहीं मिला जिसने कभी इस पक्षी को देखा हो। इस विशाल पक्षी के किस्से सुनकर, जीवशास्त्र में विशेष रुचि रखने वाले एक समुद्री कप्तान, अबादी सन् 1850 में उसे खोजने मेडागास्कर गए। गहन खोज के बाद भी पूरे द्वीप में उन्हें कहीं यह पक्षी नहीं मिला। परन्तु घने जंगल के बीच, सूखते हुए दलदली प्रदेश में उन्हें एक लगभग सम्पूर्ण अस्थिपंजर, विशाल पक्षियों की कुछ हड्डियाँ और तीन अति विशाल अण्डे मिले। इस अस्थिपंजर के आधार पर आकार के विशेषज्ञ जीव-शास्त्रियों ने उस पक्षी की पुनर्रचना की। यह पक्षी शुतुर्मुर्ग जैसा ही बन पड़ा, जो कोई दस-बारह फुट ऊँचा और चार सौ से पाँच सौ किलो वज़न का था। उसके डैनों से स्पष्ट था कि वह उड़ नहीं सकता था। इस पुनर्रचना को जीव-शास्त्रियों ने मान्यता दी और उसे जीव-शास्त्रीय नाम दिया, इपीऔरनिस। इसके विशाल आकार के कारण इसे एलीफेंट बर्ड भी कहा जाता है। इस पक्षी के आकार-बनावट और फ्रूकोर्ट द्वारा वर्णित पक्षी, वोरनपत्रा में काफी समानता थी। ऐसा प्रतीत होता है कि इसे ही अम्पात्रेस लोग वोरनपत्रा कहते थे।
इसके बाद पूरी एक सदी तक इस विशाल पक्षी के बारे में उपजी जिज्ञासा के समाधान का कोई प्रयत्न नहीं हुआ। एक सौ दस वर्ष बाद प्रसिद्ध जीवशास्त्री, खोजी और ‘लाइफ ऑन अर्थ’ पुस्तक तथा टी.वी. सीरियल के लेखक-निर्माता डेविड एटनबरो, अपने दल-बल सहित इपीऔरनिस की खोज में मेडागास्कर गए।

आज की दुनिया का विशालतम पक्षी: शुतुर्मुर्ग

शुतुर्मुर्ग, स्टÜथियो केमेलस (Struthio camelus) मूलत: अफ्रीका का एक विशाल पक्षी है जो उड़ने में असमर्थ होता है। शुतुर्मुर्ग, स्टÜथियोनिडी परिवार और स्टÜथियो प्रजाति का एक मात्र सजीव और पक्षियों की जीवित प्रजातियों में विशालतम प्राणी है। यह विलुप्त हो चुके अभी तक के विशालतम पक्षी इपीऔरनिस के गण का है। शुतुर्मुर्ग के अण्डे अन्य पक्षियों के अण्डों की तुलना में विशालतम हैं जो लगभग 4.5 x 7 इंच के होते हैं और इनका वज़न 3 पाउण्ड होता है।

लम्बी गर्दन, लम्बे पैर और 72 कि.मी. प्रति घण्टे की अधिकतम रफ्तार पर दौड़ने की क्षमता रखने वाला यह पक्षी अन्य से विशिष्ट है। शुतुर्मुर्ग की ऊँचाई 9 फीट तक होती है और इसका वज़न आमतौर पर 63 से 130 कि.ग्रा. होता है। वयस्क नर के पंख सामान्यत: काले रंग के एवं पंख और पूँछ के कोने सफेद होते हैं। मादा व युवा नर सफेद और स्लेटी-भूरे रंग के होते हैं। पौधे शुतुर्मुर्ग का मुख्य आहार हैं पर वह कीड़े भी खाता है। इनका अधिकतम जीवन काल 40 वर्ष का होता है।
इस पक्षी के प्रत्येक पैर में दो पंजे होते हैं (जबकि अधिकतर पक्षियों के चार पंजे होते हैं) जिसमें एक पंजे में बड़ा नाखून होने के कारण यह एक खुर जैसी रचना होती है जबकि दूसरे पंजे में नाखून नहीं होता। इस तरह का अनूठा अनुकूलन शुतुर्मुर्ग को दौड़ने में मदद करता है। पंखों का उपयोग भले ही उड़ने में न होता हो लेकिन ये पर्याप्त बड़े होते हैं। इनका फैलाव लगभग छह फीट होता है।

