दिशा नवानी एवं कमलेश चन्द्र जोशी                                                                                                                               [Hindi PDF, 563 kB]

स्कुल शिक्षा की वर्तमान शब्दावली में टीएलएम खूब प्रचलित शब्द रहा है। विभिन्न शिक्षक प्रशिक्षणों में भी टीएलएम के निर्माण व कक्षा में इसके उपयोग पर काफी चर्चा की जाती है। शिक्षकों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे ज़्यादा-से-ज़्यादा रचनात्मक होकर टीएलएम बनाएँ और उन्हें साझा करें। इसके परिणाम स्वरूप यह देखा गया है कि शिक्षकों द्वारा खूब चमकीले व सजावटी टीएलएम तैयार किए जाते हैं। वास्तव में, अपनी सृजनात्मकता दर्शाने का यह सुनहरा अवसर होता है। इन टीएलएम पर उन्हें पुरस्कार भी मिलते हैं। ऐसे टीएलएम जो शिक्षकों की रचनात्मकता व परिश्रम के प्रतीक होते हैं, उन्हें अच्छा मानने व पुरस्कृत करने के पीछे दो मुख्य कारण हैं।

पहला, शिक्षकों के समुदाय में टीएलएम की पहचान अभी भी इस रूप में नहीं बन पाई है कि उसे सीखने-सिखाने में एक सहायक सामग्री माना जाए, या किसी खास विषय से सम्बन्धित उद्देश्यों या बच्चों की विकासात्मक ज़रूरतों या परिवेश से जोड़कर देखा जाए। अभी तक इस बात को शायद ही कोई मान्यता मिल पाई है कि टीएलएम सीखने की प्रक्रिया को सुगम और प्रभावी बनाने का महज़ एक माध्यम है, अपने आप में एक अन्त नहीं। शिक्षकों के लिए टीएलएम बनाना एक आवश्यक मजबूरी-सा बन जाता है। इसे क्यों बनाना है या इससे सीखने के किन उद्देश्यों की प्राप्ति होगी, इन विषयों की सीमित समझ के साथ टीएलएम बनाना अपने आप में एक सीमित उद्देश्य बनकर रह जाता है।

दूसरा, टीएलएम को अनुपयुक्त रूप से शिक्षकों की प्रतिभा व उनकी स्वयं की मेहनत से जोड़कर देखा जाता है। जो टीएलएम अधिक मौलिक, रचनात्मक व जटिल होते हैं और शिक्षक की मेहनत को प्रदर्शित करते हैं, वही टीएलएम प्रशंसा के पात्र बनते हैं। शिक्षक प्रशिक्षण कॉलेजों में अधिकतर प्रशिक्षु शिक्षक टीएलएम बनाने में अपना काफी समय व्यतीत करते हैं, जहाँ इस बात पर ज़ोर दिया जाता है कि वे ऐसे टीएलएम बनाएँ जो नए व रचनात्मक हों। इस प्रक्रिया में सबसे महत्वपूर्ण उद्देश्य यह रहता है कि टीएलएम ‘प्रदर्शित’ हों और लोग उन्हें देख पाएँ।

बाज़ार में उपलब्ध टीएलएम
व्यवस्था में इस बात पर भी ज़्यादा ज़ोर नहीं दिया जाता कि कुछ विषयों के लिए बाज़ार में अच्छे टीएलएम पहले से ही मौजूद हैं और शिक्षक हमेशा स्वयं टीएलएम न बनाकर, कक्षा में इनका उपयोग भी कर सकते हैं। यह इसलिए, क्योंकि यह मान्यता है कि इससे शिक्षकों में आलस की प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलेगा। हालाँकि, कुछ हद तक यह बात सही है कि शिक्षक टीएलएम स्वयं तैयार करें व कक्षा में उनका उपयोग करें। लेकिन उससे भी ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि शिक्षक इस बात पर अपनी समझ कायम करें कि एक अच्छे व खराब टीएलएम में क्या भेद है, और कक्षा में इनका प्रभावी ढंग से कैसे उपयोग किया जा सकता है।

