कमलेशचंद्र जोशी

लोक कथाएं हमारे आम जीवन में सदियों से रची-बसी हैं। इन्हें हम अपने बड़े-बूढ़ों से बचपन से ही सुनते आ रहे हैं। लोक कथाओं के बारे में यह भी कहा जाता है कि बचपन के शुरुआती वर्षों में बच्चों को अपने परिवेश की महक, सोच व कल्पना की उड़ान देने के लिए इनका उपयोग ज़रूरी है। हम यह भी सुनते हैं कि बच्चों के भाषा के विकास के संदर्भ में भी इन कथाओं की उपयोगिता महत्वपूर्ण है। ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि इन लोककथाओं के विभिन्न रूपों में हमें लोक जीवन के तत्व मिलते हैं जो बच्चों के भाषा विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाते हैं। अगर हम अपनी पढ़ी हुई लोक कथाओं को याद करें तो सहजता से हमें इनके कई उदाहरण मिल जाते हैं।
एक चिड़िया को पेड़ के कोटर में एक गेंहू का दाना मिलता है। उस दाने को निकालने के लिए वह चिड़िया बढ़ई, लोहार, राजा आदि कई लोगों के पास जाती है। इस कहानी में खास बात यह होती है कि जिसके भी पास वह जाती है उसे वह अपने साथ पहले। घटी घटना को जरूर बताती है। जब हम ऐसी कहानी सुना रहे होते हैं तो बच्चों से हमारी यह अपेक्षा रहती है। कि पहले घटी घटना को वे जरूर दोहराएं। बच्चे भी घटना को याद रखते हुए साथ-साथ मजे से दोहराते हैं।

इस तरह कथा सुनाने की इस प्रक्रिया में बच्चे इन घटनाओं को एक क्रम में रखकर देखते हैं। इन क्रमिक घटनाओं में एक तर्क होता है जो बच्चों के मनोभावों से मिलता-जुलता है।
इस चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए हम तीन लोक कथाओं पर अपना ध्यान केन्द्रित करेंगे। पहली मलयालम लोक कथा है 'ईचा-पूचा', दूसरी मराठी लोक कथा है - 'एक्की-दोक्की' तथा तीसरी मणिपुरी लोक कथा है - 'कौन बनेगा निंगथऊ'। ये तीनों लोक कथाएं, तीन अलग-अलग चित्रात्मक बाल पुस्तकों के रूप में तूलिका पब्लिशर्स, चेन्नई से प्रकाशित हुई हैं।

ईचा पूचा
आइए मलयालम लोक कथा 'ईचा पूचा' से शुरू करें। सबसे पहले यह जानना ज़रूरी है कि मलयालम में मक्खी को ईचा तथा बिल्ली को पूचा कहते हैं। यह लोक कथा, एक मक्खी और बिल्ली के बारे में है। वे दोनों जिगरी दोस्त होती हैं और एक दिन कंजी बनाती हैं। लेकिन उसे खाने के लिए उनके पास कोई चम्मच नहीं होता। ईचा कहती है, “पूचा तुम कंजी की
 
रखवाली करो। मैं अभी कटहल का पत्ता लेकर आती हूं।'' और ईचा उड़ जाती है। पुचा ने कंजी की रखवाली का वचन तो दे दिया लेकिन कंजी की रखवाली करते-करते उसकी भूख बढ़ जाती है; और वह सारी-की-सारी कंजी पी जाती है जिससे उसका पेट बेतहाशा फूल जाता है।
आगे हम पाते हैं कि पूचा का पेट इतना फुल गया कि उसका चलना दूभर हो जाता है और वह बहुत ही धीरे-धीरे चल पाती है। पेट फूलने वाली घटना पर गौर करें तो हम पाते हैं कि यह एक ऐसा बिंदु है जो बच्चों की कल्पनाओं से खूब मेल खाता है। इस तरह का पाठ ब ऐसे चित्र बच्चे खूब पसंद करते हैं। ऐसी स्थितियों में उन्हें अपनी कल्पना व तर्क गढ़ने के खूब मौके मिलते हैं कि उसका पेट कितना फूला होगा, फूले पेट के साथ बह कैसे चलती होगी आदि, आदि? लोक कथा का यह एक महत्वपूर्ण तत्व है जो बच्चों को अपनी तरह से सोचने के काफी मौके देता है।

