वी.वी. रामन [Hindi PDF, 255 kB]

क्वांटम सिद्धान्त से पहला सम्पर्क होने पर जो लोग चकरा नहीं जाते, उन्हें शायद यह समझ में नहीं आया है।

—नील्स बोह्र

स्थूल व सूक्ष्म विश्व
प्राचीन काल से ही दुनिया को एक स्थूल ब्रह्माण्ड और एक सूक्ष्म ब्रह्माण्ड में बाँटना कई संस्कृतियों का गुण रहा है। इसके उल्लेख पायथागोरस और प्लेटो के विचारों में मिलते हैं। प्राचीन हिन्दू विश्वदृष्टि में एक बाह्य भौतिक विश्व है जिसे शिवलोक कहा जाता है, और आन्तरिक चेतना का विश्व है जिसे अन्तर्लोक कहा जाता है। मध्ययुगीन किमियागरी में भी सूक्ष्म ब्रह्माण्ड और स्थूल ब्रह्माण्ड का विचार प्रचलित था। इसमें सूक्ष्म ब्रह्माण्ड को स्थूल ब्रह्माण्ड से ज़्यादा पेचीदा माना जाता था और दोनों ही कम्पायमान थे। बोथियस, रॉबर्ट फ्लड और सर थॉमस ब्राउन जैसे मध्ययुगीन ईसाई विचारक भी इस तरह के दो विश्वों की बात करते थे।

आधुनिक विज्ञान के ढाँचे में हम अनुभूत यथार्थ के बारे में तीन अलग-अलग स्तरों पर विचार कर सकते हैं। पहला रोज़मर्रा के अनुभवों का स्तर है जहाँ चीज़ें या तो खुली आँखों से या सूक्ष्मदर्शी की मदद से दिखाई पड़ती हैं। हम जो चीज़ें देखते हैं उनमें धूल के कणों से लेकर विशाल चट्टानें, झीलें और पहाड़ शामिल हैं। इसे हम मध्यम-लोक कह सकते हैं।

इसके बाद है धरती से दूर की दुनिया: पृथ्वी से परे ग्रहों, तारों और निहारिकाओं की दुनिया। ये उन वस्तुओं से बहुत विशाल हैं जो हम धरती पर देखते, उठाते-धरते और नापते हैं। इन बाह्य वस्तुओं को स्पर्श करना या इनके साथ उठापटक करना सम्भव नहीं है। मगर दूरबीनों, अवधारणाओं और गणनाओं की मदद से इनका अध्ययन किया जा सकता है। इन्हें हम वृहत-लोक कह सकते हैं। मध्यम-लोक और वृहत-लोक में हम जिन वस्तुओं से दो-चार होते हैं वे अरबों, खरबों, नीलों और शंखों अणुओं और परमाणुओं से बनी हैं। इनको हम यथार्थ का क्लासिकल स्तर कह सकते हैं। और अन्त में, एक स्तर है जो इतना सूक्ष्म है कि अवलोकन से परे है। इस स्तर पर हम इकलौते अणुओं और परमाणुओं और उनकी उप-इकाइयों की भौतिकी पर गौर कर सकते हैं। यह सूक्ष्म-लोक है जिसकी छानबीन बीसवीं सदी में ही शुरू हुई है।
सूक्ष्म-लोक के नियमों और गुणधर्मों का अध्ययन ही क्वांटम यांत्रिकी या क्वांटम मेकेनिक्स है। यह भौतिकी की एक महत्वपूर्ण शाखा है और इसे मूलभूत भौतिकी भी कहते हैं क्योंकि इसके तहत अनुभूत यथार्थ की बुनियाद की छानबीन की जाती है।

गौरतलब बात यह है कि हमारे पैमाने पर भौतिक विश्व प्राय: पदार्थ के ऐसे छोटे और बड़े पिण्डों से बना होता है जिनमें द्रव्यमान होता है। ये पिण्ड विकिरण ऊर्जा (विद्युत-चुम्बकीय तरंगों) के समन्दर में डूबे होते हैं। ज़्यादा सटीकता से कहें, तो मध्यम-लोक और वृहत-लोक में पदार्थ कणों और (विकिरण) ऊर्जा तरंगों के रूप में नज़र आते हैं।
आइंस्टाइन का सूत्र: पदार्थ और ऊर्जा मूलत: एक ही हैं
आपको याद ही होगा कि बीसवीं सदी का एक सर्वाधिक महत्वपूर्ण सिद्धान्त विशिष्ट सापेक्षता सिद्धान्त है। इसे अल्बर्ट आइंस्टाइन (1873-1955) ने विकसित किया था और 1905 में प्रकाशित किया था।

इस सिद्धान्त ने कई बातें उजागर की थीं। इनमें से एक यह थी कि स्थान और समय आपस में गूँथे हुए हैं और एक ही निरन्तरता के अंग हैं। विशिष्ट सापेक्षता सिद्धान्त का एक और महत्वपूर्ण परिणाम यह था कि पदार्थ और ऊर्जा मूलत: एक ही हैं। इसका मतलब यह है कि पदार्थ और ऊर्जा, दोनों एक अन्तिम चीज़ के प्रकट रूप हैं।
पदार्थ ठोस पिण्डों के रूप में नज़र आता है जिसे स्थान के किसी एक बिन्दु पर स्थित माना जा सकता है। इसे किलोग्राम जैसी इकाइयों में नापा जाता है।
ऊर्जा को जूल जैसी इकाइयों में नापा जा सकता है। हम यों भी कह सकते हैं कि पदार्थ भौतिक विश्व का स्थिर भाग है जबकि ऊर्जा उसका गतिशील भाग है।

पदार्थ और ऊर्जा के बीच स्पष्ट मात्रात्मक सम्बन्ध भी है। इस कथन के दो आशय हैं। पहला आशय यह है कि पदार्थ की कोई भी निश्चित मात्रा ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा के तुल्य होती है। उदाहरण के लिए, यदि हम द्रव्यमान को किलोग्राम में नापें और ऊर्जा को जूल में नापें, तो ज्र् किलोग्राम पदार्थ ज्ञ् जूल ऊर्जा के बराबर होगा। इस बात को भौतिकी के सबसे मशहूर समीकरण के रूप में व्यक्त किया जाता है: कउथ्र्ड़2, जहाँ ड़ प्रकाश का वेग है।
दूसरा आशय यह है कि सिद्धान्तत: पदार्थ को ऊर्जा में, और ऊर्जा को पदार्थ में तबदील किया जा सकता है। जैसा कि हम जानते हैं यह तबदीली नाभिकीय अभिक्रियाओं में काफी बड़े पैमाने पर होती है। इसका मतलब यह भी है कि नाभिकीय अभिक्रियाओं के ज़रिए मानव ज़रूरतों के लिए ऊर्जा प्राप्त की जा सकती है।
विकिरण का क्वांटम रूप: तरंगों का एक कण-पक्ष भी होता है

