Sandarbh - Issue 162 (January-February 2026)
- The Cuckoo’s Eggs, the Crows’ Nests, and Much More by Sanket Raut
कोयल के अण्डे, कौओं के घोंसले और बहुत कुछ - संकेत राउत
कोयल कौओं के घोंसले में अण्डे देती है और कौआ उन अण्डों का खयाल रखता है। मगर यह नाता इतना भी सरल नहीं है। आखिर कोयल यह चुनाव कैसे करती है कि किस घोंसले में उसे अण्डे देने चाहिए? क्या कौए इतने ‘उदार’ होते हैं या धोखा खा जाते हैं? क्या कुकू की सभी प्रजातियाँ ऐसा व्यवहार करती हैं? क्या नफे-नुकसान जुड़े हैं जीव जगत के इस निहायती दिलचस्प अन्तर्सम्बन्ध में? जानने के लिए पढ़िए संकेत राउत का यह लेख। - The Journey of Hindu–Arabic Numerals by Aamod Karkhanis
हिन्दसे - आमोद कारखानीस
आज जिन यूरोपीय अंकों का इस्तेमाल हम करते हैं, उनकी जड़ें हिन्दुस्तान में हैं। हैरत की बात है कि कई-कई जंगलों, पहाड़ों, रेगिस्तानों को पार करके हज़ारों मील दूर तक, बल्कि दुनियाभर तक अंकों और गणना का यह तंत्र फैलता गया। मगर कैसे? उन दिनों जब दुनियाभर में गणना करने के अलग-अलग तरीके हुआ करते थे, तब अलग-अलग सभ्यताओं और साम्राज्यों के बीच व्यापार किस तरह हुआ करता होगा? आमोद कारखानीस अपने इस लेख में इसी पर रोशनी डालते हैं, एक मज़ेदार किस्से के ज़रिए। - An Important Statistical Technique was Invented in a Brewery by Sushil Joshi, Bhas Bapat and Himanshu Shrivastav
सांख्यिकी की एक महत्वपूर्ण तकनीक का आविष्कार एक बीयर कारखाने में हुआ था -सुशील जोशी, भास बापट व हिमांशु श्रीवास्तव
बीयर के किसी कारखाने में, कोई भी चार बोतलें लेकर क्या यह अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि बाकी की बोतलों में बीयर की गुणवत्ता कैसी होगी? वह अन्दाज़ा कितना सटीक होगा? पता लगाने के लिए हमें करना होगा ‘टी-टेस्ट’। बीयर की गुणवत्ता कायम रखने के उद्देश्य से उभरी सांख्यिकी की यह अहम तकनीक आज चिकित्सा, औद्योगिक निर्माण व कई शोधकार्यों में अपनाई जाती है, और इस तरह, इस दुनिया और समाज को आकार देने में किरदार निभाती है। इसके बारे में और जानने के लिए पढ़िए सुशील जोशी, भास बापट और हिमांशु श्रीवास्तव का लिखा यह लेख। वाकई, वैज्ञानिक खोज के रास्ते बड़े बेतरतीब होते हैं! - From Soil to Soil: The Wonder of the Kiln: Part 5 by Anil Singh
मिट्टी से मिट्टी तक: आवां का तिलस्म - अनिल सिंह
आनंद निकेतन के किस्सों के सफर में इस बार बच्चे निकल पड़े हैं मिट्टी के खिलौने बनाने। मगर यहाँ कुछ भी सतही कहाँ होता है! खोद-खोदकर मिट्टी निकालने से यह ‘प्रोजेक्ट’ शुरू होता है, और वापस मिट्टी में मिल जाने पर दम लेता है। इस बीच मेहनत है, जिज्ञासा है, गड़बड़ियाँ हैं और सबसे अहम – आनन्द है! तो चलिए, अनिल सिंह के इस भभकते लेख रूपी आवां में मिट्टी के खिलौने पकाते हैं। - Theatre India Company: Part 5 by Amit and Jayshree
नाटक इंडिया कम्पनी - अमित और जयश्री
