मो. उमर

घटना होशंगाबाद के बाबई ब्लॉक में स्थित एक गाँव के सरकारी स्कूल की है। मैं और मेरा एक साथी इस विद्यालय में बच्चों के साथ कुछ बातचीत और गतिविधि करने की गरज से यहाँ आए थे। माध्यमिक पाठशाला के बच्चों की एक खाली कक्षा देख मैं उसमें जाकर बच्चों के साथ कुछ गतिविधियाँ करने लगा।
यह सातवीं कक्षा थी और बच्चे भी कुछ बड़े थे, अत: बचकाने खेल-खिलौने और कहानी, कविता से उन्हें ज़्यादा देर बाँधा नहीं जा सकता था। मैं सोच रहा था कि क्या किया जाए जो रोचक भी हो और जिससे इन्हें कुछ नई जानकारियाँ भी मिलें। मैं अपने थैले को टटोल रहा था और बच्चे मेरी ओर इस तरह देख रहे थे जैसे वे पूछना चाहते हों कि आपके थैले में क्या है?
मेरे हाथ में सूर्य ग्रहण देखने वाला चश्मा आ गया। यह चश्मा, 3.10.05 को जब सूर्य ग्रहण लगा था, तभी से मेरे थैले में पड़ा हुआ था। बच्चों को मैंने चश्मा दिखाया और उनसे ग्रहण के बारे में बात की। उनमें से अधिकाँश ने बताया कि उन्हें परिवार के अन्य बड़े लोगों से ग्रहण के बारे में पता चला था, कुछ बच्चों ने उस दिन उपवास भी रखा था। दो-तीन बच्चे ऐसे थे जिन्होंने ग्रहण खत्म होने से पहले ही नहा लिया था। असल में उन्हें पता भी नहीं था कि ग्रहण कब से कब तक लगा और कब खत्म हुआ था।

ग्रहण क्या है...
आखिर होता कैसे है? मेरी ओर से राहू, केतु का नाम लिए जाने पर दो- चार बच्चों ने हूँ-हाँ की कि उन्होंने राहू, केतु का नाम सुन रखा है। इस पूरी बातचीत के दौरान बच्चे कुछ बोल नहीं रहे थे, बस धीरे से हाँ-हूँ, नहीं या फिर सिर हिलाना। मेरी आँखों से उनकी आँखों के मिलते ही अपने को दूसरे बच्चे के सिर के पीछे छिपा ले रहे थे।

कुछ थोड़ी बड़ी लड़कियाँ तेज़ी से किसी किताब से देखकर अपनी कॉपी पर कुछ उतारती जा रहीं थीं। बस बीच-बीच में एकाध बार मेरी ओर देख भर ले रही थीं। शायद ये उन्हें मिला हुआ घर पर करने का काम रहा होगा, जिसे पूरा करके अगले आने वाले किसी घण्टे में दिखाना होगा। यह सब कुछ होने के साथ भी कक्षा में शोर शराबा नहीं था इसलिए मुझे लगा कि कुछ बच्चे मेरी बात सुन रहे हैं। इन सभी बच्चों में एक लड़का जो कि अन्य लड़कों से थोड़ा बड़ा था, पूरी एकाग्रता के साथ मेरी तरफ देख रहा था और मुझसे आँखे मिलने पर भी वह अपनी नज़रें नहीं हटाता था। मुझे लगा कि चलो कुछ बच्चों को तो मेरी बातों में रुचि है और शायद वे समझ भी रहे हैं। तो क्यों न और बेहतर तरीके से बताया जाए। मैंने एक बच्चे से चॉक के लिए पूछा तो वह गया और अपने मास्टर साब से बोला। मास्टर साब ने अलमारी का ताला खोल तीन-चार समूची चॉक और एक नया सा दिखता हुआ डस्टर दे दिया।

पृथ्वी यूँ घूमती है
अब मैंने बोर्ड पर सूर्य, धरती, चन्द्रमा आदि के चित्र बना दिए और बताना शुरू किया कि ये सूर्य है, ये पृथ्वी है, जो सूर्य के चारों ओर घूमती है। यह ऐसे-ऐसे भी घूमती है और ऐसे-ऐसे भी घूमती है। चन्द्रमा भी पृथ्वी के चारों ओर ऐसे घूमता है। यहाँ पर मैंने जान बूझकर धुरी, कक्षा, घूर्णन आदि जटिल नामों का इस्तेमाल नहीं किया। मैं दिन-रात होने और मौसम बदलने तक उनको ले जाना चाहता था इसलिए यह ज़रूरी था कि उनको पृथ्वी के अपनी धुरी पर घूर्णन और सूर्य की परिक्रमा साथ-साथ करने का एहसास कराया जाए। भले ही चाहे इनका नाम इस रूप में न लेकर चक्कर लगाना और घूमना शब्द कहकर ही काम क्यों न चलाना पड़े।

