दीपक गोविंद मादीवाल

इस लेख में मैं क्यूमलस बादलों की जीवनी बयान करूँगा। बादलों के जन्म, विकास और मृत्यु की घटनाओं की चर्चा उन सूक्ष्म-भौतिक प्रक्रियाओं के सन्दर्भ में की गई है जो उनके पीछे काम करती हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि अगली बार जब आप नज़रें उठाकर कोई बादल देखेंगे तो आपके दिमाग की निगाहों के सामने मात्र ‘सफेद रूई के फाहे’ नहीं होंगे।

परिचय  
बादल उदात्त जीव होते हैं। वे नीले आसमान में पैदा होते हैं और ऊँचाई पर एक संक्षिप्त मगर गहमागहमी से भरे जीवन के बाद मिट्टी से सनी धरती पर लौट आते हैं। किसी भी समय खुले आसमान में मण्डराते बादलों की अद्भुत विविधता देखी जा सकती है - छोटे मज़बूत बादल, ऊँचे मीनार जैसे बादल, छरहरे बादल, चपटे बादल वगैरह। बादलों के विविध रूपों और मिज़ाजों का लुत्फ उठाते हुए एक घटकवादी (रिडक्शनिस्ट) दृष्टि से उनका कृत्रिम वर्गीकरण बहुत थकाऊ होता है और ज़्यादा काम का नहीं होता। वे कहाँ से आते हैं? वे बढ़ते कैसे हैं? वे नष्ट क्यों हो जाते हैं? जब   प्रागैतिहासिक   शिकारी-संग्रहकर्ताओं ने आसमान की ओर देखा होगा तो ऐसे सवाल उनके मन में भी आए होंगे। जवाब पाने के लिए हमें बादल की पूरी जीवन यात्रा - जन्म से मृत्यु तक - का हमसफर बनना होगा।

पृथ्वी पर जीवन और सभ्यताओं के लिए बादलों के महत्व का बखान करने की ज़रूरत नहीं है। एक ऐसी धरती की कल्पना कीजिए जहाँ बादल नहीं बनते और इस कारण से उसका पानी समन्दरों, सागरों और झीलों में सुस्ताता रहता है। बादलों द्वारा निर्धारित समय पर बरसाए जाने वाले मीठे पानी के अभाव में हमारी सभ्यता किस कदर बाधित हो जाएगी। ऐसे में हम क्या भोजन उगाएँगे और कहाँ उगाएँगे? पृथ्वी का बड़ा हिस्सा सूखा रेगिस्तान बन जाएगा। एक बार जो झीलें, तालाब और भूजल सूख गए, वे कभी बहाल नहीं होंगे। पृथ्वी पूरी तरह सूरज के लिए खुल जाएगी (आज पृथ्वी का 60 प्रतिशत हिस्सा बादलों की ओट में रहता है) जिसके चलते तापमान में परिवर्तन होगा। हम सिर्फ अटकल लगा सकते हैं कि ऐसी कठिन परिस्थिति में किस तरह का जीवन पनपेगा।

तो, बादल ज़रूरी हैं। किन्तु जब मेघ जमकर बरसते हैं या बहुत कम या अनचाहे समय पर बरसते हैं तो आपदाएँ आती हैं। बहुत कम बारिश हो तो सूखा पड़ता है, बहुत अधिक बारिश हो जाए तो बाढ़ आ जाती है। उत्तराखण्ड की 2013 की बादल फटने की घटना याद कीजिए या हाल ही में केरल और कोडागु की बाढ़ को याद कीजिए जिसने जान-माल का भारी नुकसान किया था। और जब बादल रूठकर बरसने को बिलकुल तैयार नहीं होते तो आजकल वैज्ञानिक उन्हें मनाने की कोशिश करते हैं।

बादलों के व्यापक महत्व को देखते हुए लाज़मी है कि हम यह जानें कि उनका कामकाज कैसे चलता है। मैं आपको इस मुगालते में नहीं रखूँगा कि बादलों से सम्बन्धित सारे वैज्ञानिक सवालों के जवाब मिल चुके हैं। बात दरअसल उल्टी है - बादलों को लेकर ऐसी कई गुत्थियाँ हैं जिन्हें या तो नहीं समझा जा सका है या कमज़ोर ढंग से ही समझा जा सका है। अलबत्ता, इस बात का मोटा-मोटा खाका उभर चुका है कि बादल कैसे बनते हैं, कैसे बढ़ते हैं और बरसते हैं। यह लेख इन्हीं के बारे में है।

मैं इस लेख में समस्त किस्म के बादलों की चर्चा तो नहीं कर सकता। यदि मुझे चुनना हो कि जंगल में से किसी एक जानवर का विवरण दूँ, तो मैं जंगल के राजा शेर को चुनूँगा। मगर साथ ही पाठकों को यह जता दूँगा कि शेर को जानने का मतलब यह नहीं है कि आप सारे विविध जानवरों को जान गए हैं। उसी प्रकार से मैं बादलों के राजा क्यूमलस को चुनूँगा और यह लेख उसी को समर्पित करूँगा। उम्मीद करता हूँ कि मैं आपकी जिज्ञासा को इतना कुरेद दूँगा कि आप स्वयं अन्य बादलों के बारे में पढ़ना चाहेंगे। शेष आलेख में बादल का अर्थ क्यूमलस बादल ही रहेगा। अन्यथा मैं स्पष्ट कर दूँगा। यह बता देना मुनासिब है कि क्यूमलस वास्तव में बादलों के एक परिवार का नाम है और इसे आगे उप-समूहों में बाँटा गया है किन्तु इस लेख में हमें ऐसे नामकरण और वर्गीकरण में कोई दिलचस्पी नहीं है। यह लेख तो बादलों की आन्तरिक कार्य प्रणाली पर केन्द्रित है।

बादल का जन्म 
जन्म का मतलब एक पहचान, एक लेबल हासिल करने से ज़्यादा कुछ नहीं होता। जब भी पानी की असंख्य नन्ही बूंदें आसमान में गुच्छित हो जाती हैं, सघनता से पैक होकर (किन्तु एक-दूसरे को स्पर्श नहीं करतीं और न ही एक-दूसरे में विलीन हो जाती हैं) एक बड़ा पहचानने योग्य पिण्ड बना लेती हैं, तो समझो बादल का जन्म हो गया। इस हिसाब से हरेक बादल पानी की सूक्ष्म बूंदों का समूह है (चित्र-2) जैसे मानव शरीर कोशिकाओं का समूह है। यदि आप पूछेंगे कि बादल कहलाने के लिए समूह में कितनी बूंदें होना चाहिए, तो मैं नहीं बता सकूँगा; यह लगभग वैसा ही है जैसे कि आप पूछें कि भ्रूण में कितनी कोशिकाएँ होने पर उसे मनुष्य माना जाएगा।

