लेख के पहले भाग में हमने जीव वैज्ञानिक शोध में मॉडल जीव सी. एलेगेन्स के योगदान के कुछ पहलू देखे। दूसरे भाग में चर्चा कुछ और पहलुओं पर...
नींद
सी. एलेगेन्स संभवत: सबसे सरल (आदिम) जंतु है जिसमें नींद जैसी अवस्था देखी गई है। यह जंतु हर निर्मोचन (moulting) से पहले एक सुस्त हालत में जाता है। यह भी दर्शाया गया है कि सी. एलेगेन्स शारीरिक तनाव, गर्मी के आघात, पराबैंगनी विकिरण और बैक्टीरिया-जनित टॉक्सिन से संपर्क के बाद भी नींद में चला जाता है।
संवेदनाएं
इस कृमि के पास आंखें तो नहीं होतीं लेकिन यह प्रकाश के प्रति संवेदनशील होता है। इसका कारण एक प्रकाश संवेदी प्रोटीन (LITE-1) की उपस्थिति है और यह प्रकाश संवेदी प्रोटीन जंतुओं में पाए जाने वाले अन्य प्रकाश-संवेदी रंजकों (ऑप्सिन तथा क्रिप्टोक्रोम) की तुलना में 10-100 गुना अधिक कुशलता से प्रकाश अवशोषित करता है।
सी. एलेगेन्स त्वरण को सहन करने में भी असाधारण है – यह 4,00,000 गुरुत्व के सेंट्रीफ्यूज (40,000 घूर्णन प्रति मिनट) में रखकर घुमाने पर भी अप्रभावित रहता है।
सी. एलेगेन्स के बारे में एक दिलचस्प बात यह है कि भ्रूणावस्था के उपरांत कोशिकाओं का प्रवास बहुत कम होता है और जो प्रवास होता है वह पूर्वानुमान के योग्य होता है। परिणाम यह होता है कि विभिन्न अलग-अलग कृमियों में कोई विशिष्ट कोशिका उसी स्थान पर पाई जाएगी और उन्हीं कोशिकाओं के साथ सीधे संपर्क में रहेगी।
यह तंत्रिका तंत्र का एक महत्वपूर्ण लक्षण है। किसी वयस्क उभयलिंगी कृमि में 302 तंत्रिका कोशिकाएं होती हैं और साथ में 56 ग्लियल कोशिकाएं। विभिन्न तकनीकों की मदद से सी. एलेगेन्स के पूरे तंत्रिका तंत्र का मानचित्रण किया जा चुका है। देखा गया है कि शरीर की भित्ति में मोटर (यानी काम को अंजाम देने वाली) तंत्रिकाएं होती हैं। मुंह पर रसायन-संवेदी तंत्रिकाएं पाई जाती हैं। स्पर्श, प्रकाश, तापमान, नमक व अन्य संवेदनाओं के लिए अलग-अलग तंत्रिकाएं होती हैं। सभी संवेदी तंत्रिकाओं का जुड़ाव मोटर तंत्रिकाओं से होता है।
कुल मिलाकर सोचा गया था कि यह कृमि एक चलती-फिरती नलिका भर है जो मात्र बुनियादी क्रियाओं को पूरा करती होगी – भोजन-ग्रहण, अंडे देना और चलना-फिरना। लेकिन आगे अनुसंधान ने कृमि के व्यवहार के कई आयाम उजागर किए। इस संदर्भ में नोबेल विजेता मार्टिन चाफी का काम उल्लेखनीय है। कुछ जंतु एक ग्रीन फ्लोरेसेंट प्रोटीन (GFP) का निर्माण करते हैं जो एक हरी रोशनी उत्सर्जित करता है। इसके निर्माण के लिए ज़िम्मेदार जीन को अन्य जीवों के जीनोम में जोड़ा जा सकता है। अब GFP जैविक प्रक्रियाओं के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण औज़ार बन गया है। मार्टिन चाफी ने सी. एलेगेन्स के जीनोम में इस जीन को जोड़ दिया और इस तरह से वे 6 अलग-अलग कोशिकाओं को रंगीन बनाने में सफल रहे। रंगीन हो जाने के कारण इन कोशिकाओं का निरंतर अध्ययन किया जा सकता था। इसकी मदद से वे तंत्रिका कोशिकाओं के विकास का अध्ययन कर पाए