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अलविदा, विनोद जी!
हिन्दी साहित्य जगत के मशहूर लेखक विनोद कुमार शुक्ल नहीं रहे। विनोद जी चकमक के रचनाकार भी रहे। उनकी स्मृति में लिखा गया यह लेख उनकी रचनात्मक दुनिया के भीतर झाँकने का निमंत्रण है, जहाँ घर, लोग, चीज़ें और शब्द अपने पूरे संसार के साथ उपस्थित होते हैं।
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था – विनोद कुमार शुक्ल
चित्र: कनक शशि अनिल
कम से कम शब्दों में बड़ी बात कहना और साधारण अनुभवों में छिपी मानवीय संवेदनाओं को उजागर करना विनोद जी के लेखन की खासियत है। इसकी एक बानगी इस कविता में देखिए—
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था
व्यक्ति को मैं नहीं जानता था…
हताशा से एक व्यक्ति बैठ गया था: एक टिप्पणी – नरेश सक्सेना
चित्र: कनक शशि अनिल
विनोद कुमार शुक्ल की इस बहुचर्चित कविता पर जाने-माने कवि नरेश सक्सेना की एक टिप्पणी पढ़िए। कविता के शिल्प, भाषा, उसके अर्थ की सहजता पर यह टिप्पणी ठहराव के साथ बात करती है।
बोहाग बिहू – पंकज सैकिया
बिहू के गीत, हुसोरी की धुन, कोपौ के फूल के बहाने यह कॉमिक हमें असम के बिहू उत्सव की रंगीन दुनिया में ले जाती है।
बर्फ के स्तूप – पीयूष सेकसरिया
अनुवाद: विनता विश्वनाथन
लद्दाख जैसे ठण्डे रेगिस्तान में जब प्राकृतिक हिमनदियाँ पीछे हटने लगीं और पानी की गम्भीर कमी हो गई तब कुछ लोगों ने समझ, प्रयोग व विज्ञान की मदद से बर्फ को इस समस्या का समाधान बना लिया। यह लेख बर्फ के स्तूपों की उसी कहानी को पेश करता है।
किताबें कुछ कहती हैं
इस कॉलम में बच्चे अपनी पसन्द या नापसन्द की किताबों के बारे में अपने विचार लिखते हैं। इस बार पढ़िए हैरी पॉटर सीरिज़ की किताबों के बारे में नौवीं कक्षा की दक्षा अग्रवाल के विचार।
मैं क्या खाऊँ! – उमा सुधीर
क्या आपने कभी सोचा है कि यह किस आधार पर तय होता है कि हम क्या खाएँ, और क्या नहीं? क्या यह महज़ स्वाद या पसन्द-नापसन्द का मसला है या इसकी जड़ें विज्ञान व पर्यावरण से भी जुड़ी हैं? यह लेख ऐसे ही सवालों को टटोलता है और सोचने पर मजबूर करता है।
गतिविधि कोना – अन्तर ढूँढो
चित्र: नरेश पासवान
हूबहू एक जैसे दिखने वाले दो चित्रों में छिपे हुए अन्तरों को ढूँढने की मज़ेदार गतिविधि।
गतिविधि कोना – क्यों-क्यों?
इस कॉलम में हर बार हम बच्चों से एक सवाल पूछते हैं। जिसका जवाब उन्हें सही-गलत की परवाह किए बिना अपने मन से देना होता है। इस बार का सवाल था: “कुछ लोग चीज़ें दूसरों के साथ आसानी से बाँट लेते हैं, जबकि कुछ को यह मुश्किल लगता है। तुम्हें क्या लगता है ऐसा क्यों होता होगा?”अक्सर हाालोोगोंं
कई बच्चों ने अपने दिलचस्प जवाब हमें भेजे। इनमें से कुछ आपको यहाँ पढ़ने को मिलेंगे। साथ ही बच्चों के बनाए कुछ चित्र भी देखने को मिलेंगे।
गतिविधि कोना – भूलभुलैया
दिए गए कई रास्तों में से सही रास्ते को चुनने की जद्दोजहद।
खिड़की – लवनीन मिश्रा
चित्र: प्रशान्त सोनी
एक छोटी-सी खिड़की के इर्द-गिर्द घूमती यह कहानी मोहल्ले की रोज़मर्रा की ज़िन्दगी और आपसी रिश्तों के तानेबाने को बेहद खूबसूरती से उभारती है। बदलते हालातों में पनपते डर और अनकही आशंकाओं के बीच इन्सानी जुड़ाव की ताकत को यह कहानी बेहद सहज ढंग से सामने लाती है।
गतिविधि कोना – चित्रपहेली
चित्रों में दिए इशारों को समझकर पहेली को बूझना।
यह तीर कहाँ से चला?
लेख व फोटो: जितेश शेल्के
हम तीरंदाज़ की कल्पना कैसे करते हैं? यह लेख हमारी तयशुदा कल्पना को चुनौती देता है और दिखाता है कि जब हौंसला, अभ्यास और लगन साथ हों, तो सीमाएँ बदल जाती हैं। शीतल देवी की कहानी खेल से कहीं आगे जाकर हमारी सोच पर सवाल उठाती है।
गतिविधि कोना – माथापच्ची
कुछ मज़ेदार सवाल और पहेलियों से भरे दिमागी कसरत के पन्ने।
बच्चों की रचनाओं का कोना – मेरा पन्ना
लेख व कहानी: एक पुराना-सा बेड – अहान जैन, खैता – सोनाक्षी मण्डल, सच्चे दोस्त और अच्छे कोच – अयान सिंह सोमवंशी, खेल का मैदान – अरविंद, रंगपंचमी का मेला – रहमान खान, मेरी डायरी – अनुभव कुमार
चित्र: सार्थक, मानवी मुले, सत्यजीत पारखे, राजेश्वरी यादव, वसुन्धरा, चार्वी
मेहमान जो कभी गए ही नहीं – भाग 17 – आर एस रेश्नू राज, ए पी माधवन, टी आर शंकर रमन, दिव्या मुडप्पा, अनीता वर्गीस और अंकिला जे हिरेमथ
रूपान्तरण व अनुवाद: विनता विश्वाथन
चित्र: रवि जाम्भेकर
इस सीरीज़ में हम आसपास पाए जाने वाले कुछ ऐसे आक्रामक एलियन पौधों के बारे में चर्चा करते हैं जो बाहर से आए और हमारे देश में बस गए। इस चर्चा में हम इन पहलुओं को शामिल करते हैं कि ये पौधे कहाँ से आए, कैसे आए, इनके खास गुण क्या हैं, इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाए इत्यादि।
इस बार बात जानिए – जेरूसलम चेरी के बारे में।
तुम भी जानो
इस बार जानिए:
100 साल बाद यहाँ रहने आए हैं हाथी
मवेशी कम डकार लेंगे
क्यों महुआ तोड़े नहीं जाते पेड़ से… – जसिंता केरकेट्टा
चित्र: कनक शशि अनिल
प्रकृति के साथ आदिवासी जीवन के जुड़ाव व प्रकृति के प्रति उनकी संवेदनशीलता को उजागर करती एक बेहद खूबसूरत कविता।
माँ तुम सारी रात
क्यों महुए के गिरने का इन्तज़ार करती हो?
क्यों नहीं पेड़ से ही सारा महुआ तोड़ लेती हो?...

