लुई पास्चर

6 जुलाई, 1885 - पागल कुत्ते द्वारा बुरी तरह काटे गए नौ वर्षीय जोसेफ मीस्टर को लुई पास्चर की प्रयोगशाला में लाया जाता है; लुई पास्चर यानी अपने समय के प्रसिद्ध माइक्रोबायोलॉजिस्ट/जीवाणुशास्त्री व कई बीमारियों की वैक्सीन विकसित करने वाले वैज्ञानिक। उस रात आठ बजे जोसेफ चिकित्सा जगत के इतिहास में दर्ज हो गया - रेबीज़ के खिलाफ टीका लगाने वाला वह पहला इंसान था। पास्चर का खुद का कथन कि 'संयोग भी उसी की मदद करता है जिसकी दिमागी तैयारी हो' जोसफ मीस्टर के इलाज के इस किस्से पर बहुत ही नाटकीय ढंग से लागू होता है। इसी घटना का विस्तृत विवरण पास्चर ने अपने इस लेख में दिया है।

रेबीज़ की वेक्सीन विकसित करने से पहले पास्चर ने चिकन कोलरा के जीवाणु की खोज कर उन्हें अलग किया था। पास्चर ने कमज़ोर जीवाणु की फसल तैयार की और चूजों को उसके टीके लगाए। ऐसा करने से उनमें, यानी चूजों में कोलरा के जीवाणु के विरुद्ध प्रतिरोधी शक्ति विकसित हो गई।
इसके बाद पास्चर ने अपना ध्यान एन्थ्रेक्स बीमारी पर केन्द्रित किया जो चौपायों और पालतू जानवरों में होती है। इसके लिए भी उसने वही विधि अपनाई जो उसने कोलरा का प्रतिरोधी खोजने के लिए विकसित की थी। उसने बेक्टीरिया को 42 डिग्री सेल्सियस तापमान पर ऑक्सीजन की उपस्थिति में विकसित करके कमज़ोर जीवाणु बनाए और उनके टीके लगाकर चौपायों में इस बीमारी के प्रति प्रतिरोधी शक्ति विकसित की ताकि वे बीमारी के समय उसी तरह के सशक्त जीवाणुओं का प्रतिरोध कर पाएं। पास्चर ने इस विधि का नाम वैक्सीनेशन रखा।

जिस वेक्सीन ने जोसफ का जीवन बचाया था उसे पास्चर ने बहुत मेहनत और कठिनाई से तैयार किया था और जीवाणुओं को कमजोर बनाने के लिए उन्हें कई तरह के जानवरों पर प्रयोग करने के बाद प्राप्त किया था। पास्चर वास्तव में रेबीज़ के विषाणुओं को कभी भी देख नहीं पाया था। उसका सोचना था कि वे इतने सुक्ष्म होते हैं कि उन्हें माइक्रोस्कोप से भी नहीं। देखा जा सकता। तब तक वायरस द्वारा रोग का सिद्धांत ईजाद नहीं हुआ था।
जोसेफ मीस्टर की जिंदगी लुईस पास्चर के हाथ बचने जितना ही नाटकीय किस्सा इस घटना के पचपन साल बाद उसकी मौत के बारे में है। कुछ साल बाद जोसफ पास्चर संस्थान का चौकीदार नियुक्त हो गया जिसकी स्थापना 1888 में रेबीज़ के उपचार के लिए की गई थी। अब यह संस्थान जीब विज्ञान की शोध का एक प्रमुख केन्द्र है। 1940 में नाजियों ने जोसफ मीस्टर को संस्थान में पास्चर का गोपनीय कक्ष खोलने का आदेश दिया। नाजियों का हुकम मानने के बजाय मीस्टर ने अपने आपको शहीद कर देना बेहतर समझा।

आगे पास्चर द्वारा लिखा गया अपना शोध पत्र प्रस्तुत है:

एक तरीका जिससे कुत्ते के काटने के बाद रेबीज के विकास को रोका जा सके।

रेबीज़ के अध्ययन की प्रगति में रोग निरोधक तरीके का विकास एक महत्वपूर्ण कदम था। इसका जिक्र मैंने अपने और अपने साथियों के साथ प्रकाशित लेखों में किया था। मगर यह प्रगति ज्यादा वैज्ञानिक थी, व्यावहारिक नहीं, और इसके इस्तेमाल में दुर्घटनाएं भी हो सकती थीं। जिन 20 कुत्तों का मैंने इलाज किया था उनमें से केवल 15-16 को ही मैं रेबीज़ के प्रति निरोधक कर पाया था।

