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अलविदा, जयन्त नार्लीकर! – अरविन्द गुप्ता
हाल ही में जाने-माने खगोल वैज्ञानिक जयन्त नार्लीकर का निधन हो गया। यह लेख विज्ञान व विज्ञान प्रसार के क्षेत्र में प्रोफेसर नार्लीकर के अविस्मरणीय योगदान को सलाम करता है। अरविन्द गुप्ता जी की यह आत्मीय स्मृति हमें बताती है कि किस तरह प्रोफेसर नार्लीकर ने विज्ञान को जन-जन तक पहुँचाने और बच्चों में विज्ञान के प्रति रुचि जगाने के लिए जीवन भर काम किया।
विज्ञान के प्रयोग का कमाल – जयन्त नार्लीकर
चित्र: दिलीप चिंचालकर
जयन्त नार्लीकर का यह आत्मीय और मज़ेदार संस्मरण हमें उनकी क्लास में ले चलता है, जहाँ एक पाइप और दो बीकरों की मदद से किए गए विज्ञान ने पूरी क्लास के बच्चों को चौंका दिया। पढ़िए कि वो कौन-सा प्रयोग था जिसने प्रोफेसर नार्लीकर के भीतर वैज्ञानिक जिज्ञासा की चिंगारी सुलगाई।
खुशबू का घातक सफर – पीयूष सेकसरिया
चित्र: इशिता देबनाथ बिस्वास
अनुवाद: विनता विश्वनाथन
क्या आपने कभी सोचा है कि कोई खुशबू किसी पेड़ के लिए मौत का कारण बन सकती है? त्रिपुरा के अगरतला शहर से जुड़ा ‘अगर' का पेड़, अपनी अनोखी और कीमती खुशबू के लिए जाना जाता है। लेकिन इसी खुशबू की वजह से उसकी ज़िन्दगी खतरे में भी है। ऐसा क्यों, जानने के लिए पढ़िए पीयूष सेकसरिया का यह दिलचस्प लेख।
घिन तो नहीं आती है ना... – नागार्जुन
चित्र: कैरेन हैडॉक
पूरी स्पीड में है ट्राम
खाती है दचके पे दचके
सटता है बदन से बदन
पसीने से लथपथ...
कौन, क्या, कैसे खाता है? — विनोद रायना
विनोद रायना का यह रोचक लेख हमें भोजन की उस दुनिया में ले चलता है जहाँ स्वाद, ज़रूरत और प्रकृति की अनोखी व्यवस्था एक साथ मिलती है। लेख तस्वीरों के माध्यम से अलग-अलग जीवों के भोजन व भोजन करने के तरीकों के बारे में बताता है। खाने के इस दिलचस्प सफर में हम जान पाते हैं कि प्रकृति कैसे हर जीव के लिए अनोखा तरीका और ज़रूरत तय करती है।
बूढ़े जंगल – इश्तेयाक अहमद
चित्र: प्रशान्त सोनी
क्या आपने कभी सोचा है कि जब जंगल बूढ़ा हो जाता है तो उसके पेड़, जानवर और इन्सान किस हाल में होते हैं? बिहार के भीमबाँध गाँव की पहाड़ियों में जब रात की गर्मी चैन नहीं लेने देती, तब कुछ बुज़ुर्ग किसान मिलकर करते हैं ऐसी बातें जो हमें सोचने पर मजबूर कर देती हैं कि जंगल का पानी कहाँ गया, जानवर गाँव क्यों आने लगे, और असल आदमखोर कौन है?
गतिविधि कोना — क्यों-क्यों?
