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तारों से बातें
कविता व चित्र: कनक शशि अनिल
मैं लाख कोशिश करती हूँ
ये चुप ही बने रहते हैं…
गोबुक गाँव में एक दिन
कहानी व चित्र: पंकज साइकिया
अनुवाद: कनक शशि अनिल
देरी और दोयांग आज जंगल जाने वाले हैं। उनका साथ देने उनके दोस्त भी आ रहे हैं। जंगल के इस रोमांचक सफर में उन्होंने क्या-क्या देखा, क्या-क्या किया - जानने के लिए पढ़ो बेहतरीन चित्रों से सजी ये चित्रकथा।
गतिविधि कोना – अन्तर ढूँढो
चित्र: नन्दिनी कुमारी, तेरह साल
हूबहू एक जैसे दिखने वाले दो चित्रों में छिपे हुए अन्तरों को ढूँढने की मज़ेदार गतिविधि।
चैन की साँस – उमा सुधीर
दिल्ली के AQI के बारे में तो तुमने सुना होगा। पर क्या तुम जानते हो कि AQI होता क्या है और यह कितना होना चाहिए? हमारे रोज़मर्रा के छोटे-छोटे चुनाव किस तरह इस समस्या से जुड़े हैं? इन सारे सवालों का जवाब जानने के लिए पढ़ो यह लेख, जो तुम्हें सोचने पर मजबूर कर देगा।
डियर डायरी – अमित कुमार
चित्र: कनक शशि अनिल
सोचो ज़रा कि क्या हो जब एक छोटी-सी बात किसी की पूरी दुनिया बदल दे?
पाखी की डायरी के इन पन्नों में झाँको, जहाँ डर, अकेलापन और खुद को स्वीकार करने की जद्दोजहद एक साथ उभरती है। क्या हम सच में लोगों को वैसे देख पाते हैं जैसे वे हैं, या सिर्फ उनके अलग दिखने पर ध्यान देते हैं? पाखी की डायरी की बातें तुम्हें शायद भीतर तक छू जाए।
तुम भी बनाओ – अखबार से टोकरी – रक्षिता सैनी
क्या पुरानी, बेकार पड़ी चीज़ें सच में बेकार होती हैं? ज़रा-सी कल्पना और जुगाड़ से बेकार चीज़ों को काम की और सुन्दर चीज़ों में बदला जा सकता है।
इस बार रक्षिता पुराने अखबारों से टोकरियाँ बनाने का तरीका बता रही हैं।
मेहमान जो कभी गए ही नहीं – भाग 18 – आर एस रेश्नू राज, ए पी माधवन, टी आर शंकर रमन, दिव्या मुडप्पा, अनीता वर्गीस और अंकिला जे हिरेमथ
रूपान्तरण व अनुवाद: विनता विश्वाथन
चित्र: रवि जाम्भेकर
इस सीरीज़ में हम आसपास पाए जाने वाले कुछ ऐसे आक्रामक एलियन पौधों के बारे में चर्चा करते हैं जो बाहर से आए और हमारे देश में बस गए। इस चर्चा में हम इन पहलुओं को शामिल करते हैं कि ये पौधे कहाँ से आए, कैसे आए, इनके खास गुण क्या हैं, इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाए इत्यादि।
इस बार बात जानिए – सफेद धतूरा के बारे में।
चित्रों में दिए इशारों को समझकर पहेली को बूझना।
ताला सुधारने वाला – राजेश जोशी
चित्र: प्रशान्त सोनी
हमारे रोज़मर्रा के जीवन को सहज बनाने वाले ऐसे कारीगर अक्सर हमारी नज़रों से छिपे रह जाते हैं। यह कविता ठहरकर उनकी दुनिया को देखने का मौका देती है, जहाँ साधारण काम के भीतर असाधारण अर्थ छिपे हैं। इस कविता की एक बानगी देखिए:
वह एक पुराने लेकिन मज़बूत ताले की चाबी बनाने में लगा है
एक चाबी को वह ताले में लगाकर घुमाता है
फिर पास पड़े लकड़ी के कुन्दे पर रखकर
रेतनी से चाबी को घिसता है…
कविता डायरी – कवि का बयान – राजेश जोशी
इस कॉलम में हर बार किसी न किसी कविता के सहारे कविता की अन्दरूनी दुनिया में उतरने की कोशिश करते हैं। इस बार खास बात यह है कि खुद कवि की टिप्पणी भी प्रस्तुत की गई है। यानी कवि खुद बयान करता है कि कविता उस तक कैसे पहुँची।
कविता डायरी – एक टिप्पणी – नरेश सक्सेना
राजेश जोशी की यह कविता साधारण लगने वाले “ताले और चाबी” के जरिए जीवन की गहरी बातों को खोलती है। नरेश जी संकेत देते हैं कि यह केवल ताला खोलने की बात नहीं, बल्कि जीवन की उलझनों को समझने और सुलझाने के हुनर की ओर इशारा है।
आखिर यह ‘चाबी बिठाने का हुनर’ हमें क्या सिखाता है, जानने के लिए पढ़िए यह टिप्पणी।
किताबें कुछ कहती हैं
इस कॉलम में बच्चे अपनी पसन्द या नापसन्द की किताबों के बारे में अपने विचार लिखते हैं। इस बार पढ़िए नीलोफर की मुस्कान के बारे में चौथी कक्षा की द्युति और टुनटुनी के बारे में तीसरी कक्षा के अयान कटयाल के विचार।
उल्लू नहीं, ये तो पतंगा है - पीयूष सेकसरिया
अनुवाद: विनता विश्वनाथन
बारिश में भीगे एक पुराने जंगल की यह सैर तब और भी रोमांचक हो जाती है जब लेखक की मुलाकात एक अनोखे जीव से होती है। ऐसा जीव जिसे देखकर तुम भी हैरान हो जाओगे। जंगल के सन्नाटे, रहस्य और इस अनोखी खोज का यह सफर तुम्हें प्रकृति की रोमांच से भरी दुनिया में ले जाता है।
इस कॉलम में हर बार हम बच्चों से एक सवाल पूछते हैं, जिसका जवाब उन्हें सही-गलत की परवाह किए बिना अपने मन से देना होता है। इस बार का सवाल था: “ज्ञान/सीखने को जाँँचने का एकमात्र तरीका आमतौर पर परीक्षा को माना जाता है। यह सही है या गलत? तुम इस बारे में क्या सोचते हो, और क्योंं?”
कई बच्चों ने अपने दिलचस्प जवाब हमें भेजे। इनमें से कुछ आपको यहाँ पढ़ने को मिलेंगे। साथ ही बच्चों के बनाए कुछ चित्र भी देखने को मिलेंगे।
कुछ मज़ेदार सवाल और पहेलियों से भरे दिमागी कसरत के पन्ने।
बच्चों की रचनाओं का कोना – मेरा पन्ना
लेख व कहानी:
मुझे साइकिल चलाना आ गई - उमैर, अच्छी साइकिल - दीपाशा, बेस्टी हो तो ऐसी - उज़्मा, लकड़ी की टेबल - ममता, मेरे कुक पापा - दीपक बोहरा, अबीर, बग्गा और बाबा की कहानी - अबीर श्रीवास्तव
चित्र: मानव जवारिया, राधा कुमारी, डॉली, ज्योति चौहान, दिव्या वंजारे
इस बार जानिए:
मच्छर से ली प्रेरणा
भारत में बढ़ते गार्बेज कैफे