इसके बाद, इलाज के अंत में यह जरूरी था कि रोग निरोधकता की स्थिति को प्रबल और पुष्ट करने के लिए एक बहुत ही घातक वायरस, एक नियंत्रक वायरस, का टीका लगाया जाए। इससे भी ज्यादा ज़रूरत इस बात की थी कि इन कुत्तों को अंतिम वायरस के टीके से रेबीज़ होने पर जितने दिन बाद रोग के लक्षण दिखने चाहिए, उसके भी काफी दिन बाद तक निगरानी में रखा जाए। अतः इस बात की निश्चिंतता के लिए कि रोग निरोधकता की स्थिति आ चुकी है, तीन-चार महीनों तक रुकना पड़ता था। इस मुश्किल प्रक्रिया के कारण इस तरीके का इस्तेमाल बहुत ही रहा होता।

अंत में यह तरीका किसी रेबीज़ जानवर (जिसके काटने से रेबीज़ रोग उत्पन्न हो जाए) के काटने का तुरंत इलाज करने में समर्थ नहीं था, जो कि ज़रूरी होता है क्योंकि रेबीज से पगलाया कुत्ता कभी भी किसी को काट सकता है।
इसलिए यह आवश्यक था कि एक ऐसे तरीके की खोज की जाए जो इस बीमारी का तुरंत इलाज करे और जो कुत्तों को पूरी तरह से सुरक्षित कर दे। ऐसे तरीके की खोज किए बगैर इनका प्रयोग मनुष्यों पर करने की धृष्टता भी नहीं की जा सकती थी।

अनगिनत प्रयोगों के बाद मैंने एक ऐसे रोग-निरोधक तरीके की खोज की है जो कि न केवल व्यावहारिक है। बल्कि त्वरित भी है, और जिसने कुत्तों पर बहुत ही अच्छे और सफल परिणाम दिए हैं। यह तरीका इतना सफल रहा है कि मुझे विश्वास है कि इसका प्रयोग सभी जानवरों, यहां तक कि मनुष्य पर भी किया जा सकता है।

यह तरीका प्रमुखतः निम्नलिखित तथ्यों पर आधारित है:
सामान्य रेबीज़ ग्रसित कुत्ते की रीढ़ की संक्रामक तंत्रिका का टीका अगर ऑपरेशन करके खरगोश की रीढ़ अथवा मस्तिष्क की बाहरी झिल्ली के नीचे लगाया जाए तो खरगोश को औसतन 15 दिन के बाद रेबीज़ हो जाता है।

अगर टीका लगाने के ऊपर वर्णित तरीके से पहले खरगोश के वायरस को दूसरे खरगोश में, दूसरे से तीसरे तथा तीसरे से चौथे खरगोश में डाला जाए ... तो एक अजीब-सा रुझान समझ में आता है। वो यह कि बाद के खरगोशों में यानी उस सीरीज़ के अंत के खरगोशों में रेबीज़ का संचयन काल, यानी टीका लगाने और रेबीज़ के लक्षण दिखने के बीच का समय, लगातार कम होता जाता है।
इसी तरह बीस से पच्चीस बार एक खरगोश से दूसरे खरगोश, और फिर तीसरे... आदि से गुजरने पर आठ दिन के समय अंतराल तक पहुंचे। तत्पश्चात फिर से अन्य खरगोशों से जब वायरस को गुज़ारा गया तो समय अंतराल सात दिन हो गया - जो कि नए प्रयोगों में 90 खरगोशों में से गुज़रने के बाद भी अत्यंत नियमितता से सात दिन का बना रहा। अभी तक के प्रयोगों से मैं इस संख्या तक पहुंचा हूं, और अधिकाधिक इतना ही कहा जा सकता है कि इस अंतराल के सात दिन से थोड़ा-सा घटने की हल्की-सी प्रवृत्ति दिखाई देती है।