जिस तरह ईस्ट इंडिया कम्पनी व्यापार करने भारत आई और क्या-कुछ नहीं कर गुज़री, उसी तरह, पर उस तरह नहीं भी, नाटक इंडिया कम्पनी आधारशिला की एक कक्षा में पाठ को बेहतर ढंग से समझने के लिए आई थी, और वहाँ से कहाँ-कहाँ क्या-कुछ नहीं कर गुज़री। आदिवासी बच्चों द्वारा तैयार किए गए, उन्हीं के जीवन और समाज के मुद्दों पर बात करते, उन्हीं की भाषा में खेले गए नाटक इस ‘कम्पनी’ की पहचान और शान रहे। इन नाटकों में मस्ती रही, हँसी रही, समाज के दुःख, डर और गुस्सा भी रहे, और साथ में रही सामूहिकता व एकता की पुकार। यह जादुई खेल कैसे खेला जाता था? कैसे ज़िन्दा रखा जाता था? नाटक क्यों खेला जाता था? अमित और जयश्री के इस लेख में ऐसे सवालों और जवाबों के कई रस हैं, रंग हैं। तो परदा खोलिए और चढ़ जाइए इस नाटकीय मंच पर! - Two Cities of the Olden Times: Part 8 by Prakash Kantv
पुराने समय के दो शहर - प्रकाश कान्त
आपके शहर या गाँव का इतिहास क्या है? वहाँ के खेतों में जो सिंचाई होती है, क्या वह उसी तरीके से होती है जैसी 500 साल पहले होती थी? कैसे पता करें कि तब क्या होता था? सामाजिक विज्ञान शिक्षण कार्यक्रम के तहत इतिहास के पाठों में ऐसी ही कोशिशें होती थीं। इससे बच्चे क्या-क्या सीखते होंगे? प्रकाश कान्त उसी कार्यक्रम के तहत बच्चों को सामाजिक विज्ञान पढ़ाने के अपने अनुभव, अपनी चिन्ताएँ, अपना इतिहास इस लेख में लिखकर दर्ज करते हैं। पढ़कर गवाही दें। - Ishwar Ki Kahaniyan: First Story by Vishnu Nagar
ईश्वर की कहानियाँ: पहली कहानी - विष्णु नागर
ईश्वर कहाँ हैं? एक बच्चा उन्हें ढूँढ रहा है। कहता है, ईश्वर ने बड़ी बेइन्साफी की उसके साथ। अगर ईश्वर मिलें तो ज़रूर बताइएगा उसे, वह इन्साफ करेगा। वो न कीजिएगा जो इस कहानी में कुछ लोगों ने किया। पढ़िए, विष्णु नागर की यह छोटी-सी कहानी और इन्साफ करिए, ईश्वर बनने की कोशिश नहीं। - Aaloo Ki Aankh: Part 1 by Rajesh Joshi
आलू की आँख: भाग-1 - राजेश जोशी
देपालपुर में नए मास्साब आए हैं। ज़्यादा बोलते नहीं कुछ, मगर मन ही मन कुछ बुदबुदाते रहते हैं। नौजवान हैं, शहर से आए मध्यमवर्गीय ‘संस्कारी’ ब्राह्मण। मास्टरी की नौकरी उनके सामने देपालपुर की काली मिट्टी के जैसी है – एकदम उर्वर! क्या मास्साब अपने मन का आलू बोएँगे? कैसी होगी फसल उनके लिए? पता नहीं, कुछ चिड़चिड़े-से लगते हैं। पढ़कर देखिए ज़रा, राजेश जोशी की कहानी का यह पहला भाग। - Why do we Feel Thirstier after Eating Salty Food? from Sawaliram
सवालीराम: नमकीन भोजन खाने के बाद हमें ज़्यादा प्यास क्यों लगती है?
सवालीराम इस बार नमक और प्यास के बीच के सम्बन्ध पर रोशनी डालते हैं। इसकी शुरुआत यह जानने से होती है कि प्यास लगती ही क्यों है। जवाब आपके सवाल की प्यास बुझा पाता है या नहीं, पढ़कर देखिए। - The Earthworm Builds Its Burrow by Eating Soil by Kalu Ram Sharma
मिट्टी खाकर बिल बनाने वाला केंचुआ - कालू राम शर्मा
केंचुए का शरीर कितना साधारण-सा लगता है न! मगर इस साधारण-से जीव का जीवन अनेक विचित्र खूबियों से भरा हुआ है। ये शर्मीले जीव टनों-टन मिट्टी उलट देते हैं, और धूप ‘देखकर’ सिकुड़ जाते हैं। छिपकली तक चबा जाती है इन्हें, और ये हैं कि मिट्टी चबाते हैं! वैसे ‘चबाते’ भी कहाँ हैं, दाँत और जबड़े जो नहीं हैं जजमान के पास! इन गिलगिले प्राणी की कारस्तानी पेश करते हैं कालू राम शर्मा अपने इस ‘अब-तक-अप्रकाशित’ लेख में।

