Read the magazine Download Magazine


आवरण चित्र – मिवान कोठरी, पहली 

पहली नज़र में यह चित्र मछलियों का एक संसार लगता है। लेकिन ध्यान से देखने पर इसमें पानी की लहरें, उसकी गहराई और उसका लगातार बहते रहना भी दिखाई देता है। मिवान ने नीले, हरे और पीले रंगों के साथ रेखाओं और छींटों का ऐसा इस्तेमाल किया है कि चित्र में एक तरह की गति महसूस होती है। कुछ मछलियाँ साफ दिखाई देती हैं, तो कुछ जैसे पानी में घुल-मिल गई लगती हैं। यह चित्र हमारी कल्पना को तैरने के लिए नया समन्दर देता है। 

फिल्मी बातें – मकड़ी – स्‍वस्ति‍का कुमारी, नौवीं

फिल्में देखना जितना मज़ेदार होता है, उनके बारे में बातें करना भी उतना ही रोचक हो सकता है। इस कॉलम में बच्चे अपनी पसन्दीदा फिल्मों के विविध पहलुओं पर अपने विचार, अनुभव और समझ साझा करते हैं, जैसे कि कहानी, पात्र, अभिनय, कोई खास सन्देश आदि। 

इस बार देखते हैं स्‍वस्तिका की नज़र से फिल्म मकड़ी को।

खूबसूरत कप – जितेश शेल्‍के
चित्र: कनक शशि अनिल 

क्या कप सिर्फ चीनी मिट्टी या काँच का बना एक बर्तन होता है? या फिर समाज कभी-कभी उसमें अपने भेदभाव, अपनी धारणाएँ और अपने बनाए हुए ऊँच-नीच के नियम भी भर देता है? यह कहानी हमें सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर इन्‍सानों के बीच दीवारें कौन खड़ी करता है—हमारा जन्म, हमारा काम, या हमारी सोच? सामान्‍य-सी लगने वाली घटना पर आधारित इस कहानी के बहाने अपने समाज के उस चेहरे को देखें, जिसे हम अक्सर देखकर भी अनदेखा कर देते हैं। 

सन्‍त रैदास के दोहे – सन्त रैदास 

सदियों पहले सन्त रैदास ने जात-पात के नाम पर समाज में हो रहे भेदभाव पर प्रश्न उठाए थे। उन्होंने इसे मनुष्यता के लिए सबसे बड़ा रोग बताया था। उनके ये दोहे आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं, क्योंकि वे हमें यह सोचने के लिए मजबूर करते हैं कि क्या हम इन्सान को इन्सान की तरह देख पाते हैं। 

खिंद-खन्दोल्हू – पवन चौहान 

कुछ चीज़ें सिर्फ चीज़ें नहीं होतीं, वे अपने साथ एक पूरे समय की कहानी लेकर चलती हैं। खिंद-खन्दोल्हु भी ऐसे ही थे। वे केवल ओढ़ने-बिछाने के काम नहीं आते थे, बल्कि कड़कड़ाती ठण्ड वे पहाड़ के लोगों के जीवन का एक ज़रूरी हिस्सा थे। पुराने कपड़ों से बने ये खिंद-खन्दोल्हु हमें बताते हैं कि कम साधनों में लोग कैसे मिल-जुलकर अपनी ज़रूरतें पूरी करते थे। आओ, इनके बहाने पहाड़ी जीवन, वहाँ के काम-काज और बदलती जीवन-शैलियों के बारे में जानें। 

गतिविधि कोना – अन्तर ढूँढो
चित्र: तथागत, यूकेजी

हूबहू एक जैसे दिखने वाले दो चित्रों में छिपे हुए अन्तरों को ढूँढने की मज़ेदार गतिविधि। 

गणित है मज़ेदार – सओरा संख्याएँ – आलोका कान्हेरे
चित्र: मधुश्री 

इन पन्नों में हम कोशिश करेंगे कि ऐसी चीज़ें दें जिनको हल करने में तुम्हें मज़ा आए। ये पन्ने खास उन लोगों के लिए हैं जिन्हें गणित से डर लगता है।

क्या तुमने कभी सोचा है कि अलग-अलग भाषाओं में संख्याओं के नाम भी कैसे बनाए जाते हैं? इस लेख में हम एक ऐसी रोचक भाषा से मिलेंगे, जिसमें संख्याओं के नाम बनाने का तरीका इतना दिलचस्प है कि गणित और भाषा कई दफा जुगलबन्दी करते नज़र आते हैं। तो तैयार हो जाओ, संख्याओं की एक नई और अनोखी दुनिया में झाँकने के लिए। 

चित्रकला के इर्दगिर्द - 2 – सी. एन. सुब्रह्मण्यम् 

क्या चित्र केवल देखने में अच्छे लगने के लिए बनाए जाते हैं? या वे लोगों के डर, विश्वास, इच्छाओं और जीवन की कहानियाँ भी अपने भीतर छिपाए रखते हैं? हज़ारों साल पहले गुफाओं में रहने वाले लोग जब दीवारों पर जानवरों और मनुष्यों के चित्र बनाते थे, तब उनके मन में क्या चलता होगा? इन सवालों के जवाब ढूँढते हुए यह लेख हमें उस समय बनाए गए चित्रों के पीछे छिपी दुनिया से परिचित कराता है और बताता है कि चित्रकला हमेशा से मनुष्य के जीवन और उसकी मान्यताओं से गहराई से जुड़ी रही है। 

गतिविधि कोना – क्यों-क्यों?

