कीर्ति जयराम

प्रारम्भिक साक्षरता परियोजना (ई.एल.पी.), नन्हे बच्चों में शुरुआती पठन लेखन को सुदृढ़ बनाने का एक छोटा प्रयास है। परियोजना के पहले चरण का कार्य, एक साल के लिए, दिल्ली के कुछ नगर निगम विद्यालयों में, जुलाई 2006 से क्रियान्वित किया गया। इन स्कूलों में बिहार, उड़ीसा, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश तथा राजस्थान जैसे राज्यों से आए प्रवासी बच्चों की अधिक संख्या है। स्थानीय बच्चे ज़्यादातर निजी स्कूलों में दाखिला लेते हैं। नगर निगम विद्यालयों की कक्षाओं में बच्चों की आयु में भी काफी अन्तर रहता है, जैसे कि कक्षा-1 में 6 वर्ष से लेकर 10-11 वर्ष तक के बच्चे एक साथ पढ़ते हैं। हाल ही में केन्द्रीय सरकार की शिक्षा नीतियों के तहत अधिक संख्या में बच्चों का नामांकन हुआ है जिसके कारण पहली कक्षा के हर सेक्शन में 50 से 60 बच्चे पाए जाते हैं। ये बच्चे अपने संग अपनी भाषा, संस्कृति और सामाजिक तौर-तरीके कक्षा में लेकर आते हैं, जिसके कारण कक्षा में विभिन्नता के कई स्वरूप दिखाई देते हैं।

शुरुआती कक्षाओं के साथ कार्य करने के दौरान अहसास हुआ कि बच्चे यदि कक्षा के भीतर पढ़ने-लिखने के रोचक, अर्थपूर्ण मौकों से प्रभावित हो जाते हैं, तो वे खुलकर बातचीत में शामिल हो पाते हैं; और अपनी घरेलू भाषा और जीवन अनुभवों को, बिना किसी हिचकिचाहट के कक्षा में प्रयोग करने लगते हैं। रोज़मर्रा की दुनिया को कक्षा की प्रक्रिया में जोड़ने के कारण स्कूल और घर का फासला कम लगने लगता है और बच्चों को, कक्षा के भीतर, स्वीकृति का अहसास मिलता है।

इन अनुभवों की तुलना में स्कूल के औपचारिक पाठ्यक्रम से जुड़ी प्रक्रियाओं के दौरान यही बच्चे सहमे हुए रहते हैं और कक्षा में सक्रिय भूमिका निभाने की बजाय शिक्षकों के निर्देशों का चुपचाप पालन करते रहते हैं। स्कूल और बच्चों की घरेलू भाषाओं में अन्तर तो है ही, साथ ही हम ने यह भी महसूस किया है कि कक्षा का लिखित माहौल भी कई नन्हे बच्चों के लिए अपरिचित है। इस कारण वे लिखने-पढ़ने की प्रक्रिया से किसी तरह का सार्थक जुड़ाव नहीं बना पा रहे थे। कक्षा में बच्चों की संख्या अधिक होने के कारण शिक्षक भी बच्चों की व्यक्तिगत ज़रूरतों और जिज्ञासाओं पर ध्यान नहीं दे पाते।

समय बीतने पर अहसास होने लगा कि कई बच्चे कक्षा की प्रक्रिया में असक्षम रह जाते हैं और धीरे-धीरे शिक्षक में उनके प्रति एक नकारात्मक सोच उभरने लगती है और उन्हें ‘नालायक’ या ‘कमज़ोर’ मान लिया जाता है। ऐसे बच्चे स्वयं भी अपने प्रति हीन भावना और नकारात्मक सोच आत्मसात कर लेते हैं और कक्षा में इनकी भागीदारी न के बराबर हो जाती है। चिन्ताजनक बात यह है कि ऐसे बच्चों की संख्या काफी अधिक थी। शिक्षकों के लिए ये बच्चे एक बहुत बड़ी चुनौती प्रस्तुत करते हैं। इन्हें चाहे परीक्षा में सफलता मिल भी जाए, तो भी ये शिक्षण प्रक्रिया से सार्थक जुड़ाव नहीं बना पाते हैं। इसका प्रमाण तब मिलता है जब उन्हें स्वयं किसी प्रकार की लिखित सामग्री से जोड़ कर उनकी व्यक्तिगत प्रतिक्रिया प्राप्त करने की कोशिश की जाती है। तब स्पष्ट हो जाता है कि वे स्वयं लिखित शब्दों से जानकारी नहीं प्राप्त कर पाते।