मैंने खुद घूमना तथा साथ-साथ चलना शुरू किया, मानो पृथ्वी की तरह। बच्चे हँसने लगे, शायद उन्हें लगा होगा कि यह कैसा मास्टर है जो चक्कर-घिन्नी की तरह नाच रहा है जैसे कि वे खेल के दौरान चक्कर लगाते हैं। मुझे कुछ राहत महसूस हुई कि चलो बच्चों को मज़ा आया। मुझे चक्कर-घिन्नी की तरह नाचता देख वे बच्चे भी अब मेरी बात ध्यान से सुनने लगे जो पहले कम ध्यान दे रहे थे और अन्य काम करने में व्यस्त थे। बोर्ड पर बने चित्र और मुझे चक्कर-घिन्नी बना देख मास्टर साहब जो कि दूसरे कमरे में काफी ज़ोर-ज़ोर से बोलकर पढ़ा रहे थे, बाहर की ओर आए और ऑफिस में रखी तीन-चार बड़ी-बड़ी अलमारियों में से एक को खोल कर ग्लोब निकाल लाए। मेरे हाथों में देते हुए बोले, “इससे बताइए सर।” ग्लोब को बच्चे जानते थे और उन्हें पता था कि यह पृथ्वी है। नीले रंग के बारे में पूछने पर कुछ धीमे स्वर में ‘पानी है’ की आवाज़ सुनाई पड़ी। ग्लोब के बारे में मैंने कुछ मोटी बातें उनसे पूछीं भी और बतार्ईं भी। जैसे इतना पानी, इतनी धरती, यहाँ भारत है, यहाँ बर्फ जमी रहती है आदि। ग्लोब हाथ में होने से मैंने उसे खिड़की के पास से आ रही रोशनी दिखाकर दिन-रात आदि के बारे में फिर से बताया। ग्लोब को हाथों में नचाकर एक-दो गोले चला भी। खिड़की और ग्लोब के बीच डस्टर लाकर उसको चन्द्रमा की तरह इस्तेमाल कर उसकी परछाईं भी दिखाई।

सर, वो बोहरा है
अब मुझे लगा कि मैं काफी चीज़ें बता चुका हूँ परन्तु मेरी बातें कहीं भाषण की तरह हवा में तो नहीं जा रहीं। अत: मुझे कुछ नया करना चाहिए जिससे पता चले कि ये कितना तथा क्या जान पाए हैं और वे कुछ बच्चे जो मेरी बातों में रुचि नहीं ले रहे उन्हें भी जोड़ा जा सके? यह सोचकर मैंने उसी बच्चे को बुलाया जो अब तक काफी ध्यान से मेरी सब बातें सुन रहा था और मुझे लग रहा था कि मेरी बताई गई बातों में से कुछ को वह मोटे रूप में ही सही, ज़रूर पकड़ पाया होगा। मैंने जैसे ही उसे खड़ा किया तीन-चार बच्चे चिल्लाए, “सर वो बोहरा (बहरा) है।” मुझे बड़ा धक्का लगा कि मैं जिस बच्चे को देखकर मन में इतना खुश था कि यह लगातार मेरी बात सुन रहा है और पूरे ध्यान से समझ रहा है, असल में तो वो कुछ सुन ही नहीं पाया है और देखकर अगर कुछ समझ भी पाया होगा तो वह खुद बोलकर मुझे बता भी नहीं सकता। यह लड़का भी खड़े होने के बाद अपने बगल के बच्चों के हाव-भाव और शायद मेरे अचानक ठण्डे पड़ जाने को देखकर समझ गया था कि उसके बारे में मुझे बताया जा चुका है। यह भी हो सकता है कि इससे पहले कई मौकों पर लोगों ने उसे खड़ा किया हो और यह जानकर बिठा दिया हो कि वह गँूगा और बहरा है। कुछ पलों के लिए मैं भी स्तब्ध सा खड़ा रहा। मुझे समझ में नहीं आ रहा था कि मैं उसे खड़ा करने के बाद क्या करूँ? अब जबकि वह जान गया है कि उसके बारे में मुझे पता है और मैं उसे ऐसे ही बिठा देता हूँ तो उसे अपनी शारीरिक अक्षमता का दुख हो सकता है।

