महेश बसेड़िया

पिछले कुछ समय से हम लोग बछवाड़ा (होशंगाबाद ज़िले का एक गाँव) की प्राथमिक शाला में बच्चों के साथ भाषा एवं गणित सम्बन्धी गतिविधियाँ करते रहे हैं। इन गतिविधियों के दौरान उस शाला के शिक्षक साथी भी हमारे साथ होते हैं। हमारे पास शब्द कार्ड, कविता पोस्टर, संख्या कार्ड, कुछ अभ्यास कार्ड, बहुत सारी रोचक किताबें आदि काफी सारी सामग्री होती है। कुल मिलाकर हमारी कोशिश यह होती है कि बच्चे गणित की सामान्य क्रियाएँ समझ पाएँ और साथ ही अपनी बात या विचारों को कह सकें, लिख सकें।
ऐसे ही एक दफा हम शिक्षकों के साथ अभ्यास सामग्री पर चर्चा और उसके उपयोग पर बातचीत के लिए बछवाड़ा के प्राथमिक विद्यालय गए हुए थे। काम पूरा होने के बाद हमारे अन्य साथी और शिक्षक कुछ अन्य मुद्दों पर बातचीत में मशगूल हो गए। उन दिनों ठण्ड पूरे शबाब पर थी। मैं अपनी ठण्ड भगाने के उद्देश्य से पहली कक्षा के 7-8 बच्चों को मैदान की गुनगुनी धूप में ले गया।

लगभग आधे घण्टे तक हम अलग-अलग खेल खेलते रहे। इतनी भागा-दौड़ी करके मेरी ठण्ड तो दूर हो गई थी पर थकान महसूस होने लगी। लेकिन बच्चों में थकान जैसा कुछ भी नहीं दिख रहा था, वे और भी खेलने के लिए तत्पर थे। मेरे सामने समस्या थी - खेल के अलावा और क्या करवाया जा सकता है जिससे मैं भागा-दौड़ी से बच सकूँ। अचानक मुझे एक विचार आया और मैंने बच्चों से मैदान में खड़ी जीप की ओर इशारा करके कहा, “उस पर 4 कहाँ लिखा है?” बच्चे तुरन्त दौड़कर गए और नम्बर प्लेट पर लिखे अंकों में से 4 ढूँढ़कर उस पर उंगली रख दी। 3 कहाँ लिखा है, पूछने पर तुरन्त बता दिया। फिर मैंने उनसे पूछा S कहाँ लिखा है? जीप के पीछे STOP लिखा था। बच्चे पहले नम्बर प्लेट में ढूँढ़ते रहे, नम्बर प्लेट पर MP-04 AA-3064 लिखा था। एक बच्चे ने 6 पर उंगली रखकर कहा, “ये है।” दूसरे बच्चों ने कहा, “नहीं यह 6 है।” मैंने उन्हें चुनौती देते हुए कहा, “यदि तुम लोग हार मान लेते हो, तो मैं बता देता हूँ च् कहाँ लिखा है।” बच्चों ने जोश में कहा, “नहीं, हम ढूँढ़ लेंगे।” वे ढूँढ़ने लगे। आखिरकार एक बच्चे ने STOP में से S पहचान लिया। मैंने सभी बच्चों को शाबाशी दी।

मैंने बच्चों से पूछा, “मैं अब जो भी पूछूँगा, वह जीप पर कहीं भी लिखा हो सकता है। ये बहुत कठिन काम है, तुम लोग कर पाओगे कि नहीं?” सभी ने उत्साह से कहा, “पूछिए?” मैंने शुरुआत में बड़े आकार में लिखे आसानी से ढूँढ़े जा सकने वाले अक्षरों और अंकों के बारे में पूछा। मैंने गौर किया - बच्चे यह देखने की कोशिश करते थे कि मैं कहाँ-कहाँ जीप को ध्यान से देख रहा हूँ, वहीं से वे तलाशना शु डिग्री करते थे, और बताने में सफल हो जाते थे। बच्चों की यह जुगत समझ में आने के बाद मैं जीप के चारों ओर घूमते हुए उनसे पूछने लगा। सारे बच्चे मुझ पर नज़र गड़ाए मेरे साथ घूमते लेकिन वे गच्चा खा जाते। उन्हें ढूँढ़ने में कई बार बहुत समय लगने लगा। एक-दो बार मुझे ही बताना पड़ा। धीरे-धीरे उन्होंने अपनी एक प्रवृत्ति पर काबू पाया -- उदाहरण के लिए, मैं टायर पर लिखा हुआ अक्षर, अंक या शब्द एक बार पूछ लेता था तो अगला शब्द या अक्षर पूछने पर वे खोजबीन टायर से शु डिग्री करते थे। लेकिन जब उन्हें समझ आया कि नए शब्द के स्थान और पिछले शब्द के स्थान में लगातार फर्क निकल रहा है तो सभी बच्चों ने टायर से ढूँढ़ना शुरु करके यहाँ-वहाँ बिखरकर खोजबीन शु डिग्री की।
इसी दौरान एक मज़ेदार बात हुई। मैंने बच्चों से पूछा, “जीप में कितने चके होते हैं?” सभी ने तपाक से कहा, “4”। मैंने उन्हें जीप में पीछे लगे स्टेपनी वाले चके को दिखाकर कहा, “इसे मिलाकर 5 चके नहीं हो गए?” थोड़े से असमंजस के बाद बच्चों ने कहा, “लेकिन सर, जीप चलती तो 4 चकों पर ही है।” उनके तर्क में भी दम था।