वर्तमान विचारधारा
प्रारम्भिक साक्षरता के क्षेत्र में वर्तमान शोध कार्य दर्शाने लगा है कि नन्हे बच्चों का शुरुआती पालन-पोषण और उनके आस-पास के सामाजिक परिवेश का उनकी भाषा सीखने की प्रक्रिया पर गहरा प्रभाव पड़ता है। बच्चे अपने परिवेश से सक्रिय आदान-प्रदान करके अपनी भाषा ग्रहण कर लेते हैं। यहाँ तक कि वे इस भाषा की ध्वनि संरचना के जटिल नियम स्वयं ही, बिना किसी के सिखाए, सीख लेते हैं और पूर्ण रूप से अपनी मातृभाषा आत्मसात करने के बाद ही स्कूल में प्रवेश करते हैं। इस सोच के अन्तर्गत बाल अवस्था में ही बच्चे सामाजिक परिवेश से अर्थ निर्माण करने के तौर-तरीके सीख लेते हैं और इन्हें अपने दैनिक जीवन के अनुभवों पर लागू करके, आस-पास की दुनिया को समझने का प्रयास करते हैं। मौखिक भाषा उनकी जिज्ञासा, उनके विचार, अभिव्यक्ति, कल्पना और प्रश्न प्रकट करने का माध्यम बन जाती है, और इस भाषा का प्रयोग कर के वे अपनी भाषाई क्षमताएँ सुदृढ़ बनाते जाते हैं।

प्रारम्भिक साक्षरता के साहित्य के अन्तर्गत जिन बच्चों के घर और रोज़मर्रा के जीवन में लिखित भाषा का प्रयोग किया जाता है, वे लिखित भाषा के प्रयोग के कुछ तौर-तरीके और इसके दैनिक जीवन में मायने, स्कूल में कदम रखने से पूर्व ही ग्रहण कर लेते हैं। उदाहरण के तौर पर, वे पहचान लेते हैं कि लिखने-पढ़ने की प्रक्रिया एक अर्थपूर्ण प्रक्रिया है और जो बात बोल कर कही जाती है उसे लिखकर कई लोगों तक, अथवा लम्बे समय तक के लिए, पहँुचाया जा सकता है। वे लिखित शब्दों का प्रयोग भी अपने स्वाभाविक तरीकों से करते हैं, चाहे वह अखबार या पुस्तक पढ़ने का अनुकरण हो, चिट्ठी लिखने का नाटक हो या अपनी उँगली को बाँए से दाएँ की ओर चलाकर कहानी पढ़ने की कोशिश। उच्चारित शब्दों का लिखित शब्दों से तालमेल बने या न बने, उन नन्हे बच्चों के लिए ये सब पठन के वास्तविक अनुभव बन जाते हैं।

‘इमरजेण्ट लिट्रेसी’ (Emergent Literacy) के परिप्रेक्ष्य में उपरोक्त दर्शाए गए अनुभवों की अहम भूमिका को पहचानते हुए यह माना गया है कि शुरुआती बाल अवस्था में ही पठन-लेखन की नींव स्थापित हो जाती है। दरअसल, इस सोच का मानना है कि जिन बच्चों को अपने घरों और आस-पास से लिखित माहौल और लिखित शब्द प्रयोग करने के मौके मिलते हैं, वे अपने बचपन के पहले दो या तीन वर्ष में ही लिखित जगत से एक अर्थपूर्ण रिश्ता कायम कर लेते हैं। इस विचारधारा का मानना है कि यह भविष्य में उनकी औपचारिक शिक्षा प्रणाली और पठन-लेखन सीखने की प्रक्रिया में अति प्रभावशाली और फायदेमन्द साबित होता है।

जहाँ एक तरफ शोध कार्य ने दर्शाया है कि हर समाज अपने बच्चों को मौखिक भाषा के विकास और प्रयोग के लिए अनेक मौके और समृद्ध माहौल प्रदान करता है, वहीं यह भी स्पष्ट हुआ है, कि लिखित भाषा के सन्दर्भ में ऐसा नहीं है। यदि कुछ बच्चों को भाषाई तौर से वंचित पाया गया है, तो ऐसा लिखने-पढ़ने के सन्दर्भ में ही पाया गया है; बच्चों की मौखिक भाषा की जानकारी, अनुभवों और प्रयोग करने की क्षमताओं में नहीं। स्कूल की औपचारिक भाषा और बच्चों की रोज़मर्रा की घर की भाषाओं में जो अन्तर होता है वह उनके लिए अकसर बाधा बन जाता है। यदि इस अन्तर को कक्षा के भीतर सम्बोधित नहीं किया जाता है, तब यह कई बच्चों के लिए शिक्षण सामग्री की समझ बनाने में अड़चन पैदा करता है।