ऊर्जा विविध रूपों में प्रकट होती है। ऊर्जा का सबसे आम रूप विकिरण है: हर तरंग लम्बाई और आवृत्ति की विद्युत-चुम्बकीय तरंगें। पदार्थ के कणों के विपरीत, तरंगें स्थान-बद्ध नहीं होतीं बल्कि एक क्षेत्र में फैली होती हैं। तरंगें निष्क्रिय चीज़ें नहीं हैं बल्कि कम्पन हैं। भौतिकी के क्लासिकल स्तर पर हम तरंगों को इसी तरह देखते हैं।

जब हम किसी गर्म सतह की ओर बढ़ते हैं तो हमें उससे निकलने वाली विकिरण ऊर्जा का अनुभव होता है। जब इस आम अनुभव का व्यवस्थित ढंग से, प्रयोगों के माध्यम से और मात्रात्मक अध्ययन किया गया और जब प्रेक्षण की बारीकियों को गणितीय व सैद्धान्तिक रूप में व्यक्त करने की कोशिश की गई, तो विकिरण का एक ज़बर्दस्त पहलू उजागर हुआ: कि विकिरण-ऊर्जा का एक कणीय पक्ष भी होता है। यह खोज मैक्स प्लैंक ने 1904 में की थी।4 दूसरे शब्दों में, हालाँकि क्लासिकल स्तर पर विकिरण का एक तरंग-पक्ष है, मगर गहरे परमाण्विक स्तर पर देखें तो यह सूक्ष्म-लौकिक ऊर्जा पुंजों के रूप में प्रकट और अप्रकट होती रहती है। अधिक सटीकता से कहें, तो ऐसे प्रत्येक सूक्ष्म ऊर्जा पुंज में ऊर्जा की एक निश्चित मात्रा होती है, जो तरंग की आवृत्ति के समानुपाती होती है।5 दूसरे शब्दों में, अधिक आवृत्ति वाला विकिरण मतलब अधिक ऊर्जा वाले फोटॉन। उदाहरण के लिए, माइक्रोवेव फोटॉन की अपेक्षा गामा किरण के फोटॉन ज़्यादा ऊर्जा के वाहक होते हैं क्योंकि गामा किरणों की आवृत्ति अपेक्षाकृत अधिक होती है। विकिरण की कण-इकाई को ऊर्जा का क्वांटम कहते हैं।

जब भी हम सूक्ष्म-लौकिक प्रक्रिया का सामना करते हैं (यानी जिसमें इकलौते परमाण्विक कण शामिल हों) तो हमें विकिरण-ऊर्जा के इस पक्ष को ध्यान में रखना होगा। सूक्ष्म-लोक में ऐसी कई प्रक्रियाएँ होती हैं, जिनके प्रभावों का अवलोकन व मापन किया जा सकता है।

विकिरण की इस मूलभूत प्रकृति की खोज आधुनिक विज्ञान की तहकीकात की पद्धति के बगैर कभी न हो पाती जिसमें सटीक उपकरणों और गणित का इस्तेमाल शामिल है। इस बात को रेखांकित करना होगा और आधुनिक विज्ञान के उन टीकाकारों के ध्यान में लाना होगा जो आधुनिक वैज्ञानिक निष्कर्षों और प्राचीन दार्शनिक सूझबूझ के बीच भ्रम पैदा करते हैं और इन्हें परस्पर तुल्य बताने की कोशिश करते हैं।
कणों का तरंग-पक्ष: सूक्ष्म-लोक में कणों का तरंग-पक्ष होता है

ज़रा संक्षेप में दोहरा लें कि अब तक हमने पदार्थ-विश्व की बनावट के बारे में क्या-क्या देखा है।
(क) क्लासिकल विश्व में पदार्थ कणों के रूप में और ऊर्जा तरंगों के रूप में नज़र आते हैं।
(ख) ऊर्जा में तरंग और कण, दोनों पहलू होते हैं।
(ग) तरंगों का कण-पक्ष सूक्ष्म-लोक में ज़्यादा प्रकट होता है।
(घ) पदार्थ और ऊर्जा समतुल्य हैं।
इन बातों को हम एक रेखाचित्र से दर्शा सकते हैं:
यदि हम कथन (क) और (ख) पर विचार करें और उपरोक्त रेखाचित्र को देखें तो हमें लगेगा कि भौतिक यथार्थ की प्रकृति को ज़्यादा सुडौल (सिमेट्रिकल) और सम्पूर्ण बनाने के लिए दो कथन और जोड़े जाने चाहिए:
(च) पदार्थ में कण व तरंग, दोनों पक्ष होते हैं।
(छ) पदार्थ का तरंग-पक्ष सूक्ष्म-लोक में ज़्यादा प्रकट होता है।

दरअसल, ये दो कथन लुई डी ब्रॉगली (1892-1987) द्वारा 1924 में प्रस्तुत शोध प्रबन्ध के केन्द्रीय विचार थे।8 तथाकथित डी ब्रॉगली परिकल्पना यह थी कि प्रत्येक कण का एक तरंग-पक्ष होता है। ज़्यादा सटीक शब्दों में, किसी भी कण जिसका द्रव्यमान थ्र् और वेग ध् है, यानी जिसका संवेग द्रउथ्र्ध् है, के साथ एक तरंग सम्बद्ध होती है जिसकी तरंग-लम्बाई थ् उसके संवेग के व्युत्क्रमानुपाती होती है।
ण् के अत्यन्त कम मान के चलते सामान्य पदार्थ से सम्बन्ध तरंग इतनी छोटी होती हैं कि उनका अनुभव नहीं किया जा सकता। डी ब्रॉगली तरंग की तरंग-लम्बाई उल्लेखनीय हो, इसके लिए ज़रूरी होगा कि सम्बन्धित पदार्थ का संवेग अत्यन्त कम हो। इसका मतलब है अत्यन्त छोटे पिण्ड, जैसे प्रोटॉन या इलेक्ट्रॉन। मसलन, यदि कोई इलेक्ट्रॉन 3 न् 106 मीटर प्रति सेकण्ड के वेग से गतिमान हो, तो उसका संवेग लगभग 2.7 न् 10-27 किलोग्राम.मीटर प्रति सेकण्ड होता है। हम गणना कर सकते हैं कि इससे सम्बद्ध डी ब्रॉगली तरंग लम्बाई 2.3 न् 10-10 मीटर होगी। यह एक्स-रे की तरंग लम्बाई के दायरे में है। अलबत्ता, यह ध्यान रखें कि पदार्थ-तरंगें विद्युत-चुम्बकीय तरंगें नहीं होतीं।

