प्रदीप गाठास्कर

विद्युत ऊर्जा और चुंबकीय ऊर्जा को जुड़वां भाई ही कहना पड़ेगा क्योंकि दोनों की उत्पत्ति एक ही समय होती है। और वे एक-दूसरे के बिना रह भी नहीं पाते। इसीलिए हमने इन्हें विद्युत-चुंबकत्व नाम दिया है। वैसे इतिहास के हिसाब से देखा जाए तो चुंबकत्व को बड़ा भाई मानना पड़ेगा क्योंकि बिजली की खोज से कई शताब्दी पहले इंसान चुंबक के हैरतअंगेज़ गुणधर्मों से वाकिफ था। विद्युत और चुंबकत्व के बीच इतना करीबी रिश्ता है यह बात तो बीसवीं शताब्दी की शुरुआत में कहीं जाकर समझ में आई।
लोहा और उसके समूह की धातुओं को ही चुंबक आकर्षित करता है। चुंबक के दो टुकड़े किए जाएं तो दो छोटे चुंबक बन जाते हैं, दो चुंबक एकदूसरे को कभी आकर्षित करते हैं तो कभी एक-दूसरे को विकर्षित करते हैं, इंसान ने इन सब बातों का पता किस तरह लगाया, जैसे कुछ सवालों पर चर्चा करने का प्रयास इस लेख में करेंगे।

चुंबकत्व का कारण 
चुंबकीय पदार्थों में चुंबकत्व होने का रहस्य उस पदार्थ की परमाण्विक संरचना में निहित होता है। किसी भी मूलभूत पदार्थ का परमाणु ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉन, धन आवेशित प्रोटॉन और उदासीन न्यूट्रॉन कणों से मिलकर बना होता है। इनमें से प्रोटॉन और न्यूट्रॉन तो परमाणु के केन्द्र में साथ-साथ रहते हैं, वहीं इलेक्ट्रॉन केन्द्र के चारों ओर अलग-अलग कक्षाओं में चक्कर लगाते रहते हैं। परमाणु में कितने प्रोटॉन, न्यूट्रॉन और इलेक्ट्रॉन हैं उसके आधार पर उस पदार्थ के गुणधर्म तय होते हैं। उदाहरण के लिए धातु विद्युत की सुचालक होती है तो अधातु विद्युत की कुचालक पदार्थ का रंग, स्वाद, गंध, रासायनिक गुणधर्म ये सभी परमाणु में इलेक्ट्रॉन की संख्या पर निर्भर करते हैं।
चुंबक का विद्युत आवेश से कोई संबंध जरूर होना चाहिए इसका पहली बार 1820 में पता चला। इस बात का पता हेन्स ऑरस्टेड ने लगाया। उन्होंने देखा कि जब कभी किसी विद्युत सुचालक में से बिजली बहती है तो उसके पास रखे दिक्सूचक की सुई अपनी स्थिति में तुरंत बदलाव दिखाती है, मानो विद्युत प्रवाह खुद भी चुंबक बनाता हो। देखा जाए तो बिजली का बहना यानी हज़ारों इलेक्ट्रॉनों का प्रवाह है। ऑरस्टेड ने बताया कि विद्युत प्रवाह से चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण होता है। ऑरस्टेड के प्रयोग के आधार पर ब्रिटिश वैज्ञानिक माइकल फैराड़े ने कुछ और निष्कर्ष निकाले। फैराडे ने अपने प्रयोगों के बाद यह साफतौर पर सिद्ध किया कि विद्युत प्रवाह से चुंबकीय क्षेत्र बनता है तथा चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव करके विद्युत धारा उत्पन्न की जा सकती है। यानी बिजली और चुंबक को जुड़वां भाई कहा जा सकता है।

