रोमा देव हालदार

पश्चिम बंगाल की एक देहाती प्राथमिक शाला; जहां पढ़ाने में न तो शिक्षकों की रुचि थी और न बच्चों में पढ़ने का उत्साह था। वहां एक शिक्षिका ने प्राथमिक शिक्षा को प्रभावी और बच्चों की जरूरत के मुताबिक ढालने का काम शुरू किया। विविध गतिविधियों के माध्यम से पढ़ाई को आनंददायक बनाने का यह काम तेरह साल तक चला ....... तब जाकर शाला में पढ़ने-पढ़ाने की स्थितियों में सुधार हुए। कितना कठिन होता है हालातों को बदल पाना।

मुझे अपनी बात कुछ विस्तार से कहने दीजिए। इस स्कूल का नाम पार्टली बेज़िक प्रायमरी स्कूल है। इस स्कूल के आसपास के गांवों में मुस्लिम या अनुसूचित जाति के हिन्दू लोग रहते हैंयहां साक्षरता केवल बीस प्रतिशत है और अस्सी प्रतिशत लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवनयापन करते हैं। इस गांव से कलकत्ता 150 कि.मी. दूर है, और बोलपुर नामक एक छोटा कस्बा, यहां से दस कि.मी. दूर है।

1985 में, जब मैंने इस स्कूल में कार्य प्रारम्भ किया था तो मैंने पाया कि स्कूल की वेतन सूची में पांच शिक्षकों के नाम दर्ज थे लेकिन किसी भी कार्यदिवस पर केवल दो या तीन शिक्षक ही स्कूल आते थेस्कूल के रजिस्टर में भी 160 विद्यार्थियों के नाम लिखे हुए थे, लेकिन मुश्किल से 40-50 विद्यार्थी ही रोज स्कूल आते थे।

एक बार किसी अनुपस्थित विद्यार्थी से उसके साथियों ने, इस बारे में पूछा तो उसने टिप्पणी की, "मैं स्कूल क्यों जाऊं और पढ़ने-लिखने की मुसीबत उठाऊं; और वो मोटी तनख्वाह का मज़ा ले?" कई बार विद्यार्थियों को दिन में मिलने वाले टिफिन के वितरण को देखकर मुझे बहुत निराशा हुई। विद्यार्थियों के टिफिन के लिए जो डबलरोटियां आती थीं, उनमें से एक बड़ा हिस्सा शिक्षक अपने घर ले जाते थे।

शिक्षकों का स्कूल आने का कोई निश्चित समय नहीं था। यह 11:30 से 12:30 के बीच कभी भी हो सकता था। अक्सर विद्यार्थी लगभग 10 बजे या उससे भी जल्दी आ जाते थे, और खेलना, पेड़ों पर चढ़ना, गप्पें लगाना या एक-दूसरे से लड़ना शुरू कर देते थे। शिक्षकगण किसी भी विषय, जो क्रिकेट से लेकर मगरमच्छ प्रजनन तक कुछ भी हो सकता था, पर जी भर के चर्चा कर लेने के बाद 1 2 12:30 बजे कक्षा लेते थे। पढ़ाई के दौरान भी महिला शिक्षकों को स्वेटर बुनने में कोई हिचक नहीं थी और एक-दो लड़कियों को वे अपने सिर में से सफेद बाल तोड़ने में लगाए रखती थीं। 2:30 बजे तक सारा काम खत्म हो जाता और छुट्टी का घंटा बज जाता था। शिक्षक और विद्यार्थी दोनों ही स्कूल से चले जाते थे।