याद कीजिए कि तरंगों के सबसे प्रमुख गुणधर्म व्यतिकरण (इंटरफरेंस) और विवर्तन (डिफ्रेक्शन) होते हैं। लिहाज़ा, यदि कणों के साथ तरंग सम्बद्ध हैं, तो कणों के साथ भी व्यतिकरण और विवर्तन उत्पन्न करना मुमकिन होना चाहिए। इस बात की पुष्टि प्रयोगों द्वारा कर ली गई है। इलेक्ट्रॉन पुंज को झिर्रियों और क्रिस्टल्स में से गुज़ारने पर व्यतिकरण पैटर्न देखे गए हैं (जैसे कि प्रकाश और एक्स-रे के साथ प्राप्त होते हैं)। ऐसे प्रयोगों से कण-तरंगों की तरंग-लम्बाइयाँ निकाली गई हैंै और ये मान डी ब्रॉगली सूत्र से काफी निकटता से मेल खाते हैं।10 इस गुणधर्म का उपयोग इलेक्ट्रॉन सूक्ष्मदर्शी बनाने में भी किया गया है।11 कणों और तरंगों की इस प्रकृति (दो अलग-अलग रूपों में प्रकट होने की गुंजाइश) को तरंग-कण द्वैत (वेव पार्टिकल ड्युएलिटी) कहते हैं।

प्रसंगवश यह बताया जा सकता है कि डी ब्रॉगली का विचार इतना अतिवादी लगता था कि उनके प्रोफेसर्स डॉक्टरेट उपाधि प्रदान करने में काफी झिझक रहे थे। मगर जब डी ब्रॉगली का शोध प्रबन्ध आइंस्टाइन को दिखाया गया तो उन्होंने खुलकर उसका अनुमोदन किया।

श्रॉडिंजर समीकरण

पदार्थ-पिण्डों के स्थान और संवेग में परिवर्तन को संचालित करने वाले नियमों को गणितीय रूप में लिखा जाता है और इन्हें न्यूटन के गति के समीकरण कहते हैं। इसी प्रकार से तरंगों के व्यवहार (यानी एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक और एक क्षण से दूसरे क्षण के बीच उनका आयाम (एम्प्लीट्यूड) कैसे बदलता है) को तरंग समीकरण द्वारा व्यक्त किया जाता है।

चूँकि, पदार्थ का एक तरंग-पक्ष होता है, लिहाज़ा यह सम्भव है कि पदार्थ-तरंगों के लिए भी एक तरंग समीकरण लिखी जा सके। इस तरह के पदार्थ-तरंग समीकरण को श्रॉडिंजर समीकरण कहते हैं। डी ब्रॉगली के शोध प्रबन्ध के प्रकाशन के कुछ ही समय बाद इसे विकसित कर लिया गया था।

क्वांटम भौतिकी में श्रॉडिंजर समीकरण महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, ठीक उसी तरह जैसे क्लासिकल भौतिकी में न्यूटन के समीकरण। दूसरे शब्दों में, जब हम उन कणों की प्रक्रियाओं पर विचार करते हैं जो परमाण्विक (सूक्ष्म-लौकिक) स्तर के बलों के अधीन हैं, तो हमें श्रॉडिंजर समीकरण से शुरुआत करनी होती है। इस समीकरण के उपयोग से भौतिक शास्त्रियों ने परमाण्विक स्तर की कई गुत्थियाँ सुलझाई हैं। श्रॉडिंजर समीकरण के पूरे महत्व को समझने और उसका अर्थपूर्ण ढंग से उपयोग करने के लिए आपको उच्च गणित में ठीक-ठाक महारत हासिल करनी होगी।

प्लैंक स्थिरांक ण् श्रॉडिंजर समीकरण में स्पष्ट रूप से प्रकट होता है। लिहाज़ा यह समीकरण सिर्फ सूक्ष्म-लौकिक स्तर पर ही सार्थक महत्व रखती है। जिस क्लासिकल विश्व के हम आदी हैं, उसमें श्रॉडिंजर समीकरण की कोई प्रत्यक्ष प्रासंगिकता नहीं है। यह किसी पराई धरती के कानून के समान है, जो हमें प्रभावित नहीं करता मगर यदि हम उस दुनिया के लोगों को समझना चाहते हैं तो हमें यह कानून जानना होगा।
क्लासिकल यांत्रिकी में हम अक्सर पिण्डों या पिण्डों के किसी तंत्र की गति का अध्ययन करते हैं, जो कुछ सुपरिभाषित बाह्य बलों के प्रभाव में हैं। दूसरी ओर, क्वांटम विश्व में ज़्यादा उपयोगी यह होता है कि बलों की बजाय उन बल क्षेत्रों की वजह से उत्पन्न स्थितिज ऊर्जा पर ध्यान दिया जाए, जो कणों या तंत्र को प्रभावित करते हैं।
पदार्थ-तरंग के आयाम (एंप्लीट्यूड) को संकेत ज्ञ् (साई) से दर्शाया जाता है। सरल शब्दों में ज्ञ् पदार्थ-तरंग के आयाम का द्योतक है। यह श्रॉडिंजर समीकरण में ठीक उसी तरह आता है जैसे क्लासिकल तरंग समीकरण में तरंग का आयाम आता है।
क्वांटम अवस्थाएँ: क्वांटम इकाइयाँ एक ही समय पर विभिन्न अवस्थाओं में हो सकती हैं, जब तक कि उनकी उपस्थिति को देखा न जाए।
जब आप श्रॉडिंजर समीकरण को हल करते हैं, तो आपको विभिन्न अवकलन (डिफरेंशियल) समीकरणों के कई हल प्राप्त होते हैं। इनमें से प्रत्येक अवस्था ऊर्जा, स्थिति, संवेग, घूर्णन वगैरह की द्योतक होती है। इन विभिन्न सम्भावित अवस्थाओं को क्वांटम वस्तु की आइगेन-अवस्था कहते हैं।15 क्वांटम भौतिकी की सबसे महत्वपूर्ण खोज यह है कि जब तक अवलोकन न किया जाए, कोई भी सूक्ष्म-लौकिक वस्तु एक साथ इन सभी अवस्थाओं में रहती है। यह बात हमारे पैमाने पर किसी भी चीज़ के सर्वथा विपरीत है। यह भौतिकी में एकदम नई अवधारणा है।