परमाणु की संरचना और विद्युत प्रवाह से चुंबकत्व - इन दो तथ्यों से अब हम चुंबक के रहस्य को समझ सकेंगे। परमाणु की विविध कक्षाओं में इलेक्ट्रॉन निरंतर घूमते रहते हैं। साथ ही प्रत्येक इलेक्ट्रॉन लगातार अपनी धुरी पर तेजी से घूमता रहता है। विद्युत आवेशित इलेक्ट्रॉन की इन गतियों की वजह से परमाणु के केन्द्र में एक छोटा चुंबकीय क्षेत्र निर्मित होता है।
यहां इस महत्वपूर्ण तथ्य को भी जेहन में रखना ज़रूरी होगा कि इलेक्ट्रॉन के नाभिक के इर्द-गिर्द घूमने से पैदा होने वाला चुंबकत्व काफी कमज़ोर होता है, बनिस्बत अपनी धुरी
 
परमाणु संरचना और चुंबकत्व: कुछ पदार्थों में ही चुंबकत्व क्यों होता है इस सवाल की छानबीन करते हुए वैज्ञानिकों का ध्यान पदार्थों की परमाणु संरचना की ओर गया। परमाणु के नाभिक में धन आवेशित प्रोटॉन और उदासीन न्यूट्रॉन होते हैं जबकि ऋण आवेशित इलेक्ट्रॉन नाभिक के चारों ओर चक्कर लगाते हैं। 'अ' परमाणुओं की संरचना का इस सदी की शुरुआत में प्रचलित मॉडल। 'ब' बाद में समझ बनी कि इलेक्ट्रॉन एक ग्रह के रूप में न घूमते हुए नाभिक के इर्दगिर्द एक बादल के रूप में मौजूद होता है जो नाभिक के चारों ओर घूमने के साथ साथ अपनी धुरी पर भी घूम रहा होता है।
के इर्द-गिर्द धूमने से पैदा होने वाले चुंबकत्व के। यानी कि लोहा, निकल जैसे पदार्थ जिन्हें हम लौह चुंबकीय पदार्थ कहते हैं उनका चुंबकत्व इलेक्ट्रॉनों की इस दूसरी गति की वजह से होता है।
अगर ऐसा है तो फिर सब पदार्थ प्रबल चुंबकत्व प्रदर्शित क्यों नहीं करते? इसका कारण है कि ज्यादातर तत्वों के परमाणुओं में इलेक्ट्रॉनों की जमाबट ही ऐसी होती है कि इलेक्ट्रॉनों की इन गतियों का परिणामी चुंबकीय प्रभाव शून्य होता है।
जैसे उदाहरण के लिए एक ही कक्षा में स्थित दो इलेक्ट्रॉन यदि अपनी धुरियों पर एक-दूसरे की विपरीत दिशा में घूम रहे हों तो उनके विद्युत आवेश का कुल प्रभाव शून्य होगा। ऐसे परमाणुओं में चुंबकत्व नहीं होता।
इसलिए लोहा या इसके जैसे कुछ तत्वों में ही प्रबल चुंबकत्व पाया जाता है। इसी तरह कुछ तत्व जो चुंबकीय नहीं होते, लेकिन उनके किसी अन्य पदार्थ के साथ इलेक्ट्रॉन के लेन-देन से, या इलेक्ट्रॉनों की भागीदारी करके बनने वाले यौगिक चुंबकीय हो सकते हैं। जिस तरह इलेक्ट्रॉन के प्रवाह की वजह से चुंबकीय क्षेत्र निर्मित होता
* यहां केवल फेरोमेग्नेटिज्म यानी लौह चुंबकत्व के संदर्भ में यह कहा गया है।
 
