रमाकांत अग्निहोत्री

हिन्दी की वर्तनी व्यवस्था भी बेहद जटिल है। ऐसी स्थिति में अध्यापक का क्या रोल होना चाहिए?

देवनागरी के मानकीकरण के प्रयास निरंतर होते रहे हैं और इसके साथ-साथ देवनागरी लिपि सिखाने के तरीकों को भी मानकीकरण होता रहा है। आखिर हिन्दी राजभाषा है (ध्यान दें, राज्यभाषा नहीं है संविधान के अनुसार) और भारत सरकार ने समय समय पर इसकी लिपि व वर्तनी में एकरूपता लाने के लिए विविध स्तरों पर प्रयास किए हैं। 1966 में शिक्षा मंत्रालय ने ‘मानक देवनागरी वर्णमाला' प्रकाशित की। 1967 में हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण' पुस्तिका छपी, और 1989 में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय ने 'देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण नामक पुस्तिका में ‘मानक हिन्दी वर्णमाला, मानक हिन्दी वर्तनी, परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला तथा संख्यावाचक शब्दों को एक साथ छापा। इसकी प्रस्तावना में केंद्रीय हिन्दी निदेशालय के निदेशक ने पेज 3-4 पर लिखा है।

“प्रायः देखा गया है कि हिन्दी लिखते समय लोग देवनागरी वर्णमाला में प्रयुक्त वर्णो, शिरोरेखा और मात्राओं की लिखावट में एक निश्चित दिशा पद्धति का निर्वाह नहीं करते। प्रारंभिक शालाओं में इसकी ओर ध्यान नहीं दिया जाता। द्वितीय भाषा के रूप में हिन्दी सिखाते समय तो इस प्रसंग पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसलिए 'हिन्दी वर्णमाला : लेखन विधि' इसमें दी जा रही है।"

इस लेखन विधि में ‘स' लिखना ऐसे सिखाया गया है:

लेकिन उसको ऐसे लिखने में क्या आपत्ति है:
या उन हज़ारों अन्य तरीकों से जिनसे ‘स' लिखा जा सकता है। हर बच्चा अपनी इच्छानुसार अपना लिखने का तरीका बनाए इससे किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी? अंततः वास्तव में होता तो ऐसा ही है। शायद ही कोई दो व्यक्ति हों जिनकी लिखावट बिल्कुल

एक ही जैसी हो। क्यों पठन-पाठन का इतना मूल्यवान समय हम ऐसी बेकार गतिविधियों में गंवाते हैं? क्या लिखावट में सरलता व प्रयत्न-लाघवता का कोई वैज्ञानिक पैमाना हो सकता है?

