प्लास्टिक कचरा खत्म नहीं होता। बल्कि यह धीरे-धीरे बहुत छोटे-छोटे टुकड़ों में टूटता जाता है, जिन्हें नैनोप्लास्टिक कहते हैं। ये कण नदियों, समुद्रों, यहां तक कि मानव शरीर में भी मिल रहे हैं, जो कैंसरकारी भी हो सकते हैं। ये इतने सूक्ष्म होते हैं कि इन्हें हटाना बहुत मुश्किल काम रहा है। लेकिन अब एक नया चुंबक-चालित नैनोरोबोट तैयार किया गया है जो इस समस्या से निपटने में मदद कर सकता है। 
एनवायरनमेंट साइंस में प्रकाशित शोध के अनुसार ये छोटे-छोटे रोबोट पानी में खुद घूम-घूमकर नैनोप्लास्टिक कणों को ढूंढते और पकड़ते हैं। पहले की तकनीक में रोबोट स्थिर रहते थे और बहते हुए कण सतह से टकराकर चिपक जाते थे।
नैनोरोबोट लोहे से बने खास पदार्थों से तैयार किए गए हैं, जिनमें बहुत सारे छोटे-छोटे छेद हैं। इन छेदों की वजह से इनकी सतह का क्षेत्रफल बढ़ गया है, जिससे ज़्यादा कण चिपक सकते हैं। एक खास गर्म करने की प्रक्रिया के बाद ये पदार्थ चुंबकीय बन जाते हैं। इससे इन रोबोट्स को बाहर से चुंबक की मदद से आसानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
कणों को पकड़ने का तरीका स्थिर विद्युत आवेश पर आधारित है, ठीक वैसे जैसे गुब्बारा बालों से चिपकता है। नैनोप्लास्टिक में हल्का आवेश होता है और रोबोट उन्हें अपनी ओर खींच लेते हैं।
प्रयोगशाला परीक्षण में अच्छे नतीजे मिले हैं। घूमते रोबोट सिर्फ एक घंटे में लगभग 78 प्रतिशत नैनोप्लास्टिक पानी से हटा पाए, जो कि स्थिर रोबोट की तुलना में अधिक था। रोबोट्स पर कण इकट्ठा होने पर वैज्ञानिकों ने एक साधारण चुंबक की मदद से रोबोट्स को पानी से बाहर निकाल लिया और साफ पानी अलग कर लिया।
लेकिन यह तकनीक अभी शुरुआती दौर में है। समुद्र या भूजल जैसे जटिल स्रोतों में इसकी क्षमता कम हो जाती है, क्योंकि उनमें घुले लवण विद्युत आकर्षण को कमज़ोर कर देते हैं। ऐसी स्थिति में इनकी सफाई करने की क्षमता एकदम से घट जाती है। इसके अलावा, ये रोबोट बहुत धीरे चलते हैं, इसलिए बड़े जल स्रोतों को साफ करना मुश्किल है। समय के साथ इनके छेद भी बंद हो जाते हैं, जिससे बार-बार इस्तेमाल करने पर इनकी क्षमता और कम हो जाती है। हालांकि यह तकनीक पानी साफ करने वाले प्लांट्स जैसी नियंत्रित जगहों पर काम आ सकती है।
वैसे भविष्य में नैनोरोबोट या ऐसे अन्य उपाय प्लास्टिक प्रदूषण से लड़ने का नया तरीका तो दे देंगे, लेकिन एक सवाल सदैव सिर उठाए खड़ा रहेगा कि पानी से हटाने के बाद इन नैनोप्लास्टिक का क्या होगा? यदि ये ऐसे ही पर्यावरण में कहीं अन्यत्र फेंक दिए जाएंगे, तो ये ‘यहां’ से निकलकर ‘वहां’ मुश्किलें बढ़ाएंगे। साथ ही, ऐसे समाधानों का टिकाऊ और समतामूलक भविष्य कम दिखता है। संभव है ये रोबोट्स बाज़ार में आएं और धनवानों के घर की पानी की टंकियों में फिट हो जाएं, जैसे एयर प्यूरीफायर फिट होते जा रहे हैं। जो इन उपायों को वहन नहीं कर सकते वे प्रदूषण से दामन छुड़ा नहीं पाएंगे। यदि वास्तव में प्लास्टिक या अन्य प्रदूषण पर नियंत्रण पाना है, तो प्लास्टिक उपयोग सीमित करना होगा। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - July 2026
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