ये प्रयोग जो नवंबर 1882 में शुरू हुए थे, बिना टूटे तीन साल तक लगातार चले हैं, और हमें इस बीच रेबीज़ से क्रमानुसार ग्रसित और खत्म हुए खरगोशों के अलावा कहीं और से वायरस नहीं लेना पड़ा है। इस वजह से, हमारे पास किसी भी वक्त रेबीज़ का शुद्ध वायरस, और वो भी लगभग या बिल्कुल एक दूसरे जैसा मिल पाना काफी आसान था। इस तरीके के व्यावहारिक उपयोग में यह एक प्रमुख तथ्य है।

इस प्रयोग के प्रत्येक चरण में समस्त खरगोशों की रीढ़ की तंत्रिका में एक बराबर घातकता का रेबीज़ वायरस पाया जाता है। अगर इन मेरु तंत्रिकाओं से कुछ से.मी. लंबा टुकड़ा निकाल लिया जाता है, यह ध्यान में रखते हुए कि उनमें कोई भी और मिलावट न हो पाए, और फिर उन्हें सूखी हवा में लटकाकर रखा जाता है; तो उनकी घातकता धीरे-धीरे कम होने लगती है, और अंततः खत्म हो जाती है। कितने दिन में यह घातकता समाप्त हो जाएगी यह कुछ हद तक मेरूरज्जु की मोटाई पर निर्भर करता है, परन्तु प्रमुखतः यह बाहरी तापमान से तय होता है। तापमान जितना कम होगा उतने ही ज्यादा समय तक घातकता बनी रहेगी। ये परिणाम इस तरीके का प्रमुख वैज्ञानिक आधार बिंदु हैं।
ये सब तथ्य सुनिश्चित करने के बाद कुत्ते को तुलनात्मक रूप से काफी कम समय में रेबीज़ के प्रति, इस तरीके से, निरोधक किया जा सकता है:

सात दिन वाले अंतराल का रेबीज़ का टीका लगाकर रेबीज़ से ग्रस्त होकर खत्म हुए खरगोशों की संक्रामित मेरूरज्जु के टुकड़े रोज़ क्रमशः अलगअलग फ्लास्क में लटकाकर रखे जाते हैं और फ्लास्क की तली में पोटाश के टुकड़े रखकर फ्लास्क के अंदर की हवा को सूखा रखा जाता है। प्रत्येक दिन जीवाणुरहित/निर्जीवीकृत द्रव से भरी सीरीज जिसमें मेरूरज्जु के छोटे-छोटे टुकड़े मिला दिए गए हैं, का टीका एक कुत्ते की चमड़ी के नीचे लगाया जाता है। शुरुआत मेरूरज्जु के ऐसे टुकड़े से की जाती है जो ऑपरेशन के बाद इतने दिन तक सूखी हवा में लटकाकर रखा गया हो कि यह एकदम सुनिश्चित हो कि मेरूरज्जु बिल्कुल भी घातक नहीं है। (इसके लिए कितने दिन लगेंगे यह पिछले प्रयोग में सुनिश्चित किया गया था)। अगले दिन वही ऑपरेशन उससे कम पुरानी मेरूरज्जु से किया जाता है, जो पिछली वाली से दो दिन के अंतर वाली हो। इस तरह से आगे बढ़ते हुए अंत में, यह प्रयोग अत्यन्त घातक मेरूरज्जु के साथ किया जाता है जो फ्लास्क में केवल दो दिन तक रखी गई थी।

अब (इस प्रकार) कुत्ते को रेबीज़ के प्रति निरोधक बना दिया गया था। इसे चमड़ी के नीचे वायरस का टीका लगाया जा सकता है, या ऑपरेशन करके मस्तिष्क की सतह पर, परन्तु इसमें बाद में भी रेबीज़ का विकास नहीं होता।
इस प्रयोग में एक बार भी असफल हुए बिना मेरे पास विभिन्न उम्र और जाति/प्रजाति के ऐसे पचास कुत्ते थे जो रेबीज़ के प्रति निरोधक हो चुके थे और तब सोमवार, 6 जुलाई (1885) को अलसासे से तीन लोग अचानक ही मेरी प्रयोगशाला में आए।
शलेस्टोटूट के पास स्थित मेसेनगॉट का किराने वाला, थियोडोर वॉन जिसे उसके खुद के पगलाए हुए कुत्ते ने 4 जुलाई को बांह पर काट लिया था।
नौ वर्ष का जोसेफ मीस्टर जिसे भी 4 जुलाई को सुबह आठ बजे उसी कुत्ते ने काटा था। इस बच्चे को कुत्ते ने गिरा दिया था और उसके हाथ, पैर और जांघ पर जगह-जगह काट लिया था। कुछ ज़ख्म तो इतने गहरे थे कि उसका चलना-फिरना मुश्किल हो गया था।
ज्यादातर ज़ख्मों को 4 जुलाई की शाम आठ बजे, दुर्घटना के बारह घंटे बाद विले के डॉक्टर वेबर ने पेनिक एसिड से दाग दिया था।