वर्तनी की कठिनाइयां
यह सच है कि हिन्दी की वर्णमाला व वर्तनी सीखना कोई आसान काम नहीं। वास्तव में यह बात हर भाषा को लिखने-पढ़ने के बारे में सच है। हिन्दी के विषय में अधिक कठिनाई इसलिए आती है कि लोग इस भाषा को बहुत वैज्ञानिक समझते हैं; एवं ऐसा मानते हैं कि यह भाषा बच्चे के लिए बहुत सरल होनी चाहिए। फिर जब बच्चे निरंतर गलतियां करते हैं। तो मां-बाप व अध्यापक झुंझलाते हैं। हिन्दी लिखने का देवनागरी में जिस तरह मानकीकरण हुआ है उसकी वैज्ञानिकता व सरलता दोनों पर प्रश्न चिह्न हैं। बच्चों को न सिर्फ व्यंजन व स्वर वर्ण सीखने होते हैं, बल्कि उन्हें निम्न मात्राएं भी सीखनी होती हैं।
और अक्सर साथ ही हल्-चिने (,) और काफी जगह देवनागरी अंक।
शायद देवनागरी में ही ऐसा होता है कि एक ही वर्ण के कई रूप होते हैं और उसे चारों तरफ से बदला जा सकता है। उदाहरण के लिए 'क' को देखिएः ‘क’, ‘क’, ‘क’, ‘कि', 'की', ‘कु’, ‘कू’, ‘के', 'को', 'कं' आदि और फिर 'क्ष' में भी ‘कु’। दाएं -बाएं, ऊपर नीचे हर तरफ कुछ न कुछ जोड़ने की संभावना। रोमन लिपि में ऐसा कुछ नहीं। दाईं तरफ को बराबर लिखते जाइए, बस। ‘कि' में 'इ' की मात्रा लिखी पहले जाती है, पर बोली बाद में जाती है। अध्यापक अक्सर कहते हैं। - देवनागरी सरल है, जैसा बोलो, वैसी लिखो। हिन्दी लिखने में यह बात सदा सार्थक नहीं होती। बच्चे बहुत सी गलतियां मात्राओं के प्रयोग में करते हैं। सच बात यह है कि आज की हिन्दी में 'इ' और 'ई' व 'उ' और ‘ऊ' में कोई विशेष अंतर नहीं रहा है। इसलिए बच्चे वही लिखते हैं जो सुनते हैं। यह बात 'ऋ' व 'श' और 'ष' के प्रयोग से र भी स्पष्ट हो जाती है। संस्कृत में 'ऋ' एक स्वर-ध्वनि थी। हिन्दी वर्णमाला में इसे लिखा तो स्वरों में जाता है पर इसका उच्चारण है ‘रि' यानी 'व्यंजन (९) + स्वर (इ)। (गुजरात, महाराष्ट्र व दक्षिण भारत में इसका उच्चारण ‘रू' जैसा है। जब 'ऋ' व्यंजनों के बाद आती है तो उच्चारण कई बार 'र' हो जाता है जैसे ‘कृपा' का ‘क्रपा', 'नृप' का 'व्रप' आदि। इसी प्रकार ‘श' व 'ष' में किसी समय अंतर रहा होगा, लेकिन अब नहीं है। अब यही कहकर समझाना पड़ता है कि ‘पेट कटा 'ष' लिखो', या षट्कोण वाला 'ष' - शक्कर वाला ‘श' नहीं आदि। इस परिस्थिति में यदि

बच्चेः

ऋषि को रिशि,

विष को विश,

ऋतु को रितु,

कोष को कोश

आदि लिखें तो उनका क्या दोष? उन्हें तो सही लिखने के लिए सराहना मिलनी चाहिए, लेकिन उन्हें तो सदैव गलत लिखने के लिए डांट पड़ती है।

जैसा बोलो वैसे लिखो?
इसी प्रकार आपको अनेक ऐसे शब्द मिल जाएंगे जिनमें इ-ई, उ-ऊ, ए-ऐ या ओ-औ में अंतर साफ़ नहीं है। क्या ‘भक्ति' की 'इ' उतनी ही छोटी है जितनी की ‘कि' या 'कवि' की या फिर लगभग उतनी ही लंबी है जितनी की 'की' या ‘धी' की। आप 'पेन' बोलते हैं या ‘पैन'; ‘भोंकना’, ‘भौंकना' या ‘भूकना'। उच्चारण वास्तव में अनेक हैं लेकिन लेखन मानकीकृत एकरूप। बच्चे गलती करें तो दोष उनका। वास्तव में सही लिपि सिखाने का नियम यह हो ही नहीं सकता कि जैसे बोलो, वैसे लिखो।' वर्तनी में सिखाने वाली बात ही यह कि, बोला जाएगा 'रिशि लेकिन लिखना है ‘ऋषि'। बच्चे को यह सिखाना है कि 'ऋतु', 'ऋषभ', ‘ऋण', 'ऋषि' आदि कुछ ऐसे शब्द हैं। जिनमें 'रि' को 'ऋ' लिखना है। इसी प्रकार ‘श' और 'ष' के बारे में। वर्तनी के जो नियम तर्कसंगत हैं वे तो बच्चा खुद ही आत्मसात कर लेगा। 'क्ष', 'त्र', 'ज्ञ' और 'श्र' के संबंध में बच्चों को यह समझने में कोई परेशानी नहीं होती कि इनमें दो-दो व्यंजन शामिल हैं। हां, यदि आप ‘कक्षा’ को ‘कच्छा' बोलते हैं और बच्चा आपके बोलने पर वही लिखता है जो आप बोलते हैं तो आपको क्या करना चाहिए यह आप ही जानिए!

