सात साल की मुन्नी स्कूल से घर आती है। उसके जूते धूल से सने हुए और चोटियां ढीली पड़कर खुल-सी गई हैं। आते ही सबसे पहले उसकी नज़रें अपनी मां को ढूंढती हैं। लेकिन उसकी दादी उसके हाथ से बस्ता लेकर उसे हाथ-मुंह धोने को कहती हैं। अंदर कमरे में सन्नाटा और घुप अंधेरा पसरा है। वह देखती है कि उसकी मां औंधे मुंह लेटी हुई है - एक आंख सूजी हुई और काली है, गालों पर चोट/नील के निशान हैं। मुन्नी पीछे से अपनी मां को आगोश में भर लेती है, लेकिन उसी समय अचानक मुन्नी को पेट में तेज़ दर्द का एहसास होता है। 
घर में सन्नाटा पसरा है। दादी उसे खाना खाने को बोलती हैं। फिर उसके पिता घर आते हैं और खाना खाकर दादी के कमरे में सो जाते हैं। ये सब देख कर मुन्नी के मन में सवालों का गुबार-सा उठता है, लेकिन कुछ तो है जो उसे सवाल करने से रोकता है।  
अगली सुबह वह अपनी मां को पड़ोसन से बात करते हुए सुनती है। “रात को मैंने कुछ आवाज़ें सुनी। ऐसा लगा कल तुम्हारी बारी थी।” और दोनों हंसने लगीं। मुन्नी कुछ समझी नहीं, लेकिन उसे पेट में फिर वही दर्द होने लगा। चिल्ला-चोट, दर्द भरी आवाज़ें, गहरी चोट के निशान, और फिर हंसी की आवाज़ - ये सब उसे सामान्य लगने लगे थे। मुन्नी मानने लगी थी कि शायद ऐसा ही होता है। कोई नाराज़ नहीं होता, कोई रोकता नहीं। ये मारपीट-चिल्लाना मानों रोज़मर्रा में शामिल हो गया था, जैसे गर्मी में लू का चलना, या जैसे किसी दिन नल नहीं आना।
मुन्नी चींटियों को अपने से दुगना बड़ा टुकड़ा ढोते देखती है। मुन्नी सोचती है कि “अगर हर किसी की बारी आती है, तो क्या एक दिन उसकी भी बारी आएगी?” 
चुप्पी, सफाई और हंसी-मज़ाक की आड़ के ज़रिए मुन्नी अनकहा सबक सीख लेती है, स्वीकार कर लेती है कि घरेलू हिंसा सामान्य है। इतना सब देखकर वह सीखती है कि विरोध और संघर्ष की बजाय सहन करना ज़्यादा आसान और सुरक्षित है। घर का वह सर्द, नीरस माहौल उसके मन में उठे सवालों को दबा देता है। और सबसे अहम सबक सिखाता है कि जब परिवार और आम समाज के लोग हिंसा को सामान्य मान लेते हैं तो वे लोग भी हिंसा को नज़रंदाज़ करने लगते हैं जो रोज़ाना इसके शिकार हो रहे होते हैं।
परामर्श कक्ष में हिंसा से पीड़ित महिला शायद ही कभी सीधे अपनी आपबीती बताए। लेकिन इसे समझा जा सकता है। जैसे इससे पीड़ित कोई बार-बार चोटें दिखाने के लिए आता/आती है, वहीं अन्य लोगों की शिकायत सिरदर्द, नींद न आना या पेट की खराबी जैसी समस्याओं की होती है। जब तक डॉक्टर और नर्स इन चोटों के पीछे के गैर-ज़ाहिर कारण समझने के लिए प्रशिक्षित नहीं होते, यह हिंसा दबी-छुपी ही रहेगी। डॉक्टर/नर्स और मरीज़ के बीच होने वाली चंद बातों में ही वह मौका है जब परामर्शदाता सुरक्षित और सार्थक तरीके से हस्तक्षेप कर पाए, या पीड़िता अपनी आपबीती बता पाए।