इसे हम एक उपमा की मदद से समझ सकते हैं। एक सिक्के पर गौर कीजिए। हम इसके दो पहलुओं (चित और पट) को दो सम्भव आइगेन-अवस्थाएँ मान सकते हैं। जब सिक्के को हवा में उछाला जाता है तो कहा जा सकता है कि वह एक साथ चित और पट, दोनों अवस्थाओं में है। मगर जैसे ही वह ज़मीन पर गिरता है, अवलोकन किया जाता है, तो देखा जाता है कि वह दो सम्भव अवस्थाओं में से किसी एक में ही होता है।

यही वह परिस्थिति थी, जिसमें आइंस्टाइन ने अपनी वह मशहूर टिप्पणी की थी: “ईश्वर दुनिया के साथ पाँसे नहीं खेलता।” उनका आशय यह था कि उनके लिए एक ऐसे ईश्वर की कल्पना करना मुश्किल था जो दुनिया को पाँसे फेंककर चलाता है। मगर कई आधारों पर क्वांटम यांत्रिकी दर्शाती है कि सूक्ष्म-लोक में तो ईश्वर (या प्रकृति) ठीक यही करता है।
ज्ञ् फलन और सम्भाविता: सूक्ष्म-लोक के नियम सम्भाविता पर टिके हैं
इलेक्ट्रॉन और प्रोटॉन के स्तर पर कण सुपरिभाषित बाह्य स्थितियों के तहत भी कुछ हद तक स्वतंत्रता के साथ व्यवहार करते हैं। अर्थात, उनके मार्ग सख्ती से निर्धारित नहीं होते, जैसा कि क्लासिकल स्तर पर होता है। उनका व्यवहार सम्भाविता के नियमों से संचालित होता है। दूसरे शब्दों में, हालाँकि इस बात की एकदम सटीक भविष्यवाणी करना सम्भव नहीं होता कि विशिष्ट प्रभावों के तहत कोई क्वांटम वस्तु किस तरह व्यवहार करेगी (सिक्के की तरह) मगर आप परिणाम की भविष्यवाणी निश्चित सम्भाविता से कर सकते हैं।
क्वांटम भौतिकी का मूल बिन्दु यह है कि ज्ञ् फलन उस सम्भाविता का माप है। उदाहरण के लिए, एक डिब्बे में बन्द इलेक्ट्रॉन की कल्पना कीजिए। यदि गणितीय विश्लेषण से पता चलता है कि सम्बन्धित ज्ञ् फलन का मान डिब्बे के किसी कोने में बहुत अधिक है, तो इसका मतलब होगा कि काफी सम्भाविता है कि इलेक्ट्रॉन उस कोने के आसपास ही कहीं है। या उसे उस क्षेत्र में पाने की सम्भाविता बहुत कम है जहाँ ज्ञ् फलन का मान बहुत कम है। ज़्यादा सटीकता से, यह परिणाम हमें बताता है कि यदि हम एक जैसे बहुत सारे कणों के साथ काम कर रहे हैं, तो अधिकांश मामलों में ज़्यादा इलेक्ट्रॉन्स उस कोने के निकट पाए जाएँगे जहाँ ज्ञ् फलन का मान अधिक है और उन क्षेत्रों में कम इलेक्ट्रॉन्स पाए जाएँगे जहाँ ज्ञ् का मान कम है।
कुछ इन्तहाई परिस्थितियों में जब किसी एक बिन्दु पर ज्ञ् फलन का मान 1 हो जाए और शेष सारी जगहों पर 0 हो जाए, तब हम कह सकते हैं कि सम्बन्धित कण ठीक उसी बिन्दु पर स्थित है।
अलबत्ता, ऐसा होता कभी नहीं है। आम तौर पर ज्ञ् फलन का मान किसी क्षेत्र के विभिन्न बिन्दुओं पर गैर-शून्य होता है। लिहाज़ा, कोई भी क्वांटम वस्तु कभी पूरी तरह किसी एक बिन्दु पर स्थित नहीं होती। इसी वजह से, हमें इलेक्ट्रॉन का जो बिम्ब मिलता है वह एक क्षेत्र के विभिन्न ऐसे बिन्दुओं पर पसरा होता है, जहाँ ज्ञ् फलन का मान गैर-शून्य है। इससे इस विचार का जन्म होता है कि इलेक्ट्रॉन एक संकेन्द्रित कण न होकर एक बादलनुमा वस्तु है।
टनल इफेक्ट: सामान्यत:, कोई भी वस्तु पर्याप्त शुरुआती ऊर्जा बिना टीले के दूसरी तरफ नहीं पहुँच पाएगी। सूक्ष्म-लोक में ऐसे अवरोध पार करने के लिए ज़रूरी ऊर्जा से कहीं कम ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन भी दूसरी ओर पहुँच सकते हैं, मानो किसी सुरंग से निकले हों।

