एक ऐसा कोशिका एटलस तैयार किया गया है जो चीन के 400 व्यक्तियों की प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज का प्रतिबिंब प्रस्तुत करता है। इस एटलस से पता चला है कि अलग-अलग आबादियों के लोगों में कई जीव वैज्ञानिक अंतर होते हैं।  
साइंस में प्रकाशित इस अध्ययन में खून में उपस्थित प्रतिरक्षा कोशिकाओं का एक मल्टी-ओमिक विवरण दिया गया है। ओमिक शब्द आजकल काफी प्रचलन में है - किसी कोशिका के सारे जीन्स को मिलाकर जीनोम कहते हैं, सारे प्रोटीन्स के समूह को प्रोटियोम और किसी मनुष्य के सारे सूक्ष्मजीवों के समूह को माइक्रोबायोम कहते हैं। यह अध्ययन विभिन्न ओम्स का परिचय देता है। इसे चाइनीज़ मल्टी-ओमिक्स एटलस (CIMA) नाम दिया गया है। इस एटलस में प्रतिरक्षा कोशिकाओं के कामकाज में महत्वपूर्ण विविधता पहचानी गई है जो इसी तरह के युरोपीय और जापानी समूहों में नहीं देखी गई थी। एटलस के रचयिताओं ने कहा है कि यह डैटाबेस अन्य ऐसे ही डैटाबेस का पूरक है जो मूलत: युरोप-केंद्रित हैं।
अलग-अलग अध्ययनों के अंतर्गत विभिन्न कोशिका प्रकारों के लिए मल्टी-ओमिक एटलस तैयार किए गए हैं और इनका उपयोग मस्तिष्क, अल्ज़ाइमर और प्रतिरक्षा तंत्र से जुड़े सवालों को समझने में किया गया है। लेकिन ये एटलस अक्सर युरोपीय मूल के लोगों से प्राप्त डैटा पर निर्भर रहे हैं। इसका मतलब यह हो सकता है कि इनके आधार पर विकसित औषधियां शायद अन्य मूल के लोगों के लिए प्रभावी न साबित हों। इसी खामी को भरने के लिए चीन के शांक्सी मेडिकल युनिवर्सिटी-बीजीआई कोलेबोरेटिव सेंटर फॉर फ्यूचर मेडिसिन के जुआनहुआ यिन और उनके साथियों ने चीन के 428 वयस्कों के खून में उपस्थित एक करोड़ से ज़्यादा कोशिकाओं का मल्टी-ओमिक विश्लेषण किया। 
इस एटलस में प्रत्येक व्यक्ति के जैव-आणविक सूचक पता चलते हैं। इनमें चयापचय उत्पादों की तस्वीर, रक्त के जैव रासायनिक चिंह, क्रोमेटिन एक्सेसिबिलिटी (यानी सक्रिय डीएनए) डैटा और विभिन्न कोशिका आबादियों में जीन्स की अभिव्यक्ति में फर्क नज़र आते हैं।
इससे पहले OneK1K नामक परियोजना के तहत एक डैटाबेस बन चुका था, जिसमें उत्तर युरोपीय मूल के लोगों का विश्लेषण किया गया था। इसके अलावा जापान का ImmuNexUT project नामक डैटाबेस भी मौजूद था। इनसे तुलना करके शोधकर्ताओं ने पाया कि विभिन्न आबादियों में प्रमुख प्रतिरक्षा क्रियामार्ग और कोशिका प्रकार एक जैसे हैं।
इस समानता के बावजूद इन तीन एटलसों के बीच जेनेटिक नियमन और प्रतिरक्षा कोशिकाओं की अवस्थाओं में महत्वपूर्ण अंतर दिखे। जैसे उन्होंने कतिपय जीन्स के निकट उपस्थित विविधताओं पर ध्यान दिया जो इस बात पर असर डालती है कि वह जीन कितना सक्रिय होगा। पाया गया कि CIMA डैटा में 93 प्रतिशत लक्षित जीन्स और जापानी समूह के ऐसे जीन्स में समानता थी लेकिन युरोपीय समूह के साथ यह समानता मात्र 44 प्रतिशत ही देखी गई।
एक उदाहरण के तौर पर rs11886530 जीन के परिवर्तित रूप पूर्वी एशियाई आबादी में तो आम थे मगर युरोपीय आबादी में बिरले थे। यह जीन प्रतिरक्षा कोशिकाओं (टी-कोशिकाओं) की अंदरुनी दैनिक घड़ी को प्रभावित करता है। इससे पहले यह क्रियाविधि प्रतिरक्षा कोशिकाओं में कभी नहीं देखी गई थी।
चीनी परियोजना में जिन लोगों (189 पुरुषों और 239 महिलाओं) का अध्ययन किया गया उनकी उम्र 20 से 77 वर्ष के बीच थी। शोधकर्ताओं ने देखा कि उम्र बढ़ने के साथ व्यक्तियों में श्वेत रक्त कोशिकाओं की संख्या बढ़ती है, जो शोथ (इन्फ्लेमेशन) का कारण बनती है। इसके अलावा, डेंड्राइटिक कोशिकाओं में जीन्स की अभिव्यक्ति बदल जाती है। ये कोशिकाएं प्रतिरक्षा तंत्र में संदेशवाहक का काम करती हैं।
कुल मिलाकर CIMA का यह एटलस चिकित्सा के क्षेत्र में हमारी समझ को बढ़ाएगा और व्यक्ति-आधारित चिकित्सा व औषधि चयन में योगदान देगा। (स्रोत फीचर्स)