भरत पूरे

श्रद्धांजलि

काई लाया था न काई लई जावांगा,
जसा आया न वसा चली जावांगा।
निमाड़ी भाषा में उपरोक्त भजन कालू राम ने लगभग तीन माह पूर्व ही हारमोनियम बजाते हुए खुद गाया था, तथा उसका वीडियो फेसबुक पर साझा किया था। मुझे लगता है इस भजन के दर्शन को कालू राम ने अपना जीवन दर्शन बना लिया था। इस भजन को सुनकर कालू राम के इस नए शौक के बारे में जानकारी मिली। इससे पहले तक कालू राम की पहचान होशंगाबाद विज्ञान शिक्षा कार्यक्रम (HSTP) के एक सक्रिय कार्यकर्ता एवं स्रोत व्यक्ति, अनुवर्तनकर्ता, कुछ समय के लिए होशंगाबाद बुलेटिन के सम्पादक, आसपास पाए जाने वाले पक्षियों पर एक-एक पृष्ठीय पेम्फलेट बनाकर पक्षी निरीक्षण को दिलचस्प बनाने आदि के माध्यम से थी।

लगभग 37 वर्ष पहले कालू राम ने धार कॉलेज से प्राणी शास्त्र में एम.एससी. कर 1985 में मेरे साथ एकलव्य के धार फील्ड सेंटर पर कार्यकर्ता के रूप में काम शुरू किया था। एम.एससी. में मेरा विद्यार्थी होने के बावजूद मेरा उससे कोई खास परिचय नहीं था, क्योंकि कालू राम एक अत्यन्त संकोची स्वभाव का विनम्र व्यक्ति था।
एकलव्य की मीटिंग्स, शिक्षक प्रशिक्षणों, अध्याय लेखन जैसी गतिविधियों के लिए हम दोनों ने साथ-साथ यात्राएँ कीं, और इसी दौरान मुझे कालू राम की पारिवारिक पृष्ठभूमि और विभिन्न प्रकार के संघर्षों की जानकारी मिली। मुझे इस बात का पश्चाताप भी हुआ कि छात्र जीवन में मुझे कालू राम की विशेष सहायता करनी चाहिए थी, किन्तु कर नहीं पाया।
कालू राम ने धार, खरगोन, झाबुआ ज़िलों के होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के संगम केन्द्रों के शिक्षकों एवं प्राचार्यों के साथ अच्छा तालमेल बैठा लिया था। इसी वजह से मेरे लिए इस क्षेत्र में काम करना सहज होता गया।

एकलव्य में काम (1985-2003) करते-करते कालू राम ने फोटोग्राफी और लेखन कार्य में सराहनीय प्रगति की। परिणामस्वरूप हमें एकलव्य द्वारा प्रकाशित संदर्भ, स्रोत, चकमक पत्रिकाओं में कालू राम द्वारा लिखित अनगिनत लेख एवं छायाचित्र मिलते हैं। एकलव्य में काम करते हुए कालू राम ने कुछ वर्षों तक HSTP की अपनी पत्रिका होशंगाबाद विज्ञान बुलेटिन के सम्पादन की ज़िम्मेदारी भी सम्भाली थी।
कालू राम ने अपने लगभग 37 वर्षों के कार्यकाल में एकलव्य के अलावा कई अन्य संस्थाओं के साथ भी काम किया। 2004 से 2009 तक विद्या भवन सोसायटी, उदयपुर, राजस्थान में कार्यरत रहा। सन् 2010 एवं 2011 में आर्च व जशोदा ट्रस्ट के साथ गुजरात के वलसाड़ ज़िले के आदिवासी क्षेत्र की आश्रम शालाओं में काम किया। 2011 से 2014 तक अज़ीम प्रेमजी फाउण्डेशन, देहरादून (उत्तराखण्ड) में कार्यरत रहा और फिर एक लम्बे अर्से तक फाउण्डेशन के खरगोन केन्द्र में।