कोई नवजात बादल 10 माइक्रोमीटर (μm) आकार की बूंदों से बना होता है। यह आपके बाल की मोटाई के दसवें भाग से भी कम है। धरती से देखते हुए बादल शायद आपको बहुत सघनता से पैक किया हुआ लगे मगर यदि आप सिकुड़कर एक नन्ही बूंद के बराबर हो जाएँ और बादल के अन्दर विचरण करें तो वही बादल आपको भीड़भाड़ वाला शहर नहीं बल्कि छितरी बस्ती वाला कोई गाँव लगेगा। बादल की बूंदों के बीच औसत फासला 1 मि.मी. या उससे भी ज़्यादा हो सकता है, जो स्वयं बूंदों की साइज़ से 100 गुना ज़्यादा है। उनकी नज़र से देखें तो बादल खानाबदोश बूंदों का एक विशाल, ढीले-ढाले ढंग से बँधा हुआ समूह है। आकाश के विशाल मैदान में ये बूंदें अनियमित हवाओं के प्रभाव से यहाँ-वहाँ भटकती रहती हैं।

आश्चर्य की बात तो यही है कि बादल की बूंदें बनती कैसे हैं और वह भी पृथ्वी से इतनी ऊँचाई पर। दूसरे शब्दों में, बादल पैदा कैसे होता है? पानी तरल के अलावा वाष्प (गैसीय) अवस्था में भी रह सकता है। प्रकृति ने यह निर्धारित किया है कि किसी भी तापमान (यानी उस हवा का तापमान जिसकी वह वाष्प एक हिस्सा है) पर प्रति इकाई आयतन में जल वाष्प की एक अधिकतम मात्रा रहेगी, उससे अधिक नहीं। नियम यह है कि तापमान जितना अधिक होगा, प्रति इकाई आयतन वाष्प की यह अधिकतम मात्रा उतनी ही अधिक होगी। 20 डिग्री सेल्सियस पर यह अधिकतम मात्रा प्रति घन मीटर में 15 ग्राम जल वाष्प की है जबकि 0 डिग्री सेल्सियस पर एक घन मीटर में लगभग 5 ग्राम जल वाष्प रह सकती है। यदि हवा में जल वाष्प की मात्रा इस सीमा से अधिक हो जाए तो जितनी जल वाष्प अतिरिक्त है वह संघनित होकर तरल रूप में बदल जाएगी। यदि हवा में जल वाष्प की मात्रा (उस तापमान पर) अधिकतम सीमा के एकदम बराबर हो तो कहा जाता है कि हवा ‘संतृप्त’ है। इस बात को समझने के लिए एक गिलास का उदाहरण लीजिए। आप गिलास को सिर्फ उसकी किनोर तक ही भर सकते हैं, ज़्यादा भरेंगे तो अतिरिक्त पानी बह जाएगा। गिलास की ऊँचाई को तापमान के तुल्य माना जा सकता है और उसमें भरा जा रहा तरल जल वाष्प का द्योतक है। किनोर तक भरा गिलास संतृप्त हवा का द्योतक है।

इसके अलावा, हवा में जल वाष्प की मात्रा अधिकतम सीमा से अधिक या कम होने पर हवा को क्रमश: ‘अति-संतृप्त’ या ‘अल्प-संतृप्त’ कहा जाता है। अति-संतृप्त हवा सदैव प्रयास करती है कि अपनी अतिरिक्त वाष्प को त्याग दे (अतिरिक्त वाष्प को तरल में बदलकर) और वापिस संतृप्त स्थिति में आ जाए। दूसरी ओर, अल्प-संतृप्त हवा की कोशिश रहती है कि (अपने सम्पर्क में आए किसी भी तरल पानी को वाष्पीकृत करके) स्वयं को वाष्प से भर ले। अल्प-संतृप्त हवा किसी आंशिक रूप से भरे गिलास जैसी है; बदकिस्मती से अति-संतृप्त हवा के लिए ऐसी कोई सरल उपमा उपलब्ध नहीं है।

सूर्य से पृथ्वी पर पहुँचने वाले आधे से ज़्यादा विकिरण को वायुमण्डल की विभिन्न वस्तुओं (जैसे धूल के कण, बादल, हवा के अणु) तथा धरती द्वारा परावर्तित कर दिया जाता है या छितरा दिया जाता है। आपतित सौर विकिरण का एक छोटा-सा अंश धरती सोख लेती है। (इससे भी छोटा अंश वायुमण्डलीय हवा द्वारा सोखा जाता है।) इसकी वजह से धरती गर्म होने लगती है, जो फिर अपने सम्पर्क में आई हवा को गर्म करती है। गर्म हवा आकाश की ओर उठने लगती है। उठती हुई हवा शुरुआत में अल्प-संतृप्त होती है (आधे भरे गिलास के बारे में सोचिए)। चूँकि ऊँचाई के साथ तापमान घटता है (प्रति किलोमीटर लगभग 7 डिग्री सेल्सियस), इसलिए ऊपर उठती हवा लगातार ठण्डी होती जाती है (यह लगभग वैसा ही है जैसे पानी तो उतना ही मगर गिलास की ऊँचाई कम होती जा रही है)। एक ऊँचाई पर पहुँचकर (पृथ्वी से करीब 2 कि.मी. ऊपर) उठती हवा का तापमान इतना कम हो जाता है कि वह अति-संतृप्त हो जाती है और जल वाष्प संघनित होने लगती है (जैसे गिलास की ऊँचाई घटकर तरल की सतह से नीचे आ जाए, जिसकी वजह से अतिरिक्त पानी को छलकना पड़े)। इस ऊँचाई पर बादल का आधार स्थित होता है।

अलबत्ता,  अति-संतृप्त  हवा  में उपस्थित अतिरिक्त जल वाष्प को संघनित होने के लिए किसी सतह की आवश्यकता होती है। हवा में सदा उपस्थित धूल के कण यह सतह उपलब्ध कराते हैं। लिहाज़ा, पानी की बूंदें इन्हीं धूल के कणों पर बनती हैं। धूल के कणों की अनुपस्थिति में भी यह असम्भव नहीं है कि बड़ी संख्या में जल वाष्प की बूंदें संयोगवश (बेतरतीब टक्करों के चलते) आपस में चिपक जाएँ और दृश्य बूंदें बना लें। मगर इस घटना के एक यथार्थवादी समयावधि में घटित होने के लिए ज़रूरी होगा कि अत्यधिक अति-संतृप्तता मौजूद हो जो बादलों में नहीं पाई जाती। इसलिए बूंद निर्माण की यह क्रियाविधि खारिज हो जाती है। इसके अलावा, हवा में धूल के जितने अधिक कण उपस्थित होते हैं, बूंदें भी उतनी ही अधिक बनती हैं। समन्दर के ऊपर की धूलरहित हवा में बनने वाले बादल में प्रति घन से.मी. चन्द सैकड़ा पानी की बूंदें हो सकती हैं जबकि किसी औद्योगिक क्षेत्र के ऊपर की प्रदूषित हवा में प्रति घन से.मी. कई हज़ार बूंदें पाई जा सकती हैं। यह गौरतलब है कि चूँकि अति-संतृप्त हवा में से मात्र अतिरिक्त जल वाष्प ही संघनित हो सकती है, इसलिए जब धूल कणों की संख्या ज़्यादा होती है और ज़्यादा बूंदें बनती हैं तो संघनित पदार्थ उनके बीच ज़्यादा विरलता से बँटता है और इसलिए बूंदों की औसत साइज़ कम होती है।