‘ड़' और 'कृ' हिन्दी वर्णमाला में कई बार अलग से लिखे जाते हैं। आजकल तो ‘ट वर्ग' के साथ ही लिख देते हैं। इनकी भी अपनी कहानी है।

अधिकतर शब्दों के शुरू में 'ड' व 'ढ' ध्वनि का प्रयोग होता था व दो स्वरों के बीच ‘ड़' व 'कृ' यथा डर, डाल, खड्ड, ढाल, ढक्कन आदि; व स्वरों के मध्य में लड़का, घड़ा, बड़ा, पढ़ाई, चढ़ाई आदि। पर संस्कृत, फारसी व अंग्रेजी के अनेक शब्दों पर यह नियम नहीं जमा जैसे - निडर, डालडा, सोडा, रेडियो, झंडा आदि। ध्वनि संरचना की दृष्टि से चारों ध्वनियां महत्वपूर्ण हैं। पैर में कहां बिन्दी लगेगी एवं कहां नहीं, इसका कोई नियम नहीं है। अगर आप ‘रेड़ियो' बोलते हैं तो बच्चा शायद वही लिखेगा।

क़, ख़, ग़ ज़ और फ़
जिन ध्वनियों के लिए वर्णमाला में क़, ख, ग, ज़ और फ़ रखे गए हैं। उनकी कहानी तो और भी जटिल है। क्या आप क़यामत, क़साई, नक़द, नक़ल, अख़बार, ख़बर, ख़ाकी, ख़ानदानी, तारीख़, शराबख़ाना, काग़ज़, नग़मा, सुराग़, सौग़ात, जख्म, जमानत, जमींदार, फ़र्ज, नज़ारा, फ़रवरी, फ़कीर, फ़सल, मुफ्त, माफ़ी, लिफ़ाफ़ा आदि को हिन्दी के शब्द मानते हैं, और क्या आप चाहते हैं कि इनका उच्चारण भी संस्कृत से आए शब्दों जैसा शुद्ध हो?

साफ है इस बात का उत्तर इस पर निर्भर करेगा कि आपकी हिन्दी की परिभाषा क्या है? काफी प्रयत्न हुए हैं। इन शब्दों को हिन्दी से निकाल फेंकने के। रही सही कसर छपाई की मज़बूरियों ने निकाल दी। 'क़' और 'ग़' के बारे में तो मानकीकरण करने वाली संस्थाओं ने मान ही लिया है कि वे हिन्दी के 'क' और 'ग' में घुल-मिल गए हैं - तो कसाई', 'कागज़' बोलिए और वैसा ही लिखिए। और "..'ख़' लगभग हिन्दी ‘ख’ में खपने की प्रक्रिया में है और शेष दो (ज, फ़) धीरे-धीरे अपना अस्तित्व खोने/बनाए रखने के लिए संघर्षरत हैं'' (पृष्ठ 13, केंद्रीय हिंदी निदेशालय, 1989) आप अध्यापक हैं या माता-पिता हैं - आप ही निर्णय लें कि आप किस तरफ संघर्ष करना चाहते हैं