इसके साथ आगे की कहानी में होता यह है कि पूचा अपना फूला पेट कम करने के उपाय पता करने के लिए आसपास के लोगों से पूछताछ करती है। सबसे पहले उसने छप्पर में बंधी गाय से पूछा तो उसने कहा, “मेरी देखभाल करने वाले लड़के से पूछो।'' इसी तरह से कहानी आगे बढ़ती रहती है। लड़का कहता है, “मुझे नहीं मालूम, मेरी छड़ी से पूछो।' छड़ी कहती है, "पेड़ से पूछो।" पेड़ कहता है, पक्षी से।'' फिर पक्षी कहता है, "शिकारी से।'' और शिकारी कहता है, "मेरे चाकू से।” चाकू गुस्सा करके कहता है, "अभी बताता हूं कि कैसे ठीक होगा तेरा पेट।'' और पूचा भाग जाती है। भागकर वह ईचा के पास पहुंचती है और देखती है कि ईचा एक कटहल का पत्ता घसीटते हुए ला रही है।
 
इस भाग-दौड़ में उसका पेट अपने आप ही ठीक हो जाता है और कहानी समाप्त हो जाती है। इस पूरे घटनाक्रम में कुछ बातें गौर करने लायक हैं। पहली बात तो यही है कि इस कहानी से जुड़ी सारी चीजें बच्चों के आसपास के वातावरण से हैं और उनका आपसी संबंध भी उजागर करती हैं। इस उदाहरण से समझ में आता है कि बच्चों के लिए उनके आसपास के परिवेश से जोड़ते हुए सहज रूप से एक कहानी की रचना कैसे हो सकती है?
इसके अलावा यह बात भी स्पष्ट है कि इस तरह की लोक कथाओं के अंत में कोई उपदेश नहीं निकलता। यह कतई जरूरी नहीं है कि बच्चों को केवल ऐसी कहानियां पढ़ाई जाएं जो उपदेश से भरी हों। हम बच्चों के लिए कहानी की प्रक्रिया को महत्वपूर्ण मानते हैं - जहां बच्चों को मज़ा आए तथा वे अपनी दुनिया रच सकें। ऐसी कहानियों में यह भी संभावना नज़र आती है कि अगर इस कहानी को समाप्त न करें तो बच्चे भी इसे खुद आगे बढ़ा सकते हैं। खुद कहानी बनाने में बच्चों का तर्क भी समाहित रहेगा और हर बच्चे का अपना तरीका होगा। बच्चों के लिए कैसी कहानियों का चयन किया जाए उसमें यह पहलू काफी महत्वपूर्ण है।

एक और बात भी गौर करने लायक है कि इस तरह की कहानी केवल मलयालम में ही नहीं है। ऐसी कई कहानियां हमारी अन्य भाषाओं व बोलियों में भी विद्यमान हैं। चाहे उनके पात्रों में थोड़ा बदलाव जरूर हो लेकिन इन सब में मूल ढांचा एक-सा ही होता है।
कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि इस प्रकार की वर्णनात्मक लोक कथाएं, बच्चों की भाषा विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसके साथ ही उन्हें घटनाओं का दोहराव भी अच्छा लगता है। यह दोहराव उन्हें कहानी सुनने के लिए प्रेरित करता है। इसको हम ठीक उस तरह देख सकते हैं जैसे बच्चों की कविताओं में लय व तुक का महत्व होता है। वहां यह ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होता कि इस लय व तुक का अर्थ क्या निकलता है।