टीएलएम की उपलब्धता से जुड़ा हुआ एक दूसरा पहलू भी है। आजकल टीएलएम बनाना एक धन्धा-सा बन गया है और कुछ ऐसी संस्थाएँ खुल गई हैं जिन्हें या तो कुछ सेवानिवृत्त शिक्षक चलाते हैं या कुछ ऐसे लोग जिनका शिक्षा से कोई वास्ता नहीं है। ऐसे व्यक्ति बिना किसी शिक्षा-शास्त्रीय समझ के या तो टीएलएम निर्मित करते हैं या थोक की दुकानों से खरीद कर स्कूलों में इनकी आपूर्ति करते हैं। इस बात पर शायद ही चर्चा की जाती है कि ये टीएलएम शिक्षक को पढ़ाने में और विद्यार्थियों को सीखने में किस तरह से मदद करेंगे, बच्चों की किन अवधारणाओं के विकास में सहयोग देंगे और इसमें बच्चे कौन-सी मानसिक चुनौतियाँ महसूस करेंगे।
टीएलएम के विषय में यह समझना ज़रूरी है कि किसी टीएलएम के अच्छे होने के क्या आधार हैं, और टीएलएम का प्रयोग किस प्रकार और कब करना चाहिए। लेकिन इससे पहले हम इस लेख में टीएलएम से जुड़ी कुछ अवधारणाओं को समझने का प्रयास करेंगे।

गतिविधि आधारित टीएलएम
टीएलएम के बारे में समझ बनाने के लिए हमें सर्वप्रथम खुशी-खुशी सीखने व गतिविधि आधारित शिक्षा की अवधारणाओं और टीएलएम से उनके अन्तर्सम्बन्धों को समझना होगा। खुशी-खुशी सीखने से अक्सर यह समझा जाता है कि इसमें सीखने वाले को सीखने की प्रक्रिया के दौरान आनन्द आ रहा होता है। लेकिन यहाँ ‘सीखने का आनन्द’ व ‘सीखने में आनन्द’ में फर्क करना ज़रूरी है। यह ज़रूरी नहीं है कि सीखने के दौरान बच्चा खुश नज़र आ रहा हो, मुस्कुरा रहा हो या मज़े-मज़े में सीख रहा हो। महत्वपूर्ण यह है कि विद्यार्थी को सीखने की प्रक्रिया अर्थपूर्ण लगे ताकि वह विषय सम्बन्धी मूल अवधारणाओं के बीच अन्तर्सम्बन्धों को समझ सके तथा साथ ही साथ अपने अनुभव, सोच व अपने पूर्वज्ञान को भी उससे जोड़ सके। लेकिन यह बिलकुल भी ज़रूरी नहीं है कि उसे यह प्रक्रिया हमेशा सरल व मज़ेदार ही लगे। जॉन ड्युई के अनुसार सीखने के दौरान विद्यार्थी का खुश रहना व विषय में उसकी रुचि होना सीखने के लिए महत्वपूर्ण परिस्थितियाँ हो सकती हैं, लेकिन ये अपने आप में पर्याप्त नहीं हैं। इस तरह का सीखना एक छोटी अवधि के लिए तो उपलब्धि माना जा सकता है, परन्तु यह सम्भव है कि विद्यार्थी असल में कुछ सीख ही न रहा हो या सतही तौर से ही सीख रहा हो। दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि इस प्रक्रिया में यह ज़रूरी नहीं है कि सीखने वाले की सोच तथा खुद को व संसार को देखने-समझने का उसका नज़रिया एक निचले स्तर से ऊपरी स्तर तक पहुँचे। दूसरी ओर यह सम्भव है कि सीखने की प्रक्रिया परिश्रमपूर्ण और कष्टदायक हो लेकिन अन्त में विद्यार्थी को कुछ नया या जटिल सीखने का आनन्द महसूस हो। परन्तु यहाँ पर इस बात पर ध्यान देने की ज़रूरत है कि इस प्रक्रिया में केवल तथ्यों को याद करने को सीखना नहीं कहा जा रहा है। इसी प्रकार गतिविधि आधारित शिक्षण का मतलब है कि बच्चे तथ्यों और अवधारणाओं के बीच मानसिक अन्तर्सम्बन्ध बनाएँ व उन्हें समझने का प्रयास करें, न कि कक्षा में सिर्फ हँसें-कूदें या नाचें-गाएँ। हालाँकि, बच्चों के लिए शारीरिक क्रियाकलाप आवश्यक हैं लेकिन सीखने की सभी गतिविधियों में इसकी ज़रूरत नहीं है।

