लॉयाड विलियम टेलर एवं फोंरेस्ट ग्लेन टकर

चुम्बक और लोहे के बीच आकर्षण की बात से हम बखूबी वाकिफ हैं। यह बात हमारे लिए इतनी साधारण है कि हम भूल जाते हैं कि इस आकर्षण की वजह के बारे में हम आज भी लगभग उतना ही जानते हैं जितना प्राचीन लोग जानते थे। जब स्टील की कोई नालनुमा छड़ किसी लोहे के टुकड़े को खींचती है तो हम कहते हैं कि छड़ चुम्बकीय है। इससे आगे हम नहीं सोचते। इस मामले में हम अपने 2500 साल पूर्व के पुरखों से काफी पीछे हैं क्योंकि वे इस आकर्षण के बारे में काफी सोच विचार करते थे।

"निश्चित तौर पर यह कह पाना मुश्किल है कि चुम्बकीय आकर्षण का सबसे पहला अवलोकन कहां व किसने किया था। यह कहना स्वाभाविक भी है और सही भी लगता है कि ऐसा अवलोकन लौह युग की शुरुआत के बाद हुआ होगा क्योंकि जब लोहे का ही पता नहीं था तो उससे आकर्षण का सवाल ही पैदा नहीं होता।

लिहाजा हम उस दौर की बात कर रहे हैं जहां तारीखें निर्धारित करना बहुत मुश्किल होता है।

शुरुआती परम्पराएं
प्राचीन यूनानी पाण्डुलिपियों में घुमक्कड़ फ्रिजियन खदान फोड़ने वालों व लोहारों (जिन्हें कैबिरी कहा जाता था) के कुछ चमत्कारों का जिक्र आता है। ये लोग उस समय सेमोथ्रेस के इर्द-गिर्द रहा करते थे। इन लोगों की पारलौकिक शक्तियों का एक प्रमाण यह था कि ये लौह अयस्क (जिसे हम लोडस्टोन कहते हैं) के एक टुकड़े से लोहे के कई छल्लों को चिपकाने में समर्थ थे। ये छल्ले एक के नीचे एक लटक जाते थे जबकि इनको जोड़कर रखने वाली कोई चीज़ नज़र नहीं आती थी। सेमोग्रेस के इन छल्लों के बारे में बकौल प्लेटो सुकरात ने कहा था (अपने दोस्त इऑन की वाकपटुता की तारीफ में):

“तुम्हारे अंदर उस पत्थर के समान दिव्यता है जिसे युरिपिडीज़ चुम्बक (मेग्नेट) कहता है। यह पत्थर न सिर्फ लोहे के छल्लों को आकर्षित कर लेता है बल्कि उन छल्लों में ऐसी शक्ति भर देता है कि वे और छल्लों को आकर्षित कर लें। और इन सभी (छल्लों) को यह शक्ति मूल पत्थर से मिलती है। इसी प्रकार से म्यूज़ (संगीत की देवी) पहले मनुष्यों को प्रेरित करती है और इन मनुष्यों से अन्य मनुष्यों को प्रेरणा मिलती है।”

प्लेटो ने सेमोग्थ्रेसियन छल्लों का जिक्र सर्वप्रथम ईसा पूर्व चौथी सदी में किया था और इसके बाद के साहित्य में इनका जिक्र बार-बार आता है। कैबिरी, जिन्होंने सबसे पहले इन छल्लों को बनाया व प्रदर्शित किया था, धीरे धीरे मिथकीय परम्परा में धरती के अंदर रहने वाले बौनों के रूप में स्थान पा गए। दरअसल ये लोग खदानों से लोहा निकालकर बर्तन और आभूषण बनाने का काम करते थे। ग्रिम ने अपनी कहानी ‘स्नोव्हाइट एण्ड सेवन ड्वाफ्स' के जरिए कैबिरी लोगों को अमर कर दिया। इस कहानी को बाद में वॉल्ट डिज़नी ने भी प्रस्तुत किया।

'मैग्नेट' शब्द की उत्पत्ति
'मैग्नेट' शब्द की उत्पत्ति को लेकर कई अटकलें लगाई गई हैं। 'प्लाइनी' की कहानी के मुताबिक लोडस्टोन की खोज 'मेग्नस' नाम के एक चरवाहे ने की थी। उसके जूतों में कीलें लगी हुई थीं। जब उसके जूतों पर तथा लोहे की टोपी वाले डंडे पर एक रहस्यमयी खिंचाव महसूस हुआ, तो उसने छानबीन करते हुए लोडस्टोन खोज निकाला। यह कहानी संदिग्ध लगती है। ज्यादा सम्भावना इस बात की है कि 'मैग्नेट' शब्द मैग्नीशिया से बना है। लुक्रिशियस के अनुसार लोडस्टोन की खोज मैग्नीशिया नामक स्थान से हुई थी