एक  विचलन:  जल  वाष्प  की अधिकतम सीमा क्यों? 
पिछले खण्ड में जल वाष्प की अधिकतम सीमा की बात कही गई थी। वह थोड़ी रहस्यमय लगती है। ऐसी कोई अधिकतम सीमा होनी ही क्यों चाहिए? इकाई आयतन हवा में जल वाष्प की असीमित मात्रा क्यों नहीं रह सकती? यदि आप सोच रहे हैं कि हवा किसी प्रकार का स्पंज है जो एक निश्चित मात्रा में ही जल वाष्प को सोख सकता है तो पहले ही बता दूँ कि यह उपमा दोषपूर्ण है। जल वाष्प की अधिकतम सीमा तो तब भी होती है जब हवा नहीं होती (यहाँ हवा से तात्पर्य जल वाष्प को छोड़कर ऑक्सीजन, नाइट्रोजन व अन्य गैसों के मिश्रण से है)। अधिकतम सीमा का ओर-छोर समझने के लिए हमें आणविक स्तर पर उतरना होगा।

पदार्थ की तीन अवस्थाओं के बीच अन्तर सिर्फ उनके अणुओं की गतिशीलता का है। बर्फ, पानी और वाष्प -- तीनों में इस मायने में वही पानी का अणु पाया जाता है (अणु  सूत्र  H2O,  जो  दो हाइड्रोजन  परमाणुओं  को ऑक्सीजन के एक परमाणु से जोड़कर बनता है) कि यदि आप तरल पानी के एक अणु और जल वाष्प के एक अणु की अदला-बदली कर दें तो कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अलबत्ता, तरल अवस्था में H2O अणु आपस में ज़्यादा कसकर बँधे होते हैं और इसलिए वे वाष्प के H2O अणुओं की अपेक्षा कम गतिशील होते हैं; वाष्प के अणु तो एक-दूसरे से बेखबर फर्राटा मारते रहते हैं (सिवाय उस समय जब वे आपस में टकराते हैं)। ठोस बर्फ में H2O अणु पूरी तरह जड़ होते हैं।

अब पानी की एक तरल राशि की कल्पना कीजिए जो जल वाष्प के सम्पर्क में है (सरलता के लिए मान लीजिए कि वहाँ कोई और गैस नहीं है)। तरल पानी और वाष्प लगातार एक-दूसरे के साथ H2O अणुओं का आदान-प्रदान कर रहे हैं (चित्र-3)। एक ओर तो, संयोगवश वाष्प का कोई H2O अणु तरल की सतह से टकरा जाता है और वहाँ कैद हो जाता है और तरल पानी का हिस्सा बन जाता है। दूसरी ओर, कोई H2O अणु तरल पानी से मुक्त होकर वाष्प में चला जाता है (ऊष्मीय हलचल के कारण) और उसी का हिस्सा बन जाता है। एक सेकण्ड की छोटी-सी अवधि में भी असंख्य H2O अणु दोनों दिशाओं में आते-जाते रहते हैं, तरल और वाष्प को पृथक करने वाली सरहद को पार करते रहते हैं। यदि एक इकाई समय में तरल में से जितने अणु निकलते हैं, उससे ज़्यादा प्रवेश करते हैं, तो तरल पानी का द्रव्यमान बढ़ता है। इससे विपरीत परिस्थिति (जब तरल को छोड़ने वाले अणु प्रवेश करने वाले अणुओं से ज़्यादा हों) में तरल पानी का द्रव्यमान कम होने लगता है। यदि प्रति इकाई समय में निकलने वाले और प्रवेश करने वाले अणुओं की संख्या बराबर हो तो तरल पानी का द्रव्यमान स्थिर रहेगा। ऐसी स्थिति में कहा जाता है कि तरल और उसकी वाष्प साम्यावस्था में हैं।

तरल में अणुओं के निकलने और प्रवेश की रफ्तार कौन तय करता है? चलिए किसी ऐसे H2O अणु पर ध्यान देते हैं जो तरल की सतह का हिस्सा है। वाष्प अवस्था में छलांग लगाने के लिए इसे अपने पड़ोसियों के साथ रासायनिक बन्धन तोड़ना होगा, जिसके लिए ऊर्जा की ज़रूरत होती है। ऊँचे तापमान का मतलब होता है अणुओं की ज़्यादा तेज़ गति। जब तापमान बढ़ता है तो H2O अणुओं की औसत गतिज ऊर्जा तो बढ़ती ही है, साथ ही किसी भी क्षण अणुओं में (औसत की तुलना में) बहुत अलग-अलग मात्रा में गतिज ऊर्जा होती है। किस्मत से जिन अणुओं के पास इतनी गतिज ऊर्जा होती है कि वे अपने पड़ोसियों से बन्धनों को तोड़ सकें, वे तरल पानी से पलायन कर जाते हैं। लिहाज़ा, तरल पानी से पलायन करने वाले अणुओं की संख्या तापमान के साथ बढ़ती है।

आइए, अब वाष्प क्षेत्र के किसी अणु को देखते हैं। इस मुक्त विचरते आवारा अणु के पास तोड़ने को कोई बन्धन नहीं हैं। वाष्प के H2O अणु की तरल सतह से टकराने की दर वाष्प में H2O अणुओं की सान्द्रता बढ़ने पर बढ़ती है। ऐसा इसलिए कि वाष्प प्रावस्था में H2O अणुओं की सान्द्रता जितनी अधिक होगी संयोगवश (प्रति इकाई समय में) तरल सतह से उतने ही ज़्यादा अणु टकराएँगे। निष्कर्ष यह है कि तरल पानी में प्रवेश करने वाले अणुओं की संख्या वाष्प में H2O अणुओं की सान्द्रता के साथ बढ़ती है।

अब आप स्वयं निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि क्यों जल वाष्प की मात्रा की एक अधिकतम सीमा है। ऐसे तरल पानी पर विचार कीजिए जो अपनी वाष्प के साथ साम्यावस्था में है। अर्थात् तरल में से जितने अणु पलायन करते हैं उतने ही अणु प्रवेश कर जाते हैं। अब यदि आप किसी तरह से वाष्प में और H2O अणु इंजेक्ट कर दें (जिसके चलते  अति-संतृप्तता  उत्पन्न  हो जाएगी), तो तरल सतह से टकराने वाले वाष्प के अणुओं की संख्या बढ़ जाएगी; लेकिन तरल से पलायन करने वाले अणुओं की संख्या पूर्ववत ही रहेगी (क्योंकि तापमान नहीं बदला है)। लिहाज़ा, तरल का द्रव्यमान बढ़ने लगेगा। इसी को हम वाष्प का संघनन कहते हैं। संघनन तब तक जारी रहता है जब तक कि वाष्प में H2O अणुओं की सान्द्रता वापिस साम्यावस्था मान पर नहीं पहुँच जाती। यह अधिकतम सीमा की व्याख्या कर देता है।