थे। इसके अलावा, उनके अनुसंधान ने GFP के सामान्य उपयोग का मार्ग प्रशस्त किया। आजकल सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र को मानव तंत्रिका रोगों तथा अन्य विकारों के मॉडल के रूप में उपयोग किया जाने लगा है। इसी के साथ सी. एलेगेन्स की ग्लियल कोशिकाओं के कार्य और कार्यिकी का अध्ययन भी इस दृष्टि से किया जा रहा है तथा तंत्रिकाओं और अन्य कोशिकाओं के बीच सम्बंधों की भी पड़ताल जारी है।
सूक्ष्म तथा हस्तक्षेपी आरएनए
सी. एलेगेन्स के जीवन चक्र में चार एकदम अलग-अलग लार्वा अवस्थाएं होती हैं। हर लार्वा अवस्था तथा वयस्क में बनने वाली क्यूटिकल की संरचना अलग-अलग होती है जिसके आधार पर इन्हें पहचाना जा सकता है। कई अलग-अलग ऐसे उत्परिवर्तित कृमि तैयार किए गए हैं जो विकास की इन अवस्थाओं के लिहाज़ से थोड़े अलग-अलग होते हैं। जैसे किसी में कोई विकास अवस्था छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं तो किसी में एक ही अवस्था बार-बार दोहराई जाती है। इनके अध्ययन से कुछ महत्वपूर्ण परिणाम प्राप्त हुए हैं।
उदाहरण के लिए lin-4 नामक जीन में उत्परिवर्तन वाले कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था दोहराई गई जिससे पता चला कि lin-4 द्वारा बनाया गया प्रोटीन प्रथम लार्वा अवस्था से निकलकर द्वितीय लार्वा अवस्था में प्रवेश के लिए ज़रूरी है। दूसरी ओर, lin-14 जीन में उत्परिवर्तन का असर उल्टा हुआ – ऐसे कृमियों में प्रथम लार्वा अवस्था आई ही नहीं, सीधे द्वितीय लार्वा अवस्था आ गई। इससे तो लगता है कि प्रथम लार्वा अवस्था होने के लिए lin-14 द्वारा बनाया जाने वाला प्रोटीन ज़रूरी है। लेकिन... एक बड़ा लेकिन इंतज़ार कर रहा था।
जब इन दोनों जीन्स को क्लोन किया गया तो पता चला कि lin-4 जीन किसी प्रोटीन का कोड करने लायक ही नहीं था। दूसरी ओर lin-14 प्रोटीन का कोड था। दरअसल, lin-4 जीन एक सूक्ष्म आरएनए का कोड पाया गया – शुरू में यह सूक्ष्म आरएनए 70 न्यूक्लियोटाइड लंबा था और अंत में 22 न्यूक्लियोटाइड का रह गया। विश्लेषण से पता चला कि lin-4 द्वारा बनाए गए आरएनए में lin-14 द्वारा बनाए गए मेसेंजर आरएनए के उन हिस्सों के पूरक थे जो अनूदित नहीं किए जाते (यानी ये किसी प्रोटीन का निर्माण नहीं करते)। इस खोज से यह समझ उभरी कि शायद lin-4 एक माइक्रो-आरएनए बनाता है जो lin-14 के प्रतिलेखन को रोक देता है। lin-4 वह पहला जीन था जिसे एक माइक्रो-आरएनए बनाते देखा गया था। आगे चलकर इसी तरह के अन्य माइक्रो-आरएनए पहचाने गए जो किसी जीन के काम को ठप कर देते हैं। मनुष्य के जीनोम में लगभग 1800 ऐसे माइक्रो-आरएनए जीन्स पहचाने जा चुके हैं।