चंद्रबिन्दु की स्थिति
यह तो स्पष्ट हो ही गया होगा कि कब कौन-सी ध्वनि किस भाषा की कहलाएगी और उसको लिखने के लिए कौन-सा वर्ण वर्णमाला में रखा जाएगा, यह निर्णय राजनैतिक है। खैर छपाई की राजनीति ने काम काफी सरल कर दिया है: 'ड' और 'कृ' को छोड़कर शायद ही आपको किसी वर्ण के नीचे बिन्दी दिखाई दे। चंद्रबिन्दु भी आपको कहीं दिखाई नहीं देगा। और कई जगह तो पूर्ण-विराम की जगह आपको फुल स्टॉप ही देखने को मिलेगा। ‘ख’ अब ‘ख’ लिखा जाता है, सोचिए क्यों? आखिर ‘रव' के साथ भ्रम होने का प्रश्न आज ही तो न उठा होगा?

केवल भ्रम से बचने के लिए ही ध्वनि या वर्गों का लेखा-जोखा नहीं होता। आखिर
आदि में काफ़ी अंतर है। यदि व ‘क़', 'ख़', ‘ज़' ‘ग़' ‘फ़' को निकाल दिया जाए तो काफ़ी गुंजाइश बन जाती है शब्दों के अर्थ में भ्रम की।

"किंतु जहां चंद्रबिन्दु के प्रयोग से छपाई आदि में बहुत कठिनाई हो और चंद्रबिन्दु के स्थान पर बिंदु का प्रयोग किसी प्रकार का भ्रम उत्पन्न न करे, वहां चंद्रबिंदु के स्थान पर बिंदु प्रयोग की छूट दी जा सकती है”

(पेज 13, केंद्रीय हिंदी निदेशालय,1989) अंग्रेजी के शब्द सही लिखने के लिए वर्णमाला में कुछ जोड़ना भी पड़े तो चलेगा। चंद्रबिन्दु तो हटा दिया, लेकिन वृतमुखी (०) जोड़ दिया यथा हॉल, डॉक्टर, कॉलिज आदि

वर्तनी के दोहरे प्रचलन
बड़ी ही जटिल व्यवस्था है वर्तनी के नियमों की। संयुक्त-वर्ण कैसे लिखे जाएंगे; हलन्त का क्या औचित्य है? ‘श्रीमान्’, ‘महान्' लिखें या ‘श्रीमान', ‘महान' या दोनों ही चलने दें। 'र' को आपने 'ऋ' व 'अ' में देखा।

और भी कई समस्याएं सुलझानी हैं पांच-छ: साल के बच्चे को जो हिन्दी की लिपि सीख रहा है। स्वरों का रूप कहां 'आ', 'इ', 'ई' आदि होगा और कहां इन्हें मात्राओं से दिखाया जाएगा; ‘गयी' सही है या ‘गई' या दोनों; ‘द्वितीय' सही है या 'दृवितीय' या ‘द्वितीय'; ‘कुत्ता' सही है या ‘कुत्ता' या ‘कुत्ता'। विभक्ति-चिहून सर्वनाम के साथ लिखें या नहीं - ‘आपके लिए लेकिन 'आप ही के लिए। 'ऐ' और ‘औ' का क्या-क्या उच्चारण हो सकता है - ‘कैसा', 'गवैया', 'और', 'कौवा'।

वर्तनी की जटिलता के कुछ और उदाहरण देखिएः

रम
मर
आरती
क्रम, भ्रम, द्रव्य, ग्राम
ट्रक, ट्रेन, ड्रम, ड्रामा
गर्म, धर्म, शर्म, कर्म

क्या ‘रम' का 'र' वही है जो ‘मर या आरती' में है? हर बच्चा जानती है कि 'मर' व 'आरती' का 'र' स्वर रहित है; ‘रम' के 'र' में 'अ' हैदेखने व लिखने में लेकिन बराबर।