शुतुर्मुर्ग का प्रारम्भिक एवं मूल निवास उत्तरी अफ्रीका, दक्षिणी सहारा और अफ्रीका के वर्षा वनों वाले क्षेत्र हैं लेकिन आज ये पक्षी खुले, मैदानी इलाके पसन्द करते हैं इसीलिए सावाना और भू-मध्य रेखीय वनों में पाए जाते हैं।
शुतुर्मुर्ग का सम्बन्ध पाँच हज़ार साल पुरानी मेसोपोटामिया और इजिप्ट की सभ्यता से मिलता है। कालाहारी मरुस्थल के लोग अभी भी इसके अण्डों का इस्तेमाल पानी के जग की तरह करते हैं। रोमन सभ्यता में इस पक्षी का उपयोग मनोरंजन में और खाने के लिए होता था। खूबसूरत परों, चमड़े आदि से बनने वाले आभूषणों, फैशन के कपड़ों व अन्य वस्तुओं के लिए लगातार इनका शिकार होता रहा है जिसके चलते आज इनकी आबादी सिमटकर कुछ संरक्षित भागों में और फार्म में ही रह गई है।


काफी खोज के बाद भी उन्हें न कोई विशाल पक्षी मिला और न उसके शरीर के अवशेष। पर उन्हें एक स्थान पर कोई आधा सेंटीमीटर मोटे-चपटे, कुछ गोल-से सैकड़ों टुकड़े मिले। परीक्षण के बाद पता चला कि ये टुकड़े अण्डे के हैं। बड़ी सावधानी से, अथक प्रयत्नों के बाद छाँट-छाँटकर, ‘ट्रायल एण्ड एरर’ से वे एक पूरे अण्डे का खोल निर्मित करने में सफल हुए। यह अण्डा कोई तीस सेंटीमीटर लम्बा था और इसका लम्बा और छोटा घेरा क्रमश: अस्सी और पैंसठ सेंटीमीटर का था। यह अण्डा उत्तरी भारत के गंगा-जमुना के मैदान में पाए जाने वाले बड़े, लम्बे तरबूज़ जैसा था। यही था इस धरती के एतिहासिक विशालतम पक्षी के अण्डे का उपलब्ध प्रथम खोल, जिसे विश्व के अवलोकनार्थ एटनबरो ने प्रस्तुत किया। 1967 में नेशनल जियोग्राफिक सोसायटी द्वारा खोजा गया अण्डे का अर्ध जीवाश्म हारवर्ड म्यूज़ियम, अमरीका में रखा हुआ है।
यूँ तो पक्षियों के पूर्वज, टीरोसॉर नामक उड़नशील सरीसृप, जो आज से कोई साढ़े छह करोड़ वर्ष पूर्व इस धरती पर विचरण करते थे, यहाँ के विशालतम उड़ने वाले प्राणी रहे हैं, परन्तु इपीऔरनिस अभी तक की जानकारी में निश्चिय ही धरती का विशालतम पक्षी है। सन् 1988 में दक्षिण पूर्वी अमेरिका में जिस सूडोडॉनटन के जीवाश्म मिले हैं, वह पक्षी भी इपीऔरनिस से बड़ा नहीं रहा होगा।

कहाँ गए इपीऔरनिस
अब जीवशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि एटनबरो द्वारा खोजे गए टुकड़े इपीऔरनिस के अण्डों के ही हैं और यह पक्षी निश्चित ही सत्रहवीं शताब्दी तक मेडागास्कर के भीतरी, दलदली, घने, अभेद्य जंगलों में पाया जाता था।
धीरे-धीरे जलवायु परिवर्तन एवं मानव अतिक्रमण से जैसे-जैसे दलदल नष्ट हुए, इपीऔरनिस विलुप्त होते गए। 

