लंबे समय तक किए गए एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि चूहों में फफूंदनाशी के असर बीस पीढ़ियों तक बरकरार रहते हैं। किसी मादा चूहे का संपर्क फफूंदनाशी से हो जाए, तो उसकी संतानों में गुर्दा रोग, मोटापे या प्रसव में दिक्कत जैसी परेशानियां पैदा होने की संभावना बढ़ जाती है। 
इस बात के प्रमाण बढ़ते क्रम में मिल रहे हैं कि कतिपय रसायनों से संपर्क कई आनुवंशिक परिवर्तन पैदा कर सकते हैं। ये रसायन वास्तव में किसी जीव के आनुवंशिक पदार्थ (डीएनए) में कोई परिवर्तन नहीं करते। दरअसल, जंतु कोशिकाओं के डीएनए पर कुछ मार्कर चस्पा हो जाते हैं जो अगली पीढ़ियों को भी हस्तांतरित होते रहते हैं। ये जीन्स की अभिव्यक्ति को प्रभावित करते हैं और इन्हें एपिजेनेटिक परिवर्तन कहते हैं।
इस सिलसिले में हालिया अध्ययन वॉशिंगटन स्टेट युनिवर्सिटी के माइकल स्किनर और उनके साथियों ने किया है। इन शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन किया कि यदि चूहों की एक पीढ़ी का संपर्क फफूंदनाशी विनक्लोज़ोलीन से करवाया जाए, तो आने वाली 20 पीढ़ियों तक इसके असर बने रहते हैं। पता चला कि एक पीढ़ी के संपर्क के कारण आने वाली पीढ़ियों में शुक्राणुओं की मृत्यु और प्रसव में दिक्कत जैसी समस्याएं बनी रहती हैं। इसके अलावा मातृ व शिशु मृत्यु दर भी काफी अधिक होती है, बनिस्बत संपर्क से मुक्त चूहों में या 12वीं से पहले की पीढ़ी की तुलना में।
अभी चूहों से प्राप्त निष्कर्षों को इंसानों के संदर्भ में लागू करना जल्दबाज़ी होगी। वैसे मनुष्यों में भी इस तरह के एपिजेनेटिक परिवर्तनों का पीढ़ी-दर-पीढ़ी हस्तांतरण देखा गया है - जैसे अकाल के दौरान गर्भधारण से पैदा हुए बच्चों में डायबिटीज़ का जोखिम अधिक होता है। लिहाज़ा, इन परिणामों का इंसानों के लिए निहितार्थ अकल्पनीय तो नहीं है।
इतना तो बनता है कि वायु प्रदूषण पर विचार किया जाए और निगरानी की जाए कि हम पर्यावरण में किस तरह के रसायन छोड़ रहे हैं क्योंकि यह चिंताजनक है कि असर इतनी पीढ़ियों बाद भी नज़र आते हैं।
यह सही है कि फसलों के संदर्भ में विनक्लोज़ोलीन का इस्तेमाल काफी कम होने लगा है और कई देशों में इस पर प्रतिबंध भी लग चुका है।
स्किनर के दल ने प्रयोग 2017 में शुरू किए थे। उन्होंने गर्भवती चूहों को विनक्लोज़ोलीन और डीएमएसओ (DMSO) नामक एक विलायक का इंजेक्शन दिया। फिर इन चूहों का प्रजनन 23 पीढ़ियों तक असंपर्कित चूहों के साथ करवाया। पहले गर्भवती चूहे और उसकी संतान तथा नाती-पोतों (grand offspring) के बारे में माना गया कि उनका सीधे संपर्क हुआ था। इसके बाद की 20 पीढ़ियों को पूर्वज-संपर्कित माना गया।
इसी के साथ एक कंट्रोल समूह भी था - इन्हें सिर्फ डीएमएसओ का इंजेक्शन दिया गया था और चार पीढ़ियों तक प्रजनन करवाया गया था।
शोधकर्ता दल ने अगली पीढ़ी में क्षार अनुक्रमण की तकनीक से पता किया कि उनके जीनोम के किन खंडों में मिथाइल समूह जुड़े हैं (यानी मिथायलीकरण हुआ है)। उन्होंने पाया कि कंट्रोल की तुलना में संपर्कित चूहों की बाद की पीढ़ियों में अधिक हिस्सों में मिथायलीकरण हुआ है। अर्थात एपिजेनेटिक परिवर्तन पीढ़ियों तक बने रहते हैं।
फिर उन्होंने चूहों के गुर्दों, प्रोस्टेट, वृषण और अंडाशयों को देखा। पता चला कि इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों की दर पीढ़ी-दर-पीढ़ी बढ़ती गई। मसलन जिन चूहों का विनक्लोज़ोलीन से प्रथम संपर्क पिता की ओर से करवाया गया था उनकी बीसवीं पीढ़ी में सभी 11 चूहों में अंडाशय में गड़बड़ी पाई गई जबकि कंट्रोल समूह के 19 में से 11 चूहों में। यह भी देखा गया कि संपर्कित चूहों में मोटापा और गुर्दा रोग भी ज़्यादा गंभीर थे। यही स्थिति प्रसव सम्बंधी दिक्कतों में देखी गई। टीम का मत है कि डीएनए मिथायलीकरण अंगों के सामान्य विकास व कामकाज को प्रभावित करता है। (स्रोत फीचर्स)
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Srote - August 2026
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