जिन बच्चों को घर के माहौल में लिखने-पढ़ने के मौके नहीं मिलते या बहुत कम मिलते हैं, उन बच्चों का शुरुआती भाषाई, सांस्कृतिक एवं सामाजिक विकास ज़्यादातर मौखिक रूप से ही होता है। वर्तमान विचारधारा में प्रारम्भिक साक्षरता को सामाजिक व सांस्कृतिक व्यवहार का दर्ज़ा दिया गया है। इस सोच के तहत स्कूल में प्रवेश लेने पर कई बच्चे अपने आप को अप्रवासी की तरह महसूस करते हैं। पठन-लेखन के तरीकों से अपरिचित होने के नाते वे स्कूल के लिखित संसार से एक सार्थक रिश्ता नहीं बना पाते। जब तक बच्चों को अपने दैनिक जीवन में और अपने परिवार के सदस्यों द्वारा लिखने-पढ़ने का स्वाभाविक प्रयोग करने का अहसास न हो, वे लिखने-पढ़ने के कौशल को केवल यांत्रिक नज़रिए से देखते हैं। यहाँ तक कि प्रारम्भिक साक्षरता के अध्ययन द्वारा देखा गया है कि अमेरिका के लेख-समृद्ध माहौल में भी ‘ऐपलेचियन’ जैसे कुछ समुदायों में पले हुए बच्चे अधिकतर कक्षा के भीतरी लिखित संसार से जुड़ने में असक्षम रहते हैं। इस समुदाय के भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक तौर-तरीके मौखिक हैं। इसलिए ‘ऐपलेचियन’ समुदाय के सदस्यों के घरों और समाज में लिखित भाषा का प्रयोग बहुत-ही कम होता है और इसी कारण, उनके बच्चे अपने शुरुआती बचपन में लिखित संसार से अपरिचित रहते हैं। हाल ही में, प्रारम्भिक साक्षरता की सोच ने स्वीकार किया है कि ‘साक्षरता’ केवल ‘पठन’ और ‘लेखन’ की प्रक्रियाओं तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका गहरा प्रभाव सामाजिक और सांस्कृतिक तौर-तरीकों पर भी पड़ता है।

कक्षा में विभिन्नता के प्रति सोच
पिछले दस वर्षों में हुए शोध कार्य ने साबित किया है कि कक्षा के भीतर बच्चों की असफलता का कारण उनकी क्षमताओं या घर और सामाजिक परिवेश में भाषाई अभाव नहीं है, बल्कि अकसर असफलता का कारण, उनके घर और समाज के, और स्कूल के परिवेश में अन्तर और असमानता होता है। घरेलू भाषा में और स्कूल की भाषा में अलगाव ही कई बच्चों के लिए शिक्षा सामग्री से अर्थपूर्ण रिश्ता बनाने में बाधा उत्पन्न करता है। ‘खड़ी बोली’ या ‘हरयाणवी’ जैसी भाषाओं को कक्षा में प्रयोग की जा रही हिन्दी की तुलना में, कक्षा के भीतर असमानता के नज़रिए से देखा जाता है। इसका बच्चों की शिक्षण प्रक्रिया पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। कक्षा के भीतर विभिन्न भाषाई सन्दर्भों के बच्चे शिक्षकों के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती पेश करते हैं। स्कूल के दायरे में गलती करने की गुंजाइश भी बहुत कम रहती है। इस बन्धन में फँसे हुए नन्हे बच्चे अकसर अपने प्रति हीन-भावना आत्मसात कर लेते हैं।

प्रारम्भिक साक्षरता के कई विशेषज्ञों ने इस बात पर बल डाला है कि, कक्षा में विभिन्न सन्दर्भ से आने वाले बच्चों के सीखने के स्वाभाविक तौर-तरीकों को, उनकी घर की भाषा को, और उनके रोज़मर्रा के जीवन अनुभवों को कक्षा की शिक्षण प्रक्रिया में अहमियत देना अनिवार्य है। इससे प्रत्येक बच्चे को स्कूल के जगत में स्वीकृति मिलती है; उनका आत्मविश्वास बढ़ने लगता है, और वे अपनी हिचकिचाहट और डर को काबू करके कक्षा की प्रक्रिया में भाग लेना शुरू करते हैं।