'र' पैर में या सिर पर तब जाता है जब संयुक्त व्यंजनों का हिस्सा होता है। संयुक्त व्यंजनों में यदि पहला ‘र' है तो सिर पर जैसे -‘गर्म'; यदि दूसरा 'र' है तो पैर में जैसे - ‘क्रम'; और यदि दूसरा 'ट' वर्ग के साथ है तो रूप ऐसा जैसा कि ‘ट्रक' में हैआखिर यह जटिल नियम कौन जानता है; कौन बच्चों को सिखाता है? लेकिन हर बच्चा स्वयं लिखित सामग्री से यह नियम बना लेता है।

‘क्रम' व 'कर्म' में बच्चे गलती नहीं करते। शायद ही कोई बच्चा हो जो ‘ग्राम’ को ‘गार्म' लिखे। हां, यह तो हम लोग खुद ही नहीं जानते कि ‘गरदन' सही है या 'गर्दन'; 'गरम' या ‘गर्म'; ‘सरदी' या 'सर्दी': ‘कुरसी' यो ‘कुर्सी'; ‘बरतन' यो ‘बर्तन'।

सच बहुत ही जटिल है वर्तनी व्यवस्था। कहीं-कहीं तो बहुत साफ़ नियम हैं। चेतन स्तर पर अक्सर ये नियम हमें मालूम नहीं होते। लेकिन हर हिन्दी पढ़ने-लिखने वाला व्यक्ति ये नियम स्वयं अलग-अलग रास्तों से बना लेता है। लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जिसका कोई तर्क संगत आधार नहीं। दोनों परिस्थितियों में बच्चे को खुद सीखना है और उसमें सीखने की क्षमता है। ध्वनि -व्यवस्था लिपि व्यवस्था से कहीं अधिक जटिल है। और वहां तो कुछ ऐसा भी नहीं जो स्थाई हो। स्वाभाविक प्रश्न है - अध्यापक का क्या रोल है? यही कि सीखने-सिखाने की प्रक्रिया को समझे, बच्चे की क्षमता को समझें और बच्चे को अधिक-से-अधिक रुचिकर सामग्री दें।


रमाकांत अग्निहोत्रीः दिल्ली विश्वविद्यालय के कला संकाय में भाषा विज्ञान पढ़ाते हैं। एकलव्य के प्राथमिक शिक्षा कार्यक्रम से शुरुआत से जुड़ाव।
चित्र: माधुरी पुरंदरे। माधुरी पुरंदरे पूना में रहती हैं।


इस लेख के लिए निम्न पुस्तकें संदर्भित की गई हैं।

  1. देवनागरी लिपि तथा हिन्दी वर्तनी का मानकीकरण, 1989, केन्द्रीय हिन्दी निदेशालय, मानव संसाधन विकास मंत्रालय, नई दिल्ली।
  2. मानक हिन्दी का स्वरूप, भोलानाथ तिवारी, 1996, प्रभात प्रकाशन, दिल्ली
  3. देवनागरी लेखन तथा वर्तनी व्यवस्था, लक्ष्मी नारायण शर्मा, 1976, केन्द्रीय हिन्दीसंस्थान, आगरा।

भूल सुधारः संदर्भ के पिछले अंक में बच्चों की भाषा सीखने की क्षमता' लेख में पेज 11 पर दूसरे स्तंभ के दूसरे पैरे का शुरुआती वाक्य कुछ इस तरह थाः "व्यंजन-स्वर, स्वर-व्यंजन का क्रम बना रहे, यानी दो स्वर या दो व्यंजन साथ साथ आएं इस व्यवस्था के लिए अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग प्रावधान करती हैं।'' इस वाक्य में 'न' छूटा था, वाक्य इस तरह होना चाहिए थाः

व्यंजन-स्वर, स्वर-व्यंजन का क्रम बना रहे, यानी दो स्वर या दो व्यंजन साथ साथ न आएं इस व्यवस्था के लिए अलग-अलग भाषाएं अलग-अलग प्रावधान करती हैं।'' इस भूल के लिए हमें खेद है।

- संपादक मंडल