टीएलएम के मायने

टीचिंग लर्निंग मटेरियल या टीएलएम वह सामग्री है जो बच्चों की किसी विषयवस्तु की अवधारणा को स्पष्ट करने में मदद करती है। जब हम कहते हैं कि टीएलएम बच्चों के सीखने में मदद कर रहा है तो वास्तव में, हम बच्चों के सीखने को देख कैसे रहे हैं, जब हम इस बात को समझेंगे तब ही हम एक अच्छा टीएलएम या तो तैयार कर पाएँगे या ढूँढ़कर कक्षा में उसका उपयोग कर पाएँगे। अगर हम बच्चों के याद करने या दोहराने को सीखना मानेंगे तो ज़ाहिर है कि हम टीएलएम को भी केवल जानकारी देने की सामग्री ही मानेंगे और कक्षा में उसका उपयोग भी उसी तरह करेंगे। किसी भी अच्छे और उपयोगी टीएलएम निर्माण के लिए उससे सम्बन्धित विषय एवं उससे पूरे किए जाने वाले उद्देश्य की जानकारी होना आवश्यक है।

जैसे कि अगर हमें बच्चों में गिनती की अवधारणा पर समझ बनानी है तो उसके टीएलएम को गिनती की समझ बनाने के सन्दर्भ में ही देखना होगा, न कि गिनती को याद करने के सन्दर्भ में। इसके साथ यह भी समझना ज़रूरी है कि बच्चों को गणित पढ़ाने में किन बातों पर ध्यान रखने की ज़रूरत है और विज्ञान सीखने में किन चीज़ों की, सामाजिक अध्ययन में अवधारणाएँ किस तरह स्पष्ट की जाती हैं, भाषा सीखने का क्या मतलब है व इसमें बच्चों को किस तरह के मौके देने की ज़रूरत है इत्यादि। इन्हीं सब बिन्दुओं के इर्द-गिर्द ही टीएलएम का निर्माण या प्रयोग किया जाना चाहिए।

खुशी-खुशी सीखने अथवा बच्चे की स्कूली शिक्षा को उसके स्कूल के बाहर के जीवन से जोड़ने का अर्थ यह नहीं है कि जो गतिविधियाँ बच्चे कक्षा के बाहर स्वाभाविक रूप से करते हैं, उन्हें जॉयफुल लर्निंग के नाम पर उसी रूप में कक्षा के अन्दर भी दोहराया जाए। असल में, जब किसी गतिविधि को कक्षा में करने की बात सोची जाए तो इस बात की योजना बनाई जानी चाहिए कि उसके द्वारा क्या हासिल किया जाएगा व उसका उपयोग किस प्रकार किया जाएगा। टीएलएम के इस्तेमाल का मतलब कक्षा की दीवारों को रंगीन बनाना या सुन्दर भड़कीली चीज़ों का इस्तेमाल कर केवल बच्चों को आकर्षित करना या मज़ा कराना नहीं है। इसकी बजाय, टीएलएम शिक्षकों द्वारा सिखाने व विद्यार्थियों द्वारा सीखने का एक कारगर ज़रिया है, एक ऐसा माध्यम जो सीखने के कुछ निश्चित उद्देश्यों से जुड़ा है।

टीएलएम क्या हैं?
टीएलएम की परिधि में विभिन्न तरह की सामग्री शामिल है जो सीखने-सिखाने को सुगम बनाती है। अक्सर टीचिंग एड, लर्निंग एड व टीएलएम में भेद किया जाता है। टीचिंग एड को हम शिक्षक के नज़रिए से देखते हैं। उदाहरण के लिए, शिक्षकों की कोई हैंडबुक जो कई तरह से उनका सहयोग देती है - शिक्षण के संयोजन, विद्यार्थियों के आकलन तथा पढ़ने-पढ़ाने के अतिरिक्त साधनों-स्रोतों के बारे में जानकारी देना इत्यादि। लर्निंग एड को हम सीखने वाले के नज़रिए से देखते हैं: उदाहरण के लिए, वर्कशीट। टीएलएम के इर्द-गिर्द थोड़ी-बहुत अस्पष्टता हो सकती है कि उसे हम क्या मानें - टीचिंग एड या लर्निंग एड। लेकिन यह बात तय है कि टीएलएम सीखने और सिखाने, दोनों को सुगम बनाने का एक माध्यम है। यहाँ पर गौर करने की बात यह है कि सीखने व सिखाने को एक-दूसरे से पूर्णतया भिन्न दो कोटियों में सीधे-सीधे बाँट देना और फिर टीएलएम को उनके नज़रिए से ही देखना भी उचित न होगा। उदाहरण के लिए, पाठ्यपुस्तक को हम कहाँ रखेंगे? यह शिक्षकों और बच्चों, दोनों के लिए है। इसे हम सिर्फ टीचिंग एड या लर्निंग एड के घेरे में नहीं रख सकते। लेकिन यह बात ज़रूर है कि किसी भी टीएलएम के निर्माण या उपयोग में विद्यार्थी का नज़रिया अहम होना चाहिए, न कि शिक्षक की सोच का विद्यार्थी पर थोपा जाना।