महिला सुरक्षा: वैश्विक समस्या 
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, लैंगिक आधार पर महिलाओं को किसी भी प्रकार का शारीरिक, मानसिक, या यौन नुकसान पहुंचाना या पहुंचाने की कोशिश करना महिला के खिलाफ हिंसा माना जाएगा। दुनिया भर में महिलाओं के प्रति इस दुर्व्यवहार को मानवाधिकारों का सबसे बड़ा उल्लंघन और जन-स्वास्थ्य के लिए संकट माना गया है। 
डबल्यूएचओ के आंकड़े बताते हैं कि हर तीन में से एक महिला अपनी पूरी ज़िंदगी में कभी न कभी शारीरिक या यौन शोषण से जूझती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 (NFHS-5) के आंकड़े भी इसी ओर इशारा करते हैं। ये बताते हैं कि 18 से 49 वर्ष की लगभग 29 प्रतिशत महिलाओं ने 15 साल की उम्र के बाद कभी न कभी शारीरिक शोषण का और 6 प्रतिशत महिलाओं ने यौन शोषण का सामना किया है।
इन आंकड़ों के बावजूद केवल 14 प्रतिशत महिलाएं ही इसके खिलाफ आवाज़ उठा पाई हैं। इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट फॉर पॉपुलेशन साइंसेस (2021) के आंकड़े बताते हैं कि भारत में अपने जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा समाज के हर वर्ग और हर जगह फैली है। शोषण और हिंसा के स्वास्थ्य (शारीरिक और मानसिक) परिणाम इतने गंभीर और दीर्घकालिक होते हैं कि एक मज़बूत स्वास्थ्य व्यवस्था ही इसकी शुरुआती पहचान और रोकथाम करने में सहायक साबित होगी।
महिलाओं के प्रति दुर्व्यवहार सिर्फ कानून और व्यवस्था की समस्या नहीं है, बल्कि यह एक ‘हेल्थ इमरजेंसी’ है जो हौले-हौले अस्पतालों, डिलीवरी वार्डों, आपात कक्षों और मानसिक स्वास्थ्य केंद्रों में नज़र आएगी। गौरतलब है कि स्वास्थ्यकर्मी ही वे पहले या कभी-कभी एकमात्र व्यक्ति होते हैं, जिनके सामने पीड़ित महिलाएं खुलकर अपना दर्द बयां कर पाती हैं। ऐसे मुश्किल समय में एक डॉक्टर की भूमिका या तो केवल मूक दर्शक की हो सकती है या एक सच्चे मददगार की। 
मानसिक आघात और बीमारियों का सीधा सम्बंध 
भारतीय महिलाओं में होने वाली हिंसा का सीधा सम्बंध मानसिक तौर पर बढ़ते अवसाद (डिप्रेशन), दुश्चिंता (एंक्ज़ायटी) और गहरे मानसिक सदमे (मेंटल ट्रॉमा) से है। हिंसा से पीड़ित महिलाएं लगातार एक मानसिक तनाव में जीती हैं। 
भले ही शारीरिक हिंसा न हो, लेकिन बदसलूकी और ‘दबाकर रखना’ जैसे व्यवहार समय के साथ मानसिक तकलीफ को और बढ़ा देते हैं। यह इस ओर इशारा करता है कि मार-पीट के इतर हिंसा का मानसिक स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है। जीवन साथी द्वारा घरेलू हिंसा झेल रही लगभग सभी महिलाओं में मानसिक सदमे के लक्षण दिखते हैं। इन लक्षणों में रात में नींद न आना, चिड़चिड़ापन और अतीत के बुरे हादसे बार-बार याद आना शामिल हैं। 
