हाल ही में सांता मार्टा में आयोजित एक अंतर्राष्ट्रीय बैठक में 50 से अधिक देश शामिल हुए। यह एक अलग तरह का जलवायु सम्मेलन था, जिसमें फैसलों में वैज्ञानिकों को ज़्यादा महत्व दिया गया, न कि सिर्फ राजनीति को। Transitioning Away from Fossil Fuels नाम का यह सम्मेलन इस ओर इशारा करता है कि कुछ देश अब प्रदूषण कम करने के नए तरीके अपनाना चाहते हैं।
आम तौर पर COP30 जैसी बैठकों में वैज्ञानिकों की बात राजनीतिक चर्चाओं के बीच कमज़ोर पड़ जाती है। लेकिन इस बैठक में वैज्ञानिकों को सीधे निर्णय लेने वालों से जोड़ने की कोशिश की गई है। इसी दौरान एक समूह बनाया गया, जो सरकारों को स्वतंत्र और वैज्ञानिक स्तर पर सलाह देगा, ताकि वे जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम कर सकें।
पूर्व में आयोजित वैश्विक बैठकों में कई तेल उत्पादक देशों ने जीवाश्म ईंधन को कम करने के स्पष्ट कदमों का विरोध किया, जिससे निराशा बढ़ी। इसी वजह से कोलंबिया और नीदरलैंड जैसे देशों ने एक अलग बैठक आयोजित की, जिसमें सिर्फ उन्हीं देशों को बुलाया गया जो बदलाव के लिए तैयार थे।
इस बैठक में वैज्ञानिकों ने स्पष्ट और काम करने लायक सुझाव दिए। यह रिपोर्ट लंबी-चौड़ी बातों की बजाय सीधे लागू होने वाली नीतियों पर केंद्रित थी। इसमें मुख्य सुझाव थे - नए फॉसिल फ्यूल प्रोजेक्ट्स पर रोक लगाना, इन पर मिलने वाली सब्सिडी को धीरे-धीरे खत्म करना, और सौर व पवन जैसी स्वच्छ ऊर्जा में निवेश बढ़ाना।
इस प्रक्रिया में शामिल वैज्ञानिकों ने इस सम्मेलन को एक खास मौका बताया, जहां वे सीधे उन नीति-निर्माताओं से बात कर सके जो वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर फैसले लेना चाहते हैं। उनका मानना है कि इस तरीके से ज़्यादा साफ और असरदार नीतियां बन सकती हैं, क्योंकि इसमें वे समझौते कम होते हैं जो अक्सर अंतर्राष्ट्रीय संधियों को कमज़ोर कर देते हैं।
इस सम्मेलन की अहमियत सिर्फ इसके सुझावों में ही नहीं, बल्कि इसके तरीके में भी है। इसमें विज्ञान को प्राथमिकता दी गई, जो ऐसे समय में ज़रूरी है जब दुनिया में प्रदूषण अभी भी काफी अधिक है। भले ही इसमें कम देश शामिल हुए, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इसका असर आगे चलकर बड़े पैमाने पर दिख सकता है।
इस बैठक से यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए सिर्फ राजनीतिक इच्छाशक्ति ही नहीं, बल्कि मज़बूत वैज्ञानिक समझ भी ज़रूरी है। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - July 2026
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