आसान या जटिल टीएलएम
टीएलएम के अन्तर्गत प्राथमिक से जटिल, यानी विभिन्न तरह की सामग्री व संसाधनों को शामिल किया जा सकता है। एक प्राथमिक टीएलएम, जैसे कि एक चार्ट में किसी भी जानकारी को सरल व व्यवस्थित तरीके से कक्षा में प्रस्तुत किया जा सकता है। इसी तरह एक पोस्टर विद्यार्थी को तुरन्त कोई सन्देश देने या उसे भावनात्मक ढंग से प्रभावित करने में सक्षम होता है। दूसरी तरफ, एक जटिल टीएलएम कोई मॉडल या रचनात्मक तरीके से बनाया गया कोई प्रयोग हो सकता है जो विद्यार्थियों को किसी विषय-विशेष से जुड़ी विभिन्न अवधारणाओं व तथ्यों के अन्तर्सम्बन्धों को समझने में मदद कर सके।

यहाँ पर यह समझने की ज़रूरत है कि सीखने की हर प्रक्रिया में हमेशा उच्चस्तरीय कौशलों की ज़रूरत नहीं पड़ती। कुछ कार्यों के लिए विद्यार्थियों द्वारा केवल आवश्यक व अर्थपूर्ण जानकारी प्राप्त करना ही पर्याप्त हो सकता है, जबकि कुछ अन्य कार्यों के लिए उन्हें कुछ उच्चस्तरीय कौशलों की ज़रूरत पड़ सकती है, जैसे व्याख्या करना या प्रमेय बनाना आदि। यानी यह जानना ज़रूरी है कि आप किस विषय में किस तरह की अवधारणाएँ बच्चों को सिखाना चाह रहे हैं, सीखने का सन्दर्भ क्या है, और बनाई जाने वाली सामग्री बच्चों के विकासात्मक स्तर के लिए उचित है या नहीं। इन सब बातों को ध्यान में रखकर ही टीएलएम का निर्माण करना चाहिए। कभी-कभी अपने आसपास से चुने गए कंकड़, पत्तियाँ, फूल या पास के किसी म्यूज़ियम, पार्क, जंगल या सब्ज़ी-मण्डी का भ्रमण भी टीएलएम के दायरे में आ सकता है। कक्षा में टीएलएम किसी विशेष अवसर को ध्यान में रखकर भी निर्मित किए जा सकते हैं, जैसे कक्षा में कुछ दिखाना हो या प्रदर्शित करना हो। इसी तरह फिल्म भी एक प्रभावी टीएलएम है। इसके माध्यम से बच्चे उन जगहों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं जहाँ जाना उनके लिए सम्भव ही न हो। विश्वकोष से बहुत-सी जानकारियाँ जल्दी व व्यवस्थित तरीके से प्राप्त की जा सकती हैं। झाड़ू की सींक, धागे, कागज़ व पुरानी रिफिल के माध्यम से बनाए गए साधारण टीएलएम से -- जिसमें दो स्थिर चित्रों को जल्दी-जल्दी संचालित करने पर वे गति करते हुए दिखाई पड़ते हैं -- बच्चों को दृष्टि के सिद्धान्त के बारे में बताया जा सकता है।