आप  और  आगे  जाकर  अन्य परिस्थितियों की व्याख्या भी कर सकते हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप तरल का तापमान बढ़ा दें, तो इसमें से पलायन करने वाले अणुओं की संख्या बढ़ जाएगी, जिसकी वजह से तरल का द्रव्यमान कम हो जाएगा; इस प्रक्रिया को हम तरल का वाष्पीकरण कहते हैं। क्या यह वाष्पन किसी बिन्दु पर रुक जाएगा या तब तक चलता रहेगा जब तक कि सारा तरल समाप्त न हो जाए, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या ऐसा कोई तरीका मौजूद है जिससे तरल से पलायन करने वाले H2O अणुओं को वाष्प अवस्था में बनाए रखा जा सके। किसी बन्द बर्तन में तो पलायन करने वाले H2O अणु बर्तन में बने रहते हैं। इस परिस्थिति में तरल के वाष्पीकरण के साथ वाष्प में H2O अणुओं की सान्द्रता बढ़ती जाती है। सान्द्रता बढ़ने पर H2O अणुओं के तरल सतह से टकराने की दर भी बढ़ती जाएगी। वाष्पन तब रुक जाएगा जब तरल को छोड़ने वाले और उसमें प्रवेश करने वाले H2O अणुओं की संख्या फिर से सन्तुलित हो जाएगी। इसी प्रकार से आप यह भी देख सकते हैं कि तरल का तापमान कम करने के परिणामस्वरूप वाष्प का संघनन होता है।

बचपन और जवानी 
धूप से तप रही धरती से नम हवा के ऊपर उठने से बादल का जन्म होता है। जब ऊपर उठती हवा के पार्सल में धरती से एक ऊँचाई पर पहुँचने के बाद बूंदें बनने लगती हैं, तब नवजात बादल तत्काल वृद्धि के एक ओजस्वी चक्र में प्रवेश कर जाता है। कारण है, जल वाष्प के संघनन के दौरान मुक्त ऊष्मा। यह ऊष्मा नम हवा के पार्सल को गर्म कर देती है जिसकी वजह से उछाल पैदा हो जाता है जो हवा को ऊपर उठने को मजबूर करता है। जब यह हवा का पार्सल ऊपर उठता है तो ठण्डा होता है, जिसकी वजह से ज़्यादा संघनन होता है तथा और ऊष्मा मुक्त होती है, जो नम हवा के पार्सल को और गर्म कर देती है, और ऊपर उठाती है...यह स्व-चालित  चक्र  जारी  रहता  है। अलबत्ता, जोशीली जवानी की यह वृद्धि सदा के लिए जारी नहीं रह सकती। हो सकता है कि अन्तत: ऊपर उठती नम हवा के इस पार्सल में जल वाष्प चुक जाए और उसमें पानी की बूंदें बनाने की क्षमता खत्म हो जाए। ऐसा तब होगा जब यह नम हवा आसपास की सूखी हवा से मिलेगी जो उसमें वाष्प की सान्द्रता को कम कर देगी। यह भी हो सकता है कि बढ़ते बादल का गर्वीला सिर ऊपरी वायुमण्डल की एक अदृश्य छत से टकरा जाए, जिसे ‘समतापमण्डल’  (ट्रोपोपॉज़) नाम सही ही दिया गया है। इसके ऊपर स्ट्रेटोस्फीयर आता है जहाँ तापमान ऊँचाई के साथ घटने की बजाय बढ़ने लगता है। इस वजह से बादल इस परत को भेद नहीं सकता और लम्बवत बढ़ने की बजाय आजू-बाजू फैलने लगता है (इसमें इस ऊँचाई पर चलने वाली हवाएँ भी मददगार होती हैं)। अत: बादल 1-2 कि.मी. कद के बौने भी हो सकते हैं और 12-13 कि.मी. ऊँचे भी। न सिर्फ ज़्यादा-से-ज़्यादा पानी की बूंदें (बादल के नागरिक) बनकर बादल की वृद्धि होती है बल्कि साथ-साथ बूंदें बड़ी भी होने लगती हैं। शुरू-शुरू में ये बूंदें आसपास की हवा से जल वाष्प पी-पीकर बड़ी होती हैं। यह तभी सम्भव है जब आसपास की हवा अति-संतृप्त हो। यदि आसपास की हवा अल्प-संतृप्त हुई तो बढ़ने की बजाय ये बूंदें वाष्पन के कारण छोटी होने लगेंगी। यह तो पक्की बात है कि प्रकृति में कुछ भी बरबाद नहीं होता। जहाँ बढ़ती हुई बूंदें आसपास की हवा से जल वाष्प सोखती हैं, वहीं जो बूंदें छोटी होती जाती हैं वे हवा में जल वाष्प की मात्रा में इज़ाफा करती हैं जो अन्तत: बादल में किसी अन्य बूंद का पोषण करेगी।

अपने जीवन काल में बूंदें हवा के पार्सल में सुरक्षित पड़ी नहीं रहतीं बल्कि उग्र हवाओं के द्वारा यहाँ-वहाँ फेंकी जाती हैं। इसके चलते सारी बूंदें हवा की अलग-अलग परिस्थितियों - अति-संतृप्त भी और अल्प-संतृप्त भी - का सामना करती हैं। यदि बादल की बूंद बोल सकती, तो वह अपने जीवन की कथा इन शब्दों में व्यक्त करती, “जब मेरा जन्म हुआ था, तब मैं ठीक-ठाक वृद्धि कर रही थी, किन्तु अगले ही पल मैं हवा के एक ऐसे पार्सल में फेंक दी गई कि मैं सिकुड़ने लगी। जैसे ही मुझे पूर्ण लोप का भय सताने लगा, मुझे संयोग से हवा के किसी अन्य पार्सल में फेंक दिया गया, जहाँ खुशकिस्मती से मैं फिर से वृद्धि कर सकती थी, मगर फिर से...मैं हवा के ऐसे पार्सल्स में रही हूँ जहाँ पहले से ही बूंदों की अच्छी-खासी आबादी थी जिसका मतलब था कि खाने वाले ढेर सारे मुँह थे। इसलिए मुझे अपने लिए पर्याप्त जल वाष्प नहीं मिल पाई। दूसरी ओर, मैं ऐसे अलग-थलग पार्सल्स में भी रही हूँ जहाँ की सारी जल वाष्प मात्र मेरे लिए थी...मैं अपनी उथल-पुथल भरी यात्रा में अन्य बूंदों से मिली जो इतनी खुशकिस्मत नहीं थीं कि मेरे बराबर आयु प्राप्त कर पाएँ...।” चाहे सारी बूंदें शुरुआत में एक जैसी बनें मगर हुड़दंगी हवाओं से निर्धारित उनकी नियति उन्हें अलग-अलग ढंग से विकसित होने को मजबूर करती है। इस वजह से कुछ समय बाद (शायद कुछ मिनट बाद) जीवित बची बूंदें विविध आकारों की हो जाएँगी। हमारे समान वे भी अपने निजी इतिहास की उत्पाद होती हैं।