तीसरा व्यक्ति, छुटके जोसेफ मीस्टर की मां थी जिसे कुत्ते ने नहीं काय था।
कुत्ते के मालिक ने जब कुत्ते को खत्म करके उसकी जांच की तो उसका पेट घास-फूस-भूसा और लकड़ी की छीलन से भरा हुआ था। यकीनन कुत्ता पगला गया था। जब जोसेफ मीस्टर को उसके नीचे से खींचकर निकाला गया तो वह झाग ब खून से सना हुआ था।
एम. वॉन की बांह पर भीतरी चोट की वजह से बहुत सारे निशान थे परन्तु उसने मुझे आश्वस्त किया कि कुत्ते के दांत उसकी शर्ट को भेद नहीं पाए थे। चूंकि उसके लिए डर की कोई बात नहीं थी इसलिए मैंने उसे कहा कि वो उसी दिन अलसासे वापस लौट सकता है। उसने ऐसा ही किया। पर मीस्टर और उसकी मां को मैंने अपने पास रखा।
'सायंस अकादमी' की साप्ताहिक बैठक 6 जुलाई को हुई। वहां पर मेरी मुलाकात डॉक्टर वुल्पियन से हुई जिन्हें मैंने इस घटना के बारे में बताया। एम, वुल्पियन और मेडिसिन के प्रोफेसर डॉक्टर ग्रांशर तुरन्त आकर जोसेफ मीस्टर को देखने को तैयार हो गए - घावों की संख्या और उनकी स्थिति का जायजा लेने के लिए। चौदह घाव थे, उसके शरीर पर।

हमारे प्रबुद्ध साथी और डॉक्टर ग्रांशर का मत था कि ज़ख्मों की संख्या और उनकी घातकता को देखते हुए यह लगभग पक्का था कि जोसेफ मीस्टर को रेबीज़ हो जाएगा। तत्पश्चात मैंने एम. वुल्पियन और एम. ग्रांशर को अपने नए परिणामों के बारे में बताया, जो मैंने एक साल पहले कॉपेनहेगन में अपने व्याख्यान के बाद, रेबीज़ पर की गई शोध के दौरान प्राप्त किए थे।
यह सुनिश्चित था कि यह बालक जीवित नहीं रहेगा, इसलिए मैंने दुविधा और चिंता के बावजूद जोसेफ मीस्टर पर यह तरीका, जो कुत्तों के साथ सफल रहा था, अपनाने का तय किया।
यह सच है कि मेरे पचास कुत्तों को जब मैंने रेबीज़ से निरोधक बनाया तो उन्हें उससे पहले किसी ने काटा नहीं था; परन्तु मुझे मालूम था कि उन परिस्थितियों को अपनी गणनाओं में से छोड़ा जा सकता है क्योंकि मैंने पहले ही ऐसे कुत्तों को रेबीज़ से निरोधक बनाया था जिन्हें काटा गया हो (कुत्ते ने काटा हो)। मैंने इसी वर्ष कमीशन के सामने इस नए और महत्वपूर्ण काम के साक्ष्य प्रस्तुत किए थे।