अंग्रेजी नाम की अपेक्षा चुम्बक के स्पैनिश व फ्रेंच नाम ज्यादा गुण वाचक हैं -- ला'आइमान्ट और आइमान इनका अर्थ होता है प्रेमी पत्थर। सियामीज़, चीनी व संस्कृत में जो शब्द हैं वे तो और भी विशिष्ट हैं क्योंकि उनसे यह पता चलता है कि इस पत्थर का प्रेम सिर्फ लोहे से है।

प्राचीन लोग लोडस्टोन के लोहे के प्रति आकर्षण को अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे। ऊपर दिए गए उद्धरण में प्लेटो ने प्रतिभा की तुलना चुम्बकीय गुण से की है। इसके बाद के तमाम लेखक लगभग दो हजार वर्षों तक मानते रहे कि चुम्बकीय आकर्षण का ताल्लुक किसी यांत्रिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक विश्व से है।

यदि दो वस्तुएं छू रही हों और उनके बीच बल लग रही हो, तो कोई अचरज की बात नहीं थी। मगर दूर दूर रखी चीज़ों के बीच, बगैर किसी प्रकट जुड़ाव के, बल लगे तो मामला ही बदल जाता है। और इस तरह के रहस्यमय प्रस्तुतिकरण में हैरत जैसी कोई बात नहीं है। गुरुत्वाकर्षण की अवधारणा के विकास से पूर्व यह मानने का कोई आधार भी नहीं था कि दूर दूर स्थित चीजों के बीच बल लगना कोई अपवाद नहीं बल्कि सार्वभौमिक नियम है।

चुम्बकत्व के प्रथम अवलोकन
जिस प्रथम दार्शनिक ने चुम्बकीय बल पर संजीदगी से गौर किया वह एशिया माइनर के प्राचीन शहर मिलेटस का निवासी था। वह एक चलती-फिरती दंतकथा के समान था और अवश्य ही असाधारण व्यक्ति रहा होगा। उसका नाम था थेल्स। वह सातवीं व छठी सदी ईसा पूर्व में कभी हुआ। उसकी सारी रचनाएं (यदि रही हों तो) लुप्त हो चुकी हैं और उसके बारे में हम जो कुछ भी जानते हैं वे उसके टीकाकारों के माध्यम से ही जानते हैं। अलबत्ता हर युग के रचनाकारों ने थेल्स को दर्शन का जनक माना है। थेल्स का मत था कि गति करना अथवा अन्य वस्तुओं में गति उत्पन्न कर पाना अपने आप में इस बात का प्रमाण था कि उस वस्तु में आत्मा है। लिहाज़ा, बकौल अरस्तू, थेल्स का विचार था,

"चुम्बक में आत्मा होती है क्योंकि वह लोहे में गति उत्पन्न कर देता है।"

यह एक नया व सर्वथा मौलिक विचार था। हमें लगता है उससे ज्यादा। थेल्स के समय तक (और उसके बाद भी काफी समय तक) चुम्बकीय क्रिया को जादू की श्रेणी में रखा जाता था। ऐसे मामलों में सामान्य व्यक्ति सोच भी नहीं सकता था वरना ईश्वरीय कोप का सामना करना पड़ सकता था। किन्तु यदि चुम्बक में इंसानों के पशुओं की तरह, आत्मा का वास है। तो अलग बात है। अपने या अन्य किसी के असबाब (संपत्ति, जायदाद) के बारे में विचार करना उतना बड़ा पाप नहीं है। लिहाजा चुम्बकत्व वह पहली कुदरती परिघटना थी जिसकी खोजबीन संभव थी। तद्नुसार इसने वैज्ञानिक विचारों को पहली प्रेरणा दी। वैसे यह विचार अगले तेईस सौ सालों तक परवान नहीं चढ़ने वाला था।

चुम्बकीय आकर्षण की व्याख्या
पहला सवाल तो यही था कि यह चुम्बकीय आकर्षण होता कैसे है; इसकी क्रियाविधि क्या है? इस सवाल का पूछा जाना ही अपने आप में महत्वपूर्ण था। हमें तो शायद यह एक स्वाभाविक व अपरिहार्य-सा सवाल लगेगा किन्तु प्राचीन लोगों के लिए तो यही विचार सम्भावनाओं से भरपूर था कि आप एक यांत्रिक व्याख्या की तलाश करे सकते हैं या कोई यांत्रिक हल व्याख्या का काम कर सकता है। बहरहाल इन सम्भावनाओं के साकार होने में अभी कई सदियां बीत जानी थीं।

अलबत्ता, इस नए रवैये के जो फल प्राप्त हुए थे, वे बीसवीं सदी की कसौटी पर, बहुत ज्ञानवर्धक नहीं कहे जा सकते। कुछ शुरुआती व्याख्याएं तो आज हवाई किले जैसी लगती हैं। एपिक्यूरियस (342-270 ईसा पूर्व) का कहना थाः