यूं हुई शुरुआत
ऊपर बताए गए स्कूली वातावरण में मैंने किसी अन्य स्थान से स्थानांतरित होकर उस स्कूल में पदभार ग्रहण किया था। मैंने सोचना शुरू किया कि किस तरह काम किया जाए, जिससे सारे स्कूल का वातावरण सुव्यवस्थित हो जाए और उसका विद्यार्थियों, शिक्षकों और गांव के लोगों से भी उचित ताल-मेल हो जाए। मैंने दस विद्यार्थियों के साथ काम शुरू किया। हालांकि मेरे कक्षा पहली के रजिस्टर में पचास विद्यार्थियों के नाम दर्ज थे, लेकिन मुश्किल से दस बच्चे ही प्रतिदिन स्कूल आते थे। मैंने अपना कार्य करने का तरीका धीरे-धीरे अपनाया, और 13 वर्षों तक जारी रखा; तब जाकर मैंने यह निश्चयपूर्वक अनुभव किया कि अन्त में मैं अपने उद्देश्य में सफल हो गई हूं।

मेरी कक्षा का कार्यक्रम इस प्रकार थाः

कदम-दर-कदम मेरी गतिविधियां

मां की तरह प्यार भरा व्यवहार
मैंने बच्चों के साथ एक स्नेही मां की तरह प्यार और सावधानी से व्यवहार करना शुरू किया। उन दिनों अक्सर यह देखा जा सकता था,

कि कुछ छोटे बच्चे मेरी गोदी में बैठे रहते, डर के मारे उनकी आंखें चौड़ी खुली रहतीं और वे मुझे सुन रहे होते। मैं कहानी सुना रही होती या सुकुमार राय की बच्चों की किताब, अबोल-तबोल में से कविताएं। कुछ ही हफ्तों के समय में मैंने उनको विश्वास प्राप्त कर लिया। उनके डरे हुए चेहरे, अब मुस्कुराने लगे। उन्होंने मुझे एक दोस्त और खेल के साथी की तरह समझ लिया था।

आगे मैंने पाया कि बहुत से बच्चों के हाथ-पैरों पर फोड़े-फुंसियों के कारण जख्म थेऔर विटामिनों की कमी से उनके मुंह के अन्दर भी जख्म थे। मैंने देखा कि उन्हें इधर-उधर थूकने की गंदी आदत थी और वे अपनी गंदी नाक को अपने नंगे हाथ या अपने कपड़ों के सिरों से पोंछ लेते थे। मैंने जांच की, उनके नाखून काटे, उनके फटे हुए कपड़ों की सिलाई कीकमीज, फ्रॉक आदि के टूटे हुए बटन टांके, घर में लेप बनाकर उनके फोड़े-फुंसियों पर लगाया और बच्चों को बिना पैसे लिए विटामिन की गोलियां बांटीं।

जल्दी ही बच्चों की माताएं भी मुझसे आकर मिलीं और चुटकियों में मैंने बच्चों को साफ-सुथरा और अच्छी स्वस्थ आदतों वाला बना दिया। वे साधारण कपड़े पहनते थे, लेकिन वे साफ, धुले हुए होते थे।

अक्सर माताएं मुझसे मिलने आतीं और बच्चों की किसी समस्या के लिए सलाह लेतीं या बच्चों को बुखार आदि कोई बीमारी होती तो मुझे अपने घर बुलातीं।

कक्षा शिक्षण
मैंने भाषा, इतिहास, गणित और भूगोल की औपचारिक पढ़ाई शुरू नहीं कराई। लेकिन कहानी सुनाना और कहानी की किताबें जैसे - अबनिन्द्र नाथ ठाकुर की या रूसी प्रकाशन की या सुकुमार रॉय, उपेन्द्र किशोर रॉय या जोगेन्द्र नाथ सरकार की कविताएं पढ़ाना शुरू कराया।

इन शुरुआती कोशिशों से बच्चे मेरी कक्षा की ओर आकर्षित हुए और इन सब में रुचि लेने लगे। यह रुचि जल्दी ही अनुपस्थित रहने वाले बच्चों में भी फैलने लगी। धीरे-धीरे वे भी वापस स्कूल आने लगे।

तीन-चार महीनों में ही मेरी कक्षा दाखिल हुए विद्यार्थियों से पूरी भर गई। स्कूल नहीं आने वाले बच्चों की संख्या मुश्किल से एक या दो प्रतिदिन रह गई।