माइक्रो-आरएनए की खोज के साथ आरएनए-हस्तक्षेप (RNAi) को सी. एलेगेन्स में जीन अभिव्यक्ति को रोकने के लिए उपयोग किया गया। वैसे तो RNAi द्वारा जीन की अभिव्यक्ति को रोकने की प्रक्रिया पेटुनिया में देखी गई थी लेकिन इसकी क्रियाविधि को समझकर इसका उपयोग करने की बात सी. एलेगेन्स में ही हुई। एण्ड्र्यू फायर और क्रैग मेलो ने देखा कि सी. एलेगेन्स में डबल-स्ट्रैंडेड आरएनए (डीएसआरएनए) को इंजेक्ट करने से सम्बंधित मैसेंजर आरएनए (एमआरएनए) को नष्ट करके विशिष्ट जीन को शांत किया जा सकता है, जिससे प्रोटीन उत्पादन का दमन हो सकता है। 1998 में की गई इस खोज ने जीन नियमन की हमारी समझ में क्रांतिकारी बदलाव ला दिया और इसके लिए उन्हें 2006 में नोबेल से नवाज़ा गया था।
बीमारियों की तहकीकात
शुरुआत में तो माना गया था कि मानव रोगों के अनुसंधान में इस कृमि की भूमिका सीमित ही है। लेकिन जब यह स्पष्ट हो गया कि मानव जीन्स और जीन्स के विविध संस्करणों को सी. एलेगेन्स के जीनोम में जोड़कर अभिव्यक्त करवाया जा सकता है तो नए आयाम खुल गए। उदाहरण के लिए, kindlin-1 जीन को देखते हैं। सी. एलेगेन्स में इसके समजातीय जीन से जो प्रोटीन बनता है वह इन्टेग्रिन से अंतर्क्रिया करता है। इस खोज के बाद मनुष्यों में इसी प्रकार की रोग प्रक्रिया की खोज की गई। इंटेग्रिन कोशिका संवाद में अहम भूमिका निभाते हैं और इनमें गड़बड़ी कई रोगों का कारण बन सकती है।
इसी प्रकार से मनुष्यों में एक जीन होता है presenilin-1 जिसे अल्ज़ाइमर रोग से जुड़ा माना जाता है। जब इसे सी. एलेगेन्स में अभिव्यक्त करवाया गया तो पता चला कि इसकी वजह से तापमान संवेदी गति में बाधा आई।
हाल ही में शोधकर्ता ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम दिक्कत को समझने के लिए सी. एलेगेन्स में समजातीय जीन्स पहचानने का प्रयास कर रहे हैं। सी. एलेगेन्स के तंत्रिका तंत्र को भलीभांति समझा जा चुका है। इसके अलावा इस कृमि में ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर से जुड़े कई समजातीय जीन्स भी हैं। हालांकि कृमि में ऑटिज़्म संपूर्ण रूप में तो प्रकट नहीं होता लेकिन कई खोजबीन इसकी मदद से संभव हैं। एक तो किसी जेनेटिक उत्परिवर्तन का असर इसकी तंत्रिकाओं के कामकाज और कृमि के व्यवहार पर देखा जा सकता है। इस तरह के अध्ययनों से ऑटिज़्म के मूल में उपस्थित क्रियाविधियों को समझने में मदद मिलती है।
उदाहरण के लिए शोधकर्ताओं ने सायनेप्स (तंत्रिकाओं के बीच जुड़ाव) निर्माण व कामकाज के लिए ज़रूरी जीन्स का अध्ययन करके यह समझने की कोशिश की है कि उनका ऑटिज़्म-सम्बंधी व्यवहार की असामान्यताओं से क्या सम्बंध है। वैसे तो सी. एलेगेन्स एक सरल जीव है लेकिन यह सामाजिक व्यवहार का प्रदर्शन करता है – जैसे भोजन के कारण झुंड बनाना। शोधकर्ता जेनेटिक उत्परिवर्तन और कृमि के इस व्यवहार में परिवर्तन के सम्बंध का अध्ययन करते हैं। चूंकि इस कृमि में ट्रांसजेनेसिस आसान है, इसलिए इस तरह के कई अध्ययन किए जा रहे हैं।
औषधि अनुसंधान
छोटा जीनोम और छोटे जीवन चक्र की वजह से यह बहुकोशिकीय जीव जंतुओं में औषधियों और विषों की तेज़ी से छंटनी करने का उम्दा मॉडल है। सी. एलेगेन्स में मानव रोगों के समजातीय जीन देखे जाते हैं। इसलिए यह वर्तमान में स्वीकृत दवाइयों के नए उपयोग खोजने में मदद कर सकता है।