तत्पश्चात, 6 जुलाई की शाम 8 बजे, 4 जुलाई को कुत्ते के काटने के 60 घंटे बाद, डॉक्टर वुल्पियन व ग्रांशर की उपस्थिति में बालक मीस्टर को उसके दाहिने अधोपास्थिक (Hypochondrium) क्षेत्र में चमड़ी के नीचे टीका लगाया गया। उस आधी भरी हुए ‘पारवाज़' सीरिज में एक ऐसे खरगोश की मेरूरज्जु के टुकड़े थे जो 21 जून को रेबीज़ से मर गया था। तब से उस मेरूरज्जु को सूखी हवा की फ्लास्क में सुरक्षित रखा गया था, यानी कि पंद्रह दिन तक।
अगले दिन फिर से ताज़ा टीका तैयार किया गया। इस तरह मैंने तेरह टीके बनाए और उपचार दस दिन तक चला। इसके बारे में मैं बाद में बताऊंगा कि अगर कम टीके लगाते तो भी पर्याप्त होता। परन्तु सबको समझ में आएगा कि पहले प्रयास में मैं विशेषतौर पर संभल कर चल रहा था।
अगले दिनों में, नए टीके बनाए गए और उन्हें सदैव अधोपास्थिक हिस्से में साथ दी तालिका के अनुसार लगाया गया। मेरूरज्जु की घातकता की स्थिति जानने के लिए, दो नए खरगोशों का ऑपरेशन करके उन्हें उन सब मेरूरज्जुओं का टीका लगाया गया जिनका इस्तेमाल उपचार में किया गया था।

इन खरगोशों के अवलोकन से हमें पता चला कि जुलाई 6. 7, 8, 9, 10 की मेरू तंत्रिकाएं घातक नहीं थीं क्योंकि उनसे खरगोशों को रेबीज़ नहीं हुआ (खरगोश पागल नहीं हुए)। 11, 12, 15 और 16 जुलाई को इस्तेमाल की गई सब मेरूरज्जुएं घातक थीं - और उनमें घातक पदार्थ लगातार अधिक मात्रा में मौजूद था। जुलाई 15 व 16 वाले खरगोशों को सात दिन में रेबीज़ हो गया, 12 व 14 जुलाई वालों को आठ दिन में, और जुलाई 11 वालों को पंद्रह दिन पश्चात।
यानी कि आखिरी दिनों में, मैंने जोसेफ मीस्टर को सबसे घातक रेबीज़ के वायरस का टीका लगाया था - कुत्ते से लिया हुआ वायरस जिसे कइयों बार खरगोशों में से गुज़ारा गया था - ऐसा वायरस जिससे खरगोशों को सात दिन में रेबीज़ हो जाता था और कुत्तों को 7 से 10 दिन में।

जोसेफ को दिये गए टीकों का विवरण

जुलाई      समय   मेरुरज्जु लिया सुखाया
06 08 p.m. 01 जून 15 दिन
07 09a.m. 03 जून 14 दिन
07 06p.m. 25 जून 12 दिन
08 09a.m. 27 जून 11 दिन
08 06p.m. 29 जून 09 दिन
09 11a.m. 01 जुलाई 08 दिन
10 11a.n. 03 जुलाई 07 दिन
11 11a.m. 05 जुलाई 06 दिन
12 11a.m. 07 जुलाई 05 दिन
13 11a.m. 09 जुलाई 04 दिन
14 11a.m. 11 जुलाई 03 दिन
15 11a.m. 13 जुलाई 02 दिन
16   11a.m. 15 जुलाई   01 दिन

जब निरोधकता की स्थिति आ जाती है तो सबसे घातक वायरस का काफी मात्रा में टीका लगाने पर भी कोई बुरा असर नहीं होता। मुझे सदैव लगा है कि इसका संभावित असर केवल यही हो सकता है कि प्रतिरोधकता और बढ़ जाती होगी।
इसलिए जोसेफ मीस्टर न सिर्फ उस रेबीज़ से बच गया जो उसे कुत्ते के काटने की वजह से हो जाता; परन्तु उस रेबीज़ से भी जो मैंने उसकी प्रतिरोधक शक्ति के परीक्षण के लिए टीके के रूप में दिया और जो कुत्तों में पाए जाने वाले सामान्य रेबीज़ से ज्यादा घातक है।
अत्यंत घातक वायरस के आखिरी टीके का एक और फायदा है कि काटने की वजह से जो आशंका बनी रहती है, उन पर फुलस्टॉप (रोक) लग जाती है। अगर रेबीज़ होना ही है तो घातक वायरस के टीके बाद, उसे और जल्दी हो जाना चाहिए - बनिस्बत कुत्ते के काटने से संक्रमित वायरस से। मध्य अगस्त से मैं जोसेफ मीस्टर के स्वस्थ भविष्य के बारे में आत्मविश्वास के साथ विचार कर पा रहा हूं। आज की स्थिति में जबकि तीन महीने और उसके ऊपर तीन हफ्ते गुजर चुके हैं, वह एकदम स्वस्थ है।