यह निरंतरता कैसे बनी रहे . . .
अब मेरे सामने सवाल था कि इस रुचि को लम्बे समय तक कैसे कायम रखा जाए, इसके लिए मैंने नई-नई गतिविधियां करवाने की योजना बनाई। मैंने सोचा कि किसी भी काम के दो पहलू होने चाहिए। एक तो इसमें सीखने-सिखाने से सम्बन्धित कुछ होना चाहिए, जैसे विद्यार्थी के विकास के एक-दो पक्ष भी सम्मिलित हों, वह चाहे भाषा सीखने के क्षेत्र में हो या गणित, इतिहास आदि के। दूसरे, विद्यार्थियों की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए कुछ होना चाहिए। जैसे - कोई आर्थिक मसला, या आम जनता के जानने योग्य बात, या मां की रसोईघर की कोई आवश्यक वस्तु, या उसकी स्वयं की खेलने की कोई चीज वगैरह, कुछ भी बात हो सकती है।

विविध गतिविधियां:

संबंधियों को पत्र लिखना और डाक में डालना
शुरू में मैंने अभिभावकों से पोस्टकार्ड लेकर बच्चों को दिए, जिन पर ठीक पता लिखा हुआ था।

मैंने ब्लैकबोर्ड पर पत्र लिखा, उन्होंने उसकी नकल की और मैंने वे सब पोस्टकार्ड डाक में डाल दिए। एक महीने में अधिकतर बच्चों ने बताया कि वे बहुत खुश थे क्योंकि उनके नाना, चाचा आदि को खत मिल गए थे और उन्होंने किसी संदेशवाहक के जरिए जवाब भेजा था। बच्चों के लिए यह एक महान अनुभव था, कि वे अपने दूर रहने वाले सम्बन्धियों को सन्देश भेज सकते थे।

बाद में मैं उन्हें भ्रमण के लिए डाकखाने ले जाती थी, जो एक किलोमीटर दूर था। हम प्रकृति का आनन्द लेते हुए, बड़े-बड़े धान के खेतों के पास से होकर जाते। रास्ते में मुझे उनसे कुछ अनजान पौधों, टिड्डे, ड्रैगनफ्लाई आदि के बारे में बात करने का अवसर मिल जाता था।

डाकखाने पहुंचने पर मैंने बच्चों से पोस्टकार्ड खरीदने को कहा, फिर मैं उन्हें एक पेड़ के नीचे ले गई। वहां बैठकर उन्होंने पत्र लिखे और फिर डाक में डाले। मुझे याद है, मुझे उन्हें समझाना पड़ा था कि पत्र, किस प्रकार उनकी नानी, चाचा आदि तक पहुंचता है जबकि गंजा पोस्टमास्टर उन्हें जानता तक नहीं है। इस छोटे-से भ्रमण के बाद हम वापस स्कूल आ गए। बच्चों को इसमें बहुत आनन्द आया।

यहां मेरे विद्यार्थियों को भाषा के द्वारा परिवार की वास्तविक जरूरत पूरा करने का मौका मिला। उसके बाद उनमें से कुछ विद्यार्थियों ने अच्छे सुलेख की ओर खास ध्यान दिया। पत्र लिखने के अभ्यास से भाषा की कक्षा में उनकी रुचि बढ़ी, पाठ पढ़ने और लिखने में भी।

यहां मुझे यह बताते हुए प्रसन्नता हो रही है कि मेरे एक पोलियोग्रस्त विद्यार्थी द्वारा लिखे गए पत्र ने, शिक्षा विभाग के एक अधिकारी का ध्यान आकर्षित किया। और वह अधिकारी अब उस विद्यार्थी को इलाज और स्वास्थ्य लाभ के लिए कलकत्ता भेजने का प्रयत्न कर रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं है कि मेरे इस छोटे से प्रोजेक्ट के लिए यह एक बड़ा पुरस्कार है।

