अभिषेक धर

इस लेख में, हम पाठकों के समक्ष २ कुछ ऐसी ज्यामितीय आकृतियों का संक्षिप्त विवरण प्रस्तुत करेंगे जिन्हें ‘बहुफलक' या ‘बहुतल' कहा जाता है।

हम सभी चित्र-1 में दर्शाई गई आकृतियों से भली-भांति परिचित हैं। इन्हें, सामूहिक रूप से ‘बहुभुज' कहा जाता है। वह बंद समतल आकृति जिसकी सभी भुजाएं सरल रेखाएं हों, बहुभुज कहलाती हैं।

ऊपर चित्र में दिखाए गए बहुभुजों में फर्क आसानी से समझ में आ जाता है। पहले बहुभुज (चित्र-1अ) में सभी भुजाओं की लंबाई समान है तथा सभी कोण एक जैसे हैं। अन्य दो आकृतियों में ऐसा नहीं है। आकृति 1(ब) में सभी भुजाओं की लंबाई तो समान है, लेकिन सभी कोण समान नहीं हैं। आकृति 1(स) में, न तो भुजाओं की लंबाई समान है न ही उसके कोणों में कोई समानता है। इस प्रकार हमने देखा कि प्रथम आकृति, अन्य दो की तुलना में अधिक विशेष है। ऐसी बहुभुजीय आकृति, जिसकी सभी भुजाओं की लंबाई तथा सभी कोण समान हों, ‘सम-बहुभुज' (regular polygon) कहलाती है। चित्र-1 अ, में दर्शाए बहुभुज की पांच भुजाएं होने के कारण, इसे सम-पंचभुज कहते हैं।

हम भुजाओं की भिन्न-भिन्न संख्या वाले, ऐसे अनेकानेक सम-बहुभुज बना सकते हैं। चित्र-2 में ऐसी ही कुछ और आकृतियां दर्शाई गई हैं

चित्र-2 में दिखाई गई आकृति, जिसे हम सभी समबाहु त्रिभुज के नाम से जानते हैं, से स्पष्ट होता है कि तीन से कम भुजाओं वाली बहुभुजीय आकृति संभव नहीं है। पाठक, अन्य तीन आकृतियों से भी परिचित होंगे। इन्हें क्रमशः वर्ग, सम-षट्भुज तथा सम-अष्टभुज कहते हैं। चूंकि बहुभुजों की भुजाओं की अधिकतम संख्या पर कोई प्रतिबंध तो है नहीं, इसलिए ऐसी बहुभुजीय आकृतियों की संख्या असंख्य

त्रिआयामी बहुफलक
अब तक हमने जिन आकृतियों की चर्चा की, वे सभी समतल ज्यामितीय हैं अर्थात दो आयामी हैं। अगला प्रश्न उठता है ‘क्या इनके समतुल्य त्रिआयामी आकृतियां संभव हैं?' इस प्रश्न का उत्तर ही, इस लेख में, हमारी चर्चा का विषय है। तीन आयाम में भी, समतल बहुभुजों के तुल्यरूप आकृतियां पाई जाती हैं। इन ज्यामितीय आकृतियों को ‘बहुफलक' कहते हैं। ऐसी ही दो आकृतियों को चित्र-3 में दिखाया गया है। समतलीय बहुभुज की ही भांति, त्रिआयामी

घन एवं प्रिज्म: घन छ: समान फलकों से बनी बहुफलकीय आकृति है। प्रिज्म तीन आयताकार और दो त्रिभुजाकार फलकों से बनी बहुफलकीय आकृति है। धन जैसे बहुफलक में सममिति (Symmetry) के काफी सारे तत्व दिख रहे हैं जबकि प्रिज्म में ऐसा नहीं है।

भी एक बंद ज्यामितीय आकृति है। यानी कि इसमें सब फलक आपस में जुड़कर एक बंद आकृति बनाते हैं। जिस प्रकार सरल रेखाओं से बहुभुज की रचना होती है, ठीक उसी प्रकार बहुभुजों से बहुफलक की रचना की जाती है। इसका प्रत्येक फलक एक बहुभुजीय आकृति होती है।

चित्र-3 अ में दर्शाई गई आकृति को घन कहते हैं। इसके 6 फलक हैं। दूसरी आकृति, जिसे प्रिज्म कहते हैं, के केवल 5 फलक हैं। इनका अवलोकन करने पर, दोनों में फर्क तुरंत दिख जाता है। घन अत्याधिक सममित (Symmetric) आकृति है और उसमें सब तल/फलक एक समान हैं। जबकि प्रिज्म में ऐसा नहीं है। एक बहुफलक को उसके फलकों, भुजाओं तथा शीर्षों से परिभाषित किया जाता है। चित्र-3 में, इन्हें दर्शाया गया है। इन्हें ठीक से पहचानने के लिए पाठक स्वयं जांच कर लें कि

