आग जलाना, उसका इस्तेमाल करना हमारी दिनचर्या में रचा-बसा है। हम शायद ध्यान भी नहीं देते कि हमने दिन में कितनी बार आग जलाई, वो भी अपनी सहूलियत के समय और जगह पर - खाना पकाने से लेकर सिगरेट जलाने या आग तापने तक के लिए।
ऐसा लग सकता है कि आग जलाने में कौन-सी बड़ी बात है, दियासलाई या लाइटर निकालो और लगा दो आग। लेकिन मानव इतिहास में इसका बड़ा महत्व है। किसी नैसर्गिक आग या दावानल के उपयोग से आगे बढ़कर मनुष्यों द्वारा जान-बूझकर नियंत्रित आग जलाना सीख लेना विकास में कई बड़े बदलाव ला सकता है। यह जैविक विकास और सामाजिक तथा  सांस्कृतिक विकास में भी महत्वपूर्ण रहा है। 
नियंत्रित आग शिकारी जानवरों से बचने, अंधेरी जगह पर उजाला करने और खाना पकाने में तो प्राचीन समय में मनुष्यों की मदद करती ही होगी। लेकिन आग जलाना सीखने से मनुष्यों को ठंडी जगहों पर बसने, रात में सक्रिय रहने और एक जगह इकट्ठा होने वगैरह में भी मदद मिली होगी। वैज्ञानिकों के लिए यह हमेशा रुचि का विषय रहा है कि मनुष्यों ने इरादतन सबसे पहले आग कब जलाई।
अब, हाल ही में इंग्लैंड में बर्नहम गांव के पास एक खुदाई स्थल ईस्ट फार्म से मिले प्रमाण इस बात का इशारा देते हैं कि निएंडरथल मनुष्यों ने करीब चार लाख साल पहले इरादतन और बार-बार आग जलाई थी। खुदाई में लाल रंग की (आग में पकी) गाद, ताप से विकृत चकमक पत्थर की कुल्हाड़ियां और आयरन पाइराइट के टुकड़े मिले हैं जिनका इस्तेमाल आग जलाने के लिए चिंगारी पैदा करने में होता होगा। 
दरअसल, ईस्ट फार्म का पुरातात्विक महत्व तकरीबन 100 साल पहले उजागर हुआ था। तभी से यहां खुदाई कार्य चालू है। पूर्व खुदाई में यहां से जो पत्थर के औज़ार मिले थे वे पुरापाषाण युग (करीब चार लाख साल पहले) के हैं। अन्य सबूत इशारा करते हैं कि यहां संभवतः होमो हाइडलबर्गेंसिस समूह रहता होगा और इस जगह का उपयोग एक पड़ाव की तरह करता होगा। इस जगह के आसपास की कुछ पुरातात्विक जगहों से मिले सबूत इस बात की ओर इशारा करते हैं कि प्रारंभिक होमिनिन आग का इस्तेमाल करते होंगे। लेकिन यह बता पाना मुश्किल रहा कि यह आग जानबूझकर जलाई गई थी या दावानल थी। क्योंकि मनुष्य द्वारा जलाई गई आग और दावानल काफी एक जैसे पुरातात्विक निशान छोड़ती हैं।
लेकिन अब शोधकर्ताओं को इस इलाके में ताप से विकृत हुई कुल्हाड़ियों और पकी हुई तलछट के साथ आयरन पाइराइट के टुकड़े मिल रहे हैं। आयरन पाइराइट आयरन डाईसल्फाइड का एक खनिज रूप है। जब इसे चकमक पत्थर से तेज़ी से रगड़ा या मारा जाता है तो चिंगारियां पैदा होती हैं, जिससे लकड़ी के बुरादे या सूखे मशरूम जैसे ज्वलनशील पदार्थों में आग लगाई जा सकती है।
प्रकृति में वैसे तो आयरन पाइराइट स्वाभाविक रूप से बन सकता है और मिलता है। ईस्ट फार्म में भी यह नैसर्गिक रूप से मौजूद है, लेकिन सतह से सैकड़ों मीटर नीचे। अब शोधकर्ताओं को इस स्थल पर आयरन पाइराइट के टुकड़े महज चंद फीट नीचे मिल रहे हैं, वह भी चकमक कुल्हाड़ियों के साथ। इसलिए ऐसा लगता है कि इन्हें होमिनिन द्वारा यहां लाया गया था।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं को चूल्हे के आसपास की तलछट के भू-चुंबकत्व में बदलाव के प्रमाण मिले हैं। ये प्रमाण भी यहां बार-बार आग जलाए जाने की ओर इशारा करते हैं। शोधकर्ताओं को इस तलछट की इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी करने पर पता चला कि तलछट को बार-बार गर्म किया गया था, कभी-कभी तो यह तलछट 1300 डिग्री सेल्सियस से भी अधिक गर्म हुई होगी। इसके साथ यहां पॉलीसायक्लिक एरोमैटिक हाइड्रोकार्बन्स (PAH) के निशान मिले हैं जो आम तौर पर लकड़ी जलाने से बनते हैं। 
उपरोक्त सभी प्रमाणों को एक साथ देखने पर ऐसा लगता है कि यहां जली आग प्राकृतिक आग नहीं थी बल्कि प्राचीन मनुष्यों ने इरादतन जलाई थी।
पूर्व में भी अन्य निएंडरथल स्थलों से उनके द्वारा आग जलाने के प्रमाण मिले थे, हालांकि ये प्रमाण लगभग 50,000 साल पुराने थे। और उस समय उनके आसपास होमो सेपियन्स रह रहे थे, इसलिए वैज्ञानिकों ने सोचा था कि निएंडरथल ने शायद उनसे आग जलाना सीखा होगा। लेकिन ईस्ट फार्म से मिले पुराने सबूत इससे भी साढ़े तीन लाख साल पहले के हैं। बहरहाल, नेचर में प्रकाशित इन निष्कर्षों को पुख्ता करने के लिए और अधिक अध्ययन की ज़रूरत तो है ही। कई वैज्ञानिक इस पर आगे काम करने को तैयार हैं। (स्रोत फीचर्स)