"लोडस्टोन या चुम्बक लोहे को इसलिए आकर्षित करता है क्योंकि इससे (लोडस्टोन से) निरंतर बहने वाले कण, जो कि सभी पदार्थों से बहते रहते हैं, लोहे से बहने वाले कणों के साथ विशेष समरूपता रखते हैं और टकराने के बाद वे आसानी से जुड़ जाते हैं।"

लुक्रेशियस (99-55 ईसा पूर्व) कहता है:

"इसके अलावा यह भी मुमकिन है कि कुछ चीजें
परस्पर चिपकती हैं, जुड़ी हुई और गुंथी हुईं
गोया छल्लों और हुकों से, जो लगता है कि
शायद लोहे और इस पत्थर के साथ भी होता है।"

लुक्रेशियस ने रासायनिक क्रियाओं के दौरान परमाणुओं के जुड़ने की व्याख्या भी इसी आधार पर की थी।

प्लूटार्क (46-120 ईस्वी) ने यह कल्पना की थी कि, “चुम्बक के इर्द गिर्द एक प्रभामण्डल होता है। इस प्रभामण्डल के कणों का आकार लोहे की सतह पर मौजूद छिद्रों से मिलता जुलता होता है। अतः लोहा चुम्बक को बहुत अच्छी तरह जकड़ लेता है। जैसा और कोई पदार्थ नहीं कर सकता।”

लगभग पंद्रह सौ साल बाद देकार्ते ने इस विचार को ही यह कहकर आगे बढ़ाया कि, “चुम्बक की सतह पर पेंच-ही-पेंच होते हैं जो लगातार घूमते रहते हैं। ये पेंच लोहे में मौजूद चूड़ीदार छेदों में कसकर फिट हो जाते हैं।”

तीसरी ईस्वी सदी के एक चीनी दार्शनिक कूफो ने चुम्बकत्व की तुलना स्थिर वैद्युतिक आकर्षण से की थीः

"चुम्बक लोहे को ठीक उसी तरह आकर्षित करता है, जैसे आबनूस सरसों के बीजों को... यह समझ से परे है।"

चौथी ईस्वी सदी में क्लॉडियन ने कहा कि लोहा चुम्बक को जीवन देता है और उसका पोषण करता है; लिहाजा जिस तरह से पशु भोजन की तलाश करते हैं उसी तरह चुम्बक लोहे की खोज में रहता है। यह विचार चुम्बकीय साहित्य में बार-बार उभरता है।

तेरहवीं सदी के पेरेग्रिनस ने सादृश्य की एक विचित्र परिकल्पना का सहारा लिया। इस परिकल्पना में वस्तुओं के बीच आकर्षण के भौतिक बल तथा उनके बीच अन्य समानताओं का जुड़ाव देखा गया। सम्भवतः यह परिकल्पना प्लूटार्क से प्रेरित थी। बहरहाल, पेरेग्रिनस के बारे में हम आगे और चर्चा करेंगे।

प्लाइनी को चुम्बक के उस गुण का पूर्वाभास था, जिसके आधार पर चुम्बक के स्पैनिश व फ्रेंच नाम बने हैं। उसने चुम्बक की क्रिया की व्याख्या इन लफ्ज़ों में कीः

"चुम्बक के समीप आते ही धातु इसकी ओर लपकती है और उसे जकड़ लेती है तथा स्वयं उसके आलिंगन में कस जाती है।

सोलहवीं सदी में कॉर्नेलियस गेमा ने चुम्बक व आकर्षित वस्तु के बीच लचीली रेखाओं की कल्पना की थी। उन्नीसवीं सदी में इस अवधारणा का भरपूर उपयोग किया गया। हालांकि यह असंतोषप्रद है किन्तु आज तक हम इससे बहुत आगे नहीं बढ़े हैं।

किसी ने कहा है कि विज्ञान के विकास के लिहाज़ से एक घटिया सिद्धांत किसी सिद्धांत के न होने से बेहतर है। दरअसल विज्ञान के इतिहास से पता चलता है कि सही सिद्धांतों की तुलना में गलत सिद्धांतों ने विज्ञान की प्रगति में ज्यादा योगदान दिया है। बताते हैं कि एडीसन ने अपने एक सहायक को इस बात पर झिड़का था कि वह अनगिनत असफल कोशिशों में जाया मेहनत पर शिकायत कर रहा था। एडीसन ने उसे कहा था कि अब वह कम-से-कम यह जानता है कि कौन-सी दो हजार चीजें काम नहीं करेंगी, कारगर नहीं होंगी।

हो सकता है कि हम चुम्बकत्व के कुछ सिद्धांतों पर अपनी हंसी रोक न सकें मगर इसी प्रकार निर्लिप्त भाव से उन वैज्ञानिक सिद्धांतों को देखना भी ज्ञानवर्धक होगा, जो आज प्रचलित हैं। कोई भी सिद्धांत यदि सोच को उकसाता है तो वह एक अच्छा सिद्धांत है, चाहे अन्त में उसे सामान्य स्वीकृति से अनुमोदित किया जाए या न किया जाए।