प्रत्येक लोहे के परमाणु का चुंबकत्व इतना शक्तिशाली होता है कि आस-पास के परमाणुओं में अंतःक्रिया से उस क्षेत्र के समस्त परमाणुओं का चुंबकीय अक्ष एक ही दिशा में कतारबद्ध हो। जाता है। ऐसे एक ही चुंबकीय दिशा में पंक्तिबद्ध परमाणुओं के क्षेत्र को चुंबकीय डोमेन कहते हैं।  प्रत्येक डोमेन पूर्णतः चुबकित होता है और लाखों परमाणुओं से बना होता है। लोहे के एक कण में ऐसे कई सारे डोमेन हो सकते हैं।
अ. लोहे का प्रत्येक टुकड़ा चुंबकीय गुण प्रदर्शित नहीं करता क्योंकि उस टुकड़े में मौजूद सब डोमेन का चुंबकीय अक्ष एक ही दिशा में नहीं होता, प्रत्येक डोमेन स्वतंत्र रूप से किसी भी तरफ इंगित हो सकता है। चित्र में तीर डोमेन दर्शा रहे हैं, उनका आगे का सिरा उत्तर ध्रुव और पीछे का हिस्सा दक्षिण ध्रुब।
ब. थोड़ा-सा चुंबकित लोहे का टुकड़ा। लोहे के टुकड़े के पास चुंबक लाने पर ऐसी स्थिति बन सकती है। अगर पास में रखा गया चुंबक शक्तिशाली हो तो उसे हटाने के बाद भी लोहे के टुकड़े में कमजोर चुंबकत्व बना रहेगा।
स. लोहे का टुकड़ा एक अत्यन्त शक्तिशाली चुंबक बन गया है जिसमें सब डोमेन एक ही दिशा में श्रेणीबद्ध हो गए हैं, जिससे लोहे के टुकड़े के किनारों पर बलशाली उत्तर और दक्षिण ध्रुव बन जाएंगे।
द.  इस शक्तिशाली चुंबक के अगर दो टुकड़े कर दिए जाएं तो वे दोनों टुकड़ो भी प्रबल चुंबक बने रहेंगे।
 
है, उसी तरह चुंबकीय क्षेत्र की वजह से इलेक्ट्रॉन की परिस्थितियों में भी बदलाव आते हैं। इसकी वजह से ऐसे कई परमाणु जो मूलतः चुंबकीय नहीं हैं उन्हें चुंबकीय क्षेत्र में रखने पर उनके इलेक्ट्रॉन की गतियां बदल जाती हैं। लेकिन इन बदलावों का मिलाजुला परिणाम शून्य ही रहेगा ऐसा ज़रूरी नहीं है। और इस वजह से चुंबकीय क्षेत्र में कुछ अचुंबकीय परमाणु चुंबकीय बन जाते हैं। हां, यह सही है कि ऐसा चुंबकत्व काफी कम तीव्रता का, यानी कमजोर होता है।
जिस तरह बूंदी के लड्डू का हर दाना बूंदी होता है, उसी तरह चुंबक का हर परमाणु खुद एक चुंबक होता है। जिस तरह पक्का मकान बनाने के लिए कई मज़बूत ईंटों की ज़रूरत होती है, उसी तरह तीव्रता वाले चुंबक कुछ खास चुंबकीय परमाणुओं से बने होते हैं। इस प्रकार के परमाणु यदि पदार्थ में मौजूद हों (जैसे लोहा, स्टील आदि) तब भी इनसे चुंबक बन ही जाए यह ज़रूरी नहीं है। उदाहरण के लिए लोहे के परमाणु सूक्ष्मरूप में चुंबक होने के बावजूद उनके चुंबकीय अक्ष विभिन्न दिशाओं में बिखरे होते हैं और इस वजह से उनका कुल जमा चुंबकीय बल सामान्यतः लगभग शून्य होता है। दरअसल जैसा कि सामने वाले चित्र में दर्शाया गया है, लोहे व अन्य चुंबकीय पदार्थों में चुंबकीय अक्षों के कतारबद्ध होने की घटना लाखों परमाणुओं के क्षेत्र के स्तर पर होती है, जिन्हें डोमेन कहा जाता है।
यदि ऐसा कुछ किया जा सके ताकि ये परमाणु एक ही दिशा में अनुशासित हो जाएं तो चुंबकीय क्षेत्र की सम्मिलित ताकत को हम देख सकते हैं। जैसे कक्षा में 'सर' आने पर सारे बच्चे चुपचाप ब्लैक-बोर्ड की तरफ मुंह करके बैठ जाते हैं, उसी तरह हरेक परमाणु का चुंबकीय क्षेत्र एक - दूसरे के साथ मिलकर एक शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र बनाता है, जिस वजह से एक ओर उत्तरी ध्रुव और दूसरी ओर दक्षिणी ध्रुव बनता है। हरेक परमाणु एक छोटा चुंबक होने के बावजूद किसी पदार्थ के करोड़ों परमाणु एक साथ होने पर उनसे बेहद प्रबल चुंबक बनता है। लेकिन जिन तत्वों के परमाणुओं में चुंबकत्व नहीं होता - उदाहरण के लिए गंधक, कार्बन - उनके परमाणुओं की कितने भी अनुशासित तरीके से जमावट की जाए फिर भी उनसे चुंबक नहीं बनाया जा सकता। इसीलिए लकड़ी पर चुंबक का कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