जल वाष्प के संघनन की मदद से वृद्धि करने में बूंदों को बचपन में तो मदद मिलती है किन्तु उसके बाद नहीं। संघनन के ज़रिए किसी बूंद की वृद्धि  की  दर  उसकी  साइज़  के व्युत्क्रमानुपाती (इंवर्सली रिलेट्ड) है। इसलिए बूंद जितनी बड़ी होगी, उसकी वृद्धि दर उतनी ही धीमी होगी। दरअसल, यह रफ्तार इतनी धीमी हो जाती है कि 40 माइक्रोमीटर साइज़ की बूंद की संघनन-जनित वृद्धि लगभग शून्य होती है। इसके बाद कोई युवा बादल तेज़ वृद्धि के लिए एक अन्य तरीके पर निर्भर रहता है। वह तरीका है टक्कर और संलयन का। बादल की बूंदें आपस में टकराती हैं और एक हो जाती हैं जिससे बड़ी साइज़ की बूंद का निर्माण होता है। संघनन-आधारित वृद्धि के समान ही, अशान्त हवाएँ बूंदों की टक्करों को भी संचालित करती हैं। वे उन्हें यहाँ-वहाँ धकेलती हैं जिसके चलते वे संयोगवश आपस में टकराती हैं। संघनन आधारित वृद्धि के शुरुआती चरण में बादल की बूंदें छोटी होती हैं और साइज़ में लगभग बराबर होती हैं, इसलिए (उथल-पुथल के बावजूद) उनके आपस में टकराने की सम्भावना बहुत कम होती है। हमने देखा कि संघनन जनित वृद्धि की वजह से अलग-अलग साइज़ (40 माइक्रोमीटर तक) की बूंदें बन जाती हैं। बूंदों के बीच यह गैर-बराबरी उनके बीच टकराव का मंच तैयार करती है क्योंकि अशान्त हवाओं के धक्के से वे अलग-अलग ढंग से गति करती हैं। उदाहरण के लिए, यदि बूंदों को एक घूर्णन करते पार्सल द्वारा बाहर फेंका जाता है, तो उनकी गतियों में अन्तर (जो उनकी साइज़ में अन्तर के चलते होता है) की वजह से बूंदें टकरा सकती हैं। टक्कर और संलयन की वजह से होने वाली वृद्धि बहुत तेज़ी-से होती है और तब तक जारी रह सकती है जब तक कि बादल में उपस्थित काफी सारी बूंदें 60-80 माइक्रोमीटर की न हो जाएँ। इस चरण तक बूंदों के बीच की गैर-बराबरी चरम पर होती है।

अब छोटी-छोटी बूंदों की एक बिरादरी होती है जिनकी साइज़ 20-30 माइक्रोमीटर के आसपास होती है। एक दूसरी बड़ी बिरादरी होती है जिनकी साइज़ 60-80 माइक्रोमीटर के आसपास होती है। ये बूंदें अलग-अलग क्षेत्रों में नहीं एक-दूसरे के बीच बिखरी होती हैं। यदि बूंदों की जनगणना की जाए और हरेक साइज़ की बूंदों की संख्या को कागज़ पर चित्र रूप में प्रस्तुत किया जाए तो चित्र दो कूबड़ वाला होगा (चित्र-4)। अलबत्ता, मैं यहाँ जोड़ना चाहूँगा कि वृद्धि का यह सरल चित्र विवादास्पद है।

एक और विचलन: अशान्त हवाएँ
बादल की बूंदों की पालनहार (sire) अशान्त हवाओं (Trubulent Winds) की बात न करना मेरी भूल होगी। न सिर्फ हवाएँ बल्कि विश्व के कई अन्य प्रवाह अशान्त (उबड़-खाबड़) होते हैं - नदियों और समन्दरों का प्रवाह, हमारी साँसें, इंजन के अन्दर चलने वाले प्रवाह, सूर्य के अन्दर संवहन वगैरह। सारे उबड़-खाबड़ प्रवाहों में एक बात समान होती है - उनकी अव्यवस्थित गति। मगर यह एक सवाल को जन्म देती है: व्यवस्थित गति किसे माना जाए? क्या सरल रेखा, वृत्त, दीर्घवृत्त और ऐसे आदर्श (प्लेटोनिक) पैटर्न पर होने वाली गति व्यवस्थित गति है? प्रकृति आदर्श पैटर्न की या ऐसी किसी भी चीज़ की रत्ती भर परवाह नहीं करती। प्रकृति को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई चीज़ मनुष्य को भाती है। तो उबड़-खाबड़ गति को अव्यवस्थित गति मानना सहज बुद्धि पर तो टिका है किन्तु हम इस पर भरोसा नहीं करेंगे।

उबड़-खाबड़ प्रवाह का ज़्यादा सन्तोषजनक एहसास ‘सम्मिश्रण’ के लिहाज़ से सोचने पर मिल सकता है।   मान लीजिए आप एक कटोरे में पानी लेते हैं और धीरे-से उस पर थोड़ा-सा गर्म तेल डाल देते हैं। अविलेय होने के कारण गर्म तेल ठण्डे पानी के ऊपर तैरता रहता है। यदि आप थोड़ा सब्र रखेंगे तो तेल और पानी का तापमान बराबर हो जाएगा। किन्तु अनुभव बताता है कि यदि आप जमकर हिलाएँ तो तापमान जल्दी बराबर होता है। मिश्रण की प्रक्रिया (इस मामले में हिलाकर मिलाने की प्रक्रिया) करती क्या है?

अविडोलित कटोरे में गर्म तेल से ठण्डे पानी की ओर ऊष्मा चालन विधि से बहती है। ठीक उसी प्रकार जैसे चाय में डूबे एक चम्मच के सिरे से ऊष्मा आपकी उंगली तक बहती है। इसके अलावा, यहाँ ऊष्मा को उसी क्षेत्र से बहना होता है जहाँ तेल और पानी सम्पर्क में हैं। यह क्षेत्र स्थिर रहता है। हिलाने से तेल और पानी के सम्पर्क का यह क्षेत्र बढ़ जाता है क्योंकि वे एक-दूसरे के बीच फैल जाते हैं। इस तरह से चालन के ज़रिए उनके बीच ज़्यादा ऊष्मा का प्रवाह हो सकता है। यह बात तापमान के जल्दी बराबर  होने  में  नज़र  आती  है। सामान्यत: हिलाकर मिलाने से भिन्न भौतिक गुणधर्मों के तरल पार्सल सम्पर्क में आते हैं जिससे उनके बीच आदान-प्रदान (जिस भी चीज़ का आदान-प्रदान हो सकता है) तेज़ हो जाता है।

