सुबोध जोशी कक्षा 9 में हमारे स्कूल में पढ़ने आया था। 13-14 की आयु वाले हम छात्रों के लिए वह किसी अचरज सरीखा था। उसका शरीर हम सबसे कुछ भिन्न था। जांघों के करीब से मुड़ गए पैरों के कारण वह चल-फिर नहीं सकता था। एक सहायक उसे साइकिल के डंडे पर बिठा कर स्कूल लाता, ले जाता। मैं गणित पढ़ रहा था और वह कॉमर्स। मगर, मेरे एक नज़दीकी दोस्त का वह पुराना और पक्का दोस्त था, तो कभी-कभार मध्यावकाश में मैं भी उस ‘अचरज' के पास चला जाया करता था। हालांकि तब हममें कोई दोस्ती नहीं पनप सकी थी।
ग्यारहवीं के बाद स्कूल छूटा। हम सब अलग-अलग दिशाओं में निकल गए। जीवन की आपाधापी ने दिमाग की स्लेट पर दर्ज कितने ही चेहरों और नामों को धुंधला तो दिया ही था। सुबोध भी ऐसा ही एक नाम और चेहरा था।
स्मार्ट-फोन और सोशल-मीडिया के आगाज़ के साथ अतीत की कड़ियां फिर जुड़ती गईं। फेसबुक पर पुराने दोस्त टकराने लगे। व्हाट्सएप पर मित्र-मंडल बनने लगे। एक बार फिर सुबोध से परिचय के तार जुड़े और फिर जुड़ते ही चले गए।
उम्र के उस मुकाम पर यह पता चल चुका था कि उसकी शारीरिक समस्या को ‘ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी' (DMD) कहा जाता है। हम में से जो चिकित्सक बन चुके थे, उन्होंने समझाया कि इस शारीरिक व्याधि में मांसपेशियां सिकुड़ती, सिमटती, नष्ट होती जाती हैं। पीड़ित को अमूमन लंबा जीवन नहीं मिलता। बहुत हुआ तो 25-30 बरस। 
सुबोध, तब चालीस पार कर चुका था और अपने तई सचेत और सक्रिय था।
एक बार फिर वह ‘अचरज' सरीखा था।
गुज़र चुके दौर की मेरी-उसकी गति और दिशा अनायास कुछ यूं रही कि वैचारिक धरातल पर हम आसपास खड़े थे। उसकी सोच भी सेक्यूलर थी। जीवन को देखने का तरीका रैशनल। लिखने-पढ़ने में दिलचस्पी हमें और करीब लाती गई।
उसके लेख अखबारों में निरंतर छपते थे। वह अनुवाद करता था। अपनी आत्मकथा लिख रहा था। मेरे लिखे, रचे पर वह अपनी नज़रें बनाए रखता था। 
बेहिसाब शारीरिक बाधाओं और कुछ भी करने के लिए किसी पर निर्भरता के बावजूद निराशा उसे छू तक नहीं गई थी। फोन पर सुनाई देने वाली उसकी हंसी हमेशा अकुंठित हुआ करती थी। उसकी अनोखी जीजिविषा ने मेरे अपने जीवन में एक नया सबक सिखाया। जब कभी कोई परेशानी दरपेश आई, जीवन में कोई उदास-निराश मौका आया तो उससे जूझने की मेरी एक तरकीब रही आई - सुबोध के जीवन-संघर्ष को याद कर लेने की। जिसकी तुलना में मेरे सामने आ खड़ा  संकट तत्क्षण बेहद छोटा और मामूली मालूम देने लगता। लड़ने की ताकत मिल जाती। 
बेशक, उसके सक्रिय जीवन के लिए उसकी अपनी अद्भुत जिजीविषा, उपलब्ध परिस्थितियों में खुश रहने का अनोखा माद्दा और खिलाफ हालात से लड़ सकने की खासियत के इतर उसके मां-पिता, बहनों, भांजे-भांजियों और निजी सहायकों के अटूट प्रेम और सतत तीमारदारी के अलावा दक्ष चिकित्सकों की देख-रेख को भी पर्याप्त श्रेय जाता है। 
शारीरिक समस्याओं से जूझ रहे लोगों के हकूक बाबत सदा सचेत रहने और उचित फोरम तक ज़रूरी बात ले जाने वाले स्वतंत्रता, समानता, मैत्री, न्याय और गरिमा में अथक भरोसा रखने वाले 60 पार के ‘अचरज' सुबोध जोशी ने जीवन को अलविदा कहने के लिए 26 जनवरी 2026, गणतंत्र-दिवस का दिन चुना।
विगत पांच महीनों से गंभीर रूप से बीमार सुबोध ने 29 नवम्बर 2025 को 61वीं सालगिरह मनाई थी। 4 दिसम्बर को मेरी उससे हुई अंतिम मुलाकात के वक्त बिस्तर पर ऑक्सीजन की नली लगाए लेटे हुए जो चमक उसकी आंखों में थी और जैसी मुस्कान उसके चेहरे पर थी, वह आगामी जीवन-संघर्षों में मुझे ऊर्जा देती रहेगी।
डॉक्टर दोस्तों का कहना है कि ‘ड्यूशेन मस्कुलर डिस्ट्राफी' से पीड़ित किसी व्यक्ति का इतना लंबा जीवन वाकई अचंभा है। दुनिया में ऐसे उदाहरण उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। 
सुबोध भी उन चुनिंदा नामों में शुमार है। छोटे-छोटे संकटों से डर जाने, असमय आस गुमा देने वालों को सुबोध जैसे ‘अचम्भों' को ज़रूर जानना चाहिए।
उसकी स्मृतियों को सलाम! (स्रोत फीचर्स)