लोडस्टोन को लेकर सबसे अड़ियल विश्वास यह रहा कि यदि इस पर लहसुन का तेल पोत दिया जाए तो इसकी चुम्बकीय क्रिया समाप्त हो जाती है। प्रयोगों के द्वारा बार-बार गलत साबित किए जाने के बावजूद इस विश्वास में कुछ ऐसी बात थी कि यह पंद्रह सौ साल तक प्रचलित रहा। इस विश्वास की उत्पत्ति कहां से हुई, पता नहीं है। मगर एक संभव व्याख्या यह है कि इस गलतफहमी की शुरुआत प्लाइनी से हुई थी। प्लाइनी ने एलियो (अन्य) लिखा था और इसकी नकल करने में गलती से यह एल्लियो (लहसून) हो गया। यह घटना वैसे तो कोई महत्व नहीं रखती किन्तु इसने दिशासूचक यंत्र के ईजाद का सही काल निर्धारित करने में मदद की है।

चुम्बकीय विकर्षण
चुम्बकीय क्रिया का यह एक ऐसा पक्ष था जिसका पता तो बहुत समय से था मगर जिस पर जोर नहीं दिया गया था। वह पक्ष था चुम्बकीय विकर्षण। यदि इसे पर्याप्त महत्व मिलता तो उपरोक्त कई सारे सिद्धांत तुरंत निरस्त हो जाते। संभवतः लुक्रेशियस ने ही सबसे पहले चुम्बकीय विकर्षण का अवलोकन किया था। उसने लिखाः

"ऐसा भी वक्त होता है जब लोहा,
इस पत्थर से दूर जाता है।
भागना चाहता है।
और इसका पीछा करना चाहता है।
मैंने तो देखा है,
तांबे के पात्र के अंदर रखे
सेमोथेसियन छल्लों को नाचते,
लोहे की छीलन को उछलते,
जब यह चुम्बक पत्थर पात्र के नीचे
लाया जाता है,
इतना आतुर होता है लोहा
चुम्बक से दूर भागने को।”

यह एक नया अवलोकन था किन्तु इसके महत्व को चौदह सौ सालों तक नहीं पहचाना गया। इस प्रभाव को चुम्बकों में दो विपरीत ध्रुवों की उपस्थिति की अवधारणा से जोड़कर नहीं देखा गया था। कल्पना यह की गई थी कि लोडस्टोन दो किस्म के होते हैं - एक लोहे को आकर्षित करने वाला और दूसरा विकर्षित करने वाला। प्लाइनी ने दूसरे किस्म के लोडस्टोन को ‘थिएमाइड्स' कहा था और बताया था कि यह इथियोपिया में मिलता है। ऐसे पदार्थ के अस्तित्व की बात तेरहवीं सदी तक प्रचलित रही।

आज हर स्कूली छात्र जानता है कि चुम्बक के दो सिरे होते हैं जिनके चुम्बकीय गुण कुछ मायनों में एक दूसरे के विपरीत होते हैं। इन दो सिरों को आमतौर पर ध्रुव कहा जाता है। ध्रुव यानी Pole शब्द विलियम गिल्बर्ट ने 1600 ईस्वी में दिया। आज यह आम जानकारी की बात है कि असमान ध्रुव एक-दूसरे को आकर्षित करते हैं। तथा समान ध्रुव परस्पर विकर्षण दर्शाते हैं। परन्तु ध्रुवों के अलग-अलग जोड़ों के बीच व्यवहार में अंतर की बात ज्यादा पुरानी नहीं है। इसका पहला जिक्र रॉजर बेकन द्वारा तेरहवीं सदी के मध्य में लिखी गई किताब ‘ओपस माइनर' में मिलता है:

“यदि लोहे को चुम्बक के उत्तरी भाग से स्पर्श किया जाए, तो लोहा जहां भी वह भाग जाए वहां जाता है; .... और फिर यदि चुम्बक का विपरीत हिस्सा लोहे के स्पर्शित हिस्से के पास लाया जाए तो लोहा उससे दूर भागता है।

यह सही है कि इस कथन में चुम्बकीय विकर्षण की बात स्पष्ट रूप में कही गई है मगर इससे चुम्बकीय ध्रुवीयता की एक पूर्ण और स्पष्ट छवि नहीं बनती। दरअसल इस कथन के साथ बेकन ने जो टिप्पणियां की थीं, वे गलत थीं। अलबत्ता बेकन ने ध्रुवीयता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम तो उठाया ही।