विद्याभवन सोसायटी उदयपुर में काम करते हुए प्राथमिक शिक्षा से सम्बन्धित पत्रिका (खोजबीन और बुनियादी शिक्षा: एक नई कोशिश) का सम्पादन भी किया। इसके अलावा कालू राम की एक पुस्तक खोजबीन का आनंद वाणि प्रकाशन द्वारा प्रकाशित की गई थी, जिसमें कालू राम ने होशंगाबाद विज्ञान के अपने अनुभवों को समेटा है और जिसकी रॉयल्टी एकलव्य के शैक्षिक कार्यों के लिए दान कर दी। उम्मीद है कि जल्दी ही राष्ट्रीय पुस्तक न्यास (एन.बी.टी.) द्वारा कालू राम की एक और पुस्तक का प्रकाशन किया जाएगा।
विद्या भवन में रहते हुए कालू राम ने छत्तीसगढ़ राज्य की पर्यावरण अध्ययन की पाठ्यपुस्तक व डी.एड. के पाठ्यक्रम लेखन में सक्रिय योगदान दिया। पिछले कुछ वर्षों से फाउण्डेशन के खरगोन केन्द्र को स्थापित और विकसित करने में कालू राम का परिश्रम मैंने देखा है। उसने भरपूर लगन के साथ सम्पूर्ण खरगोन ज़िले में संस्था एवं और स्वयं को स्थापित भी किया।

कालू राम की प्रकाशित पुस्तकों में छोटे जीवों से जान-पहचान, रफी अहमद किदवई की जीवनी का
हिन्दी अनुवाद (नेशनल बुक ट्रस्ट), अण्डे ही अण्डे (एन.सी.ई.आर.टी.) तथा अभिव्यक्ति, भोपाल द्वारा नवसाक्षरों के लिए प्रकाशित पाँच पुस्तकें शामिल हैं।
एकलव्य द्वारा प्रकाशित पत्रिकाओं के अलावा कालू राम ने हिन्दी पत्र-पत्रिकाओं में विज्ञान, पर्यावरण, शिक्षा और सामाजिक सरोकारों के मुद्दों पर सतत लेखन किया। इनमें बच्चों के लिए लिखे गए कई लेख शामिल हैं। इन तीन दशकों के दौरान कालू राम की पक्षी दर्शन, कीट दर्शन, मकड़ी दर्शन व फोटोग्राफी में दिलचस्पी और सक्रियता भी रही।
कालू राम का यूँ इस दुनिया से विदा लेना, मेरे और मेरे परिवार के लिए अत्यन्त पीड़ादायक है। जीवन भर उसने मुझे एक पारम्परिक गुरू का सम्मान दिया। जो कुछ भी लिखता या करता था, उसकी प्रशंसा सुनकर सदैव उसका श्रेय मुझे देता था। उसका स्वभाव ही ऐसा था कि जिस परिवार से उसका सम्पर्क हुआ, उससे उसके पारिवारिक सम्बन्ध बन गए। मेरे दौर और परिचय के अनेक नाम याद आ रहे हैं - अरविंद गुप्ते जी, भोलेश्वर दुबे, किशोर पंवार, होल्कर सर एवं विवेक पारसकर के सम्बन्धों को मैं जानता हूँ। यकीनन कालू राम के और भी अनेक परिवारों के साथ इतने ही प्रगाढ़ सम्बन्ध रहे होंगे।

अन्त में, कालू राम को अश्रूपूरित श्रद्धांजलि के साथ उस सहज-सरल आत्मा को शान्ति मिले, ऐसी कामना करता हूँ।


भरत पूरे: इंदौर के होलकर विज्ञान महाविद्यालय में प्राणीशास्त्र के प्राध्यापक रहे हैं। होशंगाबाद विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के साथ चार दशक से भी ज़्यादा का गहरा जुड़ाव।