प्रकृति का अध्ययन और स्वास्थ्य
अभिभावकों तथा अन्य लोगों की मदद से मैंने विद्यार्थियों से स्थानीय जड़ी-बूटियां, पत्ते, बीज, फूल आदि इकट्टे कराए और उनकी पहचान करना सिखाया। उनमें से कुछ हैं - कालमेघ, थानकुनि, जंडिस, वरंडा, कुलखड़ा, तुलसी, तेजपाता, हिंचे, नीम, बाशक, शृंगराज, शेफाली, पेंपे, गंधोबादल, ब्राह्मीशाक, पुदिना

विद्यार्थियों ने पत्तियों तथा बीजों को अपनी अभ्यास पुस्तिका पर चिपकाया और उनका छोटा-छोटा विवरण लिखा तथा इनका उपयोग भी बताया। बाद में मुझे खबर मिली कि कुछ बच्चों ने कुछ खास बीज-पत्तियां आदि इकट्ठा करके अपनी मां से दवाई बनवाई और उसे खाकर सर्दी-जुकाम, मलेरिया आदि ठीक किया।

साहित्य सभा
शान्ति निकेतन के विश्वभारती स्कूल का अनुकरण करते हुए, मैंने नियमित साप्ताहिक साहित्य सभा शुरू करने का प्रबन्ध किया। विद्यार्थी इस सभा का आयोजन करते थे। वे इसका संचालन करते, कहानी या कविताएं पढ़ते, समाचार पत्रों, रेडियो, टी.वी. के ताजा समाचार सुनाते, क्रिकेट के खेल के समाचार भी सुनाते। वे गीत और गज़लें गाते तथा नाटक भी करते थे।

ध्यान का अभ्यास करना
स्कूल प्रार्थना के सामान्य सत्र के तुरन्त बाद, हमारी कक्षा की शुरुआत में मैंने मौन-ध्यान का अभ्यास शुरू कराया; जिसमें सारी कक्षा मेरे साथ किसी पेड़ के नीचे या खुले बरामदे में बैठकर तीन से पांच मिनट तक, प्रतिदिन, ध्यान का अभ्यास करती थी। यह ध्यान लगाना बच्चों के व्यवहार के लिए आश्चर्यजनक काम करता है।

कहानी सुनाने की कक्षा
स्कूल के कार्यक्रम में एक घंटा कहानी सुनाने का होता है। मैं बच्चों को बहुत सी देशी-विदेशी पुस्तकों में से कहानियां पढ़कर सुनाती। कुछ कक्षाओं में बच्चों से भी कहानी सुनाने को कहा जाता।

बच्चे अपनी स्वयं की या मुझसे या किसी और से सुनी हुई कहानियां सुनाते। कहने की आवश्यकता नहीं है कि बच्चे इसका भरपूर आनंद लेते थे। साथ ही वे जनसमूह के सामने निडरता से तथा स्पष्ट बोलने की योग्यता भी प्राप्त करते थे।

कविता पाठ करना
कहानी सुनाने की तरह, कविता की कक्षा भी होती थी, जिनको हम दिल से आनन्द लेते थे। कभी मैं पढ़ती थी, कभी बच्चे। हम सब सुन्दर तुकबन्दी और कविताओं के पाठ, लय व सुन्दरता का आनंद लेते थे। इस आनन्द के द्वारा हम भाषा और साहित्य में रुचि बढ़ाने का प्रयत्न करते।

दीवार पत्रिका की तैयारी
साहित्य सेवा में पढ़ी गई विद्यार्थियों की रचनाओं में से मैंने दीवार पत्रिका के लिए रुचिकर कहानियां, कविताएं तथा अन्य चीजें चुनीं। चित्रकला की कक्षा से मैंने चित्रों को इस पत्रिका के लिए छांटा। फिर उन्हें बच्चों से आर्ट-पेपर पर साफ-साफ लिखने और इन तस्वीरों से सजाने को कहा गया। बच्चों ने इसे दीवार पर टांग दिया, जिससे सारा स्कूल इसे पढ़ सके। यह पाठ्येत्तर गतिविधि बच्चों के लिए बहुत रुचिकर होती थी।