एक्की दोक्की 
अब एक फर्क किस्म की लोक कथा को देखें जिसमें नसीहत दी गई है। यह एक मराठी लोक कथा है- 'एक्की दोक्की'। यह कहानी एक केशवाली और दो केशवाली बहनों यानी कि एक्की और दोक्की की है। एक्की के सिर पर एक बाल है। दोक्की के सिर पर दो बाल हैं इसलिए दोक्की घमण्डी है। उसकी मां सोचती है कि दोक्की बहुत सुंदर है। दोक्की इसलिए अपनी बहन पर रौब भी जमाती रहती है। एक दिन एक्की इतनी ज्यादा तंग आ गई कि वह घर से भाग गई।
इस कहानी में पहली बात यह समझ में आता है कि कहानी, समाज में इस मिथक को लेकर आगे बढ़ती है कि घने बालों वाली लड़कियां ज्यादा सुंदर होती हैं और घमण्डी भी। इस कहानी की कथा हमारे जे हन में एक तरह की रूढ (स्टीरियोटाइप) छवि बनाती है। इसलिए यह भी सवाल उठता है कि बच्चों के साथ उपयोग करने के लिए हम किस तरह की लोक कथाओं का उपयोग करें।

आगे जब वह जंगल में पहुंचती है। तो मेंहदी की झाड़ी चिल्लाती है, “मुझे पानी पिला दो।' एक्की उसे पानी पिलाती है जिस पर मेंहदी की झाड़ी उसे धन्यवाद देती है और कहती है, "मैं तुम्हारी यह मदद हमेशा याद रखंगी।'' एक्की आगे बढ़ जाती है। फिर उसे एक मरियल-सी गाय मिलती है। गाय कहती है, "मुझे भूख लगी है, खाना खिला दो।'' तो एक्की जंगल से घास-फूस इकट्ठा कर उसे खिलाती है। गाय भी उसे धन्यवाद देती है और वह भी कहती है, "मैं तुम्हारी मदद याद रखूंगी।" इस तरह कहानी आगे बढ़ती है।
यहीं से हमें कहानी का एक ढांचा समझ में आने लगता है। मन-ही-मन हम अनुमान लगाते हैं कि अब बाद में ये सब एक्की की मदद करेंगे। ऐसा पूर्वानुमान इसलिए भी लगाते हैं क्योंकि ऐसी बहुत-सी लोक कथाएं हम पढ़ते रहे हैं। परन्तु इस तरह की कथा बच्चों को कैसी लगती है यह उनके साथ काम करते हुए परखकर देखना चाहिए; क्योंकि हमारे वास्तविक जीवन में ऐसा नहीं होता। मुझे ऐसा लगता है कि इस तरह की कथाएं शायद पढ़ने वाले के लिए एक सेट पैटर्न' की लोक कथा प्रतीत होती होंगी क्योंकि इसमें बच्चों का अपना तर्क और उनकी कल्पना इतनी मुखर नहीं हो पाती और कहानी के कथानक में ऐसा कुछ नहीं है जिससे उन्हें मज़ा आए व रुचि बनी रहे। ऐसी कथाएं बच्चों को एक ही धरातल पर सोचने पर मजबूर करती हैं, उन्हें सोचने की नई राहें नहीं सुझातीं। इनका अंत अक्सर इस तरह से होता है... “अंत में खुशी-खुशी रहने लगे।" बच्चों को शायद यह खुशी अच्छी लगे क्योंकि वे अपने परिवेश में तमाम पत्रपत्रिकाओं में इस तरह की कहानियां पढ़ते व सुनते हैं। वे इसके इतर कोई नई चीज़ सोच नहीं पाते।