टीएलएम का व्यापक दायरा

प्राइवेट स्कूलों में बच्चों को विभिन्न तरह के मॉडल आदि सामग्री बनाने के गृह-कार्य दिए जाते हैं और इन्हें भी टीएलएम के दायरे में रख दिया जाता है। यह समझ नहीं आता कि बच्चों से इस तरह के अभ्यास क्यों करवाए जाते हैं। अक्सर इन मॉडल आदि को देखकर कहीं से यह आभास नहीं मिलता कि इनसे बच्चों को अवधारणा समझने में मदद मिल रही है, क्योंकि ज़्यादातर बच्चे केवल पाठ्यपुस्तक की चीज़ों को चार्ट या मॉडल के रूप में उतार रहे होते हैं। यहाँ फिर सवाल आता है कि हम बच्चों के सीखने को कैसे देख रहे हैं। जब इस पर हमारी अपनी सोच स्पष्ट होगी तभी हम बच्चों को अच्छे अभ्यास दे पाएँगे। टीएलएम को सीमित की जगह व्यापक सन्दर्भ में देखना होगा, तभी इस पर बेहतर समझ बनेगी, उसकी उपयोगिता स्पष्ट होगी, और कक्षा में सीखने-सिखाने में बदलाव की बात शु डिग्री हो सकेगी।

इस प्रकार टीएलएम के अन्तर्गत विभिन्न प्रकार की सामग्री शामिल की जा सकती है। इसमें छपी हुई सामग्री से लेकर स्वयं की बनाई हुई वस्तुएँ, स्थानीय रूप से उपलब्ध वस्तुएँ, विभिन्न इन्द्रियों के उपयोग को ध्यान में रखकर तैयार की गई वस्तुएँ, यहाँ तक कि कक्षा का एक कोना या स्कूल का एक हिस्सा भी हो सकता है। टीएलएम के निर्माण व उसके प्रयोग में सबसे ज़रूरी है शिक्षक की स्पष्टता-
1 उस उद्देश्य के बारे में जिसके लिए या तो वह स्वयं टीएलएम बना रहा हो या पहले से उपलब्ध टीएलएम का कक्षा में प्रयोग कर रहा हो;
2 कि विद्यार्थी उस टीएलएम से मानसिक रूप से कैसे जुड़ेंगे;
3 उन गतिविधियों के बारे में जो उस टीएलएम के इर्द-गिर्द करवाई जाएँगी। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि चाहे टीएलएम कैसा भी हो, उसका उपयोग किसी खास उद्देश्य को पूरा करने के लिए किया जाएगा। यह ज़रूरी नहीं कि हर टीएलएम का हर विद्यार्थी अपने हाथों से ही प्रयोग करे, लेकिन ज़रूरी है कि वह उससे मानसिक रूप से जुड़ कर अपनी समझ को समृद्ध बनाए;
4 कि टीएलएम को सजावटी सामान के रूप में प्रदर्शित न किया जाए;
5 कि किसी भी टीएलएम का, चाहे वह कितना भी अच्छा व प्रभावी क्यों न हो, एक खास जीवनकाल होता है जो कुछ मिनट, कुछ दिनों या कुछ महीनों का हो सकता है। इसलिए टीएलएम के खराब हो जाने के डर को उसके इस्तेमाल पर हावी नहीं होना चाहिए।

अच्छे व खराब टीएलएम
किसी टीएलएम के अच्छे या खराब होने के विषय में दो तरह के विचार हैं। पहला यह कि टीएलएम अपने आप में अच्छे या खराब हो सकते हैं। दूसरा यह कि कोई भी टीएलएम अच्छा या खराब नहीं होता, इसकी अच्छाई या प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि कोई शिक्षक उसे कक्षा में किस प्रकार इस्तेमाल करता है। यह समझना ज़रूरी है कि टीएलएम के इस्तेमाल को लेकर शिक्षक के महत्व व उसकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। लेकिन उसे सिर्फ उस पैमाने पर अच्छा या खराब मानना भी सही नहीं होगा। हमें इस बात को स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं करना चाहिए कि किसी भी टीएलएम के कुछ लक्षण उसे अच्छा या खराब बनाते हैं। ये मापदण्ड किसी की व्यक्तिगत सोच पर आधारित नहीं होते, बल्कि उनमें शिक्षाशास्त्रीय तर्क रहता है। कुछ ऐसे सामान्य लक्षण होते हैं जो सभी प्रकार के टीएलएम पर लागू हो सकते हैं। परन्तु कुछ ऐसे मापदण्ड भी हैं जो किसी विशेष टीएलएम पर ही लागू किए जाने चाहिए। आइए, कुछ ऐसे लक्षणों को देखें जिनके आधार पर हम किसी टीएलएम को अच्छा या खराब मान सकते हैं:
1 किसी भी टीएलएम के कुछ विशिष्ट शिक्षा सम्बन्धी उद्देश्य होने चाहिए।
2 टीएलएम के निर्माण या उसके उपयोग के पीछे यह स्पष्टता होनी चाहिए कि वह विद्यार्थी की सीख को कैसे सुगम बनाएगा और इसके लिए कक्षा में कौन-सी गतिविधियाँ उसके इर्द-गिर्द बुनी जाएँगी।
3 विद्यार्थियों के लिए टीएलएम की विकासात्मक उपयुक्तता।
4 टीएलएम के द्वारा उपलब्ध सामग्री या सीखने की प्रक्रिया में बढ़ोतरी। किसी और रूप में सिर्फ बात को दोहराना निरर्थक है।
5 बच्चों का सामाजिक, आर्थिक व सांस्कृतिक परिवेश, और उनके सीखने के सन्दर्भ में टीएलएम की उपयुक्तता।
6 विद्यार्थी के प्रति टीएलएम की संवेदनशीलता। उसकी उम्र, जाति, लिंग या सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि के बारे में कोई अपमानजनक टिप्पणी न हो।
7 टीएलएम के निर्माण की कीमत व उससे सम्बन्धित सामग्री की स्थानीय उपलब्धता।

