घोड़े के हिनहिनाने की शुरुआत होती है एक तीक्ष्ण चिंघाड़ से और फिर उसमें एक मोटी आवाज़ शामिल हो जाती है। और अजीब बात यह है कि ये दो आवाज़ें सिर्फ मोटे-पतलेपन की वजह से अलग-अलग नहीं होती। करंट बायोलॉजी में शोधकर्ताओं ने बताया है कि ये दो ध्वनियां अलग-अलग तरह से पैदा होती हैं। मोटी ध्वनि तब उत्पन्न होती है जब घोड़ा अपने वोकल फोल्ड्स (स्वर रज्जु) को कंपित करता है (जैसे हम मनुष्य करते हैं)। पतली आवाज़ पैदा करने के लिए घोड़ा सीटी बजाने की क्रिया करता है। ये निष्कर्ष कोपेनहेगन विश्वविद्यालय के एलोडी ब्रीफर और उनकी घोड़ा विशेषज्ञ बहन सैब्रिना ब्रीफर फ्रेमंड के अध्ययन से प्राप्त हुए हैं। 
आम तौर पर स्तनधारी आवाज़ पैदा करने के लिए सांस छोड़ते हैं और यह हवा उनके गले में उपस्थित स्वर रज्जुओं को कंपित करती है, जिसके परिणामस्वरूप आवाज़ पैदा होती है। प्राय: अधिक वज़नी जानवरों की आवाज़ मोटी होती है क्योंकि उनके वोकल फोल्ड भारी होते हैं और कम आवृत्ति पर कंपन करते हैं। घोड़े (औसत वज़न 500 कि.ग्रा.) भी अधिकांश आवाज़ें तो इसी तरह पैदा करते हैं। लेकिन जब वे हिनहिनाते हैं तो वे एकदम पतली, कानफोड़ू आवाज़ पैदा करते हैं। यह तीखी आवाज़ एक गुत्थी रही है। डील-डौल की तुलना में इसका पतलापन ब्रीफर को बेचैन करता रहा है।
फिर 2015 में उन्होंने एक उपकरण बनाया जिसकी मदद से वे हिनहिनाहट को आवृत्ति के अनुसार विभाजित करके देख सकते थे। जब देखा तो पुष्टि हो गई कि घोड़े सचमुच दो आवृत्तियों में आवाज़ पैदा कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में वे बायफोनिक होते हैं। बहुत ही थोड़े से स्तनधारी इस तरह से दो अलग-अलग आवृत्तियों की ध्वनियां निकाल सकते हैं - डॉल्फिन, ओर्का, कुछ लीमर। कुछ मनुष्यों में भी बायफोनिक स्थिति देखी गई है लेकिन तब जब उनके स्वर रज्जु में कुछ विकृति हो। कुछ मनुष्य गायन की तकनीक सीखते हुए यह क्षमता हासिल कर लेते हैं। लेकिन अक्सर जानवरों की आवाज़ मोटी-पतली होना उनके डील-डौल पर निर्भर होता है।
तो ब्रीफर और उनकी बहन ब्रीफर फ्रेमंड ने तहकीकात कर डाली। उन्होंने इसके लिए 10 स्विस नेशनल स्टड स्टेलियन हिनहिनाते घोड़ों की जांच एंडोस्कोप की मदद से की। एंडोस्कोप को शरीर के किसी अंग में डालकर उसकी अंदरूनी तस्वीरें खींची जाती हैं। एंडोस्कोपिक कैमरों की मदद से उन्होंने उनके लैरिंक्स (ध्वनि यंत्र) की तस्वीरें निकालीं।
देखा गया कि हिनहिनाहट की तीखी आवाज़ का सम्बंध लैरिंक्स के संकुचन (पिचकने) से है जबकि उसके बाद आने वाली मोटी आवाज़ स्वर रज्जुओं के कंपन से निकलती है जो अपेक्षाकृत कम आवृत्ति की (यानी मोटी) होती है। तो सवाल उठा कि क्या लैरिंक्स के संकुचन से सीटी की आवाज़ निकल रही है।
प्रयोगशाला में उन्होंने विच्छेदित घोड़ों के लैरिंक्स में से वायु तथा हीलियम प्रवाहित की। सीटी की आवाज़ की विशेषता होती है कि वह गैस के घनत्व से प्रभावित होती है। एक ही सुराख से कम और ज़्यादा घनत्व की गैस प्रवाहित की जाए तो हल्की गैस से ज़्यादा आवृत्ति की (यानी पतली) ध्वनि निकलेगी। दूसरी ओर, स्वर रज्जू अपनी मूल आवृत्ति पर या उसके गुणज पर कंपन करेंगे, गैस का घनत्व चाहे जो हो।
प्रयोगशाला में किए गए प्रयोग दर्शाते हैं कि घोड़ों में दोनों प्रक्रियाएं होती हैं। घोड़ों द्वारा पैदा की गई उच्च आवृत्ति की आवाज़ों की आवृत्ति हीलियम का उपयोग करने पर और बढ़ गई। इससे पुष्टि हुई कि यह आवाज़ सीटी की ही होती है। यह भी स्पष्ट हो गया कि कम आवृत्ति की (मोटी) आवाज़ें स्वर रज्जुओं के कंपनों के कारण पैदा होती हैं।
उन्होंने उन परिस्थितियों में भी प्रयोग किए जिनमें घोड़े के स्वर रज्जुओं को लकवा मार जाता है। इन प्रयोगों में मोटी आवाज़ तो गड्डमड्ड हो गई लेकिन पतली वाली आवाज़ एकदम पहले जैसी सामान्य रही।
तो इस सबका महत्व क्या है? इस संदर्भ में गुल्फ विश्वविद्यालय की कैट्रिना मर्कीस का कहना है कि बायफोनिक होने से घोड़ों को एक ‘विशाल शब्दावली' मिल जाती है। इसकी मदद से वे काफी दूरी तक संवाद कर सकते हैं, उनकी आवाज़ बहते पानी या हवा के शोर के ऊपर सुनी जा सकती है। लेकिन सबसे बड़ी बात तो इस खोज से यह समझ में आता है कि हम अपने इस प्राचीन साथी के बारे में आज भी बहुत कुछ नहीं जानते। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - July 2026
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