बात-बात में ताने देना, पाबंदियों से भरी ज़िंदगी, और मानसिक प्रताड़ना जैसे दुर्व्यवहार और मानसिक दबाव धीरे-धीरे शारीरिक समस्या में तब्दील हो जाते हैं; जैसे हमेशा शरीर में दर्द या भारीपन महसूस होना। यह भावनात्मक आघात और शारीरिक लक्षणों के आपसी सम्बंध को दर्शाता है। इसके साथ ही घरेलू हिंसा से पीड़ित महिलाओं के बच्चों में भी आगे चलकर अवसाद और दुश्चिंता जैसी मानसिक बीमारियों की संभावना बढ़ती है। इससे ज़ाहिर होता है कि मानसिक असुरक्षा और आघात एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में पहुंच सकते हैं।  
पुरुषों की तुलना में महिलाएं अवसादरोधी (एंटीडिप्रेसेंट) दवाओं का ज़्यादा इस्तेमाल करने के लिए मजबूर हैं, क्योंकि वे शरीर की जीर्ण और आत्म-प्रतिरक्षा (शरीर की प्रतिरक्षा क्षमता का खुद को नुकसान पहुंचाना) बीमारियों से जूझ रही हैं। यहां तक कि आजकल मल्टीपल स्क्लेरोसिस (केंद्रीय तंत्रिका की एक जीर्ण बीमारी) से पुरुषों की तुलना में महिलाएं ज़्यादा ग्रस्त होती हैं। पहले यह पुरुषों और महिलाओं में लगभग बराबर देखी जाती थी।  
मशहूर लेखक और डॉक्टर, डॉ. गैबोर माटे तर्क देते हैं कि इंसानों का स्वास्थ्य उनके रिश्तों और आसपास के माहौल पर बहुत अधिक निर्भर रहता है। वे इस बात पर ज़ोर देते हैं कि लंबे समय तक मानसिक और भावनात्मक तनाव हमारे तंत्रिका, हार्मोनल, और प्रतिरक्षा तंत्र को इस हद तक असंतुलित कर देता है कि शरीर का प्रतिरक्षा तंत्र खुद शरीर का दुश्मन बन बैठता है और जीर्ण समस्याएं पैदा होने लगती हैं। 
अपनी किताब, व्हेन दी बॉडी सेस नो (जब शरीर ना कहे) में वे लिखते हैं कि सदमा और लंबे समय तक तनाव शरीर की तनाव-प्रतिरोधी क्षमता को पूरी तरह से ध्वस्त कर देते हैं, और कई शारीरिक समस्याएं पैदा करते हैं। वे आगे लिखते हैं कि हमारे पुरुष-प्रधान समाज के मानदंड महिलाओं को ‘शॉक-एब्ज़ॉर्बर’ की तरह प्रस्तुत करते हैं। अर्थात पुरुष-प्रधान समाज महिलाओं से उम्मीद रखता है कि वे खुद की ज़रूरतों, इच्छाओं, भावनाओं और मन की शांति को दरकिनार करके मात्र घर-परिवार की सुख-शांति को ही अपनी ज़िम्मेदारी समझें। समाज द्वारा थोपी गई इसी स्व-उपेक्षा का नतीजा महिलाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य पर भारी पड़ता है। 
स्वास्थ्य में व्यवस्थागत और सांस्कृतिक सीमाएं 
यहां इस बात का उल्लेख ज़रूरी है कि चिकित्सक घरेलू हिंसा झेल रही महिलाओं की मदद तो करना चाहते हैं, लेकिन ढांचागत और सांस्कृतिक सीमाएं उन्हें रोकती हैं। मेडिकल की पढ़ाई के दौरान स्वास्थ्य कर्मियों को जो अनुभव दिए जाते हैं उसमें और ज़मीनी हकीकत में बड़ा अंतर होता है। 