सुरंग प्रभाव (टनल इफेक्ट): क्लासिकल विश्व में असम्भव बातें सूक्ष्म-लोक में सम्भव हैं
कल्पना कीजिए कि एक क्षैतिज सतह है जिस पर एक छोटा-सा टीला है और आप एक गेंद को धक्का देते हैं। गेंद उस टीले के दूसरी ओर चली जाएगी या कुछ दूरी तक ऊपर चढ़कर लौट आएगी, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसे शुरुआत में कितनी (गतिज) ऊर्जा दी गई थी। यदि यह शुरुआती ऊर्जा गेंद को टीले के शिखर तक पहुँचाने के लिए पर्याप्त न हुई, तो गेंद किसी हाल में दूसरी तरफ नहीं पहुँच पाएगी। सूक्ष्म-लोक में मामला कुछ अलग होता है। वहाँ, इस तरह के स्थितिज अवरोध (potential barrier) पार करने के लिए ज़रूरी ऊर्जा से कहीं कम ऊर्जा वाले इलेक्ट्रॉन भी दूसरी ओर पहुँच सकते हैं। इलेक्ट्रॉन ऐसे व्यवहार करते हैं मानो उस टीले में कोई सुरंग हो। यह इसलिए होता है क्योंकि ज्ञ् फलन उस अवरोध के दूसरी ओर भी गैर-शून्य होता है। इसका मतलब होगा कि असम्भव-सी दिखने वाली निम्नलिखित स्थिति देखने में आ सकती है। जब कोई क्वांटम वस्तु ऐसी दीवारों के बीच कैद कर दी जाती है, जिनको वह फलांग नहीं सकती, तो एक निश्चित सम्भाविता होती है कि वह फिर भी उस कैद से बाहर निकल जाएगी। क्लासिकल स्तर पर तो ऐसा नहीं हो सकता। मगर क्वांटम विश्व में ऐसा हो सकता है और होता है। और इसमें किसी भौतिक नियम का उल्लंघन नहीं होता। इस सम्भावना को सुरंग प्रभाव या टनल इफेक्ट कहते हैं16 क्योंकि इसमें ऐसा लगता है कि क्वांटम वस्तु किसी काल्पनिक सुरंग से होकर निकल गई है। यह एक उदाहरण है कि कैसे क्वांटम विश्व में चीज़ें बहुत अलग ढंग से व्यवहार करती हैं।

यह महज़ सैद्धान्तिक कौतूहल की बात नहीं है। क्वांटम सुरंगें सूक्ष्म-लोक में आम बात हैं। मसलन, रेडियोसक्रियता के सन्दर्भ में अल्फा कण परमाणु के नाभिक के अन्दर से निकल जाते हैं जबकि उनके पास इस काम को अंजाम देने के लिए पर्याप्त ऊर्जा नहीं होती।17 वे यह करिश्मा सुरंग प्रभाव के चलते ही कर पाते हैं। इसी प्रकार से, परिस्थितियाँ उपयुक्त हों, तो धातु के परमाणुओं के इलेक्ट्रॉन्स बन्धन बल से मुक्त हो जाते हैं जबकि उनके पास इतनी ऊर्जा नहीं होती। इस परिघटना को फील्ड एमिशन कहते हैं और इसका उपयोग फील्ड एमिशन सूक्ष्मदर्शी में किया जाता है। इस सूक्ष्मदर्शी से ठोस पदार्थों की सतह की संरचना का अध्ययन किया जाता है।

किसी सुचालक में विद्युत धारा के रूप में बह रहे इलेक्ट्रॉन कभी-कभी टनलिंग के ज़रिए कुचालक परत (इंसुलेटर) को पार कर जाते हैं और दूसरी ओर प्रकट हो जाते हैं। यह स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि इलेक्ट्रॉन कुचालक को भेद नहीं रहे हैं। इस प्रक्रिया में कुचालक पर कोई असर नहीं पड़ता। ये इलेक्ट्रॉन तो दूसरी तरफ एक ऐसी प्रक्रिया के माध्यम से निकल जाते हैं, जो क्लासिकल नज़रिए से जादू से कम नहीं है। हाल ही में यह भी दर्शाया गया है कि इलेक्ट्रॉन का टनलिंग निर्वात में भी हो सकता है। इस सम्भावना का फायदा स्कैनिंग टनलिंग सूक्ष्मदर्शी में उठाया जाता है। यह भी पदार्थों की सतह की संरचना के बारे में काफी विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। इसी प्रकार से, अर्ध-चालकों के सही संयोजन (जिन्हें पी-एन जंक्शन कहते हैं) में इलेक्ट्रॉन वेलेंस पट्टी में से प्रतिबन्धित पट्टी से होकर चालन पट्टी में टनल कर जाते हैं। टनल डायोड्स का आधार यही है। ऐसे डायोड्स का सॉलिड स्टेट इलेक्ट्रॉनिक्स में खूब उपयोग होता है।

हाइज़ेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त: सूक्ष्म-लोक में मापन की शुद्धता की सीमाएँ हैं
पदार्थ के तरंग-पक्ष का एक अहम परिणाम यह है कि किसी क्वांटम वस्तु की स्थिति और संवेग, दोनों को एक साथ पूरी परिशुद्धता से पता करना असम्भव होता है। देखें कि ऐसा क्यों है। कल्पना कीजिए कि किसी वाहन की स्थिति और संवेग का मापन एक हेलीकॉप्टर द्वारा राडार की मदद से किया जाता है। कम-से-कम हमारी साइज़ के पैमाने पर आप मनचाही परिशुद्धता से ये आँकड़े प्राप्त कर सकते हैं। इसके लिए आप विद्युत-चुम्बकीय तरंगें (फोटॉन्स) उस वाहन पर फेकेंगे और टकराकर वापिस आने वाली तरंगों को देखेंगे। इस प्रक्रिया में वाहन की गति अप्रभावित रहती है।

अब कल्पना कीजिए कि हम एक इलेक्ट्रॉन की स्थिति और वेग (संवेग) पता करना चाहते हैं। यहाँ भी हमें फोटॉन का उपयोग करना होगा। मगर जब फोटॉन इलेक्ट्रॉन को टक्कर मारता है, तो इलेक्ट्रॉन काफी विचलित हो जाता है। नतीजतन, टकराकर लौटने वाला फोटॉन जो सूचना लाएगा वह सही नहीं होगी। अवलोकन की क्रिया मात्र से प्रेक्षित तंत्र में विचलन पैदा हो गया है। क्वांटम तंत्रों में प्रेक्षक और प्रेक्षित के बीच यह परस्पर क्रिया अपरिहार्य है: परम शुद्धि हासिल करने में हमारी असमर्थता के मूल में यही परस्पर क्रिया है।