शुरुआती स्तर के कार्य का स्वरूप
कक्षा-1 में हिन्दी के शुरुआती पठन-लेखन की विधियाँ
ई.एल.पी. का मानना है कि शुरुआती पठन-लेखन के कुछ विशेष आयाम हैं:
-- चिन्ह और ध्वनि का तालमेल
-- लिखित शब्द और मौखिक शब्द का अर्थपूर्ण तालमेल
-- लिखित भाषा और मौखिक भाषा का तालमेल
जो कार्य प्रणाली कक्षा-1 में हिन्दी की शुरुआती साक्षरता के लिए अपनाई गई थी, उसके दो मुख्य बिन्दु हैं:
1.‘वर्ण-समूह’ पर आधारित शब्द पहचान के तौर-तरीके
2. कक्षा में सार्थक और सक्रिय लिखित माहौल

प्रचलित विधियों द्वारा पढ़ने-लिखने की प्रक्रिया को वर्ण माला से शुरु किया जाता है, और फिर पूर्व निर्धारित क्रमबद्ध शब्दों और लेख के माध्यम से, बच्चों को लिखित भाषा की संरचना से परिचित करवाया जाता है। हमने पाया है कि यह तरीके इन नन्हे पाठकों के लिए अपर्याप्त साबित हो रहे थे, और वे अकसर इन तरीकों से देवनागरी लिपि के जटिल नियमों को ग्रहण नहीं कर रहे थे। कक्षा के अनुभवों के दौरान, हमें अहसास हुआ कि लिखित चिन्हों से जुड़ने के लिए, शब्द पहचान के क्रमबद्ध सहयोगी ढाँचे के साथ-साथ, बच्चों को कई प्रकार के सार्थक मुक्त मौके देना बहुत ज़रूरी होता है, ताकि बच्चे लिपि की संरचना के नियमों से, स्वयं ही, धीरे-धीरे सक्रिय और सार्थक प्रक्रिया द्वारा परिचित हो जाएँ।

‘वर्ण-समूह’ विधि का स्वरूप
ये तरीके कक्षाओं में बच्चों के बीच किए गए प्रयोगों पर आधारित हैं। इनमें बहुआयामी विधियों द्वारा वर्ण, अक्षर, शब्द और लेख से, एक साथ ही, बच्चों को परिचित करवाया जाता है। देवनागरी लिपि के वर्णों को, वर्णमाला के क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत नहीं किया जाता है, बल्कि वर्णमाला को 7 समूहों में विभाजित किया गया है, जिन्हें ‘वर्ण-समूह’ कहा जाता है। प्रत्येक वर्ण-समूह में कुछ चयनित व्यंजन, स्वर और मात्राएँ शामिल की गईं हैं। इनका चयन शिक्षकों की भागीदारी, और कक्षाओं में बच्चों के बीच प्रयोग करके किया गया। इसका पहला आधार इनकी ध्वनियाँ और आकार की पृथकता है, ताकि बच्चों को इन्हें पहचानने में सहूलियत मिले। परन्तु वर्ण-समूह के निर्माण में सबसे अहम बात यह है कि वर्ण-समूह में उपलब्ध स्वर, व्यंजन और मात्रा के जोड़ से कई शब्द बन जाएँ, विशेष तौर से इस प्रकार के शब्द जो बच्चों के दैनिक जीवन से जुड़े हों। उदाहरण के लिए वर्ण-समूह 1 में शामिल किए गए वर्णों से परिवार के सदस्यों के नाम बन जाते हैं, जैसे नाना, नानी, मामा, पापा, काका, काकी; या रंगों के नाम - काला, नीला, लाल इत्यादि। वर्ण-समूहों के निर्माण की प्रक्रिया को 4-6 महीने लगे। इन्हें कक्षा में क्रमबद्ध तरीके से प्रस्तुत किया जाता है, ताकि पिछले वर्ण-समूहों में प्राप्त स्वर और व्यंजन को दोहराया जाए। कक्षा-1 में केवल वर्ण-समूह 1 से 6 में शामिल वर्ण और मात्राएँ सिखाई जाती हैं।