लेकिन यह सवाल उठ सकता है। कि आखिरकार लौह-पदार्थ में बिखरे हुए परमाणुओं की अनुशासित तरीके से जमावट करता कौन है? कुदरती तौर पर मिलने वाले चुंबकीय पत्थर (लोड स्टोन) कैसे बनते हैं? संभव है कि चुंबकीय पत्थर, आकाश से जमीन पर गिरने वाली बिजली की वजह से बनते हों। आमतौर पर बरसात के दिनों में बादलों पर इकट्ठा हुआ विद्युतीय आवेश धरती पर तेज़ कौंध के साथ आता है। बिजली जहां पर गिरती है यदि वहां लौह-अयस्क बिखरा हो तो बिजली द्वारा निर्मित प्रबल चुंबकीय क्षेत्र अयस्क के टुकड़ों में परमाणुओं को एक ही दिशा में जमाना संभव  बना सकता है, ऑरस्टेड द्वारा किए गए प्रयोग की तरह। लेकिन आसमान से गिरने वाली बिजली में तो कई गुना ज्यादा आवेश होता है जिसकी वजह से लौह अयस्क चुंबक में तब्दील हो सकता है।

चुंबक और विद्युत
सन् 1821 तक विद्युत और चुंबकत्व ये दोनों जुड़वां भाई हैं इस बात का पता तक नहीं था। सिर्फ कुदरत में पाए जाने वाले चुंबक और किसी लोहे के टुकड़े से बनने वाले चुंबक के बारे में उस समय तक जानकारी थी। चुंबक और बिजली के नए रिश्ते की जानकारी डेनमार्क के हैन्स क्रिश्चियन ऑरस्टेड को मिली। 1821 में ऑरस्टेड अपने दोस्त को दिखा रहा था कि सुचालक तारों में से बिजली किस तरह बहती है। उस समय प्रयोगशाला का दिक्सूचक ऑरस्टेड के उपकरण के पास रखा हुआ था। जब भी तारों में बिजली प्रवाहित होती या प्रवाह को बंद किया जाता तो दिक्सूचक एक पल भर के लिए अपनी दिशा बदलता था।
 
हालांकि दिक्सूचक तारों से कुछ दूरी पर था इसलिए तारों की बिजली और दिक्सूचक में पक्के तौर पर क्या हो रहा है यह बता पाना कठिन था। अगर एक चुंबकीय क्षेत्र दिक्सूचक को विचलित कर सकता है, तब तारों से बहने वाली बिजली और चुंबकीय क्षेत्र का कुछ रिश्ता ज़रूर है - ऐसा ऑरस्टेड का पक्का विश्वास था। बिजली के बहाब में जब-जब बदलाब किया जाता है तब चुंबकीय क्षेत्र निर्मित होता है ऐसा विचार ऑरेस्टेड ने प्रस्तुत किया। ऑरस्टेड के इस विचार की वजह से इन दोनों भाइयों का पुनर्मिलन हो सका।

