वैसे तो एड्स वायरस (ह्युमैन इम्यूनोडेफिशिएंसी वायरस यानी एच.आई.वी.) पर किए गए अनुसंधान ने हमें ऐसी कई दवाइयां मुहैया कराई हैं जो वायरस को काबू में रखती हैं और उसे हमारे प्रतिरक्षा तंत्र को तहस-नहस करने से रोके रखती हैं। दुनिया भर में करीब 4 करोड़ लोग एच.आई.वी. के साथ जी रहे हैं और कोई इलाज नहीं खोजा जा सका है। आज तक इलाज करके मात्र 11 लोगों को वायरस से मुक्त किया जा सका है। यह स्टेम कोशिका प्रत्यारोपण के ज़रिए संभव हुआ है। दिक्कत यह है कि स्टेम कोशिका उपचार का उपयोग आसान नहीं है।
अब एच.आई.वी./एड्स सम्मेलन में प्रस्तुत कुछ निष्कर्ष एक नई राह सुझा रहे हैं। कुछ अध्ययन प्रयोगशालाओं में किए गए हैं और कुछ अध्ययन मरीज़ों पर भी किए गए हैं। इनमें एक नए विचार का इस्तेमाल किया गया है।
आम तौर पर एड्स वायरस कोशिका में प्रवेश करने के बाद संक्रमित कोशिका में ऐसे परिवर्तन करता है कि वे उसकी उपस्थिति को भांपने और भांपकर स्वयं को नष्ट करने में असफल रहती हैं। यदि कोशिकाएं स्वयं को नष्ट करें तो उनके अंदर बैठे वायरस भी खत्म हो जाएंगे। यदि वायरस की इस करामात से पार पा लें तो काम आसान हो जाएगा।
यह सही है कि वर्तमान में उपलब्ध दवाइयां एच.आई.वी. का दमन इतनी हद तक कर देती हैं कि रक्त परीक्षण में वह नज़र नहीं आता। लेकिन वह संक्रमित टी-कोशिकाओं और मैक्रोफेजों में बना रहता है और अपना जेनेटिक कोड व्यक्ति के गुणसूत्रों में पिरो देता है। जैसे ही व्यक्ति उपचार बंद करता है ये सुप्त वायरस अपनी प्रतिलिपियां बनाने लगते हैं और जल्दी ही लाखों वायरस रक्त में पहुंच जाते हैं। कई संक्रमित कोशिकाएं इन वायरसों को बाहर निकालने की प्रक्रिया में या प्रतिरक्षा तंत्र के हमले में मारी जाती हैं, लेकिन कुछ जीवित रह जाती हैं।
नई रणनीति टी-कोशिकाओं व मैक्रोफेज में पाए जाने वाले ऐसे सेंसर्स पर टिकी है जो सूक्ष्मजीवों को ताड़ते हैं। इन्हें कार्ड-8 (CARD8) कहते हैं। ये मुख्य रूप से प्रोटीएज़ नामक एंज़ाइम को पहचानते हैं जो नव-निर्मित प्रोटीन्स को तोड़ता है ताकि नए वायरस बनाए जा सकें। जैसे ही कार्ड-8 किसी वायरस प्रोटीन की उपस्थिति भांपता है, वह एक किस्म की कोशिकीय खुदकुशी की प्रक्रिया शुरू करवा देता है जिसके चलते नए वायरसों का निर्माण अस्त-व्यस्त हो जाता है। इस प्रक्रिया को पायरोप्टोसिस कहते हैं।  
एच.आई.वी. अपना प्रोटिएज़ दो एक-सी इकाइयों को जोड़कर बनाता है। 2021 में साइन्स में प्रकाशित एक शोध पत्र में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय के लियांग शान और उनके साथियों ने बताया था कि कार्ड-8 सिर्फ दो इकाइयों के जुड़ने पर बने डाइमर को ही पहचानता है। वायरस इसका फायदा उठाते हैं - वे दो इकाइयों को जोड़ने की प्रक्रिया को तब तक मुल्तवी रखते हैं जब तक कि वायरस कण मेज़बान कोशिका से बाहर न झांकने लगे। शान की टीम ने यह भी बताया था कि दो वर्तमान एच.आई.वी. रोधी दवाइयां (एफेवाइरिनेज़़ और रिल्पिवायरिन) किसी तरह से डाइमर निर्माण की इस प्रक्रिया को जल्दी करवा देती हैं। उस समय तो किसी ने इस खोज की उपचारात्मक संभावना पर ध्यान नहीं दिया था लेकिन अब इस पर चर्चा हो रही है।