अन्य मापदण्ड किसी भी टीएलएम के सन्दर्भ-विशेष से जुड़े होते हैं। उदाहरण के लिए, अगर एक चार्ट को लें तो उसमें यह देखने की ज़रूरत होती है कि उसकी विषयवस्तु या ग्राफ को ठीक से देखा जा सकता है या नहीं। इसी तरह किसी ऑडियो कार्यक्रम में आवाज़ की स्पष्टता, फिल्म में विज़ुअल व ऑडियो, दोनों की स्पष्टता तथा नक्शों और ग्लोब में उचित तकनीक का इस्तेमाल आदि ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें जाँचना ज़रूरी होता है। दूसरी तरह से देखें तो कोई पुराना और कमज़ोर विश्वकोष फायदे की बजाय नुकसान पहुँचा सकता है। इसी तरह ऐसे कार्टून या कॉमिक्स जिनमें लोगों, स्थितियों व विभिन्न अवधारणाओं को सामान्यीकृत ढंग से पेश किया जाता है, भी खराब टीएलएम की श्रेणी में ही रखे जाएँगे। बहुत-सी कहानियों की किताबें भी अनुचित भाषा का इस्तेमाल करती हैं और इसलिए खराब टीएलएम होती हैं। यह भी देखा गया है कि कुछ टीएलएम पाठ्यपुस्तकों की नकल मात्र होते हैं। कहने की ज़रूरत नहीं कि इस तरह की सामग्री उद्देश्य-रहित होती है और इसमें अपना समय, ऊर्जा व संसाधन खर्च करना बेकार है।

हालाँकि, अलग-अलग टीएलएम के गुणों की एक सूची बनाई जा सकती है जिसके आधार पर हम उन्हें अच्छा या खराब मानेंगे, परन्तु इसकी बहुत उपयोगिता नहीं होगी। ज़रूरी यह है कि शिक्षकों को इतना सशक्त बनाया जाए कि बिना कोई ऐसी सूची देखे ही वे अच्छे और खराब टीएलएम की पहचान कर पाएँ। शिक्षक को टीएलएम की गुणवत्ता की सूची प्रदान करना उसकी क्षमताओं को कम कर देने के समान है।

पाठ्यपुस्तकें - टीएलएम के रूप में
बहुधा जब टीएलएम की बात करते हैं तो पाठ्यपुस्तकों को हम इस श्रेणी से बाहर कर देते हैं। परन्तु वास्तव में, पाठ्यपुस्तकें टीएलएम के दिल में बसती हैं। पाठ्यपुस्तकें किसी खास विषय, कक्षा की ज़रूरतों व पाठ्यक्रम को ध्यान में रखकर तैयार की जाती हैं तथा शिक्षक व विद्यार्थी उनका विस्तृत उपयोग करते हैं। इनके अन्दर बहुत सारे दृश्य-सम्बन्धी व वाक्-सम्बन्धी प्रतीक होते हैं, जैसे डायग्राम, तालिकाएँ, फ्लोचार्ट, पोस्टर, कार्टून, कॉमिक्स स्क्रिप्ट, चित्र, नक्शे व ग्राफ आदि। यह दूसरी बात है कि कोई भी सामान्य भारतीय कक्षा अक्सर पाठ्य-पुस्तकों पर ज़रूरत से ज़्यादा निर्भर करती है तथा ये पाठ्यपुस्तकें कक्षा की शिक्षणशास्त्रीय प्रक्रियाओं व बच्चों को भी प्रभावित करती हैं। पाठ्यपुस्तकें जिस प्रकार लिखी जाती हैं व कक्षा में इनके उपयोग की अपनी सीमाएँ हैं, लेकिन इस कारण इनके महत्व को नकारा नहीं जा सकता। पाठ्यपुस्तकों से छुटकारा पाने की बजाय, इनकी ताकत व कमज़ोरी को पहचानने तथा उनको ध्यान में रखकर ही कक्षा में इनका इस्तेमाल करने की ज़रूरत है।