इस तरह सम्पर्क में लाए तरल पार्सल्स के बीच किस चीज़ का आदान-प्रदान हो सकता है? जवाब है - ऊष्मा, पदार्थ और संवेग। यदि उक्त तरल पार्सल्स के बीच तापमान का अन्तर है तो उनके बीच ऊष्मा बहती है (अधिक तापमान से कम तापमान की ओर)। यदि उनके बीच किसी रासायनिक पदार्थ (जैसे जल वाष्प) की सान्द्रता का अन्तर है तो पदार्थ उनके बीच बहता है (अधिक से कम सान्द्रता की ओर)। यही बात संवेग पर भी लागू होती है। संवेग एक सदिश राशि है जिसके चलते उसका विवरण इस लेख के लिहाज़ से थोड़ा ज़्यादा जटिल है। विडोलन के अलावा कौन-सी क्रिया तरलों के मिलने की गति को बढ़ा सकती है? ऐसा कोई भी बल यह प्रभाव पैदा कर सकता है जिसका परिमाण पर्याप्त हो और जो तरल पार्सल्स पर क्रिया करे: घनत्व में अन्तर की वजह से उत्प्लावन (अगरबत्ती के धुएँ के बारे में विचार कीजिए), यांत्रिक रूप से आरोपित दबाव (जैसे पम्प इस्तेमाल करना), विद्युत-चुम्बकीय बल (जो सूर्य के वायुमण्डल में प्रमुख है) वगैरह।

आप ‘उबड़-खाबड़’ प्रवाह को तरलों के तेज़ी-से मिश्रित होने की क्रिया (उसका कारण चाहे जो भी हो) का नाम दे सकते हैं। मिश्रित होने की जिन क्रियाओं में उग्र मिश्रण के दर्शन नहीं होते (चाहे वे कितनी भी जटिल क्यों न हों) उन्हें सपाट (लैमिनर) प्रवाह कहते हैं। प्रकृति में सपाट प्रवाह अपवाद हैं जबकि उबड़-खाबड़ प्रवाह ही सामान्य हैं। तो यदि कोई प्रवाह जटिल दिखे तो सम्भवत: वह उबड़-खाबड़ है। बादलों में घनत्व में अन्तरों (जो तापमान और जल वाष्प की सान्द्रता में अन्तरों से पैदा होते हैं) की वजह  से  उत्पन्न  उत्प्लावन  बल अशान्ति का प्रमुख कारण होता है। मान लीजिए आप एक बादल को चलते-चलते फ्रीज़ कर दें और एक सुग्राही तापमापी की मदद से बादल के अन्दर एक सरल रेखा पर तापमान नापें। आप देखेंगे कि उस सरल रेखा पर तापमान में भारी अन्तर होंगे जो इस बात का प्रमाण है कि विभिन्न तापमान के हवा के पार्सलों को अशान्त हवाएँ एक-दूसरे में मिला रही हैं। दूसरे शब्दों में, उस सरल रेखा पर तापमान का ग्राफ एक ज़िगज़ैग होगा (चित्र-5)। अत्यन्त अशान्त बादल में यह ज़िगज़ैग-पन 1 से.मी. जैसी कम दूरी पर भी नज़र आएगा। बादल किस कदर मिश्रित होगा! और बात सिर्फ तापमान की नहीं है; पूरे बादल के अन्दर जल वाष्प की सान्द्रता तथा कई अन्य चीज़ें भी ऐसा ही ज़िगज़ैग पैटर्न प्रस्तुत करेंगी। यही स्थिति तब भी सामने आएगी जब आप बादल के अन्दर किसी एक बिन्दु पर अलग-अलग समय पर तापमान नापेंगे। तापमान का ग्राफ ज़िगज़ैग होगा और 10-10 सेकण्ड जैसे छोटे-छोटे अन्तराल पर भी ऊपर-नीचे होता रहेगा। अब ऐसे अस्त-व्यस्त माहौल में किसी एक बूंद के बारे में सोचिए।

जब यह बूंद अशान्त हवाओं के द्वारा एक सरल रेखा पर धकेली जाती है तो यह थोड़ी-सी दूरी की यात्रा में भी अलग-अलग परिस्थिति का सामना करती है। यदि वह बूंद एक ही स्थान पर टिकी रहे (जो हो नहीं सकता) तो भी वह थोड़े-से समय में भी विविध परिस्थितियों का सामना करने से बच नहीं सकती। सार यह है कि बूंदें अपने जीवन काल में जल वाष्प की सान्द्रता और तापमान की बदलती परिस्थितियों का सामना करने को अभिशप्त हैं। हम देख ही चुके हैं कि कैसे इसकी वजह से संघनन-जनित वृद्धि के प्रथम चरण में अलग-अलग साइज़ की बूंदें बनती हैं। साइज़ में यह विविधता टक्कर और संलयन से वृद्धि के अगले चरण के लिए अनिवार्य है।

इसके साथ ही अशान्ति के साथ हमारा संक्षिप्त परिचय पूरा हुआ। यह अपने आप में एक गहरा और आकर्षक विषय है। इसके बाद हम बादलों की वृद्धि के अन्तिम चरण में कदम रखते हैं जहाँ अशान्ति कोई प्रमुख भूमिका नहीं निभाती; ऐसा लगता है कि जैसे बादल अशान्त हवाओं की अवज्ञा करके अपने विकास का मार्ग स्वयं तय करता है। मैं इस खण्ड का समापन एक विचित्र बात के साथ करना चाहूँगा। बूंदें तरल पानी से बनी होती हैं जो हवा के मुकाबले हज़ारों गुना अधिक घना है, तो सवाल यह है कि ये बूंदें बनते ही धरती पर गिर क्यों नहीं जातीं? ऐसा कैसे होता है कि वे इतने लम्बे समय तक तैरती रहती हैं कि बादल बन पाता है और टिका रहता है? निसन्देह, पानी की बूंदें धरती की ओर गिरती हैं, किन्तु अत्यन्त धीमी गति से। 10 माइक्रोमीटर की बूंद हवा में फ़्1 मि.मी. प्रति सेकण्ड की गति से गिरती है। धरती तक पहुँचने के लिए उसे चंद कि.मी. की दूरी तय करना होगी जिसमें बहुत समय लगेगा। इस लम्बी यात्रा के दौरान उस गिरती बूंद के साथ कई बातें हो सकती हैं। हो सकता है कि वह वाष्पित होकर उड़ जाए क्योंकि बादल का निचला हिस्सा अल्प-संतृप्त होता है। या यह भी हो सकता है कि अशान्त हवाएँ उसे उछालकर वापिस बादल में पहुँचा दें।

