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सवाल: यदि मैं अपनी किसी एक आँख की ऊपरी पलक को हौले से दबाती हूँ तो मुझे दो-दो बिम्ब क्यों दिखाई देते हैं?

जवाब: इस जवाब को पढ़ने से पहले इसे करके देखिए। क्या दोे बिम्ब दिखाई देते हैं?

चलिए, शुरुआत इससे करते हैं कि किसी वस्तु को देखने का क्या मतलब है। बोल-चाल की भाषा में कहें तो जब हम किसी वस्तु को ‘देखते’ हैं तो हम वह वस्तु क्या है और कहाँ है, दोनों देखते हैं। और देखने की इस प्रक्रिया में हमारी आँखें और मस्तिष्क, दोनों की भूमिका है।

स्कूल की पाठ्यपुस्तकों में दिए गए रेखा-चित्रों से पता चलता है कि जब हम किसी वस्तु को देखते हैं तो उस वस्तु से परावर्तित होकर कुछ प्रकाश किरणें जब आँखों में घुसती हैं तो वे कई परतों से गुज़रती हैं। आँखों की बाहरी सतह पर आँसुओं की परत, फिर कॉर्निया, अन्दर के द्रव, फिर लेंस में से। ये सब परतें अलग-अलग घनत्व की हैं और इस वजह से किरणों का अपवर्तन होता है। फिर इन किरणों को लेंस फोकस करता है और ये आँखों के अन्दर व पिछले भाग में रेटिना (प्रकाश के प्रति संवेदनशील पर्दे जैसी संरचना) पर गिरती हैं, और यहाँ वस्तु का बिम्ब बनता है। फिर रेटिना से तंत्रिकाएँ मस्तिष्क तक बिम्ब की जानकारी पहुँचाती हैं, जिससे हमें ‘देखने’ का एहसास होता है।

हमारी दो आँखें हैं जिनमें एक-एक लेंस है, तो हर आँख की रेटिना पर एक बिम्ब बनता है। हमारी आँखें एक-दूसरे से 4-7 से.मी. की दूरी पर हैं। तो बिम्ब भी इतनी ही दूरी पर बनते होंगे। फिर भी आम तौर पर किसी एक वस्तु के इन दो बिम्ब को हमारा मस्तिष्क एक मानता है। यह इसलिए कि हमारे मस्तिष्क के अनुसार दोनों आँखों के रेटिना में तालमेल (अनुरूपता, ‘रेटिनल कॉरस्पॉण्डेन्स’) है। और जब दोनों आँखों के रेटिना पर ऐसे तालमेल वाली कोशिकाओं का उद्दीपन होता है, तो हमारा मस्तिष्क वहाँ पर बने दो बिम्बों को एक मान लेता है।

इस पन्ने पर दिए गए चित्र को देखिए। b और b' बाईं और दाईं आँखों के रेटिना के वो स्थान हैं जिनमें तालमेल है (वैसे ही c-c' और a-a'में तालमेल है)। इसका मतलब है कि जब किसी वस्तु (जो चित्र में B पर है) के बिम्ब b और b' पर बनते हैं तो हमारा मस्तिष्क मान लेता है कि यह एक ही वस्तु है, और हमें एक वस्तु देखने का एहसास दिलाता है। मान लीजिए कि अब किसी कारण उसी वस्तु B के बिम्ब b और b'की बजाय b और z' पर बनते हैं। चूँकि हमारे मस्तिष्क के अनुसार b और z में तालमेल नहीं है, वो उन दोनों बिम्ब को अलग-अलग वस्तुएँ मान लेता है और हमें अक्सर एक-दूसरे को ढकते हुए दो बिम्ब दिखाई देते हैं।

जब एक आँख की ऊपरी पलक को हौले से दबाते हैं तो ऐसा ही कुछ होता है। एक वस्तु के दो-दो, एक-दूसरे को ढकते हुए से बिम्ब दिखाई देते हैं। और अगर एक आँख को बन्द रखके दूसरी आँख को हलके से दबाते हैं तो ऐसा लगता है कि किसी ने उस वस्तु को थोड़ा-सा खिसकाया है। इससे पता चलता है कि इस आँख में बिम्ब के खिसकने की वजह से ही जहाँ एक दिख रहा था, अब दो-दो बिम्ब दिख रहे हैं।

एक आँख को हौले-से दबाने से बिम्ब अलग स्थान पर इसलिए बनता है क्योंकि उस आँख का आकार बदलता है। हमारी आँखें उबले हुए अण्डे जैसी हैं - हलके दबाव से ही कॉर्निया और उसके पीछे की परतों, लेंस की वक्रता आदि में बदलाव आ जाते हैं। ऐसा होने पर प्रकाश की किरणों के अपवर्तन में परिवर्तन होता है और लेंस के फोकस में भी। इसका नतीजा यह होता है कि रेटिना पर पहले के स्थान से हटकर अलग स्थान पर बिम्ब बनता है। इस वजह से अब दोनों आँखों के रेटिना पर ऐसे दो स्थानों पर बिम्ब बनते हैं जिनमें तालमेल नहीं है। और इसीलिए हम एक वस्तु के दो-दो बिम्ब देखते हैं।

वैसे तो दो-दो बिम्ब कई परिस्थितियों में दिखते हैं - आँखों, तंत्रिकाओं या मस्तिष्क की बीमारी, उनको चोट लगने से इत्यादि। लेकिन बिना आँख दबाए दो-दो बिम्ब दिखने लगें तो तुरन्त डॉक्टर के पास ज़रूर जाएँ।


इस जवाब को विनता विश्वनाथन ने तैयार किया है।
विनता विश्वनाथन: ‘संदर्भ’ पत्रिका से सम्बद्ध हैं।