किसी क्वांटम वस्तु की स्थिति और संवेग को एक साथ पूरी परिशुद्धता से नापने की असम्भवता (सिद्धान्तत: भी) उस सिद्धान्त का एक उदाहरण है जिसे हाइज़ेनबर्ग का अनिश्चितता का सिद्धान्त कहते हैं।18 हाइज़ेनबर्ग का सिद्धान्त सिर्फ सूक्ष्म-लोक में ही प्रासंगिक व महत्वपूर्ण होता है।

इलेक्ट्रॉन परमाणु के नाभिक में क्यों नहीं पाए जाते, इस बात की व्याख्या हाइज़ेनबर्ग सिद्धान्त के आधार पर की जा सकती है। नाभिक का व्यास 10-14 मीटर के लगभग होता है। इसे यदि इलेक्ट्रॉन की स्थिति में अनिश्चितता मान लें, तो हम उसके संवेग में अनिश्चितता की गणना कर सकते हैं। यह गणना करने पर पता चलता है कि संवेग की अनिश्चितता बहुत विशाल है। दरअसल, यह किसी ऐसे इलेक्ट्रॉन से मेल खाती है जिसकी ऊर्जा करीब 2,00,00,000 इलेक्ट्रॉन वोल्ट हो। सामान्य तौर पर परमाणु में उपस्थित इलेक्ट्रॉन की ऊर्जा महज़ चन्द इलेक्ट्रॉन वोल्ट होती है। तो इतनी ऊर्जा से लैस इलेक्ट्रॉन नाभिक को छोड़ भागेगा। इसीलिए नाभिकों में इलेक्ट्रॉन नहीं रह सकते और नहीं रहते।

ऊर्जा और समय की अनिश्चितता: सूक्ष्म-लोक में ऊर्जा संरक्षण के नियम का सख्ती से पालन नहीं होता
भौतिक रूप से प्रेक्षणीय राशियों की ऐसी कई अन्य जोड़ियाँ और हैं जिन पर हाइज़ेनबर्ग सिद्धान्त लागू होता है। ऐसी जोड़ियों को युग्मित प्रेक्षणीय (conjugate observables) कहते हैं।19 ऊर्जा व समय ऐसे दो युग्मित प्रेक्षणीय हैं। अर्थात् यदि हम किसी समय अन्तराल के दौरान किसी क्वांटम तंत्र की ऊर्जा का मापन करें, तो इन राशियों के मापन में भी निश्चित अनिश्चितताएँ होती हैं।20 इसका मतलब यह है कि समय के बहुत छोटे अन्तराल में ऊर्जा संरक्षण के नियम का उल्लंघन सम्भव है। समय के मापन में अनिश्चितता के बहुत कम मान को देखते हुए, ऊर्जा में भारी अनिश्चितता हो सकती है। लिहाज़ा, क्वांटम विश्व में यह सम्भव है कि अत्यन्त छोटे समय अन्तराल में द्रव्यमान (या ऊर्जा) निर्वात से प्रकट हो जाए या निर्वात में गुम हो जाए।

उदाहरण के लिए, एक परमाणु पर विचार कीजिए जिसके एक इलेक्ट्रॉन को उत्तेजित करके उच्चतर ऊर्जा स्तर पर पहुँचा दिया गया है। आप तो जानते ही हैं कि जब यह इलेक्ट्रॉन वापिस अपने प्रारम्भिक स्तर पर लौटेगा, तो यह एक फोटॉन उत्सर्जित करेगा। अब कल्पना कीजिए कि उत्तेजित अवस्था 10-8 सेकण्ड तक बनी रहती है। इसका सम्बन्ध समय में अनिश्चितता से होगा। लिहाज़ा, उत्सर्जित फोटॉन की ऊर्जा में 10-26 जूल तक की परिशुद्धता-हीनता होगी। आवृत्ति के रूप में देखें तो यह अनिश्चितता करीब 107 हर्ट्ज़ के बराबर है। दरअसल, मूलभूत परस्पर क्रियाओं (जैसे नाभिक के अन्दर दो फोटॉन्स के बीच अन्तर्क्रिया) के दौरान नए द्रव्यमान प्रकट और अप्रकट होते रहते हैं, जिसकी वजह से तथाकथित सशक्त क्षेत्र (स्ट्राँग फील्ड) पैदा होते हैं। ज़्यादा सामान्य रूप में देखें, तो भौतिक विश्व के अध:स्तर में अरबों-खरबों कण लगातार बनते और नष्ट होते रहते हैं और ब्रह्माण्ड का निर्वाह करते हैं। इन्हें आभासी कण (वर्चुअल पार्टिकल) कहते हैं। वास्तविक कणों में पदार्थ-ऊर्जा का संरक्षण होता है। उन्हें एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक पहुँचने में निश्चित समय लगता है। आभासी कणों में पदार्थ-ऊर्जा का संरक्षण नहीं होता। इनकी भूमिका अन्तर्क्रियात्मक बलों के ज़रिए कणों को आपस में जोड़ना है। इसीलिए हम कहते हैं कि ब्रह्माण्ड सर्वत्र अप्रेक्षणीय आभासी कणों से भरा पड़ा है।

पूरकता का सिद्धान्त: कई मामलों में एक पहलू की अधिक स्पष्टता का मतलब होता है किसी अन्य पहलू में अधिक धुँधलापन
हाइज़ेनबर्ग सिद्धान्त के असर को कई अन्य सन्दर्भों में भी देखा जा सकता है। मसलन, यदि हम नन्हे बच्चों के व्यवहार का अध्ययन करना चाहते हैं, तो हमें उनको आपस में अन्तर्क्रिया के लिए खुला छोड़ना होगा। जैसे ही हम उनका अवलोकन करेंगे, उनका व्यवहार प्रभावित होगा। इस तरह की बातें हाइज़ेनबर्ग के सिद्धान्त के प्रकाशन के तुरन्त बाद होने लगी थीं। 1927 में नील्स बोह्र ने पूरकता का अपना मशहूर सिद्धान्त विकसित किया।21 यह सिद्धान्त डी ब्रॉगली द्वारा प्रतिपादित तरंग-कण द्वैत की सूझबूझ से भरी व्याख्या है। यह सिद्धान्त इतना ही कहता है कि सूक्ष्म-लौकिक वस्तुओं के मामले में हम जितनी परिशुद्धता से उसके कण-पक्ष का विवरण करेंगे, तरंग-पक्ष में हम उतने ही अस्पष्ट होते जाएँगे। इसका उल्टा भी सही है। इस द्वैत को अन्य दायरों में भी लागू किया जा सकता है।22 इसमें हम युग्मित क्षेत्रों की धारणा जोड़ सकते हैं। किन्हीं दो क्षेत्रों पर विचार कीजिए।23 इन्हें क्1 और क्2 कहेंगे। ग् और ख्र् क्रमश: कम और ज़्यादा के द्योतक हैं। तब हम पूरकता के सिद्धान्त को निम्नानुसार व्यक्त कर सकते हैं:

जितनी अधिक स्पष्टता से हम एक क्षेत्र को पहचानते हैं, दूसरा उतना ही कम स्पष्ट होता जाएगा:

पूरकता का आशय यह निकाला जा सकता है कि एक समय पर दो युग्मित क्षेत्रों का सम्पूर्ण ज्ञान, समझ व सूझबूझ हासिल करना असम्भव है। हम इन्हें ज्ञानशास्त्रीय युग्मित क्षेत्र कह सकते हैं। जैसे, जैविक तंत्रों का यांत्रिकी नज़रिया और जीवनी शक्ति आधारित नज़रिया पूरक नज़रिए हैं। इसी प्रकार के अन्य ज्ञानशास्त्रीय पूरक युग्म हैं: कला की आलोचना और कला की सराहना, बाहरी व्यक्ति की किसी संस्कृति की समझ और अन्दरूनी व्यक्ति का उसी संस्कृति का अनुभव, किसी समस्या पर भावनात्मक प्रतिक्रिया और तार्किक प्रतिक्रिया।

चिन्तन
कभी-कभी युग्मित क्षेत्र दार्शनिक रूप से, विचारधारात्मक रूप से और व्यावहारिक रूप से परस्पर विरोधी हो सकते हैं। इन्हें हम नकारात्मक युग्मित क्षेत्र कह सकते हैं। इनके उदाहरण हैं: धर्म ग्रन्थों के प्रति ऐतिहासिक सोच और धार्मिक सोच; मुक्त व्यापार और समाजवाद; राजनीति में अनुदारवादी और उदारवादी विचारधाराएँ; मानव परिस्थितियों की वैज्ञानिक समझ और धार्मिक समझ। ज्ञानशास्त्रीय युग्मित क्षेत्र हमें समृद्ध बना सकते हैं और एक से दूसरे में जाना सम्भव होता है। दूसरी ओर, नकारात्मक युग्मित क्षेत्र परस्पर विरोधी होते हैं और प्राय: टकराव को जन्म देते हैं। इस मामले में प्रत्येक युग्मित क्षेत्र में पराकाष्ठा की स्थिति में पहुँचना सम्भव होता है। पूरकता के इस विश्लेषण का महत्व यह है कि इससे हमें यह समझने में मदद मिलती है कि क्यों मुद्दों को लेकर अलग-अलग नज़रिए होते हैं। हाइज़ेनबर्ग के सिद्धान्त की ही तरह, विचारों और समझ की दुनिया में भी निहित अवरोध होते हैं जिन्हें पार नहीं किया जा सकता। इसे मानव-स्तर के स्थूल विश्व पर सूक्ष्म-लोक की छाया कहा जा सकता है।

व्यक्ति-वस्तु (सब्जेक्ट-ऑब्जेक्ट) अन्तर्क्रिया: हमारे मापन-योग्य ज्ञान की सीमाएँ हैं
अनिश्चितता का सिद्धान्त ऐसी अमिट सीमाएँ परिभाषित करता है जो यह निर्धारित करती हैं कि सूक्ष्म-लोक की युग्मित अवस्थाओं के बारे में हम कितनी परिशुद्धता से जान सकते हैं। हमारी पूरी समझ में निहित इस अधूरेपन ने हमें यह समझने में मदद की है कि हम भौतिक विश्व को उसकी अन्तिम पूर्णता में नहीं पकड़ सकते। इस कथन का आशय यह निकालने की भूल नहीं करनी चाहिए कि यह परिशुद्ध उपकरण बनाने की व्यावहारिक दिक्कतों का मामला है। उदाहरण के लिए, यह हमेशा से पता रहा है कि ब्रह्माण्ड इतना विशाल और पेचीदा है कि मानव मस्तिष्क इसे सम्पूर्णता में पकड़ नहीं सकता और इसे इसकी असंख्य बारीकियों में समझने के लिए अति-मानवीय क्षमताओं की ज़रूरत होगी। मगर ये अड़चनें समय और ऊर्जा के अभाव की वजह से पैदा होती हैं, न कि विश्व की प्रकृति के किसी निहित लक्षण की वजह से।

दो तरह की सीमाओं की एक उपमा देखें। कोई भी इन्सान दुनिया के सारे पुस्तकालयों की सारी किताबों का हर पन्ना नहीं पढ़ सकता। मगर यदि हम यह मान लें कि किसी व्यक्ति के पास असीमित समय और ऊर्जा है, तो यह काम हो सकता है। दूसरी ओर, सूर्य की सतह पर आइस-स्केटिंग करना सिद्धान्तत: असम्भव है। इस मामले में असम्भवता प्रकृति के नियमों से पैदा होती है (5000 डिग्री पर बर्फ मिलना असम्भव है)। इसी प्रकार से, हाइज़ेनबर्ग का सिद्धान्त कहता है कि प्रकृति का एक नियम है जो सूक्ष्म-लोक के स्तर पर मात्रात्मक अन्वेषण की हमारी सीमाएँ निर्धारित करता है।

क्वांटम भौतिकी की इस खोज से प्रेरित होकर कुछ दार्शनिकों और नैतिकतावादियों ने इसे विज्ञान की सीमा का इकबाल कहकर जश्न मनाना शु डिग्री कर दिया। वास्तव में, हमें जश्न तो इस बात का मनाना चाहिए कि यह विज्ञान की एक और विजय है क्योंकि यह भी एक वैज्ञानिक खोज है। इसके अलावा, विज्ञान ने असंख्य अन्य क्षेत्रों में मानव ज्ञान को विस्तार दिया है। किसी इलेक्ट्रॉन की स्थिति और संवेग को एक साथ 100 फीसदी परिशुद्धता से नापने में हमारी असमर्थता शोक मनाने का सबब नहीं होना चाहिए।