तुम सूरज हो
मेरी अगली योजना में उसकी क्या भूमिका हो सकती है मैं सोच नहीं पा रहा था। मैं भले ही न सोच पाता लेकिन मेरे भीतर के नाटककार को नाटक वर्कशाप के दौरान दिखाई गई कुछ गतिविधियों ने एक रास्ता सुझा दिया था। मैंने उसे अपने पास बुलाया और बोर्ड पर बने सूर्य की तरफ उँगली दिखाकर बोला, “तुम सूरज हो” वह नहीं समझ पाया। मुझे एकटक देखता भर रहा। अब मैंने उँगलियों और हाथ से इशारा करके बताया कि “तुम सूरज हो। सू...र...ज चमकता है, चारों तरफ लपटें निकल रही हैं।” ये वाक्य मैंने धीरे से बोले क्योंकि मुझे पता था कि वह सुन ही नहीं सकता। बोलने के साथ ही मैंने खुद सूर्य की तरह दमकने, लपटें फेंकने, पसीना पोंछने का अभिनय किया। खिड़की से आती धूप को दिखाया। इस बार वह समझ गया था कि उससे क्या करने को कहा जा रहा है। मेरे कहने पर वह दो तीन बार चमका, दमका, लपटें फेंकी। सारे बच्चे हँसने लगे, तो वह भी हँस दिया।

अब मैं अपने काम में आगे बढ़ सकता था। मैंने इस बार पीछे से दूसरे नम्बर पर बैठी उस लड़की को बुलाया जो अनमने ढंग से मेरी बातें सुन रही थी और उसकी ओर देखने पर अपने आगे की लड़की के पीछे खुद को छुपा लेती थी। एक-दो बार कहने पर तो वह उठी ही नहीं पर जब मैंने बताया कि देखो तुमने नीले रंग का कुर्ता पहना है और हमारी पृथ्वी भी नीली दिख रही है, आ जाओ, तुम्हें पृथ्वी बनना है। उसकी सहेली ने भी उसे ढकेलते हुए भेजा। थोड़ा-थोड़ा सकुचाते-शर्माते आखिर-कार वह मेरे पास आ गई। अब मैंने उसे सूर्य के चारों ओर खुद नाचकर दिखाया कि तुम्हें ऐसे नाचना है, तो सभी हँसने लगे, वह भी शर्मा कर हँसने लगी। एक-दो बार कहने पर वह घूमने लगी। सूर्य बने हुए लड़के से मैं बोला, “तुम भी दमकते रहो, लपटें फेंकते रहो।” लड़की अब परिभ्रमण के साथ-साथ घूर्णन भी कर रही थी और मुझसे भी कहीं ज़्यादा बेहतर और तेज़ी से। करे भी क्यों न आखिर, चक्कर-घिन्नी की तरह नाचना तो बच्चों और खासतौर से लड़कियों का मनपसन्द खेल होता है।

मेरे सूरज और पृथ्वी तैयार हो चुके थे और सभी बच्चे अब पूरे ध्यान से देख रहे थे। लिखने वाले भी अपने हाथ रोककर इसे देख रहे थे। अब मुझे ज़रूरत थी तो बस चन्द्रमा की। आगे बैठा छोटा लड़का जो मेरे लिए चॉक एवं डस्टर लाया था और अपने द्वारा लाए गए डस्टर का इस्तेमाल देख रहा था, उसने चॉक-डस्टर लाने की भूमिका भर से ही अपने आप को मुझसे जोड़ लिया था और ध्यान दे रहा था। उसे मैंने चन्द्रमा बनाया। पृथ्वी, चन्द्रमा, सूर्य के इस खेल का बच्चे मज़ा ले रहे थे। मास्टर साब भी दूर से देख रहे थे। उनकी कक्षा के बच्चे भी झाँककर देख रहे थे। हमारा सूरज मुस्कुराते हुए दमक रहा था, पृथ्वी घूम रही थी और चन्द्रमा भी पृथ्वी का चक्कर लगा रहा था।

तीनों बच्चों के इस संयोजन की मदद से मैंने बच्चों को ग्रहण के बारे में समझाने का प्रयास किया। इसके बाद मैंने बच्चों से पूछना शु डिग्री किया। किसी जगह पर जब चन्द्रमा बना लड़का, पृथ्वी बनी लड़की और सूरज बने लड़के के बीच में आ जाता या फिर पृथ्वी बनी लड़की और चन्द्रमा बने लड़के के बीच में सूरज बना हुआ लड़का आ जाता तो मैं कक्षा के बच्चों से पूछता कि क्या हुआ? तो एक साथ ‘सूर्य ग्रहण हैै’ और ‘अब चन्द्र ग्रहण है’ की आवाज़ें सुनाई पड़ती थीं। मैं नहीं जानता कि ये बातें उन्हें कब तक याद रहेंगी, सूर्य या चन्द्र ग्रहण की घटना को वे कितना समझ पाए और सभी बच्चे समझ भी पाए या नहीं। लेकिन इस एक-डेढ़ घण्टे की कक्षा ने मुझे बतौर शिक्षक सन्तुष्ट किया है, चाहे वह आंशिक रूप से ही क्यों न हो।


मो. उमर: एकलव्य, होशंगाबाद में गणित समूह में कार्यरत हैं। नाटक निर्देशन में विशेष रुचि।
चित्र: शिवेन्द्र पाण्डिया। चित्रकार और डिज़ाइनर हैं। भोपाल में निवास।