ऑरस्टेड ने जो प्रयोग किया उसे आप भी आसानी से करके देख सकते हैं। ऑरस्टेड के प्रयोग पर फ्रेंच वैज्ञानिक आंद्रे एम्पियर ने काफी सोच-विचार किया और चुंबक और विद्युत के आपसी रिश्ते को एक गणितीय सूत्र के रूप में दिखाया। इसके बाद ही चुंबक की एक नई किस्म विद्युत-चुंबकत्व समझ में आ सका। यानी चुंबक, बिजली के बहाब से भी बनाया जा सकता है यह समझ में आया। उदाहरण के लिए अपने घरों में इस्तेमाल होने वाली 'डोर बेल' के हथौड़े की टन-टन बिजली की वजह से बनने वाले विद्युत-चुंबक से ही संभव हो पाती है।
एम्पियर ने अपने प्रयोग को आगे बढ़ाकर दिखाया कि तारों में से बहने वाली विद्युत धारा यदि चुंबकीय क्षेत्र का निर्माण कर रही है तो ऐसे दो तारों के बीच आकर्षण या विकर्षण निर्मित होता है। यदि दो तारों में विपरीत दिशा में विद्युत धारा बह रही हो तो इन तारों के बीच चुंबकीय आकर्षण पैदा होता है। लेकिन यदि दो तारों में एक ही दिशा में विद्युत धारा प्रवाहित हो रही हो, तो तारों के बीच निर्मित चुंबकीय क्षेत्र तारों को विकर्षित करेगा। एम्पियर के इन प्रयोगों से विद्युत धारा का बहाव चुंबकीय क्षेत्र निर्मित करता है, यह साबित हो गया। आज एम्पियर का यह नियम विद्युत चुंबकत्व के चार प्रमुख सिद्धांतों में से एक है।

बदलता हुआ चुंबकीय क्षेत्र, विद्युत चालकों में विद्युत धारा प्रवाहित करता है, यह माइकल फैराडे ने साबित करके दिखाया। इस सिद्धांत का इस्तेमाल बिजली पैदा करने के लिए जनरेटरों में किया जाता है। फैराडे का यह नियम, एम्पियर द्वारा प्रतिपादित सिद्धांत का प्रतिबिम्ब था। विद्युत चुंबकत्व के नियमों में दूसरा नियम 'फैराडे का सिद्धांत' कहलाता है। इस तरह एम्पियर एवं फैराडे ने विद्युत व चुंबकत्व में परस्पर संबंध स्पष्ट किया।
इससे भी आगे जाकर जेम्स क्लार्क मैक्सवेल ने विद्युत चुंबकीय तरंगें किस तरह बनती हैं और इनका बहाव किस तरह होता है, इसका गणितीय सूत्र प्रस्तुत किया। मेक्सवेल ने विद्युत चुंबकत्व के सिद्धांतों की गणितीय व्याख्याएं प्रस्तुत की और विद्युत चुंबकत्व के चार नियमों को चार समीकरणों द्वारा दिखाया। मेक्सवेल द्वारा दर्शाए समीकरणों के कारण विद्युत, चुंबक और विद्युत चुंबकत्व के सभी गुणधर्म सहजता से समझ में आ सके। इसलिए विद्युत-चुंबकत्व के चार आधारभूत समीकरणों को 'मेक्सवेल समीकरण' कहा गया।
घरों में और हमारे इर्द-गिर्द मौजूद काफी सारी चीजें विद्युत चुंबकत्व पर निर्भर हैं, तो इन दो जुड़वां भाइयों से हमारी रोज़ मुलाकात होती ही रहेगी।

शिक्षकों के लिए चुंबक अध्याय पढ़ाने के लिए मार्गदर्शिका

विद्यार्थी क्या सीखेंगेः
1. कुछ चुनिंदा चीजें ही चुंबक की ओर आकर्षित होती हैं।
2. ऐसी सभी चीजों में लोहा होता है।
3. चुंबकत्व, पदार्थ की अणु-परमाणु की संरचना से निर्मित होता है।

आवश्यक सामानः
1. विविध चीजें जिनमें लोहे से बनी चीजें हों और ऐसी चीजें भी जिनमें लोहा न हो। जैसे चम्मच, कान की बाली, चॉक, डस्टर, दवाई की गोलियां, पिन, जंग लगा सामान आदि।
2. एक सामान्य चुंबक।

पहला पीरियडः
विद्यार्थियों को चुंबक के बारे में क्या पता है, उन्होंने पहले कभी चुंबक देखा है या इस्तेमाल किया है क्या, इस बारे में जानकारी लीजिए। इस पीरियड में छात्रों को अपने अनुभव सुनाने दीजिए। पीरियड के अंतिम हिस्से में विविध पदार्थों पर चुंबक का क्या असर होता है यह पूरी कक्षा को दिखाइए।