अंतरिक्ष में उड़ान
सी. एलेगेन्स तब सुर्खियों में आया था जब 2003 में कोलंबिया स्पेस शटल हादसे के बाद भी यह जीवित मिला था। बाद में 2009 में घोषणा हुई थी कि सी. एलेगेन्स अंतर्राष्ट्रीय स्पेस स्टेशन पर दो सप्ताह बिता रहा था। इसे वहां भेजा गया था ताकि शून्य गुरुत्वाकर्षण का असर मांसपेशियों के विकास और अन्य शरीर क्रियाओं पर परखा जा सके। इस अनुसंधान का सम्बंध प्रमुख रूप से अंतरिक्ष उड़ान, बिस्तर पर पड़े रहने, बुढ़ापे और मधुमेह के कारण मांसपेशीय विकारों को समझना था। कोलंबिया शटल के मुसाफिर कृमियों के वंशजों को बाद में एंडेवर यान में भेजा गया था। ऐसे कई अंतरिक्ष प्रयोगों का निष्कर्ष था कि मांसपेशियों और हड्डियों के जुड़ावों को प्रभावित करने वाले जीन्स अंतरिक्ष में कम अभिव्यक्त होते हैं। अलबत्ता, यह पता नहीं चल पाया है कि इसका मांसपेशियों की ताकत पर क्या असर होता है।
जेनेटिक्स
सी. एलेगेन्स के जीनोम में करीब 20,470 ऐसे जीन्स होते हैं जो किसी न किसी प्रोटीन का कोड हैं। इनमें से 35 प्रतिशत जीन्स मानव होमोलॉग्स (समजातीय) हैं। समजातीय जीन विभिन्न प्रजातियों में पाए जाने वाले ऐसे जीन होते हैं जो एक सामान्य पूर्वज जीन से विकसित होते हैं। उनके डीएनए अनुक्रम में काफी हद तक समानता होती है और अक्सर उनके कार्य भी सम्बंधित होते हैं। और यह कई बार दर्शाया जा चुका है कि यदि मानव जीन्स को सी. एलेगेन्स में डाला जाए तो वे अपने समजातीय जीन्स का स्थान ले लेते हैं। इसके विपरीत सी. एलेगेन्स के कई जीन्स स्तनधारी जीन्स के समान कार्य कर सकते हैं।
उपरोक्त चर्चा से स्पष्ट है कि गोल कृमि सी. एलेगेन्स ने जीव विज्ञान की कई गुत्थियों को सुलझाने में मदद की है और पिक्चर अभी बाकी है। लेकिन एक बात पर कुछ कहना मुनासिब है। वह है सी. एलेगेन्स को तमाम जीव वैज्ञानिक प्रक्रियाओं के लिए एक मॉडल बनाने के प्रयास।
सिडनी ब्रेनर से शुरू करके सी. एलेगेन्स पर काम करने वाले शोधकर्ताओं का एक समुदाय विकसित होता गया, जो स्वयं को कृमि-जन (worm-people) कहते हैं। इस समुदाय की एक विशेषता इसका सहयोगी रवैया और खुलापन रहा है। अपनी खोज को एक-दूसरे से साझा करना, नए शोधकर्ताओं को हर तरह से मदद करना (चाहे सामग्री उपलब्ध करवाकर या कामकाज में मदद देकर), समय-समय पर मिलकर विचार-विमर्श करना इस समुदाय के व्यवहार में शुमार रहा है।
1975 से ही यह समूह एक छमाही वर्म ब्रीडर्स गज़ट प्रकाशित करता आ रहा है। सी. एलेगेन्स शोध समुदाय हर दो साल में अंतर्राष्ट्रीय कृमि सम्मेलन आयोजित करता है जहां शोध पत्रों वगैरह के अलावा कृमि सम्बंधी प्रहसन, नृत्य वगैरह प्रस्तुत किए जाते हैं।
एक वर्मबुक प्रकाशित की जाती है जिसमें वर्तमान शोध के विवरण, शोध सम्बंधी सामग्री की उपलब्धता तथा प्रोटोकॉल वगैरह शामिल होते हैं।
अर्थात यह गोलकृमि अनुसंधान की जो संभावनाएं प्रस्तुत करता है, उनको साकार रूप देने में एक कृमि समुदाय की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। (स्रोत फीचर्स)
