माधव गाडगिल

मानव चाहे जितना विध्वंस करे और चाहे पृथ्वी पर से अपने वंंश को ही खत्म कर दे, फिर भी संसार के असली मालिक बैक्टीरिया के साम्राज्य को कोई हानि नहीं पहुँचेगी।

यदि किसी से यह पूछा जाए कि “आप कौन” तो शायद जवाब मिलेगा, “इस शरीर को फलानाजी-ढिकानाजी कहते हैं।” यदि आगे यह पूछा जाए कि “क्या यह शरीर एक ही जीव है?” तो शायद फलानाजी-ढिकानाजी कहेंगे, “और नहीं तो क्या?” विज्ञान कहता है कि मनुष्य का शरीर खुद के होने का भान देने वाला एक जीव तो है ही, उसके अलावा हमारी त्वचा पर हर वर्ग सेंटीमीटर पर लगभग एक लाख बैक्टीरिया धमाचौकड़ी कर रहे हैं। और तो और, पेट में करोड़ों सूक्ष्म जीव डेरा जमाए हुए हैं।
 यदि फलानाजी-ढिकानाजी ने हाल में दही-चावल खाया होगा तो दूध को दही बनाने वाले लाखों बैक्टीरिया पेट में पहुँच गए होंगे, वे अलग। यदि हट्टे-कट्टे फलानाजी-ढिकानाजी का वज़न 100 किलो है तो इसमें से 10 किलो भार तो शरीर के ऊपर और अन्दर स्थित बैक्टीरिया का ही है। इन बैक्टीरिया की मदद के बिना फलानाजी-ढिकानाजी अपना भोजन पचा भी नहीं सकते। उन्होंने जो दही खाया था, उसे बनाने के लिए दूध किसी भैंस ने दिया होगा। वह भैंस अपने चार खण्डों वाले आमाशय में रहने वाले बैक्टीरिया की मदद के बिना घास को पचा नहीं सकती। दही-चावल का चावल भी बैक्टीरिया की मदद से ही उपजता है। धान जैसी वनस्पति हवा में उपस्थित नाइट्रोजन का उपयोग नहीं कर सकती। बैक्टीरिया हवा से नाइट्रोजन लेकर नाइट्रेट नामक अणुओं में बदल देते हैं। ये नाइट्रेट मिट्टी में मिल जाते हैं जिनका उपयोग धान और अन्य पौधे कर सकते हैं।

सूक्ष्मजीवों की महत्ता
सारांश यह है कि बैक्टीरिया जैसे सूक्ष्मजीव पौधों और जन्तुओं की मदद के बिना आराम से जीवित रह सकते हैं, लेकिन पौधों और जन्तुओं के लिए सूक्ष्मजीवों की मदद के बिना जी पाना असम्भव है। पृथ्वी की सतह पर रहने वाले जीवधारियों की उत्पत्ति पौने चार अरब साल पहले हुई थी। इसमें से पहले दो अरब साल तो सूक्ष्मजीवों का ही राज था। आदिम सूक्ष्मजीवों की कोशिकाओं में एक ही कक्ष होता है और उनमें कोशिकांग नहीं पाए जाते हैं। उन्नत वनस्पतियों और जन्तुओं की कोशिकाओं की संरचना अधिक जटिल होती है। पौधों की कोशिकाओं में सूर्य के प्रकाश की ऊर्जा का उपयोग करने वाले क्लोरोफिल से भरे कोशिकांग पाए जाते हैं जिन्हें क्लोरोप्लास्ट कहते हैं। पौधों और जन्तुओं, दोनों की कोशिकाओं में ऊर्जा उपयोग का नियंत्रण करने वाले माइटोकॉण्ड्रिया नामक कोशिकांग होते हैं।
क्लोरोप्लास्ट व माइटोकॉण्ड्रिया नामक इन कोशिकांगों का इतिहास बहुत रोचक है। एक सूक्ष्मजीव द्वारा दूसरे सूक्ष्मजीव को निगल लेने के फलस्वरूप ये बने हैं। क्लोरोप्लास्ट मूल रूप से वे सायनोबैक्टीरिया हैं जिन्हें अन्य सूक्ष्मजीवों ने निगल लिया है। इसी प्रकार से माइटोकॉण्ड्रिया मूल रूप से रिकेट्सिया जैसे बैक्टीरिया हैं।