कुल मिलाकर ऐसी कहानियां बच्चों में एक कंडीशनिंग कर देती हैं। ऐसा हमें खास तौर पर तब महसूस होता है जब हम बच्चों का स्वयं का लिखा हुआ पढ़ते हैं; तब लगता है कि बच्चों को विविध तरह की सामग्री मुहैय्या करना ज़रूरी है। ऐसी सामग्री जिसमें बच्चों के लिए विभिन्न तरह की कल्पना ब सोच उपस्थित हो। इसके साथ ही कुछ ऐसी सामग्री भी हो जो उन्हें स्वयं भी नई-नई चीजों के बारे में सोचने के अवसर दे; जिसके अंतर्गत उन्हें अपने अलग-अलग तरह के अनुभवों के बारे में सोचने का मौका मिल सके और उनके सोचने के विविध आयाम खुल सकें।

कौन बनेगा निंगथऊ
तीसरी लोक कथा 'कौन बनेगा निंगथऊ' एक मणिपुरी लोक कथा है। यह लोक कथा हमें राजा-रानियों के किस्सों की याद दिलाती है। ऐसी कहानियां भी हम पढ़ते रहे हैं जिनकी शुरुआत अक्सर इस तरह होती है - 'एक था राजा, एक थी रानी। दोनों मिलकर ...।' हमारी इस कहानी में उनके यहां कोई बच्चा नहीं होता। राजा के शासन से प्रजा अत्यन्त सुखचैन से रहती है। प्रजा अपने राजा को बहुत चाहती है और उनके बच्चे के लिए ईश्वर से प्रार्थना करती है जिसके फलस्वरूप उनके तीन बेटे होते हैं - सान जाईबा, सान याईमा और सान तोम्बा। और फिर बारह साल बाद एक लड़की भी होती है- साना तोम्बी।
धीरे-धीरे, राजा-रानी बूढ़े हो जाते हैं और उन्हें यह चिंता सताने लगती है कि आगे उनका राज्य कौन संभालेगा? इसी के इर्द-गिर्द कहानी का ताना-बाना बुना गया है। राज्य में एक प्रतियोगिता आयोजित की जाती है जिसमें सभी राजकुमार अपनी श्रेष्ठता का प्रदर्शन करते हैं - अधिकतर अपनी वीरता का।

ऐसी कथाओं में इस तरह के मिथक खुब होते हैं कि उनके बारह साल बाद लड़की हुई या उन्होंने फूल तोड़ा तो राजकुमार या राजकुमारी बन गई। ऐसी कहानियों में राजा-रानियों को काफी ईमानदार दिखाया जाता है और राजगद्दी के लिए आयोजित होने वाली प्रतियोगिताओं में हमेशा सबसे ‘छोटे' की ही जीत होती है।
इस कहानी में बेटी साना तोम्बी को अगला राजा चुना जाता है क्योंकि वह करूणामयी थी। उसने अपने राज्य में पक्षियों, जानवरों और पेड़ -पौधों का भी ध्यान रखा था जबकि राजकुमारों ने अपनी बीरता का ही प्रदर्शन किया। इन कथाओं में अक्सर वीरता या बहादुरी से ज्यादा महत्वपूर्ण करुणा या बुद्धि को माना जाता है। ऐसी कहानियों का अंत भी सुखमय ही होता है।
इस कहानी को अगर हम समाप्त न करके अधूरा छोड़े तो यह बच्चों को कल्पना की उड़ान भरने का काफी मौका दे सकती है। जैसे कि तीनों राजकुमार सान जाईबा, सान याईमा और सान तोम्बा क्रमश: पेड़ को भेद कर कुदने वाले, पेड़ के ऊपर से छलांग लगाने वाले व पेड़ को उखाड़ने वाले होते हैं। इस पर हम बच्चों से पूछ सकते हैं कि अब तुम्हीं फैसला करो कि इन तीनों में से राजा किसे बनना चाहिए? ऐसे प्रश्नों से हम कहानी को खोल सकते हैं ताकि बच्चों को सोचने का मौका मिले।