इस प्रक्रिया के पश्चात्, वर्ण-समूह 7 के शेष वर्ण, मात्राएँ, संयुक्त अक्षर इत्यादि, बच्चे कक्षा 2 और 3 में शब्द-दीवार, शब्द-गतिविधियाँ और अन्य लिखित सामग्री का प्रयोग करके सीख लेते हैं। ई.एल.पी. के पहले वर्ष के अनुभव ने दर्शाया कि वर्ण-समूह 1 के विभिन्न चिन्ह और ध्वनियों से परिचित होने के लिए बच्चे दो महीने तक ले रहे थे, लेकिन इसके बाद वे बाकी वर्ण-समूह जल्द-ही सीख गए। क्योंकि, बच्चों को कक्षा के भीतर अपनी रोज़मर्रा की व्यवहारिक भाषा को प्रयोग करने की गुंजाइश दी जाती है, वे खुलकर इन विधियों से जुड़ने लगते हैं।
कक्षा-1 में करवाए जाने वाले वर्ण-समूह इस तरह से हैं:

वर्ण-समूहों को समझाने का तरीका
यहां वर्ण-समूह 1 को उदाहरण के तौर से लिया जाएगा, बाकी वर्ण समूहों को भी इसी प्रकार से क्रियान्वित किया जाता है। वर्ण-समूह 1 समझाने के तरीके निम्नलिखित हैं:

1)  बच्चों को वर्ण-समूह में शामिल किए गए प्रत्येक स्वर और व्यंजन की ध्वनि और चिन्ह से, एक-एक करके गतिविधियों द्वारा परिचित करवाया जाता है।

सब से पहले वर्ण के आकार की पहचान के लिए - उसे ब्लैकबोर्ड या स्लेट पर लिखकर, बच्चों को उसके ऊपर उँगली फेरने के लिए कहा जाता है, और इस तरह की अन्य गतिविधियाँ करवाई जाती हैं, ताकि इन्द्रियों के प्रयोग से बच्चे प्रत्येक वर्ण के आकार से परिचित हो जाएँ। बच्चों से ‘क’ वाले शब्द पूछे जाते हैं, चाहे वे किसी भी भाषा में हों। इस विधि से चिन्ह और ध्वनि में सम्बन्ध स्थापित होता है। दो या तीन दिन बाद जब ‘क’ से बच्चे परिचित हो जाते हैं, तब अन्य वर्णों को एक-एक करके इसी तरह सिखाया जाता है।

साथ ही बच्चे प्रत्येक वर्ण से शुरु होने वाले शब्द बतलाते हैं। फिर वर्ण पहचान के लिए श्रुतलेख के तहत बच्चों से वर्ण और अक्षर लिखवाए जाते हैं, फिर उन्हें पढ़वाया जाता है, ताकि बच्चे वर्णों के आकार और ध्वनि का तालमेल आत्मसात कर लें। इस तरह प्रत्येक वर्ण की पहचान कराई जाती है। साथ में शब्द गतिविधियाँ करवाई जाती हैं।
शब्द गतिविधियाँ
-- मैंने अपनी नन्ही आँख से एक चीज़ देखी जो ‘क’ या ‘न’ आदि से शुरु होती है। वो क्या है?
-- ‘क’ से शुरु होने वाले शब्दों के चित्र बनाना।
-- वर्ण समूह में आने वाले शब्द बोलकर पूछना कि वे किस से शुरु होते हैं।
-- ‘रेलगाड़ी’ खेल में बच्चे चयनित वर्ण से शब्द बोलकर ही रेल में जुड़ सकते हैं।
-- ‘हवा चली’ खेल में हवा जिस लिखित शब्द पर रुकती है, उसे बोलना।
इस प्रकार की विभिन्न गतिविधियों द्वारा बच्चे वर्णों और मात्राओं से परिचित हो जाते हैं।

2)  प्रत्येक वर्ण समूह में पाए गए सभी स्वर, व्यंजन और मात्रा के जोड़ से जितने भी अक्षर उपलब्ध हैं, उन्हें ‘अक्षर-चार्ट’ में प्रस्तुत किया जाता है।

विभिन्न इन्द्रियों के प्रयोग से, बच्चों को रोज़ पाँच मिनट के लिए अक्षर-चार्ट के उच्चारण का अभ्यास करवाया जाता है। जैसे, छोटी आवाज़ के लिए मुठ्ठी बन्द, बड़ी आवाज़ के लिए मुठ्ठी खुली। अक्षर-चार्ट से जुड़ी गतिविधियाँ भी करवाई जाती हैं, ताकि बच्चे इसमें दिए गए अक्षरों से अच्छी तरह परिचित हो जाएँ।