वार्षिक कैलेंडर की तैयारी
विद्यार्थियों को प्रति वर्ष एक बड़ा-सा वार्षिक कैलेंडर आर्ट पेपर पर बनाना सिखाया जाता था। बच्चे इसे तस्वीरों से सजाते थे, तथा इसमें महीने, हफ्ते, दिनांक तथा दिनों का विस्तृत ब्यौरा देते थे। हम इसे अपनी कक्षा में टांगते थे और आवश्यकता होने पर काम में लेते थे।

दैनिक डायरी लिखना
विद्यार्थियों को प्रतिदिन डायरी लिखने के लिए प्रेरित किया जाता है। वे इसे प्रसन्नता से करते हैं। वे इसे घर के काम की तरह हर रोज़ मुझे दिखाते हैं। उनकी डायरियों से मुझे बहुत-सी मज़ेदार खबरें मिलती हैं, जैसे घोंसले में से एक बार अंडे निकालने के बाद वापस उसमें रखना, जहरीले सांप को मारना आदि। हम अक्सर मनोरंजक डायरी, सारी कक्षा को पढ़कर सुनाते। इस काम में मैंने पाया कि बच्चों को अपने को व्यक्त करने की योग्यता और रुचि विकसित करने का अवसर मिलता है।

कातुम-कुतुम (दस्तकारी)
सुविख्यात कलाकार अबनिन्द्रनाथ ठाकुर ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया और इसे यह नाम दिया। यह एक प्रकार से कला और दस्तकारी की प्रक्रिया है। इसमें बेकार चीजों जैसे - खाली माचिस, कागज, कपड़ा और रिबन के टुकड़े, दीमक खाई लकड़ी आदि चीजों से कोई खिलौने आदि बनाना होता है। इन चीजों को अगर ठीक से छांटकर जमाया जाए, तो एक सुनहरी पगड़ी पहने हारमोनियम बजाता हुआ आदमी बन सकता है। इस विचार को लेकर मेरे बच्चों ने उड़ती हुई चिड़िया, रेंगता हुआ सांप कूदता खरगोश, दौड़ता हिरन, फुदकता कगारू, नाचती लड़किया आदि बहुत-सी चीजें बनाईं। बच्चों को इस काम में बहुत मज़ा आयाइस तरह के क्राफ्ट के काम में कोई भी खर्चा नहीं होता, लेकिन इससे बच्चों की रचनात्मक प्रवृत्ति को बढ़ावा मिलता है। निरीक्षण करने की शक्ति का विकास होता है, सौन्दर्यबोध आता है, और औजारों को काम में लाने की योग्यता का विकास होता है।

अल्पना बनाना
स्कूल को सजाने के लिए मैं अक्सर यह प्रोजेक्ट कराती हूं। हम स्कूल के बरामदे में बिल्डिंग के सामने या किसी पेड़ के इर्द-गिर्द कोई उपयुक्त स्थान पसन्द करके वहां सफाई करते हैं और वर्षों पुरानी कला ‘अल्पना बनाते हैं। सरस्वती-पूजा, स्वतन्त्रता-दिवस आदि के अवसर पर हम अल्पना से सजाने के लिए विभिन्न रंगों, फूलों, बीजों यहां तक कि कोयले के चूरे, रेत, ईंटों के चूरे आदि का प्रयोग करते हैं। यह एक दूसरा क्षेत्र है जहां विद्यार्थियों ने खुद को स्वतंत्रता से अभिव्यक्त किया और अपनी कला की लोगों द्वारा प्रशंसा होते देखी।

रसोईघर उद्यान
मेरी कक्षा ने बैंगन, टमाटर, हरी मिर्च, पपीता और फूल आदि उगाकर एक छोटा सा रसोईघर उद्यान बनाया। बच्चों को फावड़े से मिट्टी खोदने, खाद डालने, पौधे लगाने और पानी देने में बहुत अच्छा लगता है। इसके बाद मैंने देखा कि बच्चे पेड़-पौधों को पहले से ज्यादा प्यार करने लगे हैं। वे पेड़-पौधों को पशुओं तथा दूसरों से बचाने के लिए उनकी रखवाली करते। बच्चों ने फालतू में फूल-पत्ते तोड़ना और पौधों को नष्ट करने की अपनी पुरानी आदत, अपने-आप ही बदल दी। अपने छोटे-से बाग से उन्हें बैंगन, मिर्च आदि जो थोड़ी-सी उपज मिलती उसे वे अपने स्कूल के पीछे रहने वाले गरीब पड़ोसियों में बांट देते हैं।