दिशासूचक का शुरुआती इतिहास
परन्तु आधुनिक व्यक्ति की नज़र में चुम्बक का सबसे महत्वपूर्ण (उपयोगी) गुण यह है कि चुम्बक लटकाए जाने पर (जब क्षैतिज दिशा में घूमने को स्वतंत्र हो) उत्तर-दक्षिण दिशा में स्थिर हो जाता है। यह दिशासूचक की क्रिया है। हालांकि इसे चुम्बकीय आकर्षण व विकर्षण से जुड़ा माना जाता है किन्तु वास्तव में यह काफी अलग चीज़ है। चुम्बकीय आकर्षण व विकर्षण, बलों का खेल है। जबकि चुम्बकीय घूर्णन बल-घूर्ण (Torque) का मामला है। जब बल व बल-घूर्ण के बीच अंतर स्पष्ट हुआ था, तब मेकेनिक्स विज्ञान में काफी स्पष्टता आई थी। चुम्बकत्व के इतिहास ने इस अंतर को रेखांकित किया।

सौभाग्यवश, चुम्बक के व्यवहार के इन दो पहलुओं का विकास एक दूसरे से कमोबेश स्वतंत्र हुआ। दिशासूचक या इसका कोई आदि-रूप पश्चिम की बजाय पूर्व में पहले दिखाई पड़ता है। परन्तु समुद्री यात्रा में इस यंत्र का उपयोग यकीनन यूरोप में पहले किया गया। ईस्वी सन् 121 में रचित एक चीनी शब्दकोश में विस्तार से बताया गया है कि दक्षिण की ओर इंगित करने का गुण लोहे में कैसे पैदा किया जाता है। इसमें यह भी बताया गया है कि एक पत्थर के उपयोग से सुई में यह गुण उत्पन्न किया जा सकता है। यह दुर्भाग्य की बात है कि प्राचीन रचनाकार अपने द्वारा वर्णित यंत्रों के विस्तृत विवरण को ज़रूरी नहीं समझते थे। यदि ऐसा होता, तो हमें पता चलता कि वैज्ञानिक युग की जड़े अतीत में कहीं ज्यादा गहरी हैं।

ऐसा लगता है कि शुरुआत में चीन में इसका उपयोग भू-शकुन ज्ञानी और जादूगर किया करते थे। वैसे हो सकता है कि इसका उपयोग यात्री तातार में अपने अभियानों के लिए भी करते रहे हों। इस बात का कोई प्रामाणिक रिकॉर्ड नहीं है कि पश्चिम से पहले चीन वासियों ने इस यंत्र का उपयोग नौवहन में किया हो। इस तरह के इस्तेमाल के बारे में सर्वप्रथम चीनी विवरण 1086 से 1099 ईस्वी के बीच मिलता है जब यह कहा जाता है कि कैन्टन व सुमात्रा के बीच विदेशी नाविक इसका उपयोग करते हैं।

पश्चिम मे दिशासूचक का उपयोग
आज यह कहना बहुत मुश्किल है कि पश्चिम में सबसे पहले नाविक दिशासूचक का उपयोग कब और कहां हुआ। इतना ही कहा जा सकता है कि जब साहित्य में दिशासूचक प्रकट हुआ (12वीं सदी के अंतिम वर्षों में) तब तक इसका उपयोग काफी सामान्य हो चुका था। एलेक्जेण्डर नेकहैम (1157 1217) ने पैरिस में 1180 से

शुरुआती कम्पास का सन् 1562 में बनाया गया एक चित्र। एक बड़े से पानी भरे ड्रम में एक कटोरीनुमा बर्तन तैर रहा है। इस कटोरी में चुम्बक रखा है। ताकि वह स्वतंत्र रूप से घूम पाए

1186 के दरम्यान अपने व्याख्यानों में इसका जिक्र किया था और यह जिक्र दिशासूचक में सुधार के सुझाव का था। नेकहैम ने बारहवीं सदी के अंत या तेरहवीं सदी की शुरुआत में लिखी गई अपनी पुस्तक ‘डी यूटेन्सिलिबस' में दिशासूचक को जहाज़ पर एक अनिवार्य यंत्र के रूप में दर्शाया था। इसके पश्चात् दिशासूचक

का ज़िक्र तेरहवीं सदी के मध्य में ब्रुनेटो लातिनी (दान्ते के गुरु) ने किया। मगर रोचक बात यह है कि लातिनी ने दिशासूचक के एक अपेक्षाकृत पुराने व अनगढ़ रूप की बात की है। यह ज़िक्र उसने रॉजर बेकन से मुलाकात के बाद एक पत्र में कियाः

"उसने (रॉजर बेकन ने) मुझे चुम्बक दिखाया, जो एक भद्दा काला पत्थर होता है तथा लोहा इससे स्वतः ही चिपक जाता है। वे इस पत्थर को एक सुई से छुआते हैं, फिर इस सुई को एक तिनके में घुसाकर पानी पर तैरा देते हैं। इस सुई की नोक ध्रुव तारे की ओर घूम जाती है। यदि रात अंधेरी हो, तारे न दिखते हों, न चांद, तो इसकी मदद से जहाजी सही रास्ता पता कर सकते हैं।”