कुछ अनपेक्षिप बातें सामने आईं जैसे मैंने पूछा Z कहाँ लिखा है? बच्चों ने जीप पर अलग-अलग जगह लिखे Z ढूँढ़कर बता दिए। तब मैंने उनसे कहा एक और जगह Z लिखा है, ज़रा उसे भी तो खोजकर दिखाओ। थोड़ी देर में बच्चों ने उस Z को भी ढूँढ़कर दिखा दिया।
मैंने सोचा अब बच्चों से संख्या सम्बन्धी सवाल पूछे जाएँ। उनसे आसान-से सवाल मसलन खिड़की दरवाज़ों की संख्याएँ पूछीं। फिर मैंने बच्चों से जीप के पिछले चके में लगे नट-बोल्ट गिनकर बताने को कहा। मज़ेदार स्थिति थी -- गोलाई में एक-से नट-बोल्ट लगे होने के कारण बच्चे गड़बड़ा जाते थे कि कौन-सा नट-बोल्ट अन्तिम है। वे 5 तक गिनने के बाद फिर से गिनने लगते थे। बार-बार गफलत में फँसने के बाद एक बच्चे ने नट-बोल्ट पर एक हाथ रखकर दूसरे हाथ से एक-एक को गिनकर सही संख्या 5 बता दी।
हमारी नट-बोल्ट गिनाई चल रही थी तभी कक्षा तीसरी का एक बच्चा उत्सुकतावश वहाँ आ गया। उसे भी यह सब देखकर मज़ा आ रहा था। मैंने तब तक बच्चों से एक सवाल किया था कि जीप के चारों चकों में कितने नट हैं? कक्षा पहली के बच्चे एक-एक चके के पास जाकर नट गिन रहे थे। कक्षा तीन के बच्चे ने जल्दी से जवाब दिया- 20 नट। थोड़ी देर बाद पहली कक्षा के दो बच्चों ने आकर बताया 19 नट हैं। यह सुनकर मैं भी आश्चर्य में पड़ गया। जब मैंने खुद हरेक चके के पास जाकर देखा तो पाया कि एक चके में सिर्फ 4 नट थे। तभी मुझे एकाएक याद आया कि कुछ दिनों पहले ही पंचर टायर बदलवाते वक्त एक नट टूट गया था। तब से एक चके में चार नट ही हैं। मैंने तो जीप के चके के पास न जाते हुए बस गुणा करके 20 का अंक प्राप्त कर लिया था, लेकिन बच्चों ने दिखा दिया कि कई बार गणितीय शॉर्टकट की बजाए वास्तविक अवलोकन ज़रूरी होते हैं।

इसके बाद मैं बच्चों से जीप के विभिन्न पुर्ज़ों के बारे में सवाल करने लगा। जैसे मैंने स्टियरिंग व्हील दिखाकर पूछा, “यह किस काम आता है?” बच्चों ने स्थानीय बोली में कहा, “जा चका से गाड़ी मुड़कात हैं।” वे ब्रेक, एक्सीलेटर, एग्ज़ॉस्ट पाइप, वाइपर आदि को पहचानते थे और इनका क्या काम है उससे भी वाकिफ थे।
कितना समय बीत गया था इसका अहसास ही नहीं हुआ। साथियों ने आवाज़ दी तो लगा काफी समय हो गया है। अब बातचीत समेटते हुए मैंने बच्चों से पूछा, “तुम में से किस-किस ने ट्रेक्टर चलाया है?” हालाँकि यह एकदम टाइम-पास सवाल था क्योंकि इतने छोटे बच्चों से ट्रेक्टर चलाने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी। फिर भी बच्चों ने इस सवाल का जवाब जोश से दिया। चार-पाँच बच्चों ने एकदम से कहा, “मैंने चलाया है, मैंने चलाया है।” पूछने पर किसी ने कहा - पापाजी ने खेत में चलवाया था, किसी के चाचा ने चलवाया था। एक बच्चे ने कहा, “जा राकेश ने खड़ो ट्रेक्टर ढुड़का दओ थो, बस फिर जाके पापा ने जाहे खूब मारो थो।”
इतनी बातचीत के बाद बच्चों से विदा लेकर हम सब वहाँ से चल दिए। इस आकस्मिक चर्चा ने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया कि पहली के बच्चे भी अपने आस-पास की चीज़ों में कितनी रुचि रखते हैं, कितनी जानकारी रखते हैं उन सब के बारे में।
क्यों न हम बच्चों के इस नैसर्गिक गुण को विकसित करने में सहयोग दें? उन्हें विभिन्न तरह के उपकरण जैसे सायकिल, मोटर सायकिल, टी.वी., रेडियो, कम्प्यूटर, मोबाइल, घड़ी इत्यादि देखने दें, इन सबके बारे में उनसे चर्चा करें। यदि इनका उपयोग करने में मदद कर सकें तो और अच्छा होगा। याद रखिए प्रत्येक वस्तु बच्चों से संवाद बनाने एवं शैक्षणिक गतिविधियों के काम आ सकती है, भले ही वो एक जीप ही क्यों न हो।


महेश बसेड़िया: एकलव्य के होशंगाबाद केन्द्र पर कार्यरत हैं। बच्चों के साथ विविध गतिविधियों में रुचि। फोटोग्राफी का शौक। सभी फोटोग्राफ: महेश बसेड़िया।