मेडिकल की पढ़ाई में पूरा ध्यान बीमारियों, अंगों, पैथालॉजी जांच पर केंद्रित रहता है; उसमें मरीज़ की मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक स्थिति के लिए कोई जगह नहीं होती। नतीजतन, बाधाएं बरकरार रहती हैं। इससे निपटने के लिए स्वास्थ्य कर्मियों को कोई खास प्रशिक्षण नहीं दिया जाता। साथ ही, कम समय में कई मरीज़ों को देखना (परामर्श का सीमित समय), निजी जीवन में दखलंदाज़ी का डर, कानूनी फसाद का डर, समस्या को उचित व्यक्ति/संस्था/जगह तक पहुंचाने सम्बंधी अपर्याप्त जानकारी, और खुलकर ऐसे गंभीर विषयों पर चर्चा करने में थोड़ी झिझक भी होती है। 
इन कमियों को दूर करने के लिए संस्थाओं की प्रतिबद्धता, कार्यबल के प्रशिक्षण और समग्र नीति निर्माण ज़रूरी है। हालांकि कागज़ी कार्रवाइयां और समस्या को उचित जगह पहुंचाना ज़रूरी है, लेकिन साथ में चिकित्सा पाठ्यक्रमों और रोज़मर्रा के चिकित्सा अभ्यास में ‘ट्रॉमा-इन्फॉर्म्ड केयर' (सदमा समझकर देखभाल) को शामिल करना भी उतना ही आवश्यक है। वैसे तो भारतीय स्वास्थ्य शिक्षा में विद्यार्थियों को आपातकालीन स्थितियों को संभालने, उनसे निपटने और उस समय शांत, सक्षम और निष्पक्ष बने रहने की पूरी तैयारी करवाई जाती है, लेकिन हिंसा जैसी गंभीर स्थितियों में डॉक्टरों का काम मरीज़ों को केवल दवाई देना, टांके लगाना या मेडिकल टेस्ट कराने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। 
डॉक्टर के लिए मरीज़ के इलाज के दौरान व्यावहारिक दूरी बनाने और पत्थर दिल होने के बीच एक बारीक लकीर होती है। और इस लकीर पर दृढ़ता और करुणा के साथ टिके रहना सीखना शायद ही औपचारिक शिक्षा का हिस्सा होता है। विद्यार्थियों को मरीज़ों के साथ भावनात्मक दूरी रखने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है, लेकिन उन्हें यह नहीं सिखाया जाता कि वे अपने सामने मौजूद मानवीय ज़रूरत को नज़रअंदाज़ किए बिना ऐसा कैसे करें। मेडिकल पाठ्यक्रम में सदमों पर विचार और चर्चाओं की जगह होने से हमारे स्वास्थ्यकर्मी काबिल होने के साथ-साथ संवेदनशील और नरम दिल भी बनेंगे। 
कुछ अहम बदलाव 
चिकित्सकों को सदमा सम्बंधी देखभाल में प्रशिक्षित होना चाहिए। यह पाया गया है कि डॉक्टरों का मरीज़ों और पीड़ितों के साथ शांत और सहानुभूतिपूर्ण बर्ताव मानसिक तनाव कम करता है और पीड़ितों द्वारा आगे सहायता लेने की संभावना बढ़ती है (चंद मिनटों की ही सही)। स्वास्थ्यकर्मी की नपी-तुली सजग उपस्थिति मात्र उपचार में मददगार नहीं होती बल्कि उपचार का हिस्सा होती है। स्वास्थ्य पेशेवरों के सहज संकेतों में शामिल हैं चेहरे के हावभाव, शांत लहज़ा, सम्मानपूर्वक बातचीत, साहस देने वाली प्रक्रिया/चर्चा, और सजग और ध्यान से समस्या सुनना। स्वास्थ्य कर्मी अपनी नियमित दिनचर्या में छोटी-छोटी बातों को ध्यान में रखते हुए ऐसे मौके बना सकते हैं। 