परंतु इससे पहले ही दिशासूचक इतना प्रचलित हो गया था कि इसे तत्कालीन समुद्री आचार संहिता में कानूनी रूप से शामिल कर लिया गया था। बारहवीं सदी के अंतिम दौर की एक ऐसी आचार संहिता में व्यवस्था की गई थी कि यदि कोई जहाज़ी दिशासूचक के साथ छेड़छाड़ करे तो उसे कठोर दण्ड दिया जाए। एक अन्य संहिता में ऐसे अपराध के दोषी जहाज़ी की “यदि जान बख्या दी जाए, तो वह जिस हाथ का ज्यादा इस्तेमाल करता हो, उसे एक चाकू घुसेड़कर मस्तूल से या लकड़ी के किसी अन्य लट्ठे से इस तरह चिपका दिया जाए कि वह हाथ चीरकर ही मुक्त हो सके।''

यहां यह बात गौरतलब है कि उस समय दिशासूचक का इस्तेमाल तभी किया जाता था जब दिशा पता करने के अन्य सारे तरीके नाकाम रहते थे। हर मर्तबा उपयोग करने से पहले इसे चुम्बकित किया जाता था क्योंकि स्टील के स्थायी चुम्बकों का जमाना अभी छ: सौ साल दूर था।

एक मुश्किल और थी। यह विश्वास तो प्रचलित था ही, कि लहसून से चुम्बकीय गुण नष्ट हो जाता है और समस्या यह थी कि लहसून भोजन का एक आम हिस्सा था। इसलिए लोडस्टोन की हिफाजत के लिए जवाबदेह लोग बहुत चौकन्ने रहते थे। इसके लिए भी नियम बनाए गए थे, जिनसे पता

बारहवीं सदी में प्रचलित समुद्री आचार संहिता में कहा गया था कि यदि कोई नाविक दिशा सूचक के साथ छेड़छाड़ करे तो उसे कठोर दंड दिया जाए। उसका हाथ मस्तूल या किसी लकड़ी के लट्टे पर रखकर हाथ में चाकू घुसा दिया जाए। 16 वीं सदी में बनाए गए इस चित्र में कुछ ऐसे ही सजायाफ्ता नाविकों को दिखाया गया है।

चलता है कि दिशासूचक का उपयोग 12 वीं सदी के अंत में काफी प्रचलित था। वैसे तो दिशासूचक के ‘आविष्कारक' के संबंध में दावे तो कई किए गए हैं मगर प्रामाणिक तौर पर इतना ही कही जा सकता है कि इस यंत्र का सबसे पहले उपयोग कब शुरू हुआ होगा।

पेरेग्राइन का खत, डी मेग्नेट
सन् 1229 में चुम्बक के विषय में एक ग्रंथ लिखा गया। इसके रचनाकाल को देखते हुए कहा जा सकता है कि यह इस विषय पर लिखा गया सबसे उल्लेखनीय ग्रंथ है। ऐसा प्रतीत होता है कि उस वर्ष रॉजर बेकन के एक अंतरंग मित्र व सहयोगी पीटर पेरेग्राइन से एक मित्र ने चुम्बक के विषय में पूछताछ की। इसका जवाब पेरेग्राइन ने अपने विख्यात ‘एपिस्टोला डी मेग्नेट' में दिया था। जवाब पाने वाले ने शायद समझा कि यह जानकारी गोपनीय है। लिहाजा इस पत्र का मजमून तो दूर, इसे लिखे जाने की बात भी तीन सौ सालों तक अज्ञात रही। जब इसकी प्रति मिली तब भी अगले तीन सौ सालों तक इसके लेखक को लेकर विवाद रहा। हाल ही में लेखक की पहचान असंदिग्ध रूप से हो पाई है। पेरेग्राइन का यह खत 13 अध्यायों में बंटा हुआ है। इस पत्र की सबसे उल्लेखनीय बात यह है कि (ध्यान दें कि पत्र तेरहवीं सदी में लिखा गया था।) पेरेग्राइन इस बात पर जोर देता है कि यदि कोई चुम्बक के गुणों को समझना चाहता है, तो उसके पास प्रयोग करने का हुनर जरूर होना चाहिए। पेरेग्राइन कहता है कि खोजी को -

"स्वयं हस्तकला में भी दक्ष होना चाहिए ताकि वह इस पत्थर की क्रियाओं से इसके आश्चर्यजनक प्रभाव को समझ सके। क्योंकि अपनी सतर्कता से वह जल्दी ही उन त्रुटियों को सुधार लेगा जो यदि उसमें अपने हाथों के उपयोग का हुनर नहीं है तो शायद वह प्रकृति व गणित के अपने ज्ञान के आधार पर बरसों में नहीं सुधार पाएगा। क्योंकि वैज्ञानिक क्रियाओं में हम काफी कुछ हाथों के उद्यम से खोजते हैं, इसके बगैर हम कुछ भी संपूर्ण या निर्दोष नहीं बना सकते।"