अ. चित्र-3' में दर्शाए घन के 6 फलक, 12 भुजाएं तथा 8 शीर्ष हैं। इसके सभी फलक एक जैसे यानी वर्ग हैं

ब. चित्र-3ब में दिए प्रिज्म के 5 फलक, 9 भुजाएं तथा 6 शीर्ष हैं। इसके दो फलक त्रिभुजाकार हैं तथा शेष आयताकार हैं।

सम-बहुभुजों की भांति, बहुफलकों में भी सम-बहुफलक होते हैं। सम बहुफलक उसे कहते हैं जिसके सभी

सम-बहुफलक: त्रिआयामी ज्यामिती में अनगिनत बहुफलक बनाए जा सकते हैं। लेकिन जहां तक सम-बहुफलकों का सवाल है, केवल ऊपर दिखाई गई पांच आकृतियां ही संभव हैं। सम-बहुफलक यानी वो आकृति जो केवल एक जैसे सम बहुभुजों से बनी हो और उसकी समस्त भुजाएं एवं शीर्ष भी समान हों।

फलक एक समान हों तथा सम बहुभुजों से बने हों और सभी भुजाएं तथा शीर्ष भी समान हों

पांच सम-बहुफलकीय आकृतियां
चित्र-4 में पांच सम-बहुफलकीय आकृतियों को दर्शाया गया है। इनके नाम प्रत्येक आकृति में फलकों की संख्या के अनुसार रखे जाते हैं

चतुष्फलक, अष्ट्रफलक, विशफलक, घन तथा द्वादशफलक।

वस्तुतः इन आकृतियों को सम चतुष्फलक, सम-अष्टफलक इत्यादि के नाम से पुकारना चाहिए, लेकिन बहुधा उपरोक्त नाम ही प्रयोग में लाए जाते हैं। इनके संदर्भ में, एक आश्चर्यजनक सत्य यह है कि ये पांचों आकृतियां ही संभव सम-बहुफलक हैं। इनके अतिरिक्त, अन्य कोई सम-बहुफलकीय आकृति बनाना संभव नहीं है। इस महत्वपूर्ण तथ्य की व्याख्या, हम आगे चलकर करेंगे। इससे पहले, इन पांचों सम-बहुफलकों से परिचय करते हैं।

इन पांचों को सम्मिलित रूप से ‘प्लेटोनीय पिंड' भी कहा जाता है। निम्नलिखित तालिका में, पांचों समबहुफलकों के मुख्य लक्षणों का विवरण दिया गया है। पाठकों से अपेक्षा है कि वे इन तथ्यों की जांच स्वयं भी करें।*

तालिका के प्रथम स्तम्भ में बहुफलक का नाम तथा दूसरे में फलक की बहुभुजीय आकृति का नाम दिया गया है। तीसरे, चौथे तथा पांचवें स्तम्भों में क्रमशः फलकों, भुजाओं तथा शीर्षों की संख्या का विवरण दिया गया है। छठे स्तम्भ में, बहुफलक की किन्हीं दो भुजाओं के परस्पर मिलान से बने कोणों का माप है तथा अंतिम स्तम्भ में बहुफलक के किसी भी शीर्ष पर मिलने वाले फलकों की संख्या दी गई है।

कितने सम-बहुफलक
आओ, अब हम यह जानने का प्रयत्न करें कि उपरोक्त पांच के अतिरिक्त अन्य कोई सम-बहुफलक संभव क्यों नहीं है। सर्वप्रथम, इस तथ्य की ओर ध्यान दें कि एक बंद आकृति पाने के लिए, किसी भी शीर्ष पर कम से-कम तीन बहुभुजों का मिलना अत्यंत आवश्यक है। (सोचकर देखिए कि क्या यह सही है) दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी शीर्ष पर बनाए गए समतलीय कोणों का कुल योग 360" से कम होना चाहिए। (सोचिए ऐसा क्यों?) इसका अभिप्राय यह है कि यदि हम समबाहु त्रिभुज