पीड़िता की पहचान: ज़रूरी नहीं कि हर पीड़िता चोट के निशान के साथ ही डॉक्टर के सामने आए। कभी-कभी लक्षण मनो-शारीरिक होते हैं। डॉक्टरों के लिए यह ज़रूरी है कि वे मनो-शारीरिक लक्षणों और हिंसा की संभावना को सक्रिय रूप से पहचानें, इसके लिए शांत और खुले मन से बातचीत करने का मौका दें। यह लक्षणों को समझने में मददगार हो सकता है। 
हिंसा के आयाम को समझना: कुछ परिस्थितियों में पीड़िता हिंसा वाले माहौल या हिंसा करने वालों से दूरी नहीं बना पाती। कुछ ऐसी चीज़ें होती हैं जो पीड़िता को उसी परिस्थिति में थामे रखती हैं; जैसे डर, अकेलेपन की आशंका, आर्थिक-भावनात्मक निर्भरता, परिवर्तन की उम्मीदें, या प्यार। किसी को पूरी तरह छोड़ देने की प्रक्रिया काफी लंबी और दर्द भरी होती है। शोध बताते हैं कि पीड़िता किसी बुरे रिश्ते से पूरी तरह निकलने से पहले उसके पास कई बार वापिस लौटती और निकलती है। 
यहां मुख्य बात यह है कि डॉक्टर को यह समझना चाहिए कि अगर उनका मरीज़ दुर्व्यवहार करने वाले व्यक्ति के पास वापस जाने का फैसला करता है, तो उनका यह फैसला डॉक्टर की देखभाल या उनकी अहमियत पर कोई सवाल नहीं उठाता।
जो मरीज़ अपने उत्पीड़क के पास वापस चला जाए, वह भी जब स्वास्थ्य-कर्मी के पास लौटे, तो करुणा और सहारे का हकदार होता है, न कि निराशा का। ऐसी स्थिति में डॉक्टर को यह सोचने की बजाय कि “मैं नाकाम रहा, क्योंकि वे वापस चले गए,” यह सोचना चाहिए कि “जब भी वे तैयार होंगे तब मैं उनकी मदद कर सकता हूं।”  
समाधान की बजाय मदद करना: ऐसी परिस्थिति में किसी पीड़िता पर यह दबाव नहीं बना सकते कि वह सब कुछ पूरी तरह छोड़ दे; इसकी बजाय उन्हें लगातार सहायता, संबल और ज़रूरी सेवाएं उपलब्ध करा सकते हैं। भारतीय समाज में ज़्यादातर महिलाएं घर या रिश्ता छोड़ नहीं पाती या छोड़ना नहीं चाहती। स्वास्थ्य कर्मियों को इस वास्तविकता के लिए तैयार रहना चाहिए और उन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, जो उनके नियंत्रण में हैं। ऐसी स्थिति में भी पीड़िता को सुरक्षित महसूस कराना, चिकित्सकीय देखभाल देना, उन्हें समझना और उनका मनोबल बढ़ाना जैसी सहायता तो की ही जा सकती है।
बचपन के बुरे अनुभवों के बारे में, सामाजिक तनावों के बारे में जानना और भावनात्मक पीड़ा को समझना जैसे छोटे-छोटे बदलाव भी मरीज़ पर अच्छा असर डाल सकते हैं।
सुरक्षित माहौल, न कि झटपट निर्णय: इन हालातों में आम तौर पर महिलाएं मानसिक स्वास्थ्य के लिए ‘काउन्सलर या मनोचिकित्सक’ के पास नहीं जा पातीं या जाने से कतराती हैं। इसलिए हिंसा से पीड़ित ज़्यादातर महिलाओं के पास डॉक्टर ही एकमात्र सहारा होता है। ऐसे में उनके लिए डॉक्टर के पास सहानुभूतिपूर्ण और एक ऐसी जगह की ज़रूरत होती है जहां कोई ठप्पा नहीं लगाया जाएगा। बिना ज़ोर-ज़बरदस्ती के देखभाल को प्राथमिकता देना, जांच से पहले सहमति लेना, और डॉक्टर के कक्ष में उनकी सीमाओं का सम्मान करना - ये सभी बातें उन्हें एक ऐसा सुरक्षित माहौल देती हैं, जो उन्हें अपने पारिवारिक परिवेश में नहीं मिल पाता। 