सम्भवतः विज्ञान में प्रभावी प्रयोगों की भूमिका व प्रकृति के संबंध में यह प्रथम ज्ञात वक्तव्य है।

चुम्बकीय धुवीयता और पेरेग्राइन
इसके बाद पेरेग्राइन चुम्बकीय ध्रुवीयता के संबंध में प्रथम स्पष्ट वक्तव्य देता है। वह यह भी बताता है कि यदि लोडस्टोन के एक टुकड़े को तोड़ा जाए तो आप पाएंगे कि टूटी हुई सतहों पर असमान ध्रुव उत्पन्न हो जाते हैं। पेरेग्राइन का वक्तव्य रॉजर बेकन द्वारा कुछ ही वर्षों पहले प्रस्तुत कथन से हर मायने में आगे है - सिवाय एक के। वह यह कि समान ध्रुवों के बीच विकर्षण होता है - इतनी पैनी निगाह वाले व्यक्ति के लिहाज से इसे अनदेखा करना अचरज की बात है।

पेरेग्राइन यह भी बताता है कि एक चुम्बक के इर्द-गिर्द, जिन्हें हम चुम्बकीय रेखाएं कहते हैं, कैसे खींची जाएं।'' दरअसल बल रेखाओं का विचार ही आगामी विकास का पूर्वाभास कहा जा सकता है। इसी के आधार पर तीन शताब्दी पश्चात् कॉर्नेलियस गेमा चुम्बकीय आकर्षण की क्रियाविधि समझाने वाले थे। इन रेखाओं को प्रत्यक्ष देखने का एक आम तरीका यह है कि लोहे का बुरादा चुम्बक के आसपास फैलाया जाए। यह बुरादा एक पैटर्न में जम जाता है। जिसे हम कहते हैं कि यह इन काल्पनिक रेखाओं का प्रदर्शन है। इसके अलावा दिशासूचक की सुई भी इन रेखाओं की स्पर्श रेखा (टेन्जेन्ट) की दिशा में स्थिर हो जाती है। पेरेग्राइन ने इसी सिद्धांत का उपयोग किया था। तरीके का वर्णन वह इन शब्दों में करता है:

“एक सुई को पत्थर (लोडस्टोन) पर रख दीजिए, लोहे की लंबाई के समानांतर। अब एक रेखा खींचिए। इसके बाद सुई को पत्थर पर किसी अन्य जगह पर रखें और इसकी स्थिति के अनुसार पत्थर पर एक और रेखा खींच दें। और यदि आप चाहें, तो ऐसा पत्थर पर कई जगहों पर कीजिए। और नि:संदेह ये सभी रेखाएं दो बिन्दुओं पर मिलेंगी, जिस तरह से सारी देशांतर रेखाएं धरती के दो विपरीत ध्रुवों पर मिलती हैं। इससे आपको पता चल जाएगा कि एक उत्तर है और दूसरा दक्षिण।”

इसका महत्व दोहरा है। आज की तरह उस समय यह बात मानकर काम नहीं चल सकता था कि चुम्बक (चाहे छड़ हो या नाल) के दो ध्रुव उसके दो सिरों पर होते हैं। पेरेग्राइन के ज़माने में चुम्बक दरअसल लोडस्टोन के आड़े तिरछे टुकड़े हुआ करते थे। और जब लोडस्टोन को आकार देना शुरू हुआ तब भी उसे छड़ का नहीं बल्कि गोले का आकार दिया गया। स्वयं पेरेग्राइन ने गोलाकार चुम्बक बनाया था और फिर एक चुम्बकित सुई की मदद से उसके ध्रुव पता किए थे। छड़ चुम्बक के बनने में अभी 130 साल का वक्त था। (तब तक चुम्बकीय सुई ज़रूर बन चुकी थी जो दरअसल में एक छड़ चुम्बक ही है - पर उसे उस स्वरूप में पहचाना नहीं गया।)

चुम्बकीय क्षेत्र: पेरेग्राइन के विचार
परन्तु पेरेग्राइन के विवरण की ज्यादा दूरगामी महत्व की बात चुम्बक

यदि लोड स्टोन को तोड़ा जाए तो टूटी हुई सतह पर नया ध्रुव बनता है इस तथ्य को दिखाता हुआ सन् 1629 का चित्र। पेरेग्राइन ने तो यह भी बताया था कि टूटी हुई सतह पर विपरीत ध्रुव बनते हैं।

पेरेग्राइन के अनुसार लोड स्टोन के इर्द-गिर्द फैली चुम्बकीय बल रेखाओं को पता करने का एक आसान तरीका है: लोड स्टोन के चारों ओर लोहे को बुरादा छिड़का जाए। बुरादा एक निश्चित पैटर्न में जम जाता है। यह चित्र लगभग तीन सौ साल बाद 1 629 में बनाया गया।