इस कॉलम में हर बार हम बच्चों से एक सवाल पूछते हैं। जिसका जवाब उन्हें सही-गलत की परवाह किए बिना अपने मन से देना होता है। इस बार का सवाल था: “कुछ लोग शारीरिक रूप से अलग दिखते हैं या उनका जीवन जीने का तरीका अलग होता है। तुम उन्हें किस तरह देखते हो? तुम्हारे ऐसा सोचने का कारण क्या है?

कई बच्चों ने अपने दिलचस्प जवाब हमें भेजे। इनमें से कुछ आपको यहाँ पढ़ने को मिलेंगे। साथ ही बच्चों के बनाए कुछ चित्र भी देखने को मिलेंगे।

गतिविधि कोना – चित्रपहेली

चित्रों में दिए इशारों को समझकर पहेली को बूझना।

थि‍रकती दुनिया – मुक्ता अंजल 

क्या कभी तुम्हें लगा है कि हमारे आसपास की चीज़ें भी नाचती-गाती हैं? झाड़ू को चलाना, कपड़ों का हवा में लहराना, पक्षियों का उड़ना और हमारे कदमों का थिरकना—इन सबमें एक छिपी हुई लय होती है। यह चित्रकथा हमें उसी लय को देखने, महसूस करने और रोज़मर्रा की साधारण-सी चीज़ों में छिपी सुन्‍दरता को खोजने का मौका देती है। 

टॉइलेट का इतिहास –  विनता विश्वनाथन 

आज लगभग हम सभी टॉइलेट का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन क्या कभी तुमने सोचा है कि जब न पाइप थे, न फ्लश और न ही आधुनिक बाथरूम, तब लोग क्या करते थे? खुले में शौच से लेकर आधुनिक फ्लश तक इन्सानों ने टॉइलेट के कितने ही रूप ईजाद किए हैं। इस इतिहास में कुछ आविष्कार हैं, कुछ हैरान करने वाले तरीके और कुछ ऐसे किस्से, जिन पर यकीन करना शायद तुम्हारे लिए मुश्किल हो। 

तुम भी बनाओ – अखबार से चप्पल– रक्षिता सैनी 

क्या पुरानी, बेकार पड़ी चीज़ें सच में बेकार होती हैं? ज़रा-सी कल्पना और जुगाड़ से बेकार चीज़ों को काम की और सुन्दर चीज़ों में बदला जा सकता है।
इस बार रक्षिता पुराने अखबारों से अलग-अलग तरह की चप्पलें बनाने का तरीका बता रही हैं। 

मेहमान जो कभी गए ही नहीं – भाग 20 – आर एस रेश्नू राज, ए पी माधवन, टी आर शंकर रमन, दिव्या मुडप्पा, अनीता वर्गीस और अंकिला जे हिरेमथ
रूपान्तरण व अनुवाद: विनता विश्वाथन
चित्र: रवि जाम्भेकर

इस सीरीज़ में हम आसपास पाए जाने वाले कुछ ऐसे आक्रामक एलियन पौधों के बारे में चर्चा करते हैं जो बाहर से आए और हमारे देश में बस गए। इस चर्चा में हम इन पहलुओं को शामिल करते हैं कि ये पौधे कहाँ से आए, कैसे आए, इनके खास गुण क्या हैं, इन्हें कैसे व्यवस्थित किया जाए इत्यादि।
इस बार बात जानिए – ‘सिकल सेना’ के बारे में।

एक्सरसाइज़ और मस्तिष्क 

जब हम एक्सरसाइज़ की बात करते हैं, तो आम तौर पर हमारे मन में शरीर को स्वस्थ और मज़बूत बनाने की बात आती है। लेकिन क्या तुमने कभी सोचा है कि दौड़ना, कूदना और खेलना हमारे मस्तिष्क को भी बदल सकता है? वैज्ञानिकों ने हाल ही में पाया है कि नियमित एक्सरसाइज़ से मस्तिष्क की कुछ कोशिकाएँ ज़्यादा सक्रिय और आपस में बेहतर तरीके से जुड़ जाती हैं। क्या इसी वजह से शुरू में मुश्किल लगने वाली एक्सरसाइज़ कुछ दिनों बाद आसान लगने लगती है? आओ, जानें कि शरीर के साथ-साथ मस्तिष्क पर भी एक्सरसाइज़ का क्या असर पड़ता है। 

गतिविधि कोना – भूलभुलैया
दिए गए कई रास्तों में से सही रास्ते को चुनने की जद्दोजहद। 

गतिविधि कोना – माथापच्ची
कुछ मज़ेदार सवाल और पहेलियों से भरे दिमागी कसरत के पन्ने।

बच्चों की रचनाओं का कोना – मेरा पन्ना

लेख व कहानी: नीले रंग का पक्षी – अलमता कुरैशी, जुनैद का सपना – जुनैद, मेरी दादी की यादें – रोशन कुमार राम, थंब गर्ल – आध्या सिंह, बड़े मज़े तब आते हैं – अभी पार्की, मेरी मम्मा - काशी पाटीदार, मेरे पापा - आँचल, मेरा रंग भरा कपड़ा – सत्यम उइके
चित्र: मानसी कुमरे, अंकिता कुमारी, सिया, देविका सगुने, जानवी उइके, सचिन सिलावट, वंश, अर्श, वीरा गोरे 

तुम भी जानो
इस बार जानिए:
6 7
चॉकलेट की कमी 

कौआ – हर्षवर्धन कुमार
चित्र: शुभम लखेरा
रोज़मर्रा के एक पल को जीवन्त ढंग से सामने लाती एक छुटकी कविता।