हमेशा उपलब्ध रहना, बिना किसी पूर्वाग्रह के पेश आना और ज़ोर-ज़बर्दस्ती न करना - ये बातें किसी पीड़िता को दोबारा मदद लेने को तैयार कर सकती हैं। और कभी-कभी, किसी पीड़िता के लिए सबसे मददगार साबित होता है कि कोई उसकी कहानी पर विश्वास करे। 
भावुक नहीं, संवेदनशील बने: दूसरों (पीड़िता) की परेशानी समझने के समय डॉक्टर खुद की मनदुरुस्ती का भी ख्याल रखें, और यह समझें कि उन्हें क्या करना है और क्या नहीं। निराशा, उदासी या क्रोध को समझने के लिए चिंतनशील अभ्यास, पर्यवेक्षण या सहकर्मियों की सहायता महत्वपूर्ण है। मन को शांत और संवेदना के साथ-साथ ज़्यादा भावुक होने से बचाना भी ज़रूरी है। चुनौतीपूर्ण मामलों के बाद डायरी लिखना या दूसरे साथियों से चर्चा करना मददगार हो सकता है।
यह काम मानसिक और भावनात्मक रूप से थका देने वाला है। इसलिए डॉक्टरों को यह भी समझना होगा कि ऐसी परिस्थितियों में पीड़ितों के फैसले उनकी देखभाल की काबिलियत नहीं दर्शाते। संयमित चिकित्सक के रूप में संयमित चिकित्सकीय स्थान बनाते समय अपने बारे में सोचना तनाव से बचाता है।
महिलाओं का सम्मान: चुप्पी तोड़ें, हिंसा अस्वीकार्य करें 
ज़्यादातर भारतीय घरों में हिंसा केवल इसी वजह से होती आई है क्योंकि समाज और महिलाएं चुप्पी साध लेते हैं। नारी को पूजने वाले देश में जब महिलाओं के प्रति अत्याचार-दुर्व्यवहार होते हैं तो वही समाज आंखें फेर लेता है, जबकि ऐसा व्यवहार बिल्कुल बर्दाश्त नहीं किया जाना चाहिए। यह विरोधाभास परेशान करने वाला है।
महिलाओं के प्रति हिंसा को एक निजी मामला या नियति मानना स्वीकार्य नहीं है। हमें सिखाया जाता है कि घर की ‘इज्जत’ हर हाल, हर कीमत पर बनी रहनी चाहिए। लेकिन अत्याचारों को छुपाना और चुपचाप सहते रहना कोई सम्मानजनक बात नहीं है। 
सांस्कृतिक बदलाव तब शुरू होगा जब हम महिलाओं को सिर्फ इज़्ज़त का समंदर, त्याग की मूर्ति, या महज़ पीड़ित के तौर पर नहीं, बल्कि एक संपूर्ण इंसान के तौर पर देखेंगे - जिनकी सुरक्षा और गरिमा के साथ कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इस बदलाव की शुरुआत घर-स्कूलों की आम चर्चाओं से, और नई पीढ़ी को जागरूक करने से होती है। यह सिखाने से होती है कि प्यार का मतलब चुप्पी, डर और सहन करना नहीं है।  
जब तक यह बड़ा सामाजिक बदलाव होता है तब तक स्वास्थ्य केंद्रों और स्वास्थ्य कर्मियों से ही उम्मीद की जा सकती है कि वे इन महिलाओं के लिए सुरक्षा के ठिकाने बनें और मेडिकल पाठ्यक्रम में ‘सदमा को समझकर देखभाल' सिखाने को प्राथमिकता दी जाए। (स्रोत फीचर्स)