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मैंने खत लिखा – यक्षिका का खत चकमक के नाम

इस चिट्ठी में यक्षिका का चकमक के प्रति स्नेह, उत्सुकता और आत्मीय जुड़ाव साफ दिखाई देता है। उसके शब्द बताते हैं कि चकमक उसके लिए एक दोस्त की तरह है— जो जिज्ञासा जगाती है, कल्पना को उड़ान देती है और हर महीने अनुभवों की एक नई दुनिया से मिलवाती है।

पत्ते-पत्तू – प्रभात
चित्र: पकंज साइकिया 

इस कविता में प्रभात शब्दों का ऐसा तानाबाना रचते हैं कि चाय, सत्तू, मच्छी, लस्सी और सब्ज़ी जैसे रोज़मर्रा के शब्द भी कविता का हिस्सा बन जाते हैं। तुकबन्दी, दोहराव और ध्वनियों के खेल से वे साधारण शब्दों को भी असाधारण बना देते हैं। एक बानगी देखो: 

पत्ते से बोली पत्तू
ये चाय है या सत्तू
हैं भरे चाय में दाने
ले आए हो बिन छाने…

एंटीलोप कैन्यन
फोटो व लेख: इशिता देबनाथ बिस्वास

क्या तुमने कभी ऐसी जगह की कल्पना की है, जहाँ चट्टानें लहरों की तरह मुड़ी-तुड़ी दिखती हों और ऊपर से आती धूप उन्हें लाल, नारंगी और सुनहरे रंगों से भर देती हो? एंटीलोप कैन्यन ऐसी ही एक अद्भुत जगह है। यह लेख हमें इसकी अनोखी बनावट, इसके बनने की कहानी और इससे जुड़ी नवााहो लोगों की मान्यताओं के रोचक सफर पर ले चलता है। 

मेहमान जो कभी गए ही नहीं – भाग 21 – आर एस रेश्नू राज, ए पी माधवन, टी आर शंकर रमन, दिव्या मुडप्पा, अनीता वर्गीस और अंकिला जे हिरेमथ
रूपान्तरण व अनुवाद: विनता विश्वाथन
चित्र: रवि जाम्भेकर

इस सीरीज़ में हम आसपास पाए जाने वाले कुछ ऐसे आक्रामक एलियन पौधों के बारे में चर्चा करते हैं जो बाहर से आए और हमारे देश में बस गए। इस चर्चा में हम इन पहलुओं को शामिल करते हैं कि ये पौधे कहाँ से आए, कैसे आए, इनके खास गुण क्या हैं, इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाए इत्यादि।
इस बार बात जानिए – ‘ब्लैक वॉटल’ के बारे में।

फिल्मी बातें – फैन्ड्री – वरुण ग्रोवर 

हर अच्छी फिल्म अपने खत्म होने के बाद भी हमारे भीतर चलती रहती है और हमें कुछ नए सवालों के साथ छोड़ जाती है। ‘फिल्मी बातें’ कॉलम में इस बार लेखक, गीतकार और स्टैंड-अप कॉमेडियन वरुण ग्रोवर मराठी फिल्म फैन्ड्री के बारे में लिख रहे हैं—एक ऐसी फिल्म, जो बचपन, सपनों और जाति के कठिन सच को बेहद संवेदनशील ढंग से सामने लाती है। 

तुम भी बनाओ – अखबार से मुखौटा और फूलदान – रक्षिता सैनी 

क्या पुरानी, बेकार पड़ी चीज़ें सच में बेकार होती हैं? ज़रा-सी कल्पना और जुगाड़ से बेकार चीज़ों को काम की और सुन्दर चीज़ों में बदला जा सकता है।
इस बार रक्षिता पुराने अखबारों से मुखौटा और फूलदान बनाने का तरीका बता रही हैं।

गतिविधि कोना – क्यों-क्यों?

इस कॉलम में हर बार हम बच्चों से एक सवाल पूछते हैं, जिसका जवाब उन्हें सही-गलत की परवाह किए बिना अपने मन से देना होता है। इस बार का सवाल था: “कुछ लोग मानते हैं कि कुछ परिस्थितियों में युद्ध ज़रूरी हो जाता है, जबकि कुछ अन्य लोग मानते हैं कि किसी भी परिस्थिति में युद्ध ठीक नहीं होता। तुम्हें क्या लगता है—किन परिस्थितियों में युद्ध करना सही हो सकता है, और किन में नहीं? और क्यों?”