यह कहानी हमारे प्राचीन परिवेश को भी परिभाषित करने का प्रयास करती है। पात्रों के इलाके का स्थानीय इतिहास भी सामने आता है। लेकिन यह भी ध्यान रखना होगा कि हमें यह इतिहास एक ही नज़रिए से बताया जाता है। अधिकतर कथाएं राजा-रानी पर ही केन्द्रित रहती हैं। इसमें दूसरा पक्ष अपनी 'पैसिव' भूमिका में रहता है, जैसा कि ऐसी बहुत-सी कहानियों में देखने को मिलता है। जनपक्षीय बात यदा-कदा ही नज़र आती है। हालांकि इस कहानी में ऐसा कुछ भी नहीं है।
इन कहानियों में कुछ मूल्य होते हैं जैसे आदर, इज्ज़त, सम्मान, सच आदि। इन मूल्यों के इर्द-गिर्द कथानक बुना जाता है। लेकिन अगर इन कहानियों में खोजा जाए तो और भी अच्छी चीजें निकल सकती हैं जिनसे हम कुछ नई बातें निकाल सकते हैं।

अंत में, इन तीनों लोक कथाओं को देखकर यह समझ में आता है कि लोक कथाओं के काफी भिन्न-भिन्न रूप होते हैं। प्रश्न यह उठता है कि हम बच्चों के साथ काम करते हुए किस तरह की कथाओं को उपयोग में लाएं? ऐसी कथाएं चुनी जाएं जो बच्चों के स्वस्थ मनोरंजन के साथ उनकी कल्पना और सोच को भी विस्तार दें - यह बात महत्वपूर्ण लगती है।
ऐसा कहा जाता है कि लोक कथाएं पुराने मूल्यों को ही उजागर करती हैं। और इसके साथ एक रूढ छवि (स्टीरियो। टाइप) भी रचती हैं। इससे कभी-कभी बच्चे भ्रम में भी पड़ जाते हैं कि “अरे! यह कैसे हो गया?' हालांकि हमें लगता है कि बच्चे भ्रम की स्थिति में भी सीखते हैं। अपना तर्क रखने की कोशिश करते हैं। यह जरूरी इसलिए भी है क्योंकि हम मानते हैं कि बच्चा बहुत तर्कशील व कल्पनाशील होता है। लेकिन इस बात की स्पष्टता होनी चाहिए कि कथा आखिर बताना क्या चाह रही है? इसे क्यों गढ़ा गया है? क्या विरोधाभास ऐसे हैं कि बच्चा अपना तर्क रख पाएगा? यह ज़रूरी होता है कि कथा इस तरह से रची गई हो कि बच्चा अपना तर्क रख पाए या कथा में उसे तर्क रखने में मदद मिले।

जब बच्चों को हम स्वतंत्र रूप से सोचने वाला बनाना चाहते हैं तो हमें उनकी सामग्री पर भी काफी ध्यान रखना होगा। नहीं तो बच्चों में भी एक तरह की चीज़ों की 'छबि' सी बन जाती है जो बाद में उनके लेखन व सोच में व्याप्त रहती है। इसलिए हम कहते हैं कि बच्चों के लिए विभिन्न तरह की सामग्री तो उपलब्ध हो, लेकिन बच्चों को ध्यान में रखते हुए।
इस बात को कहने में कोई हर्ज नहीं कि बच्चों के शुरुआती स्कूली दिनों में भाषा विकास के लिए इनका उपयोग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसे हमें अपने शिक्षण में उपयोग करना चाहिए और बच्चों को इस तरह की सामग्री से परिचित कराना चाहिए।


कमलेश चंद्र जोशी: लखनऊ की नालंदा संस्था से जुड़े हैं। बच्चों के साथ काम करने में विशेष दिलचस्पी है।
चित्रः ‘एक्की-दोक्की' और 'ईचा पूचा' किताबों से साभार।
समीक्षित पुस्तकों के प्रकाशकः तुलिका, 7, पृथ्वी एवेन्यू, अभिरामपुरम, चेन्नई, 600018