हमारा शरीर: जीवों का अड्डा

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि हमारा शरीर कई जन्त़ुओं का अड्डा है। कई जन्तु हमारे शरीर के ऊपर और कई जन्तु हमारे शरीर के अन्दर भी रहते हैं। इनमें से कुछ हमें नुकसान पहुँचाते हैं, कुछ वैसे ही रहते हैं, तो कुछ लाभदायक भी हैं।
सिर की जूँ से तो सब परिचित हैं। यह कई लोगों के सिर पर बालों के बीच छिपकर रहती है और एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति के सिर पर पहुँच जाती है। यह हमारे सिर से खून चूसतीे है। जूँ के जैसे कुछ जन्तु शरीर के अन्य भागों पर भी रहते हैं।
सिर में जो रूसी हो जाती है, वह एक फफूँद के कारण होती है। फफूँद वास्तव में एक मृतोपजीवी है। सिर पर पनपने वाली इस फफूँद के कारण सिर की त्वचा की ऊपरी परत सूखकर झड़ने लगती है, जिसे हम रूसी कहते हैं।

हमारी त्वचा में कुछ सूक्ष्मजीव भी रहते हैं। ये इतने छोटे होते हैं कि हमें दिखाई नहीं पड़ते। नाखूनों में, शरीर पर पाए जाने वाले रोमों के छिद्र में, आँख की पलकों के नीचे, न जाने कहाँ-कहाँ ये सूक्ष्मजीव पलते हैं। कोई घाव हो जाए, तो उसमें भी ये सूक्ष्मजीव पलते हैं। इन्हीं की वजह से मवाद बनता है।
कुछ सूक्ष्मजीव हमारे शरीर के अन्दर भी रहते हैं। ऐसा बताते हैं कि हमारी आँतों में लाखों सूक्ष्मजीव पलते हैं। ये हमें कोई नुकसान नहीं पहुँचाते। बल्कि कुछ सूक्ष्मजीव तो ऐसे हैं जो हमारे लिए विटामिन बनाते हैं। लेकिन कुछ हानिकारक जीव भी हमारे शरीर में पहुँच जाते हैं। जैसे कई बच्चों के पेट में कीड़े (कृमि) हो जाते हैं। पटार ऐसा ही एक कृमि है। पटार जैसे अन्य कृमि भी कभी-कभी मनुष्य की आहारनली में पहुँच जाते हैं। वहाँ ये हमारा पचा-पचाया भोजन चट कर जाते हैं।

कुछ सूक्ष्मजीव ऐसे भी हैं जो हमारे शरीर में पहुँचकर रोग उत्पन्न करने की क्षमता रखते हैं। जैसे- मलेरिया के परजीवी, टीबी के जीवाणु, निमोनिया के जीवाणु, पोलियो के विषाणु आदि। ये हमारे शरीर में अलग-अलग स्थानों को अपना घर बनाते हैं। जैसे, टीबी के जीवाणु प्राय: हमारे फेफड़ों में वास करते हैं।

कोशिकांगों से सज्जित ऐसी उन्नत कोशिकाएँ लगभग डेढ़ अरब साल पहले पृथ्वी पर प्रकट हुई थीं। बहुकोशिकीय जीवों का विकास होने में और एक अरब साल लग गए।
इसका मतलब यह हुआ कि पृथ्वी पर शुरुआती सवा दो अरब सालों तक जीवन का वृक्ष केवल सूक्ष्मजीवों के रूप में ही था। हमें तो सूक्ष्मजीवों की दुनिया के बारे में पहली बार पता चल पाया सवा तीन सौ साल पूर्व, सूक्ष्मदर्शी का आविष्कार होने पर। पिछले 50-60 सालों में ही यह ठीक-ठीक समझ में आया कि जीवजगत कौन-से बुनियादी अणुओं से बना है। यह भी समझ बनी कि जीवन के वृक्ष की छोटी-बड़ी शाखाएँ और उनसे छोटी उपशाखाएँ कैसे निकलती गईं। इस सबके परिणामस्वरूप जीवन के वृक्ष के बारे में हमारी धारणाएँ पूरी तरह बदल गईं। एक उदाहरण देखिए।