कई बच्चों ने अपने दिलचस्प जवाब हमें भेजे। इनमें से कुछ आपको यहाँ पढ़ने को मिलेंगे। साथ ही बच्चों के बनाए कुछ चित्र भी देखने को मिलेंगे।

गतिविधि कोना – अन्तर ढूँढो 

हूबहू एक जैसे दिखने वाले दो चित्रों में छिपे हुए अन्तरों को ढूँढने की मज़ेदार गतिविधि। 

लहरा के बल खा के – पीयूष सेकसरिया
अनुवाद: विनता विश्वनाथन

बिना पैरों के दौड़ना, तैरना, पेड़ों पर चढ़ना और कभी-कभी हवा में भी ग्लाइड करना —सुनने में किसी जादू जैसा लगता है ना? तुम्हें शायद यकीन न हो पर ये सब करने वाले जीव हमारे आसपास ही रहते हैं। इस लेख में जानो साँपों की दुनिया के कुछ ऐसे रहस्य, जो उन्हें धरती के सबसे अनोखे जीवों में शामिल करते हैं। 

गतिविधि कोना – भूलभुलैया
दिए गए कई रास्तों में से सही रास्ते को चुनने की जद्दोजहद। 

अभयारण्य में बाघ – चन्दन यादव
चित्र: शुभम लखेरा

इस कहानी की शुरुआत ही तुम्हें एक दिलचस्प दृश्य के बीच ले जाती है—एक बाघ जो जंगल में लोगों की नज़रों से छिपने की बजाय उनके सामने नाले में बैठा है। लेकिन क्या वह सचमुच लोगों को दिखने के लिए बैठा है, या उनसे कुछ और कह रहा है? चन्दन यादव की यह कहानी बाघ, जंगल और इन्सानों के रिश्ते को एक नए नज़रिए से देखने का मौका देती है। 

गतिविधि कोना – चित्रपहेली

चित्रों में दिए इशारों को समझकर पहेली को बूझना।

अकाल और उसके बाद  – नरेश सक्सेना
चित्र: प्रशान्त सोनी

यह कविता कुछ ही पंक्तियों में अकाल और भूख की पूरी कहानी कह देती है। कवि ने चूल्हे, चक्की, कुतिया, चूहे और कौए जैसी रोज़मर्रा की चीज़ों के ज़रिए घर की उदासी और फिर अन्न आने की खुशी को इतनी मार्मिकता से चित्रित किया है कि कविता पढ़ते हुए वह दृश्य आँखों के सामने उतर आता है। 

कविता डायरी – एक टिप्पणी – नरेश सक्सेना
किसी कविता को पढ़ना केवल उसके शब्दों को पढ़ना नहीं, बल्कि उसके भीतर छिपे दृश्यों, संकेतों और लय को पहचानना भी है। नागार्जुन की प्रसिद्ध कविता ‘अकाल और उसके बाद’ पर नरेश सक्सेना की यह टिप्पणी दिखाती है कि एक छोटी-सी कविता में कितनी बड़ी दुनिया और कितने गहरे अर्थ समाए हो सकते हैं। 

गतिविधि कोना – माथापच्ची

कुछ मज़ेदार सवाल और पहेलियों से भरे दिमागी कसरत के पन्ने।

बच्चों की रचनाओं का कोना – मेरा पन्ना
लेख व कहानी: मैं तो खाती जाती हूँ - अरसी, मोर कीआवाज़ सुनने का इन्तज़ार - प्रज्ञा, गर्मी की छुट्टियाँ - पीहू कुमारी, घूमने की खुशी - लक्ष्य जोशी, कुत्‍तों से डर - पूजा पाण्‍डे, उसकी याद आती है - दीपक बोहरा, आम के पेड़ का मज़ा - छाया अहिरवार
चित्र: सोहम निंबालकर, ज़ोया, ऐश्वर्या भदंग, दीप्‍ति‍, मोनकिा रावत 

तुम भी जानो
इस बार जानिए:
चॉंद पर परमाणु रिएक्‍टर
व्‍हेल फॉल