चुम्बक के इर्द-गिर्द विभिन्न स्थानों पर रखी गई चुम्बकीय सुई की स्थिति कैसे होगी उसके बारे में पेरेग्राइन की

के इर्द-गिर्द बल रेखाओं की उपस्थिति का विचार था। यह कहना अतिशयोक्ति न होगी कि बेल क्षेत्र की अवधारणा चुम्बकत्व व विद्युत के पूरे सिद्धांत के विकास में सबसे सशक्त रणनीति रही है। पेरेग्राइन इस अवधारणा की सम्भावनाओं को समझ पाने की स्थिति में तो नहीं था किन्तु उसने इस अवधारणा को एक ठोस अवलोकन की बुनियाद देकर इसे वैज्ञानिक रूप से निहायत उपयोगी ज़रूर बना दिया। तेरह सौ साल पहले लुक्रेशियस ने चुम्बक के निकट लोहे की छीलन में हरकत की बात कही थी तथा पेरेग्राइन से कुछ वर्ष पूर्व किसी इतालवी कवि ने अटकल लगाई थी कि लोडस्टोन व लोहे के बीच मौजूद हवा आकर्षण में कुछ भूमिका अदा करती है। परन्तु इनका कोई वैज्ञानिक महत्व नहीं था। पेरेग्राइन ने इस विचार को निश्चित रूप दिया तथा ध्रुवीयता व बल क्षेत्र के बीच संबंध स्थापित किया। इसकी बदौलत आगे का काम संभव हुआ जो वाकई विद्युतीय सिद्धांत की जान है।

धुरी पर टिकी चुम्बकीय सुई का पहला चित्रण जो आज हमारे पास है। पेरेग्राइन द्वारा 1269 में लिखी गई ‘एपिस्टोला डी मेग्नेट' में यह चित्र बनाया गया है।

पेरेग्राइन की दिशासूचक सुई
पेरेग्राइन के ग्रंथ में ही हमें धुरी पर टिकी सुई वाले दिशासूचक का प्रथम विवरण व चित्र मिलता है। नेकहैम ने करीब दो पीढ़ी पूर्व ही इस यंत्र का जिक्र किया था और संभवतः इस दरम्यान इसका व्यापक उपयोग होने लगा था। अलबत्ता पेरेग्राइन ने ही पहली बार इसे बनाने की विधि तथा इसका चित्र प्रस्तुत किया।

गोया हमें यह याद दिलाने के लिए कि वह तेरहवीं सदी का बाशिन्दा है. पेरेग्राइन ने ‘एपिस्टोला डी मेग्नेट' का समापन एक चुम्बकीय शाश्वत गतिशील मशीन के विवरण से किया है। पेरेग्राइन को लगता था कि यदि उसकी चुम्बकीय गेंद को ठीक से धुरी पर टिकाकर संतुलित कर दिया जाए, तो वह प्रत्येक चौबीस घंटे में एक बार घूमेगा, जैसे कि चुम्बकीय ब्रह्माण्ड गोल घूमता है। इस मशीन का एकमात्र उपयोग, पेरेग्राइन के हिसाब से घड़ी के रूप में था। पेरेग्राइन ने यह भी चेतावनी दी थी कि पहली कोशिश असफल रहने की आशंका है (क्या वह अपने अनुभव से कह रहा था) - इसे (नाकामी को) प्रकृति का नहीं, अपनी कुशलता का दोष मानना।''

इस कमजोर चेतावनी के साथ ही विज्ञान का यह महत्वपूर्ण दस्तावेज़ समाप्त हो जाता है। इसके बाद पेरेग्राइन के बारे में कुछ नहीं सुना गया।

(शेष अगले अंक में जारी)


लॉयड विलियम टेलर व फोरेस्ट ग्लेन टकर द्वारा सर्वप्रथम यह लेख ‘फिज़िक्स -- द पायोनियर साइंस' में सन् 1944 में प्रकाशित किया गया। मौजूदा लेख टचस्टोन पब्लिशिंग कम्पनी द्वारा 1972 में प्रकाशित, 'द रियल्म ऑफ साइंस' के खंड 8 से साभार अनुदित।

अनुवादः सुशील जोशीः एकलव्य के होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम तथा स्रोत फीचर सेवा से संबद्ध। साथ ही स्वतंत्र विज्ञान लेखन व अनुवाद करते हैं।

रियल्स ऑफ साइंस में कुल 20 खंड हैं। इन खंड़ों में प्रकाशित सामग्री को पांच प्रमुख समूहों में बांटा गया है : द नेचर ऑफ साइंस, द नेचर ऑफ मैटर एंड एनर्जी, द नेचर ऑफ स्पेस, द नेचर ऑफ अर्थ एन्वायरनमेंट और द नेचर ऑफ लाइफ।