*इन आकृतियों के मॉडल तैयार करना, पाठकों के लिए लाभदायक सिद्ध होगा। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताब 'खेल खेल में' (लेखक - अरविंद गुप्ता) भी मददगार साबित हो सकती है। इसमें माचिस की तीलियों से मॉडल बनाना सिखाया गया है। इस लेख के अंत में भी कागज़ द्वारा मॉडल बनाने के बारे में कुछ जानकारी दी गई है।

की सहायता से कोई सम-बहुफलक बनाना चाहें तो केवल 3, 4 या 5 त्रिभुज का ही एक शीर्ष पर मिल पाना संभव है। छः त्रिभुजों के एक शीर्ष पर मिलने से कोणों का कुल योग 360" हो जाएगा; जिससे बंद त्रिआयामी आकृति नहीं बन सकती। चित्र-5 में इस तथ्य को स्पष्ट किया गया है। किसी शीर्ष पर मिलने वाले समबाहु त्रिभुजों की उपरोक्त तीन संभावनाओं से हमें क्रमशः चतुष्फलक, अष्टफलक तथा विंशफलक प्राप्त होते हैं। समबाहु त्रिभुजों के स्थान पर यदि वर्गों का उपयोग किया जाए तो केवल एक ही संभावना है कि हम तीन वर्गों को एक ही शीर्ष पर मिलाएं। ऐसा

सम-बहुफलक की शर्ते: किसी सम-बहुभुज से त्रिआयामी बंद आकृति प्राप्त करने के लिए जरूरी है कि हर शीर्ष पर कम-से-कम तीन बहुभुज मिलें। दूसरी जरूरी शर्त है कि किसी शीर्ष पर मिलने वाले बहुभुजों द्वारा बनाए गए कोणों का योग 360 डिग्री से कम होना चाहिए। इन दोनों तथ्यों को ध्यान में रखकर अगर क, ख, ग, घ, को देखा जाए तो 'ख' स्थिति में छः त्रिभुजों के एक शीर्ष पर मिलने से पहली शर्त तो पूरी हो गई लेकिन इन 6 त्रिभुजों द्वारा बनाए कोणों का योग 360 डिग्री हो जाता है। इससे हमें षट्भुजी तल तो मिलता है लेकिन बंद आकृति नहीं; जबकि 'क' में बंद आकृति मिलती है। इसी तरह 'घ' में चार वर्गों के एक शीर्ष पर मिलने से एक वर्गाकार तल बन जाता है, जबकि 'ग' में एक बंद आकृति यानी घन बनने की संभावना है।

नमक के क्रिस्टलः प्रकृति में पाया जाने वाला नमक बहुफलकों के नियमों का पालन करते हुए अपने क्रिस्टल बनाता है। चित्र में नमक के घनाकार क्रिस्टल दिखाई दे रहे हैं।

करने से हमें घन प्राप्त होता है। अंततः यदि हम सम-पंचभुज का उपयोग करें तो हमें परिणामस्वरूप द्वादशफलक प्राप्त होगा। पाठक इस बात पर ध्यान दें कि पांच से अधिक भुजाओं वाले सम-बहुभुज का उपयोग, एक समबहुफलक बनाने के लिए नहीं किया जा सकता। इस प्रकार, हमने देखा कि उपरोक्त पांच सम-बहुफलकीय आकृतियां ही संभव हैं।

लेकिन भिन्न-भिन्न प्रकार के बहुभुजीय फलकों को मिलाकर, हम निस्संदेह विभिन्न प्रकार के (विषम) बहुफलकों का निर्माण कर सकते हैं।

उदाहरणार्थ, चित्र-6 (पृष्ठ-31) में दर्शाई गई दो आकृतियों में प्रथम, एक जाना-पहचाना बहुफलक है जिसे 12 सम-पंचभुजों तथा 20 सम षट्भुजों को मिलाकर बनाया गया है। वास्तव में, यही आकृति C-60 अणु की हैयह एक महत्वपूर्ण कार्बनिक अणु है जिसे हाल ही में खोजा गया है। यह 60 कार्बन परमाणुओं से मिलकर बना है। इस विशिष्ट अणु की बहुफलकीय आकृति में, प्रत्येक शीर्ष पर एक कार्बन परमाणु विद्यमान है। इस आकृति को ‘बकीबॉल फुलरीन के नाम से जाना जाता है।*


* फुटबॉल कार्बन के बारे में और जानकारी के लिए संदर्भ का अंकः18, जुलाई-अगस्त 1997 देखिए।