पीरियड़ दोः
कक्षा के सभी बच्चों की 5-5 की या 10-10 की टोलियां बनवाइए। हरेक टोली को ऊपर बताया सामान मिल गया है यह ज़रूर पक्का कर लें। इन टोलियों को आपके द्वारा दिखाए गए प्रयोग करने हैं। लेकिन इससे पहले कौन-सी चीजें चुंबक द्वारा आकर्षित होंगी और कौन-सी नहीं, इसके बारे में विद्यार्थियों को आपस में चर्चा करने दीजिए।
इसके बाद टोली के हरेक बच्चे को, दिए गए हरेक सामान की चुंबक से जांच करनी है; और अपनी कॉपी में लिखते जाना है कि कौन-सी चीजें चुंबक से आकर्षित होती हैं और कौन-सी नहीं? साथ ही छात्रों को यह भी लिखते जाना है कि उनके पूर्वानुमान के हिसाब से चुंबकीय लगने वाली चीज़ों में से कौन-कौन सी चुंबकीय निकली या चुंबकीय नहीं निकली। कुछ चीजें चुंबक की ओर आकर्षित क्यों होती हैं? ऐसी चीजों में क्या समानता है, उनके कौन-से गुण महत्वपूर्ण लगते हैं, इस बारे में विद्यार्थियों से चर्चा कीजिए।

पीरियड तीनः
चुंबक और लौह सामग्री का इस्तेमाल करते हुए हरेक टोली को इस लेख में सुझाए प्रयोग और अन्य प्रयोग करने के लिए पर्याप्त समय दीजिए। लेकिन बच्चों को बाद में यह भी बताना है कि उन्हें चुंबकों की कौन-कौन-सी खासियतें पता चलीं। हरेक टोली अपनी-अपनी खोज कक्षा में प्रस्तुत करे।
चुंबकीय क्षेत्र और उसका विद्यार्थियों द्वारा खोजी गई खासियतों से किस तरह सह-संबंध बैठ पाता है इस बारे में चर्चा कीजिए। इसके लिए कुछ सरल डायाग्राम, परमाणु संरचना आदि का भी उपयोग किया जा सकता है। विद्यार्थियों की आयु को ध्यान में रखकर स्पष्टीकरण को संक्षिप्त या विस्तृत किया जा सकता है।

चर्चाः
1. धरती का चुंबकीय क्षेत्र कुछ हज़ार सालों में पलट जाता है यानी उत्तरी धुप, की जगह दक्षिणी ध्रुव आ जाता है। ऐसा यदि निकट भविष्य में हुआ तो उसके क्या परिणाम निकलेंगे? भूवैज्ञानिकों को ध्रुवों के पलटने की जानकारी किस तरह मिली?
2. चुंबकीय और विद्युतीय क्षेत्रों के एकत्रीकरण से क्या-क्या लाभ मिले? विद्युत-चुंबकत्व का इंसान ने क्या इस्तेमाल किया, विज्ञान में अलग-अलग विषयों को साथ-साथ, एक जगह लाने से क्या लाभ मिलते हैं?
3. पक्षी -जीवाणु अपने लंबे सफर के दौरान पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र का इस्तेमाल करते हैं इस तथ्य की खोज की जा चुकी है। इस जानकारी से आगे चलकर इंसान किस तरह के फायदे ले सकेगा।
4. माइकल फैराडे की खोज से चुंबकीय क्षेत्र से बिजली को बनाया जा सका और जनरेटर की खोज हो सकी। आज हमारी जिंदगी में इस एक खोज से कितनी तब्दीली आ गई है। अपने पास-पड़ोस में, घर में पूछताछ करके देखो कि क्या लोग माइकेल फैराडे और उसकी खोज के बारे में जानते हैं? क्या तुम उन लोगों को इस बारे में कुछ बता सकोगे?

* इन प्रश्नों में दिए गए चुंबकत्व के कुछ पहलुओं और अन्य जानकारी के लिए संदर्भ के अंक 14, 16, 29 और 30 में दिए गए लेखों को देखिए।


प्रदीप गोठोत्कर: स्कूली बच्चों को विज्ञान पढ़ाने का शौक। साथ ही विज्ञान लेखन में रुचि। यह लेख मराठी संदर्भ अंक-10, अप्रैल-मई, 2001 में दिए गए लेख को संपादित रूप है।
मराठी से अनुवादः माधव केलकर।