चिड़ियों के पंख एकत्र करना
बच्चे सब स्थानीय चिड़ियों के पंख इकट्ठाकर अपनी अभ्यास पुस्तिका में लगाते और साथ में उसकी पहचान, प्राप्ति का स्थान, चिड़िया का वर्णन, उसकी खाने, घोंसला बनाने, अंडे देने आदि आदतों के विषय में लिखते। इस काम से चिड़ियों की दुनिया में रुचि और प्रकृति के प्रति प्रेम बढ़ता है।

तितलियों के लार्वा इकट्टे करना और उन्हें पालना
विद्यार्थी उस जगह मिलने वाले कीटों और तितलियों के लार्वा इकट्ठा करते हैं, और उन्हें कांच के हवादार बर्तन में रखते हैं। हर रोज वे बर्तन को साफ करते और लार्वा को खाने के लिए खास पत्तियां देते। वे कांच के बर्तन का प्रतिदिन बाहर से निरीक्षण करते, उनकी बढ़त, लार्वा से प्यूपा बनना और अन्त में सुन्दर-सी तितली बनना देखते। वे इनके उचित विकास के लिए हर तरह की सावधानी रखते और अन्त में उसे उड़ जाने देते। यह काम हमेशा ही बच्चों को मनोरंजक और रुचिकर लगता। यह उनके दिल की गहराइयों में प्रकृति प्रेम उत्पन्न करता।

चित्रकला और मॉडल बनाना
मैंने मुक्त हस्तचित्र बनाने, उनमें रंग भरने और साथ ही मिट्टी से मॉडल बनाने, सिखाने शुरू कराए। कहने की आवश्यकता नहीं है कि स्कूल के पास इस उद्देश्य के लिए सामान मंगाने के लिए पैसा नहीं था। आर्ट पेपर, रंग, पेंसिल आदि का खर्च शिक्षक को स्वयं ही करना होता।

खेलकूद
अपनी कक्षा के दैनिक कार्यक्रम में मैंने खेलों का अभ्यास शुरू कराया, जिससे बच्चों का मनोरंजन हो और उनका स्वास्थ्य भी ठीक रहे। मैंने उन्हें ऊंची-कूद, लम्बी-कूद, साधारण जिमनास्टिक, दौड़ना और कुछ खेलों का अभ्यास करने के लिए प्रेरित किया। कभी-कभी मैं विश्वभारती विश्वविद्यालय से खेल विशेषज्ञों को आमंत्रित करती। वे बच्चों को प्रशिक्षण देते तथा उनका मार्गदर्शन करते।

पहेलियों को तुरन्त हल करना
इस कक्षा में बच्चों को दो ग्रुप में बांट दिया जाता है और उनसे कुछ आसान से प्रश्नों के उत्तर पूछे जाते हैं या आसान पहेलियां हल करने को दी जाती हैं। सारी कक्षा का वातावरण प्रतिस्पर्धात्मक बना दिया जाता है, और प्रत्येक बच्चा प्रतियोगिता में भाग लेता है। यह कक्षा बच्चों को समस्या का सामना करने के लिए मानसिक तौर से सतर्क बनाती है।

स्क्रैप-बुक बनाना
यह एक जानी-पहचानी गतिविधि है जिसमें विद्यार्थी समाचार पत्रों, मैग्जीन या और कहीं से भी फोटो और तस्वीरें काटकर अपनी स्क्रैप-बुक के पन्नों पर चिपकाते हैं और साथ में उसका छोटा-सा विवरण लिखते हैं। इसमें इस तरह के चित्र भी मिल जाते हैं जैसे - सचिन ने क्रिकेट में बाऊन्ड्री बनाई, प्रधानमंत्री जनता को सम्बोधित करते हुए, विध्वंसकारी रेल दुर्घटना, जंगलों, घरों, बस्तियों को नष्ट करता प्रचंड तूफान आदि।

