आंकड़ों से पता चलता है कि स्तनधारियों की ही 2000 से अधिक (वन्य) प्रजातियों का कानूनी और गैर-कानूनी दोनों तरीकों से व्यापार किया जाता है। ज़ाहिर है इस व्यापार से वन्यजीवों का मनुष्य से संपर्क बढ़ा है। अब, एक हालिया अध्ययन में पता चला है कि वर्तमान में व्यापार किए जा रहे वन्य स्तनधारी जीवों में से लगभग आधे ऐसे हैं जिनमें कम से कम एक ऐसा रोगजनक है जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकता है। यानी वन्यजीवों का व्यापार हमारी सेहत के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। यह पहली बार है जब बड़े स्तर पर यह समझने की कोशिश की गई है कि वन्य जीव व्यापार और तस्करी बीमारियों के फैलाव से कितने जुड़े हैं।  
यह तो हम जानते हैं कि एचआईवी, इबोला और कोविड-19 जैसी कई बीमारियां जीवों से मनुष्यों में आई हैं। लेकिन अब तक यह ठीक-ठीक नहीं पता था कि यह खतरा कितना बड़ा है। इस अध्ययन में पुराने व्यापार रिकॉर्ड और जीवों से फैलने वाली बीमारियों के डैटा को मिलाकर यह समझने की कोशिश की गई कि किन जीवों के व्यापार से बीमारियों के फैलने की संभावना ज़्यादा होती है।
अध्ययन स्तनधारी जीवों पर केंद्रित रखा गया क्योंकि इनका उपयोग भोजन, फर, अनुसंधान और पारंपरिक दवाओं में ज़्यादा होता है, और ये जैविक रूप से मनुष्यों से करीब हैं। शोध में पाया गया कि व्यापार की जाने वाली 2000 से अधिक प्रजातियों में से लगभग 41 प्रतिशत में ऐसे रोगजनक होते हैं जो मनुष्यों को संक्रमित कर सकते हैं। जबकि जिन प्रजातियों का व्यापार नहीं होता, उनसे खतरा सिर्फ 6.4 प्रतिशत के करीब है।
अध्ययन में वन्यजीव व्यापार के तरीकों को भी बहुत महत्वपूर्ण पाया गया है। जीवित जीवों का व्यापार सबसे अधिक जोखिम भरा होता है, क्योंकि इससे मनुष्यों का सीधा संपर्क संक्रमित जीवों से होता है। दिलचस्प बात यह है कि गैर-कानूनी व्यापार का असर उतना ज़्यादा नहीं पाया गया जितना पहले सोचा जाता था। इसका मतलब है कि कानूनी और नियंत्रित व्यापार भी बीमारियों के फैलाव में योगदान दे सकता है।
अध्ययन की एक और महत्वपूर्ण बात यह पता चली है कि जितने लंबे समय तक किसी प्रजाति का व्यापार होता रहता है, उतना ही उससे जुड़ा खतरा बढ़ता जाता है। यानी मनुष्यों और वन्य जीवों के बीच लगातार लंबे संपर्क से रोगजनकों को फैलने और इंसानों के अनुकूल बनने का ज़्यादा मौका मिलता है।
वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि इस शोध से सरकारें बेहतर नियम बना पाएंगी ताकि भविष्य में महामारी के खतरों को कम किया जा सके। अगर अधिक जोखिम वाली प्रजातियों और व्यापार के तरीकों की पहचान हो जाए, तो खतरनाक संपर्क को सीमित किया जा सकता है।
फिर भी सावधानी में ही सुरक्षा है। यह सोचना भी उतना आवश्यक है कि किन जीवों से हमें जीवनदायिनी या निहायत ज़रूरी चीज़ें हासिल हो रही हैं, और कितना व्यापार महज़ शौकिया चीज़ों के लिए हो रहा है। (स्रोत फीचर्स)