बुढ़ापा और मृत्यु 
छोटी बूंदें तो इस मायने में लाचार होती हैं कि अशान्त हवाएँ उन्हें यहाँ-वहाँ फेंकती रहती हैं। मगर जैसे-जैसे बूंदें बड़ी होती जाती हैं, उनकी जड़ता अशान्त हवाओं की ताकत का प्रतिरोध करने लगती है। फ़्80 माइक्रोमीटर की मोटी-तगड़ी बूंदों को अशान्त हवाएँ लतिया नहीं सकतीं। अब ये बूंदें गुरुत्वाकर्षण के असर से पृथ्वी की ओर गिरने लगती हैं। गिरते-गिरते ये बड़ी-बड़ी बूंदें रास्ते में आने वाली अन्य बूंदों से टक्कर और संलयन के परिणामस्वरूप और बड़ी होती जाती हैं। इस प्रकार से, गिरती हुई बूंदें 1 मि.मी. या उससे भी बड़ी हो सकती हैं। जब ये बूंदें बड़ी संख्या में धरती से टकराती हैं तो लीजिए, बारिश हो गई। बड़ी बूंदों का नीचे बैठने का वेग कहीं अधिक होता है, इसलिए उन्हें धरती पर पहुँचने में कम समय लगता है। हाँ, इन बूंदों की शुरुआती साइज़ काफी बड़ी होनी चाहिए ताकि वे रास्ते में ही वाष्पित होकर गायब न हो जाएँ।

तो 10 माइक्रोमीटर से कम साइज़ से शुरू करके 1 मि.मी. से बड़ी साइज़ (यानी  मोटापे  में  सौ  गुना  वृद्धि) अख्तियार करने तक यह एक अद्भुत वृद्धि यात्रा थी। इसका यह भी मतलब है कि इस यात्रा में इनका आयतन दस लाख गुना बढ़ जाता है। बादलों के अवलोकन से यह भी उजागर होता है कि बादली-बूंदों के आकार में इतनी वृद्धि औसतन 30-40 मिनट में हो जाती है। यह किसी कक्षा के एक पीरियड के बराबर है। बहुत तेज़ है, नहीं? बारिश के रूप में बरसना किसी बादल का अगले जन्म में प्रवेश का संस्कार है।

बादल बरसकर गायब हो जाता है। बादल के बरसने के बाद जो चन्द बूंदें आसमान में रह जाती हैं, वे वाष्पित हो जाती हैं। इस तरह से बादल का निधन सम्पूर्ण हो जाता है। बारिश का पानी अब धरती के सीने पर बहता है और वाष्पित होकर एक और बादल बनता है। इस प्रकार, जीवन का पहिया घूमता रहता है: जो नीले आसमान में विराजमान था, उसे धरती की धूल चटा दी जाती है और एक बार फिर उसे शिखर पर पहुँचाया जाता है, और यह चक्र बार-बार दोहराया जाता है।

विविध मसले 
जैसा कि शुरू में कहा गया था, यह लेख क्यूमलस बादलों के बारे में है। ये बादल गर्म होती ज़मीन और जलराशियों से ऊपर उठती हवा में से पैदा होते हैं। बादलों के पैदा होने के कई अन्य तरीके भी हैं। उदाहरण के लिए, जब कोई बहती हवा किसी पर्वत से टकराती है तो उसे मजबूरन ऊपर उठना होता है। ऊपर उठते हुए वह ठण्डी होती है और उसमें उपस्थित जल वाष्प संघनित होने लगती है (ओरोग्राफिक बादल)। आप समझ ही गए होंगे कि मुख्य बात यह है कि किसी प्रकार से हवा इतनी ठण्डी हो जाए कि जल वाष्प संघनित होने लगे। यह परिणाम आम तौर पर हवा को विभिन्न तरीकों से ऊँचाई पर पहुँचाकर होता है। ऐसा एक अन्य तरीका है: जब गतिशील हवा के दो पिण्ड या उनकी सतहें (जिनमें से एक गर्म और दूसरी ठण्डी है) आपस में टकराती हैं तो उनमें से कम घनी गर्म हवा को भारी ठण्डी हवा के ऊपर उठना पड़ता है। इसकी वजह से वह हवा ठण्डी हो जाती है और पानी की बूंदें संघनित होने लगती हैं।

अलबत्ता, एक ऐसा तरीका भी है जिसमें हवा ऊपर उठे बगैर भी ठण्डी हो सकती है। रात के समय जब धरती के पास की हवा ठण्डी होती है, तो उसमें कोहरा बन सकता है। कोहरा वह दुर्लभ विनम्र बादल है जो ज़मीन पर पैदा होता है।
बादल सदैव तरल पानी की बूंदों से नहीं बने होते। यदि कोई बादल कद में काफी बड़ा हो जाए, तो उसका ऊपरी हिस्सा हिमांक के आसपास के वातावरण में होता है। ऐसी परिस्थिति में तरल पानी की बूंदों की बजाय बर्फ के छोटे-छोटे रवे बनने लगते हैं। कभी-कभी ऐसे बादल बरसते हैं किन्तु उनका बर्फ के रवों से बना सबसे ऊपरी हिस्सा आसमान में टंगा रह जाता है। ये बादल आम तौर पर ऐसे लगते हैं जैसे आसमान के कैनवास पर कूचियाँ चलाई गई हों। इन्हें सिरस बादल (cirrus clouds) कहते हैं।

क्यूमलस बादल कपास के ढेर जैसे दिखते हैं। (चित्र-1 में बादल का आकार देखें, जैसा कि इन्हें अक्सर चित्रित किया जाता है।) इस बादल की मोटाई ऊँचाई के साथ घटती जाती है क्योंकि ऊपर  उठती  बादली-हवा  (यानी नमीयुक्त  हवा)  क्रमिक  रूप  से अल्पसंतृप्त हवा से मिलती है। इनके मिलने से बादल की बूंदों का ह्रास होता है, और यह ह्रास किनारों से शुरू होकर क्रमश: बादल के केन्द्रीय भाग की ओर बढ़ता है। दूसरे शब्दों में, आसपास की हवा बादल का भक्षण करती है और इसीलिए जैसे-जैसे बादल का कद बढ़ता है, उसकी मोटाई कम होने लगती है।

हमने देखा कि कैसे ऊपर उठते हवा के पार्सल में पानी की बूंदें अलग होती हैं और बादल का निर्माण करती हैं। मगर बादल में सिर्फ ऊपर उठती हवा की धाराएँ ही नहीं होतीं। हवा के झोंके नीचे की ओर भी बहते हैं। जब बादल का ऊपरी हिस्सा ठण्डा हो जाता है और बादल के शीर्ष की हवा घनी हो जाती है तो वह नीचे स्थित अपेक्षाकृत हल्की हवा में डूबने लगती है।

और चलते-चलते बता दूँ कि सारी बरसातें धरती तक नहीं पहुँचतीं। ऐसी बरसातों को ‘वर्गा’ कहते हैं। ऐसी बरसातों में पानी की बूंदें धरती की ओर अपनी यात्रा के दौरान बीच रास्ते में ही पूरी तरह वाष्पित हो जाती हैं। ऐसा तब हो सकता है जब बादल बहुत ऊँचाई पर बनते हैं और बूंदों को लम्बी दूरी तय करनी होती है, एक ऐसी यात्रा जिसे वे पूरा नहीं कर पातीं।
ऐसा तब भी हो सकता है जब बादल के नीचे की हवा इस कदर अल्प-संतृप्त होती है (जैसे रेगिस्तान के ऊपर) कि बूंदें धरती तक की सामान्य दूरी तय करते हुए ही वाष्पित हो जाती हैं।