सूक्ष्मजीवों की शाखाओं का वर्णन
चालीस साल पहले तक यह माना जाता था कि सूक्ष्मजीव का मतलब केवल बैक्टीरिया होता है। लेकिन जब ऐसे सारे सूक्ष्म जीवधारियों के आणविक स्तर के घटकों की जानकारी उपलब्ध होने लगी तब समझ में आया कि सूक्ष्मजीवों के दो अलग-अलग जगत हैं -- बैक्टीरिया और आर्किया। ये दो जगत, जीवन वृक्ष के तने से निकली हुई जीवजगत की दो प्रारम्भिक महाशाखाएँ हैं जो प्रथम सवा दो अरब सालों तक बिना किसी रुकावट के बढ़ती रही थीं।

इसके बाद इन दोनों शाखाओं का ऐसा मिलन हुआ कि आर्किया के शरीर (कोशिका) में बैक्टीरिया समा गए और अधिक उन्नत तीसरी महाशाखा बन गई। पिछले डेढ़ अरब सालों में इन तीन महाशाखाओं से अनेक शाखाएँ और उपशाखाएँ निकलती रही हैं। अधिक विस्तार से देखें तो प्रोकैरियोट-आर्किया महाशाखा की 7 शाखाएँ निकलीं और प्रोकैरियोट-बैक्टीरिया महाशाखा की 6 शाखाएँ निकलीं। इस प्रकार कुल 13 शाखाएँ निकलीं। इसके विपरीत, यूकैरियोट्स से केवल 10 शाखाएँ निकलीं। यानी बैक्टीरिया और आर्किया में उन्नत जीवधारियों की तुलना में अधिक विविधता पाई जाती है। इतना ही नहीं, यूकैरियोट्स की 10 में से 7 शाखाएँ पूरी तरह से एककोशिकीय जीवों की हैं। शेष तीन शाखाएँ हैं -- वनस्पति, जन्तु और फफूँद। इन तीन शाखाओं के भी सारे सदस्य बहुकोशिकीय नहीं हैं, कई एककोशिकीय भी हैं। हम बहुकोशिकीय जन्तुओं और वनस्पतियों को सरलता से देख तो सकते हैं लेकिन शाखाओं के स्तर पर ऐसे बहुकोशिकीय जन्तुओं और वनस्पतियों की विविधता न के बराबर है, और जो है वह अभी हाल ही में विकसित हुई है। पृथ्वी पर जीवन के पौने चार अरब सालों के इतिहास में मात्र 60 करोड़ साल पहले ही हमारे जैसे बहुकोशिकीय जीवधारी अस्तित्व में आए हैं।

यहाँ यह समझना ज़रूरी है कि आर्किया कोशिका में बैक्टीरिया का समावेश कितना बड़ा परिवर्तन था। बैक्टीरिया और आर्किया एककोशिकीय जीव हैं और इनकी कोशिका में कोई सुगठित केन्द्रक नहीं होता। उनका केन्द्रक बिखरा हुआ होता है और उसके इर्द-गिर्द झिल्ली नहीं होती। आर्किया की कोशिका में बैक्टीरिया के समाहित हो जाने के कारण जो नई कोशिकाएँ बनीं, उनमें झिल्ली में लिपटा हुआ एक सुगठित केन्द्रक था। जिनके शरीर की कोशिकाओं में बिखरा हुआ और बिना झिल्ली वाला केन्द्रक होता है, उन्हें केन्द्रकविहीन या प्रोकैरियोट्स कहते हैं। इसके विपरीत, सुगठित और झिल्लीयुक्त केन्द्रक वाले जीवधारियों को केन्द्रकयुक्त या यूकैरियोट्स कहते हैं। यूकैरियोट्स के बनने के बाद जैव-विकास के नए-नए आयाम खुलते गए। इसलिए इस परिवर्तन को जैव-विकास की धारा का एक बड़ा मोड़ माना जाता है।

इसीलिए आज जीव वैज्ञानिक विश्वास के साथ कह रहे हैं कि पृथ्वी के असली मालिक तो बैक्टीरिया और आर्किया हैं। संख्या की दृष्टि से हमारे रिश्तेदार, बहुकोशिकीय जन्तु और वनस्पति, उनकी तुलना में कुछ भी नहीं हैं। इतना ही नहीं, जिन परिस्थितियों में बहुकोशिकीय जन्तु और वनस्पति जीवित ही नहीं रह सकते, उनमें सूक्ष्मजीव मज़े से रहते हैं।