नेतृत्व का प्रशिक्षण
प्रत्येक सप्ताह के लिए एक विद्यार्थी कक्षा का नेता चुन लिया जाता है। उसे कक्षा की व्यवस्था, साथी बच्चों का व्यवहार, कक्षा के बाहर क्राफ्ट, खेल आदि की व्यवस्था आदि करने का अधिकार दिया जाता है। स्कूल के समारोह, पूजा, स्वतंत्रता दिवस, पिकनिक आदि में साथ के बच्चों का निर्देशन करने में उन्हें काफी काम करना होता है। इससे उसके अन्दर छिपे नेतृत्व के गुणों को विकसित होने का अवसर मिलता है।

हासिल हुईं उपलब्धियां
प्राथमिक स्कूल में विद्यार्थियों की आवश्यकता पर आधारित गतिविधियां शुरू करने और उन पर तेरह वर्षों तक ईमानदारी से, लगातार काम करने के परिणाम स्वरूप - शिक्षकों, विद्यार्थियों और गांव के लोगों, और इतना ही नहीं, स्कूल के वातावरण में भी कई परिवर्तन देखने को मिले:

  1. विद्यार्थी प्रोजेक्ट की ओर आसानी से और अपनी ही दिलचस्पी से आकर्षित होते हैं।
  2. विद्यार्थियों की यह दिलचस्पी स्कूल के सामान्य पाठ्यक्रम के अध्ययन में भी हस्तांतरित हो जाती है।
  3. विद्यार्थियों को बोलने, पढ़ने-लिखने में आत्मविश्वास आया और उनके व्यक्तित्व के विकास में भी वृद्धि हुई।
  4. कुछ ही वर्षों में स्कूल में दाखिल विद्यार्थियों की संख्या 160 से बढ़कर 275 हो गई।
  5. विद्यार्थियों की उपस्थिति 30% से 85% हो गई। (1985 से 1998)
  6. बच्चों का शुरू में ही स्कूल छोड़ना बिल्कुल बंद हो गया।
  7. सीखने-सिखाने की प्रक्रिया में सामान्य सुधार हुआ। इस वजह से अच्छी संख्या में विद्यार्थियों को हाईस्कूल में दाखिले के अवसर मिल रहे हैं। यह परिस्थिति 1985 की परिस्थिति के बिल्कुल विपरीत है।

स्कूल के शिक्षकों में परिवर्तन

  1. एक कक्षा के सक्रिय और वास्तविक सच्चे काम ने अन्य शिक्षकों को, उनका काम करने का अनुपयुक्त तरीका बदलने के लिए सीधे प्रभावित किया।
  2. अन्य शिक्षक अपनी कक्षाओं में अधिक दिलचस्पी लेते पाए गए। और वे भी अपनी कक्षाओं में इसी तरह के प्रोजेक्ट करने की कोशिश करने लगे।
  3. स्कूल में शिक्षकों की उपस्थिति में बहुत सुधार हुआ।
  4. शिक्षक पहले से कहीं अधिक सक्रिय पाए गए।
  5. शिक्षकों ने गलत व्यवहार जैसे - बच्चों के टिफिन में से हिस्सा लेना, कक्षा में स्वेटर बुनना, सफेद बाल तुड़वाना, अपने-आप ही बन्द कर दिया।

रोमा देव हालदारः विनया भवन, विश्व भारती, शांति निकेतन, पश्चिम बंगाल।
पुष्पा अग्रवाल: स्वतंत्र अनुवादक, जयपुर में रहती हैं।
इस लेख के सभी चित्र श्री बी. एम. भोंडे ने बनाए हैं। वे होशंगाबाद में रहते हैं।