निष्कर्ष
उक्त चर्चा के महत्वपूर्ण बिन्दुओं का सार-संक्षेप नीचे प्रस्तुत किया गया है। टीएलएम के सम्बन्ध में निम्न बातों पर गौर किया जाना चाहिए:
* पहली बात यह है कि टीएलएम सीखने के उद्देश्य को पूरा करने का एक माध्यम मात्र है।
* किसी भी टीएलएम को किसी विषय-विशेष के सन्दर्भ में ही देखना चाहिए और उसी के अन्तर्गत उसे निर्मित करने व उपयोग करने के बारे में सोचना चाहिए। इसके लिए अनिवार्य है कि टीएलएम बनाने वाले और उपयोग करने वाले, दोनों की ही उस विषय सम्बन्धी अच्छी जानकारी हो।
* बहुत तरह की चीज़ों/सामग्रियों को टीएलएम माना जा सकता है। उन्हें बनाया जा सकता है या खरीदा जा सकता है। टीएलएम डिज़ाइन व उद्देश्य के अनुसार सरल से जटिल हो सकते हैं।
* प्रत्येक टीएलएम की अपनी विशेषताएँ व सीमाएँ होती हैं। कोई भी एक टीएलएम, चाहे वह कोई पाठ्य-पुस्तक ही क्यों न हो, सीखने के सभी उद्देश्यों व सभी अवसरों पर सभी बच्चों के लिए उपयुक्त नहीं हो सकता।
* किसी भी टीएलएम को बनाने, चुनने या खरीदने से पहले विद्यार्थी के सामाजिक व आर्थिक परिवेश और उसकी विकासात्मक अवस्था को ध्यान में रखना चाहिए।
* बच्चों की रुचि उनके सीखने में एक महत्वपूर्ण परिस्थिति होती है, लेकिन सिर्फ यही आधार किसी टीएलएम को अच्छा मानने के लिए पर्याप्त नहीं है।
* टीएलएम के उपयोग के दौरान अर्थपूर्ण गतिविधियों का चयन करना अनिवार्य है।
* शिक्षकों को टीएलएम स्वयं तैयार करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन किसी टीएलएम को शिक्षक ने तैयार किया है, केवल इस वजह से वह अच्छा नहीं हो जाता।
* इसी तरह गैरसरकारी संस्थाओं/व्यक्तियों द्वारा बनाए गए टीएलएम को सिर्फ इस कारण बेकार नहीं कहा जा सकता क्योंकि वे शिक्षकों द्वारा नहीं बनाए गए हैं।
* स्वयं शिक्षकों द्वारा टीएलएम बनाए जाने पर ज़ोर देने से ज़्यादा महत्वपूर्ण यह है कि वे अच्छे व खराब टीएलएम को पहचान सकें। उन्हें विभिन्न टीएलएम के बीच फर्क करने के सही कारणों का पता होना चाहिए। इसी तरह उन्हें उनकी उपलब्धता व उनका इस्तेमाल करने के विभिन्न तरीकों के बारे में ज्ञान होना चाहिए।


दिशा नवानी: टाटा सामाजिक विज्ञान संस्थान, मुम्बई में एम.ए. (एजुकेशन) पाठ्यक्रम की समन्वयक और शिक्षा संकाय में एसोसिएट प्रोफेसर।
कमलेश चन्द्र जोशी: प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र से सम्बद्ध। इन दिनों अज़ीम प्रेमजी फाउंडेशन, देहरादून में कार्यरत।