इस कॉलम में हर बार हम बच्चों से एक सवाल पूछते हैं। जिसका जवाब उन्हें सही-गलत की परवाह किए बिना अपने मन से देना होता है। इस बार का सवाल था: “बढ़ती गर्मी से राहत पाने के लिए तुम क्या-क्या तरीके अपनाते हो, और क्यों?”अक्सर
कई बच्चों ने अपने दिलचस्प जवाब हमें भेजे। इनमें से कुछ आपको यहाँ पढ़ने को मिलेंगे। साथ ही बच्चों के बनाए कुछ चित्र भी देखने को मिलेंगे।
गतिविधि कोना — चित्रपहेली
चित्रों में दिए इशारों को समझकर पहेली को बूझना।
कला के आयाम – सूटकेस में स्टूडियो — शेफाली जैन
इस लेख में शेफाली हमें मिलवाती हैं अपने कलाकार दोस्त ब्लेज़ जोसेफ और उनके सूटकेस से। ब्लेज़ अपने सूटकेस में कला की एक समूची दुनिया साथ लिए चलते हैं — स्केचबुक, ब्रश, मिट्टी, हल्दी, बीज, और ढेर सारे रंग! यह लेख बताता है कि कैसे ब्लेज़ अपने सफर और आसपास की चीज़ों को ही कला का ज़रिया बना लेते हैं। ब्लेज़ की कला के सफर के बारे में और जानने के लिए पढ़िए यह लेख।
नए पत्ते – बीमारी की चिन्ता – अलिज़ा
चित्र: हबीब अली
‘नए पत्ते’ नामक इस कॉलम में आप पढ़ेंगे अंकुर संस्था के स्कूली बच्चों की थोड़ी अनगढ़, लेकिन ताज़गी से भरी रचनाएँ।
घर के भीतर की छोटी-छोटी बातें कभी-कभी बड़े जज़्बात बुनती हैं। अलिज़ा की यह कहानी चिन्ता से भरी ऐसी ही एक शाम की है—जब अब्बू की तबीयत ठीक नहीं लग रही, लेकिन वो कुछ बता भी नहीं रहे। अम्मी की बेचैनी, बच्चों की नज़रें और उस रात की खामोशी सब मिलकर एक साधारण से लगने वाले दिन को खास बना देते हैं।
गतिविधि कोना — अन्तर ढूँढो
एक जैसे दिखने वाले दो चित्रों में छिपे हुए अन्तरों को ढूँढने की मज़ेदार गतिविधि।
मेहमान जो कभी गए ही नहीं – भाग 12 – आर एस रेश्नू राज, ए पी माधवन, टी आर शंकर रमन, दिव्या मुडप्पा, अनीता वर्गीस और अंकिला जे हिरेमथ
रूपान्तरण व अनुवाद: विनता विश्वाथन
चित्र: रवि जाम्भेकर
इस सीरीज़ में हम आसपास पाए जाने वाले कुछ ऐसे आक्रामक एलियन पौधों के बारे में चर्चा करते हैं जो बाहर से आए और हमारे देश में बस गए। इस चर्चा में हम इन पहलुओं को शामिल करते हैं कि ये पौधे कहाँ से आए, कैसे आए, इनके खास गुण क्या हैं, इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाए इत्यादि।
इस बार बात जानिए – मैदान घास/लॉन ग्रास के बारे में।
कुछ मज़ेदार सवाल और पहेलियों से भरे दिमागी कसरत के पन्ने।
बच्चों की रचनाओं का कोना — मेरा पन्ना
लेख व कहानी: हमने मनाया बिहु – रोदाली दास, पिज़्जे का ठेला – गोविन्द वर्मा, रमज़ान उल मुबारक! – कशफ, साइकिल चलाई – प्रणाली देशमुख, हमने मज़े किए – फरा कुरैशी
कविता: मढ़ई रे मढ़ई – बीजाडाण्डी के सातवीं कक्षा के बच्चों द्वारा रचित।
चित्र: कीर्तिका दास, छाया अहिरवार, गोविन्द वर्मा, अनन्त मिश्रा, मानवी मुले, राशिदा कुरैशी, राजन्ति तिर्की
तुम भी जानो
इस बार जानिए:
इस कला में मनुष्यों से बेहतर बन्दर
बढ़ती गर्मी और बारिश
हवा बह चली – अमित कुमार
चित्र: अनन्या सिंह
हवा बह चली
मीलों-मील...