सूक्ष्मजीवधारियों की उत्पत्ति
जब सूक्ष्मजीव पहली बार पृथ्वी पर प्रकट हुए, उस समय का वातावरण और जलावरण आज से एकदम भिन्न था। उसमें ऑक्सीजन लगभग शून्य थी और कार्बन डाईऑक्साइड अधिक मात्रा में थी। अमोनिया, मीथेन, हाइड्रोजन सल्फाइड जैसी जो गैसें आज हमें विषैली लगती हैं, वे भी काफी मात्रा में मौजूद थीं। जीवन की शुरुआत गहरे समुद्र में ऐसे स्थान पर हुई थी जहाँ दरारों में से उबलता हुआ लावा बाहर निकलकर आता था। यानी बिलकुल प्रारम्भिक सूक्ष्म जीवधारियों (आर्किया) की उत्पत्ति एकदम अलग प्रकार के पर्यावरण में हुई थी। ऐसी कठिन परिस्थितियों में तपकर निकले हुए सूक्ष्मजीव कई ऐसे कठिन पर्यावरणों में रह सकते हैं जहाँ जन्तुओं और वनस्पतियों के जीवित रहने की कल्पना भी नहीं की जा सकती। कुछ सूक्ष्मजीव तो 200 डिग्री सेल्सियस तापक्रम पर उबलते पानी में फलते-फूलते हैं (साधारण परिस्थिति में पानी 100 डिग्री सेल्सियस पर उबलता है, लेकिन समुद्र की गहराइयों में दाब इतना अधिक होता है कि पानी बहुत ऊँचे तापमान पर उबलता है)।

खुद के भोजन का निर्माण कर सकने वाली क्लोरोफिलयुक्त वनस्पतियों के लिए ऊर्जा का एकमात्र स्रोत प्रकाश है, लेकिन अनेक हुनरमन्द सूक्ष्मजीव कई प्रकार के ऊर्जा स्रोतों का उपयोग करते हुए अपना पोषण तैयार कर लेते हैं। इन हुनरमन्द जीवों में सबसे विलक्षण वे हैं जो पृथ्वी की सतह से सैकड़ों मीटर नीचे रहते हैं। ये चट्टानों के घटकों की पानी के साथ होने वाली रासायनिक क्रिया से निकलने वाली ऊर्जा से अपना पोषण जुटा लेते हैं। इस प्रकार की क्षमता के कारण सूक्ष्मजीवों ने विभिन्न परिवेशों में धाक जमा ली है और यह दिखा दिया है कि वे किसी भी प्रकार की परिस्थिति से जूझते हुए फल-फूल सकते हैं।
सूक्ष्म जीवधारी मानव के समान असहिष्णु नहीं हैं। हमने पृथ्वी पर जिस प्रकार और जिस गति से विनाश किया है, उससे लग रहा है कि पृथ्वी पर मानव का अस्तित्व कभी भी समाप्त हो सकता है। लेकिन मानव चाहे जितना हंगामा करे, भीषण परमाणु युद्ध भी कर ले तो भी अधिक-से-अधिक यह होगा कि हम अपने साथ अधिकांश बहुकोशिकीय जीवधारियों को ले डूबेंगे, लेकिन सूक्ष्मजीव तो हर हाल में बने रहेंगे।


माधव गाडगिल: भारतीय पारिस्थितिकविद्, अकादमिक, लेखक व स्तम्‍भ लेखक। भारतीय विज्ञान संस्थान के तत्वावधान में गठित एक शोध मंच, सेंटर फॉर इकोलॉजिकल साइंसेज़ के संस्थापक। भारत सरकार की वैज्ञानिक सलाहकार परिषद के पूर्व-सदस्य। 2010 में गठित वेस्‍टर्न घाट्स इकोलॉजी एक्सपर्ट पैनल (डब्ल्यूजीईईपी), जिसे गाडगिल आयोग के रूप में जाना जाता है, के प्रमुख। पर्यावरणीय उपलब्धि के लिए वोल्वो पर्यावरण पुरस्कार और टायलर पुरस्कार से सम्मानित। भारत सरकार द्वारा 1981 में पद्मश्री पुरस्कार और 2006 में पद्मभूषण पुरस्कार से सम्मानित।
यह लेख एकलव्य द्वारा प्रकाशित माधव गाडगिल की पुस्तक जीवन की बहार से साभार।