माधव केलकर

पिछले दिनों मेरे दोस्त ने अपने बच्चे के बारे में एक किस्सा सुनाया और मुझसे सलाह भी माँगी। पहले किस्सा सुना देता हूँ।
मेरे दोस्त को किस्म-किस्म के पेन के संग्रह का शौक है। कभी-कभी अच्छा लगने पर वह कोई पेन खरीद भी लेता है। वह उन संग्रहित पेन से लिखता कितना है इस पर चुप रहना ही बेहतर होगा। कई पेन बरसों पड़े रहेंगे और उनसे चन्द लफ्ज़ों से ज़्यादा कुछ नहीं लिखा गया होगा। लेकिन कौन-सा पेन किसने दिया, कब दिया आदि वह एक पल भी गँवाए बिना बता देता है। दोस्त के इस दीवानेपन के कारण उसे कई दोस्त बतौर तोहफा पेन देते रहते हैं।

आज से आठ साल पहले उसे प्रभजोत कौर ने एक फ्रांसीसी पेन दिया था। चन्द लफ्ज़ लिखकर और चन्द हस्ताक्षर करके उस पेन को भी संग्रहालय में रख दिया गया। जब-तब प्रभजोत की चर्चा होने पर पेन की याद आ जाती थी। लेकिन औरों की तरह वह पेन भी संग्रहालय की शोभा ही बढ़ा रहा था।
एक साल पहले मित्र का दस वर्षीय बेटा चुपके से प्रभजोत वाले पेन को लेकर स्कूल गया। एक-दो दिन के भीतर उस पेन को किसी सहपाठी ने चुरा लिया। इस पूरी घटना का पता घर में किसी को नहीं था।

पिछले दिनों मित्र का बेटा स्कूल से लौटा तो बेहद खुश था, खुशी छुप नहीं रही थी। पूछने पर उसने बताया कि प्रभजोत आंटी वाला पेन मैंने दोबारा हासिल कर लिया है। किसी को कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि प्रभजोत के पेन को दोबारा पाने का क्या मतलब है।

पूरा किस्सा कुछ इस तरह था - मित्र के बेटे को लगभग साल भर बाद अपने सहपाठी के पास प्रभजोत आंटी वाला पेन दिखाई दिया। दोनों बच्चों में इस पेन को लेकर बातचीत हुई। सहपाठी यह मानने को तैयार नहीं था कि उसने पेन चुराया है। उसका तर्क था कि ऐसे पेन तो इफरात में मिलते हैं, उसने बाज़ार से इसे खरीदा है। मित्र का बेटा जानता था कि उसके पिता तोहफे में मिले पेन को काफी हिफाज़त से न केवल रखते हैं बल्कि उनका इन सबसे बेहद आत्मीय लगाव भी है। मित्र के बेटे ने सहपाठी से पूछा, “तुमने यह पेन कितने रुपए में खरीदा है?” सहपाठी ने बताया, “50 रुपए में।” मित्र के बेटे ने उससे सौदा करते हुए कहा, “मैं कल तुम्हें 100 रुपए दूँगा। तुम यह पेन मुझे दे दो। दोनों में समझौता पक्का हो गया।”

मित्र के बेटे ने अपनी गुल्लक में से चुपचाप 100 रुपए निकाले और सहपाठी को देकर प्रभजोत आंटी वाला पेन हासिल कर लिया। मेरे मित्र ने पेन हाथ में लेकर देखा तो वाकई वह पेन तोहफे वाला ही था। फिर पेन से चन्द लफ्ज़ लिखकर देखे तो इस बात की तस्दीक हो गई कि यह वाकई प्रभजोत वाला पेन ही है। घर का एक सदस्य बच्चे द्वारा गुल्लक से चुपचाप रुपए लेने से नाराज़ भी हुआ।

इस सारे घटनाक्रम को जानकर मेरा मित्र काफी दुखी हो गया। एक तो बेटे को इस पेन को स्कूल ले जाने की क्या ज़रूरत थी? इतने खूबसूरत पेन पर किसी का दिल आ जाना स्वाभाविक है। इसलिए सहपाठी ने जो किया वह भी गलत नहीं है। और खास बात, बेटे ने जिस तरह अपनी भूल का सुधार किया। उसके बारे में बेटे से क्या बातचीत की जाए उसकी समझ में नहीं आ रहा है। वह अभी भी तय नहीं कर पा रहा है कि बच्चे ने भूल-सुधार डाँट के डर से किया या पिता के पेन से भावनात्मक लगाव के कारण। वह अपनी संग्रहशीलता पर भी प्रश्न चिन्ह लगा रहा है। भूल-सुधार के इस तरीके पर घर में किसी ने बच्चे को डाँटा नहीं लेकिन कोई भी समझ नहीं पा रहा है कि गुल्लक से रुपए निकाल लेना, दोस्त से पेन का सौदा करना और पिता के जज़्बातों की कद्र करना, इन सबको किस रूप में लेना चाहिए।

मेरा दोस्त मुझसे इस बारे में सलाह चाहता है। मेरी सहज बुद्धि में भी कुछ नहीं आ रहा है कि बच्चे से किस तरह बातचीत की जाए या बातचीत की कोई ज़रूरत है भी क्या? आशा करता हूँ ‘संदर्भ’ के पाठक मेरी कुछ मदद कर पाएँगे।

बच्चे ने पेन की वापसी के लिए जो किया (जिसे हम बड़े भूल-सुधार कह रहे हैं) और वह जिस भी वजह से किया हो लेकिन मैं एक और सवाल से जूझ रहा हूँ कि बच्चों द्वारा गुल्लक में जमा किए धन को क्या बच्चे अपनी मर्ज़ी से खर्च कर सकते हैं या उन्हें इसे बड़ों की देख-रेख में खर्च करना चाहिए? कृपया दोनों उलझनों पर अपना मशवरा ‘संदर्भ’ के पते पर लिख भेजिए


माधव केलकर: शैक्षणिक संदर्भ से सम्बद्ध हैं।
चित्र: कनक - बच्चों के लिए शौकिया चित्र बनाती हैं। दिल्ली में निवास।