टीरोसॉर

पृथ्वी पर एक समय ऐसा भी था जब यहाँ अनेक उड़नशील, विशालकाय सरीसृप थे। टीरोसॉर उनमें से एक थे।
टीरोसॉर, टीरोसॉरिया गण के उड़नशील सरीसृप थे। ट्रायासिक युग के अन्त से लेकर क्रिटेशियस युग के अन्त यानी 6.5 करोड़ वर्ष पहले तक ये आसमान में राज करते रहे। ये ऐसे पहले और विशालतम रीढ़धारी प्राणी थे जिनमें तेज़ गति से उड़ने की क्षमता विकसित हुई। गोरैया के आकार से लेकर हवाई जहाज़ तक के आकार वाले इन प्राणियों का बड़ा सिर, विशाल पंख और तुलनात्मक रूप से छोटा शरीर था।
टीरोसॉर की प्रारम्भिक प्रजातियों के लम्बे दाँत और लम्बी पूँछ हुआ करती थी जबकि बाद की प्रजातियों में पूँछ काफी छोटी हो गई और कुछ में तो दाँतों का भी अभाव देखा गया।
उत्तरी अमेरिका में पाया जाने वाला विशालतम टीरोसॉर, क्वैटज़लकोटलस नॉरट्रोपी (Quetzalcoatlus northropi) के पंख लगभग 39 फीट लम्बे और वज़न 90-120 कि.ग्रा. हुआ करता था। हालाँकि कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इनका वज़न 200-250 कि.ग्रा तक का रहा होगा। लम्बी गर्दन वाले इन प्राणियों की चोंच लम्बी होती थी जो शिकार करने के अनुकूल थी।


माना जाता है कि तेरहवीं से सोलहवीं शताब्दियों के बीच मेडागास्कर के समीप मोज़ाम्बिक सागर से गुज़रने वाले पोतयात्रियों ने तटीय निवासियों को इपीऔरनिस के अण्डों के खोलों को मटकों के रूप में इस्तेमाल करते देखा होगा। जिज्ञासावश पूछने पर उनको जब यह बतलाया गया होगा कि वे एक पक्षी के अण्डे हैं तो वे निश्चिय ही हैरान रह गए होंगे। अपने चिरपरिचित, विशालतम पक्षी शुतुर्मुर्ग के अण्डों से भी कई गुना बड़े, इन अण्डों से निकलने वाले विशाल पक्षी के आकार, उड़ान और शक्ति के बारे में उन्होंने कल्पना की होगी और अपनी यात्राओं के वर्णन में रोचकता लाने के लिए इसके बारे में किस्से गढ़े होंगे तथा इस पक्षी को रूख नाम दिया होगा। इन काल्पनिक किस्सों को मार्को पोलो के वर्णनों ने खूब हवा दी होगी। अब यह बताना पड़ेगा कि इन दानवाकार पक्षियों की कल्पना और किस्सों का मूलनायक इपीऔरनिस ही था जो बेचारा डैने फैलाकर हवा में उड़ना जानता ही नहीं था। न उसने कभी हाथी उठाया होगा और न ही विशाल चट्टान।
कुछ भी हो, आज के विशालतम पक्षी से लगभग छह फुट ऊँचा, शुतुर्मुर्ग के अण्डे से छह-सात गुना बड़े अण्डे से निकलने वाला यह पक्षी दानवाकार तो रहा ही होगा।


डी. एन. मिश्रराज: होल्कर साइंस कॉलेज, इन्दौर में वनस्पतिशास्त्र के वरिष्ठ प्राध्यापक रह चुके हैं। मध्य प्रदेश के अनेक स्नातकोत्तर महाविद्यालयों के प्राचार्य भी रहे हैं। पक्षी दर्शन में गहरी रुचि है। इन्दौर में निवास।