के. आर. शर्मा

पुस्तक - प्लास्टिक ही प्लास्टिक
लेखक - सुबोध जावड़ेकर
प्रकाशक - सी.एसआईआर, नई दिल्ली
पता - डॉ. के. एस. कृष्णन मार्ग,
नई दिल्ली - 110012
प्रकाशन - 1992, पृष्ठ - 104,
मूल्य - 12 रुपए

आज हमारे दैनिक जीवन में प्लास्टिक ने गज़ब की घुसपैठ कर रखी है। बाल्टी, मग, टूथब्रश, रस्सी, रेडियो, टी.वी., बिजली के स्विच....और भी न जाने क्या-क्या चीजें प्लास्टिक की बनी है या उनमें प्लास्टिक मौजूद है। अब तेल, घी, दूध जैसे तरल पदार्थ लाने के लिए आप यदि घर से बर्तन न भी ले जाएं तो कोई बात नहीं, पोलिथीन की थैली जो उपलब्ध है! . .

सौ साल पहले किसी ने सोचा भी नहीं होगा कि कभी पानी भी पोली-पैक में मिलने लगेगा! चारों तरफ नज़र दौड़ाएं तो पाएंगे कि मध्यमवर्गीय घरों में तो प्लास्टिक ने गज़ब की घुसपैठ कर रखी है। और तो और इसने कई जगह तो भारी और पारंपरिक पदार्थों (जैसे लोहा) का स्थान तक ले लिया है।

आखिर प्लास्टिक है क्या? इसकी खोज कैसे हुई? कौन था इसे खोजने वाला? प्लास्टिक से इतनी रंग-बिरंगी चीजें कैसे बनती हैं? हम आजकल जिस धड़ल्ले से दैनिक जीवन में इसका उपयोग कर रहे हैं क्या वह सुरक्षित है? ये कई सवाल हैं जिनके जवाब ‘प्लास्टिक ही प्लास्टिक' नाम की किताब में मिल सकते हैं।

प्लास्टिक के तमाम पहलुओं के बारे में यह पुस्तक अपने में अनूठी जानकारियां संग्रहित किए हुए है। इस किताब का प्रकाशन सी.एस.आई.आर. (प्रकाशन और सूचना निदेशालय) ने किया है, इस उद्देश्य से कि प्लास्टिक के बारे में जानकारी जन-सामान्य तक पहुंच सके।

असल में सी.एस.आई.आर. की पचासवीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में निर्णय लिया गया था कि विज्ञान के प्रसार के लिए पुस्तकों की एक श्रृंखला छापी जाए। इसके लिए खगोलिकी, मौसम विज्ञान, समुद्र विज्ञान, नए पदार्थ, रोगविरोधी विज्ञान (इम्यूनोलॉजी) तथा जैव प्रौद्योगिकी जैसे विषयों को चुना गया। अभी तक इस कड़ी की सागर से संपदा, जीवन : कोशिका से कोशिका तक, हुक्म का गुलाम, सितारों ग संसार आदि शीर्षक से किताबें प्रकाशित हुई हैं। प्लास्टिक से प्लास्टिक इसी कड़ी का एक हिस्सा है।

प्लास्टिक नामक पदार्थ ज्यादा पुराना नहीं है। कोई सवा सौ साल पहले संयोगवश इसकी खोज हुई!स्विटज़रलैंड का एक वैज्ञानिक श्योनबेन कुछ प्रयोग कर रहा था कि गंधक के अम्ल (सल्फ्यूरिक एसिड), और शोरे के अम्ल (नाइट्रिक एसिड) से भरे बीकर फर्श पर गिर पड़े..! इस मिश्रण को उसने जब सूती कपड़े से पोंछने की कोशिश की तो उसे मिला एक कृत्रिम बहुलक 'नाइट्रो सेल्युलोज़ बस यहीं से शरुआत होती है प्लास्टिक की खोज की कहानी की नाइट्रो सेल्यूलोज़ का दुर्गुण है कि यह कठोर होता है और तेजी से आग पकड़ लेता है। तो इस पदार्थ में बदलाव करके इसको उपयोगी बनाने की तरफ ध्यान गया एक दूसरे वैज्ञानिक पार्केस का उसने इसमें कुछ बदलाव करके एक पदार्थ बनाया किंतु यह भी नरम और आसानी से टूटने वाला था। तभी 1869 में अमेरिका के वेस्ले और हयात् बंधुओं ने नाइट्रो सेल्युलोज़ में कपूर मिलाकर एक और पदार्थ बनाया। इसे गर्म करके इच्छानुसार आकृति में ढाला जा सकता था। इस प्रकार पहली बार प्लास्टिक का निर्माण हुआ| इसका नाम पड़ा 'सेल्युलाईड'। हालांकि सेल्युलाईड भी जल्दी से आग पकड़ लेता है लेकिन पहले-पहल प्लास्टिक का यही रूप सामने आया।

प्लास्टिक के क्षेत्र में ही एक और दिलचस्प संयोग बना उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में - जब डह बैकलैंड नामक वैज्ञानिक ने पाया कि फिनॉल तथा फॉर्मेल्डिहाईड (मृत प्राणियों को सड़ने से बचाने के लिए उपयोग में लाया जाने वाला पदार्थ) को गर्म किया जाता है तो एक चिपचिपा पदार्थ, रेज़िन बनता है। उसने पाया कि इस चिपचिपे पदार्थ को गलाकर सांचे में ढाला जा सकता है। जो ठंडा होने पर कठोर हो जाता है। इस पदार्थ को बैकलेंड के नाम के आधार पर बैकेलाइट कहा जाने लगा। बैकलाइट एक ऐसा पदार्थ है जो प्लास्टिक उद्योग का आरंभ बिंदु था।