3)  वर्ण समूह से प्राप्त कुछ शब्दों को कक्षा की ‘शब्द दीवारों’ में, विषय सम्बन्धी समूहों में प्रदर्शित किया जाता है, और इनसे जुड़ी कई तरह की गतिविधियाँ करवाई जाती हैं। बच्चों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे स्वयं अपने दोस्तों के साथ इस प्रक्रिया को खेल की तरह, कक्षा में जारी रखें।

4)  शब्द दीवार में पाए शब्दों को ‘शब्द ताली’ से तोड़कर उनके अंगों की पहचान करना बच्चों को सिखाया जाता है, और फिर बच्चे इन्हें अक्षर-चार्ट में खोजते हैं। शब्दों की ताल को पहचान कर उन्हें ताली से तोड़ना बच्चे जल्दी सीख लेते हैं।

5)  अपने शब्दों को अक्षर-चार्ट में खोजने के स्वतंत्र मौके बच्चों को दिए जाते हैं, और फिर इन शब्दों के वे चित्र बनाते हैं। बच्चों को अकसर अक्षर-चार्ट एक जादू के चार्ट की तरह दिखने लगता है जिसमें उनके कई शब्द छुपे रहते हैं। इस प्रक्रिया में हर बच्चा अपनी जान-पहचान के शब्दों को ढँूढ़ता है, चाहे वे उसकी घरेलू भाषा में हों। यह बच्चों के लिए एक मज़ेदार शब्द खोज का खेल बन जाता, और इसके ज़रिए बच्चे नए वर्ण, अक्षर और मात्राओं से अर्थपूर्ण शब्द और उनके चित्र बनाते हैं।

परियोजना ने पाया कि धीरे-धीरे ये छोटे बच्चे खूब सारे शब्द लिखने और पढ़ने लगते हैं। शब्द खोज की प्रक्रिया के लिए यह चार्ट हर स्तर के पाठक के लिए एक उपयोगी साधन है। हमने देखा कि स्तर-3 के बच्चे, जो कि सहजता से पढ़ना-लिखना जानते थे, ‘पालक’, ‘मकान’, ‘कालीन’ और ‘नकली’ जैसे शब्द अक्षर-चार्ट में ढूँढ़ लेते हैं; जब कि स्तर-1 के बच्चे ‘नाना’, ‘काकी’ या ‘पानी’, ‘माली’ जैसे शब्द ढँूढ़ पाते हैं।

बच्चों के साथ अक्षर-चार्ट से खोजकर शब्द बनाने की प्रक्रिया को शुरु में ब्लैकबोर्ड पर पूरी कक्षा के साथ, और फिर व्यक्तिगत स्तर पर करवाया जाता है।

6)  प्रत्येक वर्ण-समूह में पाए गए वर्ण और मात्राओं को जोड़कर तीन या चार छोटी-छोटी कविताएँ बनाई हैं। इनका उच्चारण कक्षा में अभिनय के साथ करवाया जाता है। जब बच्चे इन्हें सीख लेते हैं, तब बच्चों को इनके लिखित स्वरूप से, ‘कविता चार्ट’ के द्वारा परिचित कराया जाता है। अब कविता के उच्चारण के साथ-साथ अध्यापिका ‘कविता चार्ट’ पर उँगली रखकर एक-एक लिखित शब्द की ओर बच्चों का ध्यान दिलाती है, ताकि बच्चे समझ सकें कि जिन शब्दों का वे उच्चारण कर रहे हैं, उन्हें वे लिखकर भी अभिव्यक्त कर सकते हैं।

7)  कविता के शब्दों को बच्चे अक्षर चार्ट में खोजते हैं, और इन शब्दों के चित्र भी बनाते हैं। प्रत्येक वर्ण-समूह से जुड़ी कविताओं में केवल उन शब्दों को शामिल किया गया है जो उस वर्ण-समूह अथवा पूर्व आने वाले वर्ण-समूहों में उपलब्ध वर्णों और मात्राओं के जोड़ से प्राप्त होते हैं। उदाहरण के लिए वर्ण-समूह 5 की निम्नलिखित कविता की संरचना में, वर्ण-समूह 1 से लेकर वर्ण-समूह 5 तक से बने शब्दों को जोड़ा है। इन कविताओं द्वारा बच्चों को शब्द निर्माण के कुछ नियम व्यवस्थित और अर्थपूर्ण तरीके से सिखाने का प्रयास किया गया है।