विदाई के शब्द 
इस लेख में मैंने बमुश्किल बादलों की भौतिकी की सतह को ही कुरेदा है। बादलों का भौतिक शास्त्र दुनिया भर में शोध का एक महत्वपूर्ण व सक्रिय क्षेत्र और बहस का विषय है। मैं उम्मीद करता हूँ कि यह लेख आपको बादलों के बारे में और खोजबीन करने को प्रेरित करेगा।

सार रूप में, हमने क्यूमलस बादलों के बारे में जाना, जो तब बनते हैं जब धरती से हवा ऊपर उठती है और ऊपर उठते हुए ठण्डी होती जाती है। इस प्रक्रिया में एक ऊँचाई (∼2 कि.मी. के ऊपर) पानी की बूंदें बनने लगती हैं। शुरुआत में बादल की जो बूंदें 10 माइक्रोमीटर से छोटी होती हैं, वे जल वाष्प के संघनन के फलस्वरूप बड़ी होने लगती हैं। इन बूंदों को जब अशान्त हवाएँ इधर-उधर उछालती हैं तो इनका सामना विविध परिस्थितियों से होता है। इसके चलते विभिन्न साइज़ों की बूंदें बनती हैं जिनमें से कुछ बूंदें 30-40 माइक्रोमीटर साइज़ तक की होती हैं। इस मुकाम के बाद संघनन की बजाय बूंदों के बीच टक्कर और संलयन उनकी वृद्धि का प्रमुख तरीका बन जाता है। इस प्रकार से बादल की जो बूंदें 70-80 माइक्रोमीटर तक बड़ी हो जाती हैं, उन पर अशान्त हवाओं का असर कम पड़ता है और वे गुरुत्वाकर्षण के प्रभाव से नीचे बैठने लगती हैं। अपने रास्ते में वे संयोगवश टक्कर और संलयन की घटनाओं से भी गुज़रती हैं। इस तरह से हो सकता है कि उनकी साइज़ चन्द मि.मी. तक हो जाए। ये बड़ी-बड़ी बूंदें धरती पर बारिश के रूप में गिरती हैं और इस तरह से बादल का जीवन-चक्र सम्पन्न होता है।

कोई भी विज्ञान सम्बन्धी लेख तब तक अधूरा माना जाएगा जब तक कि वह पाठकों को उस क्षेत्र के कुछ दिलचस्प अनसुलझे सवालों के बारे में न बताए। इस लेख की विषयवस्तु साफ-सुथरी और सुव्यवस्थित है क्योंकि मैंने इस विषय की मात्र मोटी-मोटी रूपरेखा प्रस्तुत की है। यदि आप बारीकियों के तहखाने में जाएँ तो नज़ारा गड्ड-मड्ड होने लगता है। यहाँ पहुँचकर नए-नए सिद्धान्त और अटकलें उछाली जाती हैं, जिन पर बहस होती है, आपत्तियाँ होती हैं, खण्डन होते हैं या (ज़्यादा खुशकिस्मत मामलों में) उन्हें अस्थाई तौर पर स्वीकार कर लिया जाता है।

बादल-वैज्ञानिकों को बादल की बूंदों की त्वरित वृद्धि एक पहेली लगती है। वे यह तो मानते हैं कि अशान्त हवाओं द्वारा प्रेरित टक्कर व संलयन इसे गति देने वाला एक कारक होना चाहिए किन्तु एक सवाल बहस का विषय बना हुआ है: ‘अशान्त हवाएँ ठीक-ठीक कैसे बादल की बूंदों के बीच टक्करों की दर को बढ़ाती हैं?’ कुछ लोगों का मत है कि अशान्त हवाएँ बूंदों के झुण्ड बनाने में भूमिका निभाती हैं (जिसकी वजह से पूरी जगह में वे एकरूप ढंग से नहीं बिखरी रहतीं)। ऐसा होने पर उनके बीच टक्करों की सम्भावना बढ़ जाती है। कुछ अन्य लोगों ने सुझाया है कि बूंदों को अशान्त हिस्सों से गुलेल की तरह फेंका जाता है, जिसकी वजह से टक्कर की दर बढ़ती है। इन लोगों के मुताबिक झुण्ड बनाना अनावश्यक है। आप शायद अपना दिमाग भिड़ाकर टक्करों की दर बढ़ने की किसी नई क्रियाविधि का सुझाव देना चाहें।

यदि बूंदों के बीच टक्करें वृद्धि की प्रमुख विधि है, तो यह ज़रूरी है कि बूंदें बहुत अलग-अलग साइज़ की हों (और कम-से-कम कुछ बूंदें तो 30-40 माइक्रोमीटर की होनी चाहिए), और इनका निर्माण तेज़ी-से होना चाहिए। इस सन्दर्भ में एक सवाल का जवाब देने के लिए काफी मेहनत की जा रही है: ‘संघनन की कुदरती प्रवृत्ति होती है कि वह बूंदों की साइज़ को एक संकरे परास (डिस्ट्रीब्यूशन) में रखे, तो अशान्त हवाएँ ठीक-ठीक किसी तरीके से छोटी-सी अवधि (10 मिनट से भी कम) में विविध साइज़ की बूंदें बना देती हैं?’

ध्यान दें कि अशान्त हवाएँ दोनों ही सवालों में प्रमुखता से नज़र आती हैं। अशान्ति के बगैर निश्चित रूप से बादल छोटी-सी अवधि (एक घण्टे से कम) में नहीं बरसेंगे और बादलों का औसत जीवनकाल अपेक्षाकृत लम्बा होगा (शायद एक दिन)। किन्तु अशान्त बहाव एक मुश्किल समस्या का द्योतक है। अशान्त बहावों के व्यवहार का पूर्वानुमान तो अपेक्षाकृत सरल मानव-निर्मित परिस्थितियों में भी नहीं किया जा सकता, वायुमण्डल या बादलों के अन्दर पूर्वानुमान की बात तो दूर की है। जब कभी भी अशान्ति किसी भौतिक परिघटना में सिर उठाती है, आप आश्वस्त हो सकते हैं कि वह ऐसे सवालों को जन्म देगी जो लम्बे समय तक पीछा नहीं छोड़ेंगे।
बादलों से जुड़े ऐसे कई और गहरे व रोचक सवाल हैं किन्तु वे इस लेख के दायरे से बाहर के हैं। तो यहीं रुककर,  बाहर  निकलते  हैं  और आलीशान बादलों को निहारते हैं।


दीपक गोविंद मादीवाल: अपने शोध के दौरान आई.आई.एससी. बेंगलुरू में बादलों पर अधय्यन किया। वर्तमान में जे.एन.सी.ए.एस.आर., बेंगलुरू में पोस्टडॉक्टोरल शोधकर्ता हैं।
अँग्रेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
यह लेख रेज़ोनेंस पत्रिका के अंक - नवम्बर 2018 से साभार।