रासायनिक रूप से देखा जाए तो प्लास्टिक एक समान इकाइयों की लंबी-लंबी श्रृंखलाएं हैं। यानी कि प्लास्टिक बहुलक (पॉलिमर) हैं। बैकेलाइट की खोज के बाद तो और तेजी से इस दिशा में प्रयोग होने लगे। आजकल प्लास्टिक मुख्यतः पेट्रोलियम पदार्थों से बनाए जाते हैं। पोलिथीन और पीवीसी इस तरह बनने वाले दो प्रमुख प्लास्टिक हैं। विभिन्न किस्म के प्लास्टिकों में पोलिथीन, पीवीसी, पोलीस्टराइन और पोलीप्रोपिलीन का प्रमुख स्थान है। हमारे देश में उपरोक्त चारों को ही तरह तरह के प्लास्टिकों का मुख्य स्रोत माना गया है।

इस किताब में प्लास्टिक की खोज के साथ ही इसके विभिन्न स्वरूपों को अनूठे ढंग से प्रस्तुत किया गया है। जैसे खाना बनाने के लिए विभिन्न तरह की खाद्य सामग्री उपलब्ध हो तो उससे एक से अधिक तरह के व्यंजन बनाए जा सकते है लगभग उसी तर्ज़ पर प्लास्टिक को बेहतर और आकर्षक बनाने के लिए मसाले बनाम रंग डालने पड़ते हैं। आज हमारे सामने बहुत ही अलग-अलग तरह के प्लास्टिक मौजूद हैं। कोई एकदम नरम तो कोई एकदम बढ़ता प्लास्टिक कचरा : दुनिया परेशान है कि इसका क्या करें। कठोर, कुछेक को तो गर्म करके पुनः ढाला जा सकता है या यूं कहें कि उनकी रीसाइक्लिंग की जा सकती है। गुणों के हिसाब से भी इनमें आपस में अंतर है। जैसे आमतौर पर 100 डिग्री सेंटीग्रेड पर सभी प्लास्टिक पिघल जाते हैं पर टेफ्लॉन नाम का प्लास्टिक 260 डिग्री सेंटीग्रेड पर भी नहीं पिघलता।

सुबोध जावड़ेकर द्वारा लिखी गई यह किताब प्लास्टिक की खोज से लगाकर अब तक तैयार किस्मों तथा इसके रसायन शास्त्र की जीवंत तस्वीर पेश करती है। कुल मिलाकर किताब उनके लिए और भी उपयोगी बन जाती है जो अणु परमाणु के संकेत समीकरण की भाषा समझ सकते हैं।

आज के युग को प्लास्टिक युग कहें तो कोई हर्ज नहीं होना चाहिए। एक तरफ तो इसका इतना प्रचार है पर दूसरी तरफ इसके कारण एक बड़ी समस्या आन खड़ी हुई है। जैसे अनेक चीजें सड़ गल कर मिट्टी में मिल जाती हैं परन्तु प्लास्टिक ठीक इसके विपरीत प्रकृति में जैसे के तैसे पड़े रहते हैं। हमने प्लास्टिक बनाना और उपयोग करना तो सीख लिया लेकिन इसको नष्ट करने के तरीके अभी तक नहीं खोजे जा सके हैं। वैसे इसको ठिकाने लगाने का एक तरीका है - इसे इकट्ठा कर पुनः उपयोग लायक बनाना। हमारे आसपास पड़े कचरे से बीना गया प्लास्टिक पुनः चक्रीकरण के लिए भेज दिया जाता है। इसके बावजूद बेकार पड़े प्लास्टिक की मात्रा में से बहुत थोड़े का ही इस तरह उपयोग हो पाता है। लेखक ने अपनी पुस्तक में इस बात की ओर इशारा किया है कि अब हमें ऐसे प्लास्टिक बनाने चाहिए जिन्हें प्रकृति हज़म कर जाए।

किताब की शुरुआत में बताए गए हैं, अलग-अलग देशों में प्लास्टिक खपत के आंकड़े। तुलनात्मक रूप से भारत में इसकी खपत बहुत कम है। इसको आधार बना कर लेखक ने लिखा है - 'इससे पता चलता है कि हमें अभी और कितनी प्रगति करनी है। इस कथन से जो सवाल खड़ा होता है वो विकास के बारे में सोचने के हमारे तरीके की ओर इशारा करता है कि क्या प्लास्टिक उत्पादन व खपत के मामले में अन्य देशों की बराबरी करना ही प्रगति का सूचक है?

यह कहते हुए शायद इस बात का ध्यान नहीं रखा गया कि विकसित कहे जाने वाले देश इस समय प्लास्टिक कचड़े के कारण, उनके पर्यावरण को पैदा खतरे से जूझ रहे हैं और हर साल करोड़ों रुपए प्लास्टिक का कोई ऐसा विकल्प ढूंढने में खर्च कर रहे हैं जो प्रकृति को नुकसान न पहुंचाए।


(के. आर. शर्मा - होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम से संबद्ध, एकलव्य के उज्जैन फील्ड सेंटर में कार्यरत)