वर्ण-समूह 5 की एक कविता का उदाहरण:

शीला का छाता फट गया
शीला का छाता फट गया
हवा में छाता फट गया
हवा में छाता फट गया
पानी आया टप टप टप
पानी आया टप टप टप
शीला गीली छाता गीला
शीला का छाता फट गया

उपरोक्त कविता में केवल वर्ण-समूह 1 से लेकर वर्ण-समूह 5 में पाए गए वर्णों और मात्राओं से निर्मित शब्दों को शामिल किया गया है।

8)  बच्चों की समझ का समय-समय पर मूल्यांकन किया जाता है, जिसके लिए प्रत्येक वर्ण-समूह पर आधारित विशेष मूल्यांकन प्रपत्र तैयार किए गए हैं। यह मूल्यांकन मुख्यधारा की औपचारिक शिक्षा व्यवस्था की आवश्यकता है, लेकिन इस तरह के औपचारिक मूल्यांकन ने ई.एल.पी को दुविधा में डाल दिया है। जहाँ एक ओर इन विधियों ने छात्रों के पूर्वज्ञान और सीखने के स्वाभाविक तौर-तरीकों को अहमियत देने का प्रयास किया है, वहीं दूसरी ओर यह जटिल सवाल सामने आया है कि क्या शुरुआती स्तर के पाठकों की पठन-लेखन सीखने की स्वाभाविक प्रक्रियाओं को मूल्यांकन के सीमित दायरे में बाँधना उपयुक्त है? परियोजना इस खोज में जुटी हुई है कि मूल्यांकन का कौन-सा स्वरूप प्रारम्भिक स्तर के छात्रों के लिए उपयोगी होगा।

वर्ण समूहों पर आधारित एक सहयोगी, क्रमबद्ध ढाँचा
इस तरह हमने देखा कि वर्ण-समूह विधि के अन्तर्गत बच्चों को देवनागरी लिपि की संरचना के कुछ विशेष नियमों से परिचित कराने का प्रयास किया गया है। इसके तहत नियमित तरीकों से बच्चों को शब्द निर्माण के कुछ नियमों का अहसास दिलाया जाता है। उदाहरण, वर्ण-समूह 1 की पहली कविता में ‘माला’ और ‘लाना’ जैसे शब्द हैं, जिनके लिखित और मौखिक स्वरूप में सीधा तालमेल है, यानी मा अ ला। वर्ण-समूह 1 की दूसरी कविता में ‘नल’ और ‘लप-लप’ जैसे शब्दों को भी शामिल किया गया है। इन शब्दों की लिखित संरचना इस प्रकार है, न्अअअल्अअ; लेकिन बोलते समय अन्तिम ‘अ’ का उच्चारण नहीं किया जाता, यानी न्अअअल्। इसलिए, इन शब्दों के लिखित और मौखिक स्वरूप में तालमेल नहीं है। इस नियम को बच्चे स्वयं ही, इन शब्दों के प्रयोग से सीख जाते हैं।

इसी तरह वर्ण-समूह 1 की तीसरी कविता में ‘आई’, ‘लाई’, ‘आम’ जैसे शब्द शमिल किए गए हैं, जिनमें स्वर के पूर्ण रूप को भी लिया जाता है, आ अ “ई”; “आ” अ म् अ अ । पहले कविता का उच्चारण किया जाता है, और फिर ‘शब्द दीवार’, ‘कविता चार्ट’ और ‘अक्षर चार्ट’ के प्रयोग से, बच्चे कविता के लिखित स्वरूप अथवा शब्द निर्माण के कुछ नियमों से परिचित हो जाते हैं। इस प्रकार, वर्ण-समूह के व्यवस्थित ढाँचे के प्रयोग से बच्चे शब्दों के लिखित और मौखिक रूप और उनके तालमेल को समझने लगते हैं।