ज़्यादा महत्वपूर्ण बात तो यह है कि हाइज़ेनबर्ग के विश्लेषण ने उजागर किया है कि गहरे स्तर पर दृष्टा और दृश्य के बीच (व्यक्ति और वस्तु के बीच) एक अपरिहार्य अन्तर्क्रिया होती है। बोह्र24 ने इसे इस तरह व्यक्त किया था: “अस्तित्व के महानाटक में हम दर्शक भी हैं, और अभिनेता भी।” यह विज्ञान की उस विश्व दृष्टि को बदल देता है जिसमें माना जाता था कि एक बाह्य वस्तुगत विश्व है और उससे एकदम पृथक व्यक्तिनिष्ठ विश्व है। हाइज़ेनबर्ग का सिद्धान्त विश्व के बारे में एक रहस्योद्घाटन है, विज्ञान का धिक्कार नहीं।

क्वांटम उलझाव: दुनिया में हर चीज़ आपस में जुड़ी है
याद करें कि क्वांटम वस्तुओं का विवरण और विश्लेषण उनके तरंग-पक्ष से सम्बद्ध ज्ञ् फलन द्वारा किया जाता है। तरंगें तो चारों तरफ फैली होती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि जब दो इलेक्ट्रॉन पास-पास होते हैं तो वे दो बादलों की तरह एक-दूसरे पर फैले (परस्पर व्याप्त) होते हैं। और तो और, जब फोटॉन या किसी कण जैसी क्वांटम वस्तु दो अलग-अलग वस्तुओं में टूटती या क्षय होती है, तो उन दो पृथक-पृथक वस्तुओं के तरंग फलन आपस में अन्तरंग ढंग से उलझे (एंटेंगल्ड) होते हैं। उनके ज्ञ् फलन अन्तर्सम्बन्ध तब भी बरकरार रहते हैं जब उनके बीच फासला बना दिया जाए। इस मासूम-से वक्तव्य के निहितार्थ बहुत गहरे हैं। इसका मतलब है कि बहुत दूर-दूर स्थित वस्तुएँ भी एक-दूसरे पर असर डाल सकती हैं; क्लासिकल नज़रिए से तो यह जादू ही लगेगा।

एक उदाहरण देखिए। मान लीजिए कि एक फोटॉन दो में टूट जाता है और वे दोनों एक-दूसरे से दूर चले जाते हैं। उनका मिला-जुला घूर्णन (स्पिन) फिर भी प्रारम्भिक फोटॉन के स्पिन के बराबर ही रहेगा। अब प्रत्येक फोटॉन एक ही समय पर सारी सम्भव स्पिन अवस्थाओं में रहेगा, जब तक कि उनमें से किसी एक का अवलोकन नहीं किया जाता। जिस क्षण अवलोकन किया जाएगा, उसी क्षण दूसरे फोटॉन का स्पिन भी निर्धारित हो जाएगा। दूसरे शब्दों में, एक फोटॉन का मापन तत्काल दूसरे फोटॉन की अवस्था को प्रभावित करेगा, चाहे वह कितनी ही दूरी पर हो। ऐसा प्रतीत होगा जैसे सूचना प्रकाश से भी तेज़ गति से पहुँची है।

हम दो पाँसों ॠ और ए की मदद से भी एक उपमा दे सकते हैं। कल्पना कीजिए कि पाँसे ॠ का हर पहलू पाँसे ए के किसी पहलू से मेल खाता है। जैसे पाँसे ॠ पर पहलू 1 पाँसे ए के पहलू 1 से मेल खाता है। अब हम इन दोनों पाँसों को हवा में उछाल देते हैं। जब तक वे फर्श पर नहीं गिरते, तब तक वे एक साथ सारी अवस्थाओं में रहेंगे। क्वांटम उलझाव के मुताबिक, यदि गिरने पर पाँसा ॠ का पहलू 3 ऊपर आता है, तो पाँसे ए का भी वही पहलू ऊपर होगा।

क्लासिकल विश्व में तो यह एक चमत्कार होगा, मगर क्वांटम विश्व में यह आम और अपेक्षित बात है। क्वांटम एंटेगलमेंट26, यह शब्द श्रॉडिंजर ने दिया था। उन्होंने उलझाव को ‘क्वांटम मेकेनिक्स का लाक्षणिक गुण’ कहा था जो ‘क्लासिकल विचार से क्वांटम विश्व के पूर्ण पृथक्करण का द्योतक है।’

गौरतलब है कि ये क्वांटम मेकेनिक्स के वर्तमान स्वीकृत ढाँचे के आधार पर सर्वथा वैध और अविवादित निष्कर्ष हैं। इनकी प्रायोगिक पुष्टि भी हो चुकी है। मगर ये इतने चकराने वाले और सहजबोध के विपरीत हैं कि क्वांटम मेकेनिक्स के शुरुआती संस्थापक एक-दूसरे द्वारा की गई व्याख्याओं को लेकर पूरी तरह सहमत नहीं होते थे। मगर आज भौतिक शास्त्र यथार्थ की प्रकृति के सन्दर्भ में इनके गहरे निहितार्थों की बहस से आगे बढ़कर एक ऐसी स्थिति में पहुँच चुका है जहाँ इन परिणामों के सम्भावित उपयोगों पर चर्चा होने लगी है27।


वी.वी. रामन: रॉचेस्टर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी, रॉचेस्टर, न्यूयॉर्क में भौतिकी और मानविकी के एमेरिटस प्रोफेसर हैं। भारतीय धरोहर और संस्कृति के बहुत-से पहलुओं पर काफी लिखा है और व्याख्यान दिए हैं।
अँगेज़ी से अनुवाद: सुशील जोशी: एकलव्य द्वारा संचालित स्रोत फीचर सेवा से जुड़े हैं। विज्ञान शिक्षण व लेखन में गहरी रुचि।
सभी वैज्ञानिकों के चित्र इस पुस्तक से लिए गए हैं: एन इन्ट्रोडकशन टू फिज़िकल साइंस - जेम्स टी. शिपमैन, जेरी एल. एडम, जे. विल्सन। प्रकाशक - डीसी हीथ एंड कम्पनी, टोरंटो।
मूल लेख ‘रेज़ोनेंस’ पत्रिका के अंक, अगस्त 2012, खण्ड 17 में प्रकाशित हुआ था।