कुत्ते के काटने के बाद रेबीज़ के उपचार/रोकथाम का जो नया तरीका मैंने अभी बताया है उसका क्या अर्थ निकलता है इस सवाल की संपूर्ण व्याख्या करने का अभी मेरा कोई इरादा नहीं है। अभी तो इस प्रयोग का, जिसे मैं जारी रख रहा हूं, महत्व समझने के लिए जितने शुरुआती विश्लेषण की जरूरत हैं, मैं अपने आपको उसी तक सीमित रखूगा, ताकि आखिरकार सबसे बेहतर विश्लेषण/व्याख्या को अपनाया जा सके।

विभिन्न तरह के घातक वायरसों को कमजोर करने के जो तरीके अपनाए जाते हैं, और उनसे जो रोग-निरोधक हासिल किया जाता है; और यह मानते हुए कि हवा इस वायरस को कमज़ोर बना देती होगी, सबसे पहले इस तरीके का जो कारण समझ में आता है कि सूखी हवा के संपर्क में रहने से मेरूरज्जु के टुकड़ों में उपस्थित ( वायरस ) की घातकता लगातार कम होती जाती होगी, और अंत में एकदम खत्म हो जाती होगी।
इस विचार से हम यह मानने लगेंगे कि यह जो तरीका है वो इस बात पर निर्भर करता है कि सबसे पहले मरणासन्न वायरस इस्तेमाल किए जाएं, फिर कमज़ोर और उसके बाद ज्यादा और ज्यादा घातक।
मैं दिखाऊंगा कि तथ्य इस विचार की तरफ इंगित नहीं करते। मैं साबित करूंगा कि हवा में सुखाई गई मेरूरज्जु की घातकता का परीक्षण करने के लिए अपनाई गई विधि में खरगोश में रेबीज़ होने के लक्षण दिखने) में समय की बढ़ोत्तरी दरअसल मेरूरज्जु में रेबीज़ वायरस की मात्रा की कमी की वजह से है, न कि उनकी घातकता में कमी आने की वजह से।

अंत में मैं कहना चाहूंगा कि आज की तारीख में शायद सबसे महत्वपूर्ण समस्या, जिसे हल करना ज़रूरी है, यह है कि कुत्ते के काटने और उपचार शुरू करने के बीच कितना समय अंतराल हो सकता है। जोसेफ मीस्टर के केस में यह अंतराल ढाई दिन का था - परन्तु कई बार यह इससे भी कहीं ज्यादा हो सकता है।
पिछले मंगलवार, 20 अक्टूबर को डॉक्टर वुल्पियन और ग्रांशर की मदद से मैंने 15 साल के एक युवक का उपचार शुरू किया जिसे 6 दिन पहले एक कुत्ते ने दोनों हाथों पर काट लिया था और जिसकी स्थिति गंभीर थी। मैं उसके उपचार के नतीजों के बारे में अकादमी को जल्द ही सूचित करूंगा।


लुई पास्चर (1822-1895 ): उन्नीसवीं सदी में माइक्रोबायोलॉजी को विकसित करने वाले जीवाणुशास्त्री थे। रेबीज के खिलाफ वैक्सीन तैयार करने के अलावा उन्होंने पस्च्यूरीकरण पर भी शोधकार्य किया।
मूल शोध-पत्र लुई पास्चर द्वारा लिखित एवं रिसेंट एसेज ऑन बेक्टिरिया इन रिलेशन टू डिसीज़' शीर्षक से । 886 में प्रकाशित किया गया था। संदर्भ पत्रिका में प्रकाशित यह लेख रियाल्म ऑफ साइंस में प्रकाशित नेब का अनुवाद है।
रियल्म ऑफ साइंस में कुल 20 खंड है। इन खंड़ों में प्रकाशित सामग्री को पांच प्रमुख समूहों में बांटा गया है । द नेचर ऑफ साइंस, द नेचर ऑफ मैटर एंड एनर्जी, द नेचर ऑफ स्पेस, इ नेचर ऑफ अर्थ एन्वायरनमेंट और द नेचर ऑफ लाइफ।