लिपि से जुड़े, अनेक प्रकार के स्वतंत्र खोजबीन के मौके
परियोजना का मानना है कि यह प्रक्रिया बहुत-ही महत्वपूर्ण है, क्योंकि इसके तहत बच्चे अपने दैनिक जीवन से जुड़े शब्दों को अक्षर चार्ट में खोजते हैं और फिर चित्र के माध्यम से उनके अर्थ को दर्शाते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान दो बातें सामने आईं। पहली बात यह थी कि एक ही शब्द के लिए, अलग बच्चों ने चित्र बनाकर विभिन्न अर्थ दर्शाए, जो कि उनकी मानसिक सोच और अनुभवों से जुड़े हुए थे। उदाहरण के लिए कुछ बच्चों ने अक्षर चार्ट के अक्षरों को जोड़कर ‘लाली’ शब्द बनाया और फिर ‘लाली’ के चित्र बनाए, लेकिन ये चित्र अलग थे। एक बच्चे ने छोटी बच्ची का चित्र बनाया; दूसरे ने आकाश में लाली बनाई; जबकि, उसके साथी ने होंठों की लाली का चित्र बनाया। यहाँ तक कि, कक्षा के एक नन्हे बच्चे ने अपनी बकरी का चित्र बनाया, क्योंकि उसकी बकरी का नाम ‘लाली’ था।

दूसरी बात जो सामने आई, वह थी कि कुछ बच्चों ने अपनी घरेलू भाषा से उपलब्ध शब्दों को अक्षर चार्ट में खोजकर लिखा। जैसे - माँ के लिए ‘अमी’, बाबा (पापा), पाकी (चिड़िया), कापा (कपड़ा), सीला (शीला) और कीला (कील) इत्यादि।
परियोजना की सोच है कि लिखित भाषा ग्रहण करने के लिए अक्षर चार्ट से शब्द बनाने की गतिविधि की अहम भूमिका है। इसके द्वारा बच्चों को शब्द निर्माण के नियमों से परिचित होने के, और लिखित शब्दों से अर्थपूर्ण रिश्ते बनाने के सक्रिय मौके मिलते हैं। इस प्रक्रिया के दौरान बच्चों को शब्दों की सही वर्तनी स्वयं ही शब्दों का प्रयोग करके ग्रहण करने के लिए समय दिया जाता है, वर्तनी की गलतियों का शिक्षक द्वारा सुधार नहीं किया जाता है। वर्तनी के सुधार के लिए नियमित समय अवधि के दौरान, बच्चों को श्रुतलेख और अन्य शब्द गतिविधियाँ करवाई जाती हैं।

मई-जून सन् 2007 में ‘सर्व शिक्षा अभियान’ के तहत दिल्ली नगर निगम के शिक्षकों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इसके अन्तर्गत हमने लगभग 600 शिक्षकों के लिए 16 प्रशिक्षण कार्यशालाएँ आयोजित की थीं। इनके तहत शिक्षकों से प्राप्त ई.एल.पी. की विधियों पर लिखित फीडबैक में 95% शिक्षकों ने इन विधियों को अपनी कक्षाओं में लागू करने की इच्छा प्रकट की है। कई शिक्षकों ने इन विधियों से जुड़ी सामग्री की माँग भी उठाई है। हमारी कोशिश रही है कि बच्चों के शब्द पहचान के विशेष कौशल को सार्थक और अर्थपूर्ण विधियों द्वारा विकसित किया जाए। साथ में, उन्हें कक्षा के भीतर एक सक्रिय और अर्थपूर्ण लिखित परिवेश भी दिया जाए, जिसके द्वारा वे लिखित भाषा का पर्याप्त प्रयोग, वास्तविक और सार्थक तरीकों से अथवा निडरता से कर सकें। ई.एल.पी. द्वारा कक्षा में समृद्ध लिखित परिवेश विकसित करने का प्रयास ‘संदर्भ’ के अगले अंक में प्रस्तुत किया जाएगा।

(अगले अंक में जारी)


कीर्ति जयराम: प्राथमिक शिक्षा और प्रारम्भिक साक्षरता के क्षेत्र में शिक्षक, शिक्षक प्रशिक्षक के रूप में काफी लम्बा अनुभव है। फिलहाल राजस्थान के ग्रामीण क्षेत्र के सरकारी प्राथमिक शालाओं में चल रहे प्रारम्भिक साक्षरता प्रोजेक्ट और इस से जुड़ी स्रोत सामग्री के निर्माण में व्यस्त हैं।
इस प्रोजेक्ट की विधियां विकसित करने में उन्हें हर्ष और ज्योत्सना का विशेष सहयोग रहा ।
प्रारम्भिक साक्षरता परियोजना (ई.एल.पी.), दिल्ली महानगर पालिका के सहयोग और सर रतन टाटा ट्रस्ट की वित्तीय सहायता से शुरू किया गया एक प्रयास है। परियोजना के पहले चरण का कार्य, दिल्ली महानगर पालिका के कुछ विद्यालयों में जुलाई 2006 से क्रियान्वित किया गया है।