चींटियों को स्व-प्रेरण से काम करने, भविष्य की तैयारी और दूर की सोच रखने, और मिल-जुलकर काम करने को प्राथमिकता देने जैसे कई सकारात्मक गुणों से जोड़ा जाता है। चींटियों की कई प्रजातियां सामाजिक होती हैं और समूह में रहती हैं। हालांकि, समूह में रहने के फायदे तो होते हैं, लेकिन साथ-साथ इसके कुछ नुकसान भी हैं। 
सामाजिक समूहों में रहने के कारण मनुष्यों को भी मौसमी संक्रमणों, जैसे इंफ्लूएंज़ा जैसी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। संक्रमण के प्रभावों से निपटने के लिए अनुशासन और कुछ मूल नियमों का पालन करना हम सीख गए हैं। आम तौर पर बीमारी या संक्रमण के लक्षण पता चलते ही हम काम/ऑफिस से छुट्टी लेकर थोड़े दिनों के लिए सामाजिक दूरी बना लेते हैं। सामाजिक दूरी से संपर्क के दायरे को कम करके संक्रमण फैलने से रोका जा सकता है। सामाजिक दूरी बनाने की यह प्रक्रिया सामूहिक अनुशासन पर निर्भर है और ऐसे ही गुणों के लिए चींटियां भी मशहूर हैं।  
सवाल है कि ये चींटियां बस्तियों में रहते हुए रोगजनकों से कैसे निपटती हैं? कुछ चींटी प्रजातियों में यह देखा गया है कि कुछ सदस्य साथी चींटियों की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने के लिए मेटाप्ल्यूरल ग्रंथि से निकलने वाले एक संक्रमण रोधी तरल पदार्थ को लार्वा, साथी चींटियों और खुद के शरीर पर पोत लेते हैं। गौरतलब है कि यह ग्रंथि सिर्फ चींटियों में पाई जाती है और उनके वक्ष के पिछले भाग में स्थित होती है। इस लेप से बस्ती को एक तरह की सामाजिक सुरक्षा मिलती है और सदस्य कुछ हद तक संक्रमण से महफूज़ रहते हैं।  
इसके अलावा भी चींटियों में सुरक्षा के कुछ और अजीबोगरीब उपाय देखे गए हैं। स्विट्ज़रलैंड के लॉज़ेन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने प्रयोग के दौरान एक काली श्रमिक चींटी का पैर घायल कर दिया। फिर उसे बस्ती में छोड़कर अन्य साथी चींटियों के व्यवहार पर ध्यान दिया। उन्होंने देखा कि साथी चींटियों ने घायल चींटी के पैर को शरीर से जोड़ने वाले हिस्से पर बार-बार काटकर घायल पैर को शरीर से ही अलग कर दिया। इससे लगता है कि चींटियों ने घायल चींटी का अंग-विच्छेदन करके बीमारी की रोकथाम की। क्योंकि चोटग्रस्त पैर कीटाणुओं को न्यौता देता, जिससे दूसरे साथियों में भी संक्रमण फैलने का खतरा पैदा हो सकता था।  
एक अपेक्षाकृत हालिया अध्ययन में महामारी के दौरान चींटियों की बस्ती की प्रतिक्रिया को देखा गया। इसमें बगीचों में पाई जाने वाली चींटी (Lasius niger) पर अध्ययन किया गया। यह भारतीय चींटियों जैसी है जो आम तौर पर हमारे आसपास दिखती हैं। ये ज़मीन के नीचे जटिल बांबियां बनाती हैं, जिनमें एक मुख्य प्रवेश द्वार, एक केंद्रीय हिस्सा - जिसमें रानी चींटी, अंडे और लार्वा रहते हैं। साथ ही कुछ छोटे-छोटे कक्ष होते हैं जो भोजन व कचरा इकट्ठा करने के लिए और अन्य चींटियों के उपयोग के लिए होते हैं। बस्ती के सभी हिस्से सुरंगों के ज़रिए आपस में जुड़े होते हैं। चींटियों के बीच काम का स्पष्ट विभाजन होता है - कुछ श्रमिक चींटियां अंडे और लार्वा की देखभाल करती हैं और अन्य चींटियां भोजन का बंदोबस्त करती हैं। 
प्रयोगों के दौरान एक रानी चींटी और करीब 200 श्रमिक चींटियों के समूह ने एक नई बस्ती बनाई। प्रयोग के लिए उस बस्ती की सभी चींटियों पर छोटे क्यूआर कोड लगाए गए थे ताकि वीडियो कैमरों से निगरानी की जा सके। बस्ती की बनावट पर नज़र रखने के लिए वैज्ञानिकों ने माइक्रो-सीटी स्कैन का इस्तेमाल किया। उसके एक दिन बाद वैज्ञानिकों ने ऐसी 20 श्रमिक चींटियों को बस्ती में छोड़ा जिनका संपर्क रोगजनक फफूंद से करवाया गया था। 
कुछ दिनों तक निगरानी करने के बाद वैज्ञानिकों ने गौर किया कि अन्य चींटियों के मुकाबले संक्रमित चींटियां ज़्यादा बार बस्ती से बाहर गईं और उन्होंने बस्ती से बाहर ज़्यादा समय बिताया। ये संक्रमित चींटियों द्वारा खुद को अलग-थलग रखने का व्यवहार था। बस्ती की बनावट भी बदल चुकी थी, प्रवेश द्वार आम बस्ती की तुलना में ज़्यादा दूर-दूर थे। बस्ती के कामकाज में फुर्ती आ गई थी, और ज़्यादा ध्यान लंबी सुरंगें बनाने पर दिया जाने लगा था। विभिन्न कक्षों के बीच जुड़ाव भी कम कर दिया गया था। 
इन सभी बदलावों की वजह से चींटियों के अलग-थलग समूहों के बीच आपसी संपर्क सीमित हो गया था। खाना जुटाने वाली चींटियों का बस्ती के सबसे मुख्य सदस्यों (रानी व रानी की सहायक चींटियों) से संपर्क बहुत कम हो गया था और वे स्वस्थ रहीं।   
बचाव की ये रणनीतियां जानी-पहचानी लगती हैं ना? हम भी इसी तरह महामारी या अन्य संक्रमणों से बचने के लिए क्वारंटाइन, दूसरों से मिलते समय मास्क पहनना, बार-बार हाथ धोना जैसे कुछ उपाय अपनाते हैं। लगता है कि इन चींटियों ने भी संक्रमण से बचने के लिए सामाजिक दूरी के अपने उपाय विकसित कर लिए हैं। (स्रोत फीचर्स)