कई औषधि निर्माताओं ने ऐसी अधिक शक्तिशाली दवाइयों पर काम भी शुरू कर दिया है। जैसे टारगेटेड एक्टिवेटर ऑफ सेल किल (TACK) पर ध्यान दिया जा रहा है। 2023 में मर्क कंपनी ने साइन्स ट्रांसलेशन मेडिसिन में बताया था कि उसने ऐसा अणु खोज लिया है जो प्रोटिएज़ को डाइमराइज़ करवाने में एफेवाइरिनेज़ से कई गुना शक्तिशाली है। कंपनी इसका परीक्षण ऐसे लोगों पर कर रही है जिन्हें पहले कोई उपचार नहीं मिला है।  
दूसरी ओर, कोलंबिया विश्वविद्यालय के डेविड हो एक दोतरफा रणनीति पर काम कर रहे हैं। इसमें TACK को एक अन्य तरीके के साथ जोड़ा गया है। यह दूसरा तरीका है सुप्तावस्था पलट एजेंट (Latency reversal agents LRA) पर आधारित। ये ऐसे एजेंट होते हैं जो वायरस की सुप्तावस्था को समाप्त करके उन्हें अपनी प्रतिलिपियां बनाने को उकसाते हैं। इसके पीछे विचार यह है कि जिन कोशिकाओं में वायरस तेज़ी से प्रतिलिपियां बनाएंगे, उन्हें प्रतिरक्षा तंत्र नष्ट कर देगा या वे स्वयं ही फट जाएंगी। लेकिन अब तक इस तरह से वायरस का जखीरा कम करने में सफलता सीमित रही है।
 हो की प्रयोगशाला में बेहतर LRA बनाने पर काम चल रहा है। वहां सुप्त संक्रमित कोशिकाओं के खिलाफ एंटीबॉडी बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं, जो ऐसे कोशिकीय संकेतों को शुरू करवा दें जो वायरस को अपनी प्रतिलिपि बनाने को उकसाएं। लेकिन प्रयोगशाला में एच.आई.वी. संक्रमित लोगों से ली गई कोशिकाओं में अकेली एंटीबॉडी कारगर नहीं रही। ये कोशिकाएं ऐसे व्यक्तियों की थीं जो उपचार ले रहे थे और वायरस को पूरी तरह नियंत्रित कर रहे थे। लेकिन हो ने बताया है कि जब उन्होंने साथ में TACK औषधि मिला दी तो वायरल आरएनए की मात्रा तेज़ी से कम हुई।
हो का कहना है कि एच.आई.वी. संक्रमण की स्थिति पर असर डालने के लिए LRA और टैक का उपयोग शायद ज़रूरी न हो। 
रिट्रोवायरस और अन्य मौकापरस्त संक्रमणों पर एक सम्मेलन में वॉशिंगटन विश्वविद्यालय मेडिसिन की प्रिया लाल ने बताया कि उनकी टीम ने सात ऐसे एच.आई.वी. संक्रमित व्यक्तियों को शामिल किया जो विभिन्न वायरस रोधी दवाइयों और एफेवाइरिनेज़ की मदद से वायरस पर काबू किए हुए थे। सुप्त रूप से संक्रमित कोशिकाओं के प्रति संवेदी तकनीकों की मदद से पता चला कि 4 महीने के उपरांत 6 व्यक्तियों में सुप्त संक्रमित कोशिकाएं 20 से 50 प्रतिशत तक कम हो गई थीं।
शोधकर्ताओं ने स्वीकार किया है कि इतनी गिरावट किसी व्यक्ति को रोगमुक्त करने के लिए पर्याप्त नहीं है लेकिन यह इस विचार का प्रमाण है कि प्रोटिएज़ को सक्रिय करने वाले शक्तिशाली कारकों का विकास करना उपयोगी होगा। कई औषधि निर्माताओं ने इस दिशा में काम करना शुरू भी कर दिया है। (स्रोत फीचर्स)