अष्टफलकीय मैगनेटाइटः टॉल्क क्लोराइड शिस्ट नामक चट्टान में मैगनेटाइट (लोहे का एक अयस्क) के अष्ट्रफलकीय क्रिस्टल दिखाई दे रहे हैं।

अभी तक जिन पांच पिंडों की चर्चा की गई उन्हीं की भांति, किंतु उनसे भिन्न बहुफलकीय पिंडों का एक और समूह है जिन्हें ‘आर्किमीडीय पिंड' कहा जाता है। उपरोक्त ‘बकीबॉल' एक ऐसा ही आर्किमीडीय पिंड है। नीचे दी गई दुसरी आकृति भी आर्किमीडीय वर्ग की एक आकृति है जिसे ‘स्नब घन' कहते हैं।

प्रकृति में भी सम-बहुफलक
यह बात विशेष रूप स उल्लखनीय है कि प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले कई पदार्थों की क्रिस्टल संरचना भी उपरोक्त सम-बहुफलकों जैसी ही होती है। हाल ही में खोजे गए विशेष पदार्थ, जिन्हें आभासी-क्रिस्टल (Quasi crystals) कहते हैं, में बीस तल वाली विंशफलकीय संरचना पाई गई है।

सुंदर ज्यामितीय आकृतियां होने के साथ-साथ, बहुफलक कई प्रकार के विशिष्ट गणितीय गुणों से भी संपन्न हैं। हम ऐसे दो विशेष लक्षणों का वर्णन यहां करेंगे।

पाठक चाहें तो ऐसे अन्य गुणों को खोजने की कोशिश खुद कर सकते हैं। ये दो लक्षण इस प्रकार हैं

1. तालिका में दिए विवरण की ओर ध्यान दें। तालिका की प्रत्येक पंक्ति में, एक बहुफलक विशेष का विवरण दिया गया है। बहुफलक विशेष के फलकों की संख्या को शीर्षों की संख्या में जोड़कर, भुजाओं की संख्या से घटाने पर सदैव 2 प्राप्त होता है

चित्र: 6 फुटबॉल कार्बन और स्नब क्यूब

ऊपरः 12 सम-पंचभुजों और 20 सम षटभुजों से बना एक बहुफलक। यदि फुटबॉल के काले-सफेद चकतों पर गौर करें तो यही संरचना दिखाई देगीइसलिए ऐमी ही रचना वाले कार्बन के अणु को फुटबॉल कार्बन नाम दिया गया। दाएं: त्रिभुजों और चतुर्भुजों से बना एक बहुफलक जिसे स्नब क्यूब कहते हैं।

2. किसी बहुफलक के किसी शीर्ष पर बने कुल समतलीय कोण को 360° में से घटाइए। सभी शीर्षों पर प्राप्त इस संख्या को परस्पर जोड़ने पर सदैव 720 प्राप्त होता है।

सम बहुफलकों के संदर्भ में, जिन


*अगर शीर्ष एकदम चपटा हो तो वहां मिल रहे समस्त कोण का जोड़ 360 डिग्री होगा। इसलिए जब बहुफलक के किसी शीर्ष पर बने कुल समतलीय कोण को 360 डिग्री से घटाते हैं तो पता चलता है कि आकृति समतल से कितनी फर्क है।


गणितीय तथ्यों का हमने ऊपर उल्लेख किया, वे एक-दूसरे से संबंधित हैं। ये तथ्य, स्विटजरलैंड के महान गणितज्ञ यूलर द्वारा प्रस्तावित एक सुंदर प्रमेय के फलस्वरूप हमें प्राप्त हुए हैं। आप यह जानने का प्रयत्न करें कि क्या ये आश्चर्यजनक तथ्य अन्य बहुफलकों, यथा प्रिज्म, बकीबॉल इत्यादि के लिए भी सत्य हैं अथवा नहीं।

बहुफलकों का इतिहास
लेख के अंत में, हम प्लेटोनीय पिंडों तथा अन्य बहुफलकों के संबंध में कुछ ऐतिहासिक जानकारी प्रस्तुत करते हैं। जिन पांच सम-बहुफलकों का वर्णन हमने इस लेख में किया, वे कम-से

केपलर का मॉडलः जोहानेस केपलर (1571 - 1 63()) ने सौर्यमंडल के मॉडल को बनाने में समबहुफलकों को इस्तेमाल किया था। इस मॉडल में घन, चतुष्फलक ...... वगैरह की मदद से उस समय ज्ञात छह ग्रहों को दर्शाया गया था।

लियोनार्दो की कृतिः अपने दौर के अग्रणी वैज्ञानिक, इंजीनियर व कलाकार लियोनार्दो द विंची ने भी त्रिभुजों और चतुर्भुजों की मदद से एक बहु फलकीय आकृति बनाई थी।

कम पिछले 2500 र्षों से मानव सभ्यता के अंग हैं। यद्यपि, महान यूनानी दार्शनिक प्लेटो (400 ई.पू.) के नाम पर इन्हें प्लेटोनीय पिंड कहा जाता है लेकिन प्लेटो इन आकृतियों को खोजने वाले प्रथम व्यक्ति नहीं थेपुरातात्विक उत्खनन के दौरान पाए गए कुछ बहुफलकीय पिंडों के ‘क्ले मॉडल्स' की आयु, प्लेटो के समय से पहले की आंकी गई है। इन सुंदर एवं सममित (Symmetric) आकृतियों ने कलाकारा दार्शनिकों तथा गणितज्ञों को सदैव आकृष्ट ही नहीं किया, वरन् उन्हें नए विचारों की तरफ प्रेरित भी किया। उदाहरणार्थ, सौरमंडल में ग्रहों की गतिविधियों की व्याख्या हेतु मॉडल तैयार करने के लिए, कैपलर (1571 - 1630 ई.) ने इन्हीं पांच प्लेटोनीय पिंडों का उपयोग किया था। उसके समय में मात्र छ: ग्रहों की जानकारी थी। इसलिए, उसने सौरमंडल का जो प्रतिरूप तैयार किया, उसके अनुसार प्रत्येक ग्रह की कक्षा भिन्न भिन्न गोलों पर थी जिनके केन्द्र एक ही जगह थे। इन छहों गोलों को पांच प्लेटोनीय पिंडों द्वारा पृथक किया गया था। यों तो सौरमंडल का वह प्रतिरूप सफल सिद्ध नहीं हुआ, लेकिन इससे हम वैज्ञानिकों की अद्भुत कल्पना शक्ति का अनुमान अवश्य लगा सकते हैं।

महान खगोलशास्त्री होने के साथ साथ, कैपलर एक गणितज्ञ भी थाउसने व्यवस्थित रूप से, उस समय तक ज्ञात सभी बहुफलकों का अध्ययन किया तथा बहुत-सी नई बहुफलकीय आकृतियों की खोज भी की

इसी प्रकार, महान कलाकार (साथ ही वैज्ञानिक, अभियंता और गणितज्ञ भी) लियोनार्दो द विंची (1452 1519 ई.) को भी ज्यामिती से प्रेम था।

बहुफलकों के विचित्र जगत की इस यात्रा को विराम करते हुए, हम आशा करते हैं कि इस लेख के माध्यम से हम पाठकों के सम्मुख बहुफलकों की संक्षिप्त जानकारी के साथ -साथ, उन्हें इस अद्भुत जगत में स्वयं विचरण करने को प्रेरित कर सकें।

सम-बहुफलकों के कागज़ी मॉडल बनाना

अगले तीन पृष्ठों पर बहुफलकों के कागजी मॉडल बनाने के लिए रेखाचित्र दिए गए हैं। आप सभी रेखाचित्रों को किसी अन्य कागज़ पर ट्रेस कर लीजिए। इस ट्रेसिंग की बाहरी लाइनों को कैंची से काट लीजिए। जहां-जहां दोहरी रेखाएं हैं वह जगह बहुफलक बनने पर चिपकाने में मदद देंगी। फिर अंदर दिए गए चौकोन, त्रिकोनों आदि के हिसाब से कागज़ को मोड़ते जाइए। कोशिश कीजिए, आप आसानी से पांचों प्लेटोनीय सम-बहुफलक खुद बना लेंगे।

रेखाचित्र को बाहरी रेखाओं के पास से काटते हैं। फिर अंदर दी गई रेखाओं के सहारे मोड़ते हुए साथ दिया गया बहुफलक बनाने की कोशिश करनी है। हर एक रेखाचित्र में चिपकाने में मदद देने वाली पट्टी न काटने का ध्यान रखना है।


अभिषेक धरः मुंबई के टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ फंडामेंटल रिसर्च में शोध पूरा करने के बाद अब बेंगलौर के 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ सांइसेज़' से पोस्ट डॉक्टरेट कर रहे हैं।
अनुवादः ब्रजेश कुमार बेंगलौर के 'इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मांइमेज' से संबद्ध।
कागज़ी मॉडलः अरविंद गुप्ता की किताब 'खिलौनों का अस्ता' से लिए गए हैं।